सादर ब्लॉगस्ते पर आपका स्वागत है।
Showing posts with label Sumit. Show all posts
Showing posts with label Sumit. Show all posts

Sunday, September 27, 2015

कविता : खूनी दरवाजा



दिल्ली गेट के पास
इतिहास के दुःख भरे पलों को 
अपने सीने में दबाए
उदास गुमसुम सा
खड़ा है खूनी दरवाजा
जब भी सुनता है 
कोई अनजान सी आहट तो
हो उठता है चौकन्ना
और अपने विशाल शरीर को 
कड़ा कर मजबूत करने लगता है
कुछ देर बाद 
अपने इस प्रयास में 
असफल होने पर
सुबकने लगता है खूनी दरवाजा
उसे अचानक याद आते हैं वो क्षण 
जब आजादी की चाह में
बादशाह ने फूँका था
विद्रोह का बिगुल
बदले में बादशाह ने
पाया था निर्वासन
और उसके शहजादों को
इसी दरवाजे पर 
सरेआम भून दिया था
सफ़ेद शैतानों ने गोलियों से
उन हत्यारे पलों को 
याद करते हुए
खूनी दरवाजा बेबसी से
तड़पने लगता है
फिर अचानक गर्वित हो
खड़ा हो जाता है तन कर
और माँग करता है कि
जब बदल दिए गए
कई शहरों, सड़कों और 
मोहल्लों के नाम 
तो क्यों न 
उसका भी नाम बदला जाये
और खूनी दरवाजा में 
दरवाजे को ज्यों का त्यों
बेशक रखा जाये लेकिन
खूनी के बदले कर दिया जाये
शहीद या फिर क़ुरबानी
तब खूनी दरवाजा 
शहीद दरवाजा या क़ुरबानी दरवाजा हो
रहेगा सदा ही गर्व से तना
और करेगा स्वागत 
हर राहगीर का 
उत्साह और प्रफुल्लता से।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

Friday, July 17, 2015

कागा अब बोले नहीं मुंडेर पे (व्यंग्य)


   हुत दिन गुज़र गए पर अपनी मुंडेर पर कोई कागा अर्थात कौआ काँव-काँव करते नहीं दिखा। एक वो भी दिन थे जब अक्सर कौए काँव-काँव करते मुंडेर पर दिख जाते थे और हम बालक चीखते हुए उनसे कहते थे ‘उड़ जा कौआ चाचा आते हों’ या फिर ‘उड़ जा कौआ मामा आते हों’। सच कहें बेशक हम इतने बड़े हो गए लेकिन बचपन दिल में अभी भी जीवित है और ये बचपन अक्सर जिद करता है कि हमारी मुंडेर पर कोई कौआ आकर बैठे और जोर से काँव-काँव करे और फिर हम चीखकर बोलें ‘उड़ जा कौआ कोई अपना आता हो’। पर दिल की बात दिल में ही रह जाती है और कोई कौआ मुंडेर की ओर मुंह भी नहीं मारता और ये बचपन दिल के भीतर ही बैठा हुआ तड़पता रहता है। आजकल कौए भी ईद के चाँद बन चुके हैं वो साल में दो बार दिख भी जाता है लेकिन ये कौए तो साल में एक ही बार दीखते हैं वो भी श्राद्धों में। आखिर कौओं ने घर पर आना और आकर मुंडेर पर बैठकर काँव-काँव करने की परम्परा का त्याग क्यों कर दिया? कहीं उन्हें भी कलियुगी संस्कृति ने अपनी छत्रछाया में जगह तो नहीं दे दी जो वो दूत बनना छोड़कर यूँ अचानक लापता हो गए। फिर मन सोचता है कि कौए बेचारे भी क्या करें आज के युग में बेटा बाप का नहीं रहा, भाई को भाई फूटी आँख नहीं सुहाता तो रिश्तेदार अपने दूसरे रिश्तेदारों को सीधी आँख भला कैसे देख सकते हैं? जैसे-जैसे समय बीत रहा है, लोगों की आशाएँ विशाल और ह्रदय सिकुड़कर छोटे होते जा रहे हैं और उन सिकुड़ते हृदयों में रिश्तेदार तो कभी रह ही नहीं सकते। पहले रिश्तेदार एक दूसरे के सुख-दुःख के साथी होते थे। मुसीबत के समय अपने रिश्तेदार के कंधे से कन्धा मिलाकर खड़े हो जाना सच्चे रिश्तेदार की निशानी होती थी। पर समय के कोल्हू ने रिश्तेदारी को ऐसा पेरा कि न तो सच्ची रिश्तेदारी सलामत बची और न ही सच्चे रिश्तेदार। छोटे-छोटे स्वार्थ की खातिर रिश्तेदार का राम नाम सत्य तक कर देने को तत्पर रिश्तेदारों को रिश्तेदारी का र भी ठीक ज्ञात नहीं रहा हो तो कौए बेचारे क्या करें? वो कैसे पता लगायें कि घर आनेवाला वाकई में रिश्तेदार है क्योंकि उसके हृदय में तो रिश्तेदारी नामक तत्व पहले ही तार-तार हो चुका मिलता है। शायद इसीलिए कोई कौआ भूले-भटके घर की मुंडेर पर बैठ भी जाए तो किसी रिश्तेदार के आने की सूचना देने को काँव-काँव नहीं करता। असल में उसे रिश्तेदार के दिल में वो पुराना प्रेम व स्नेह दिखाई ही नहीं देता इसलिए उसके भीतर काँव-काँव कर ख़ुशी मनाने की भावना भी दम तोड़ देती है। इसलिए कौओं ने अब काँव-काँव करना छोड़ दिया है। शहरों में बड़े-बड़े मकानों और संकुचित दिलों वाले भले लोग भी भला कहाँ कामना करते हैं कि कोई कौआ काँव-काँव करे और कोई रिश्तेदार आ टपके तथा उनकी व्यस्तता में खलल डाल दे। इसलिए उन्होंने अपने घर की मुंडेर पर काँच या लोहे के कंटीले तार लगाकर कौओं को वहाँ बैठने से अवरुद्ध कर दिया। अब कौओं को भी मुंडेर पर काँव-काँव कर मेहमान या रिश्तेदार के आने का संदेशा देने का चाव नहीं रहा है। अब वे अपना समय या तो किसी लाश का माँस नोंचने में व्यतीत करते हैं या फिर मनुष्य का वेश धरकर किसी सदन में जाकर काँव-काँव करने लगते हैं।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 


Sunday, March 2, 2014

गौना (कहानी)


  माज सेवा का चाव लिए एक दिन कुछ मित्रों के साथ मिलकर हमने भी एक एन.जी.ओ. रजिस्टर्ड करवा लिया. अब हमारे सामने प्रश्न यह था, कि अपने एन.जी.ओ. के द्वारा पहला भला काम क्या किया जाए? हमने यह निश्चय किया कि अपने एन.जी.ओ. की शुरुआत किसी ऐसे भले काम से करेंगे जो वास्तव में भला हो. हमने अपने सभी मित्रों, नाते-रिश्तेदारों को इस विषय में सूचित करके इस बारे में उनकी नेक राय माँगी, लेकिन भले काम के बारे में सुनकर वे राय देने से शायद इसलिए डर गए, कि कहीं उनकी राय के साथ हम उनकी जेब भी ढीली न करवा दें. सो उन्होंने हमें यह राय दी कि फालतू चक्करों में पड़ने के बजाय अपने काम पर ध्यान दें और जीवन जैसा चल रहा है उसे वैसा ही चलने दें. यह एन.जी.ओ. वगैरह चलाना नेताओं और बड़े लोगों काम है और हम मिडिल क्लास वाले इस लायक नहीं हैं, कि एन.जी.ओ. जैसी बड़ी चीज के विषय में सोचें भी. उनकी मिडिल क्लास सोच पर गुस्सा भी आया और हँसी भी. अरे भई अब क्या अच्छा काम करने के लिए भी हाई क्लास या मिडिल क्लास के होने या न होने के बारे में भी सोचना पड़ेगा? 
सब ओर से निराशा मिलने के बाद  हमने फैसला किया कि अब हम स्वयं ही यह निर्णय करेंगे, कि एन.जी.ओ. का शुभारंभ किस भले कार्य से किया जाए. आख़िरकार दो दिन की चर्चा में हमारी मेहनत रंग लाई और हमने अपने एन.जी.ओ. की ओपनिंग के लिए एक भला कार्य चुन लिया. हमने निर्णय लिया कि हम अपने एन.जी.ओ. के द्वारा  किसी गरीब कन्या का विवाह करवाएँगे. हमने अपने खास-खास रिश्तेदारों में इस बारे में विधिवत सूचना भिजवा दी और उन सबसे विनम्र आग्रह किया कि किसी गरीब कन्या की तलाश करें ताकि इस नेक कार्य को करके हमारे एन.जी.ओ. का शुभारंभ हो सके.
अगले दिन ही नाना जी का फोन आया कि उन्होंने एक गरीब कन्या की खोज कर ली है. वह नाना जी के घर के सामने भाड़ भूनने वाले भुज्जी की लड़की थी.  भुज्जी, जिसका नाम संतोष था और गाँव में उसे सब प्यार से संतोषा कहते थे, ने बेटा पाने की लालसा में लड़कियों की कतार लगा दी थी. छः लड़कियाँ होने के पश्चात आखिर उनकी मनोकामना पूर्ण हुई और उसके घर एक बेटा पैदा हुआ. अब संतोषा के घर में बूढ़े माँ-बाप, पत्नी, बच्चों  और स्वयं को जोड़कर एक क्रिकेट टीम तैयार हो चुकी थी, जिसने उसके घर के बजट को क्लीन बोल्ड कर दिया था. वो तो नाना जी के घर में नानी और मामियों के काम में उसकी लड़कियाँ सहायता कर देती थीं और बदले में नाना जी की ओर से उसके घर के गुजारे लायक मदद मिल जाती थी. जब नाना जी को फोन पर गला फाड़ कर हमारी शुभ काम करने की योजना के बारे में संतोषा ने सुना, उसने नाना जी के तब तक पैर नहीं छोड़े जब तक कि उन्होंने इस बात का वादा नहीं कर दिया कि हमारे एन.जी.ओ. का शुभारंभ उसकी बड़ी बेटी के विवाह से ही होगा.
हालाँकि इस बारे में शायद पूरा गाँव ही सुन चुका होगा, क्योंकि नाना जी फोन पर इतनी तेज आवाज में बात करते हैं, कि उनकी बिटिया यानि कि मेरी माँ भी यह अनुभव करने लगती हैं वो अपने दामाद यानि कि मेरे पिता के मुकाबले फोन पर कुछ ज्यादा ही चीखते हुए बतियाते हैं. अब जाने नाना जी के कान में सुनने में कोई दिक्कत है या फिर वो फोन के दूसरी ओर बात कर रहे इंसान को ही बहरा समझते हैं.  
नाना जी ने हमें आदेश दिया कि जल्द से जल्द इस शुभ कार्य को अंजाम किया जाए. हमारी सबसे छोटी मौसी का फोन आया कि वह भी इस शुभ कार्य में हमारे साथ रहेंगी और उनसे बात करने पर पता चल गया कि वो केवल विवाह मंडप पर ही हमारे साथ रहेंगी. मामाओं व मामियों ने भी इस भले कार्य में हमारा पूरा साथ देने का वादा किया. अब यह पता नहीं चल पाया कि वे कितना साथ देंगे. वैसे हमने उनके साथ के प्रकार के बारे में ज्यादा पूछना भी उचित नहीं समझा, क्योंकि हमें लगा कि वे सब मन से भी हमारे साथ रहें तो भी कम से कम कुछ सहारा तो मिलेगा ही.
जहाँ हमारे रिश्तेदार इस कार्य में सहयोग करने को उत्सुक हो रहे थे, वहीं हमारे एन.जी.ओ. के एक सदस्य, जो अपने विचारों से विद्रोही स्वाभाव का था, के प्रभाव में आकर अन्य सदस्य हमारे विरोध पर उतर आए. उन सबने मिलकर तर्क दिया कि एन.जी.ओ. का आरंभ किसी छोटे-मोटे भले कार्य के माध्यम से होना चाहिए न कि ऐसे भारी-भरकम बजट वाले काम से. हम गंभीर सोच में पड़ गए, लेकिन हमारी टीम, जिसमें अब केवल मैं और मेरी माँ ही बचे थे, ने फैसला लिया कि एक बार जिस काम को करने का फैसला कर लिया है तो उसे पूरा करके ही दम लेंगे. एन.जी.ओ. के सदस्यों के अलावा हमें अपने पारिवारिक सदस्यों का विरोध भी झेलना पड़ा. पिता जी और बड़े भाई को जब हमारी योजना के बारे में पता चला तो उन्होंने कहा कि यहाँ क्या अनाप-शनाप पैसा आ रहा जो इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठा ली.
चारों ओर से होनेवाले विरोध से हमारा उत्साह कुछ पल के लिए भंग हो गया, लेकिन शरीर में राजपूती खून ने उबाल मारा और “रघुकुल रीत सदा चलि आई / प्राण जायें पर वचन न जाई” दोहे को दोहराते हुए हमने निर्णय किया कि इस भले कार्य को हम करके ही रहेंगे चाहे कोई बुरा माने या भला. एन.जी.ओ. के बाकी सदस्यों को जब हमारे इस दृढ फैसले के बारे में पता चला तो उन्होंने कोई भी सहायता करने से साफ़ इंकार कर दिया और पिता जी और बड़े भाई से किसी मदद की उम्मीद हमने कभी की ही नहीं थी. हम हमें जो कुछ करना था खुद ही करना था.
माँ ने अपनी बचत पोटली और मैंने अपनी एक्स्ट्रा पे को इस भले कार्य में होम करने का निर्णय किया. अपनी आर्थिक तैयारी के उपरांत हमने नाना जी से संतोषा की बेटी के विवाह के लिए शुभ मुहूर्त निकलवाने के लिए कहा. नाना जी ने विवाह का मुहूर्त निकलवा कर आदेश दिया, कि विवाह तिथि से एक सप्ताह पहले ही विवाह की तैयारी करवाने के लिए हम उनके घर हाज़िर हो जायें. 
हम माँ और बेटे विवाह की तय तिथि से एक सप्ताह पहले ही  नाना जी की हवेली में पहुँच गए. हमें वहाँ सभी मौसा-मौसियाँ अपने बाल-बच्चों के साथ उपस्थित मिले. पूरे घर में उत्सव सा माहौल था. हमारे लिए उत्सव का माहौल कुछ देर बाद ही मायूसी से भर गया. कारण यह था कि नाना जी ने संतोषा की बेटी के विवाह का जो बजट बनाया था वह मेरी एक्स्ट्रा पे और माँ की बचत से कई गुना अधिक था. हमने नाना जी से हिम्मत जुटाकर यह पूछने की हिम्मत की, कि हम गरीब कन्या का विवाह करने जा रहे हैं या फिर राजसी घराने की किसी लाडली का? यह सुनते ही नाना जी भड़क उठे और बोले कि उन्होंने आस-पास के गाँवों में इस विवाह की घोषणा कर दी है और हम संतोषा की बेटी का विवाह राजपूती आन-बान के साथ किया जाएगा. अगर ऐसा नहीं हुआ तो वो कहीं मुँह दिखाने के लायक नहीं रहेंगे.
राजपूती आन-बान पर कुर्बान होना अब हमारी विवशता बन गई थी. अब हमारे सामने यक्ष प्रश्न यह था, कि इस लंबे-तगड़े बजट के लिए धन का इंतज़ाम आखिर कैसे किया जाए? पिता जी और भाई से इस बारे में बात करना ओखली में सिर देना होता. एन.जी.ओ. के अन्य सदस्यों से कोई आस थी नहीं. हमें निराश देख हमेशा की तरह माँ की माँ यानि कि मेरी नानी जी ने संकटमोचक की भूमिका निभाई और हमें चुपचाप उधार के तौर पर विवाह में खर्च होनेवाली राशि प्रदान कर दी.
हमने राजपूती परंपरा के अनुसार संतोषा की बेटी के लिए दहेज का सामान ख़रीदा व विवाह हेतु जरूरी सामान का प्रबंध किया. आस-पास गाँवों में इस विवाह के बारे में खबर फैल गई और सभी नाना जी की तारीफों के पुल बाँधने लगे. गाँव वाले इस बात से अनजान थे कि विवाह हम अपने एन.जी.ओ. के अंतर्गत करवा रहे थे. वे तो यह समझ रहे थे कि यह सब नाना जी की कृपा से हो रहा है. हालाँकि ऐसी बात नहीं थी कि नाना जी ने कोई मदद नहीं की. नाना जी के आदेश पर घरातियों व बारातियों के भोजन में खर्च होने के लिए आटा और दाल की बोरियाँ गोदाम से निकाल कर हाज़िर कर दी गईं.
निश्चित दिन व समय पर संतोषा की बेटी का विवाह बड़े धूम-धाम से संपन्न हुआ. आस-पास के गाँवों में रहनेवाले लोग इस विवाह को कौतूहलवश देखने आए और नाना जी की जय-जयकार करते हुए वापस गए. हमने मामा की लड़की को इस विवाह की तस्वीरें खींचने के लिए उसके हाथ में कैमरा देकर नियुक्त कर दिया, ताकि वो तस्वीरें हमारे नवनिर्मित एन.जी.ओ. की ऑडिट रिपोर्ट के काम आ सकें, लेकिन उसका कैमरा अपने दादा के मूछों पर ताव देते हुए अंदाज से दूसरी ओर घूमा ही नहीं. विवाह होने के बाद संतोषा की बेटी को नम आँखों से हम सबने विदा किया. विवाहरुपी शुभ कार्य करने के दो दिन बाद ही हम वापस अपने घररुपी ठिकाने में पहुँच गए.
हम इस आर्थिक झटके से उबरने की कोशिश कर ही रहे थे, कि एक दिन नाना जी का फोन आ गया. घर की खैर-खबर पूछने के बाद उन्होंने बताया, कि उनके पास सुबह संतोषा आया था और पूछ रहा था कि बेटी का गौना करवाने की तारीख कबकी रखी जाए? नाना जी ने कहा, कि जिस प्रकार ठाट-बाट से संतोष की बेटी का विवाह हुआ था, उसी प्रकार गौना भी होना चाहिए वरना इलाके में हाल ही में बनी इज्ज़त मिटटी में मिल जायेगी. फोन रखने के बाद निराश और दुखी हो माँ मेरा और मैं उनका मुँह देखने लगा.  
कुछ देर बाद फिर से फोन की घंटी बजी. दूसरी ओर संतोषा था. वह माँ को प्रणाम करके बोला, “जीजी रचना के गौना की तारीख कब की रखी जाए?”

इतना सुनते ही माँ ने घबराकर फोन काट दिया और हम माँ-बेटे अपना-अपना सिर पकड़कर गहरी सोच में डूब गए.

सुमित प्रताप सिंह

इटावा, नई दिल्ली, भारत 

Monday, February 17, 2014

व्यंग्य: मिस्ड कॉल

    पको वो बीते दिन तो याद ही होंगे, जब मोबाइल फोन हमारे जीवन का अभिन्न अंग बना था। लैंडलाइन फोन के सहारे गुजर-बसर करनेवाले हम भोले और भाले जीवों के नीरस होते जा रहे जीवन में एक नई अनुभूति का अहसास करवाने आया था मोबाइल फोन और उसके साथ ही साथ आ धमकी थी मिस्ड कॉल। शुरूआती दौर में आउट-गोइंग व इनकमिंग के बहुत अधिक दाम लगते थे। इसलिए शान दिखाने के चक्कर में मोबाइल फोन मध्यवर्गीय भारतीय मानुष की जेब ढीली कर डालता थालेकिन हम भारतीय  तो ठहरे हर मुश्किल का हल निकालने में सिद्धहस्त। सो इस समस्या को भी दूर करने में हमने अधिक समय नहीं लगाया। अब लोग एक दूसरे से बतियाने के लिए मिस्ड कॉल का प्रयोग करने लगे। उधर से मिस्ड कॉल आती और इधर से सस्ते लैंडलाइन का सदुपयोग होना आरम्भ हो जाता। प्रेमी और प्रेमिकाओं की तो लव लाइफ मिस्ड कॉल से निकल पड़ी। मिस्ड कॉल ने प्रेम के पंछियों का भाग्य ही बना डाला। उधर से प्रेमिका मिस्ड कॉल मारती और इधर प्रेमी महोदय टेलीफोन की दुकान के कोने में बने फोन बूथ में लैंड लाइन से प्रेमिका को फोन मिलाकर उसमें खो जाते थे और अपनी जेब ढीली करवाते रहते थे 
हालाँकि मिस्ड कॉल का बाकी समाज को भी बहुत लाभ मिला। सड़कों पर अवैध रूप से विराजमान रेहड़ी-पटरी वाले मिस्ड कॉल मिलते ही अपना सामान-सट्टा लेकर रफू चक्कर हो जाते थे और नगर निगम वाले बचे हुए नाममात्र सामान से ही वजू करने को विवश होकर  जाते थे। चोरोंसटोरियों और उन जैसे अन्य भले मानुषों के लिए मिस्ड कॉल  वरदान जैसा कार्य करती थी। जैसे ही उनपर पुलिसिया धावे का अंदेशा होतातभी कहीं से मिस्ड कॉल आ जाती और वे तथाकथित भले मानुष झट से जाने कहाँ अदृश्य हो जाते और बेचारे पुलिसवालों का हाल साँप के गुज़र जाने पर लकीर पीटते रह जानेवाला हो जाता।

समय बदला टेलिकॉम कंपनियों की आपसी प्रतिद्वंदिता ने इनकमिंग कॉल मुफ्त करवा डाली और आउटगोइंग कॉल भी पहले के मुकाबले काफी सस्ती हो गईलेकिन मिस्ड कॉल का जलवा अभी बरक़रार है। हमपर तो इसकी विशेष तौर से कृपा रहती है। दोस्तयार व रिश्तेदार सभी मिस्ड कॉल नामक प्रेम हमें अक्सर प्रदान करते रहते हैं और हम उनके मिस्ड कॉल रुपी प्रेम का खामियाजा आउटगोइंग कॉल कर-करके भरते रहते हैं। लोग हैं कि अपना लाभ देखते हुए हमें मिस्ड कॉल की सेवा देते रहते हैं और एक हम हैं जो सर्वप्रेम का भाव दिल में बसाये हुए मिस्ड कॉल का जवाब दे-देकर लक्ष्मी मैया को हमसे धीमे-धीमे दूर करते रहते हैं । एक बार किसी काम व्यस्त थेकि एक दोस्त की मिस्ड कॉल आ गई। जब हमने उसे कॉल किया तो खिलखिलाते हुए बोला, "यार अब क्या बताएँ असल में महीने का आखिरी दिन हैइसलिए मोबाइल रिचार्ज नहीं करवा पाया सो मिस्ड कॉल करनी पड़ी"। मन तो हुआ कि उस दुष्ट से पूछ लें, कि यहाँ हमारा क्या महीने का पहला दिन हैइस दिन हमारा भी महीने का आखिरी दिन ही होता है और इस रोज हमारे वेतन का भी लगभग राम नाम सत्य हो चुका होता है। पर आदत से मजबूर जो ठहरे। माँ-बाप ने बचपन से ऐसी आदत डाल रखी हैकि किसी का दिल नहीं दुखाया जाता चाहे बेशक दूसरा हमारे दिल के हजार टुकड़े करके चला जाए। फिर यह सोचते हैं कि कभी वो भी दिन थे जब मिस्ड कॉल की प्रतीक्षा में हमारे पल कितनी बेचैनी और इंतज़ार में बीता करते थे। इसलिए मन मसोस कर इस मिस्ड कॉल नामक विपदा को झेलते रहते हैं। ये लो जी फिर से ससुरी मिस्ड कॉल आ गई। चलिए लगता है कि किसी गरीब ने इस तथाकथित अमीर को याद फ़रमाया है।
सुमित प्रताप सिंह 
इटावा, नई दिल्ली, भारत 

Friday, February 7, 2014

व्यंग्य: संपादक की पत्नी

   संपादक की पत्नी नामक संबंध लेखक समुदाय के लिए बड़ा ही पवित्र है. संपादक महोदय हमारे लिए यदि आदरणीय हैं, तो उनकी पत्नी महोदया हम सबके लिए परम आदरणीया हैं. हम लेखकों को नचाने वाले संपादक नामक खिलौने को कसने की चाभी उन्हीं के पावन हाथों में विराजमान रहती है, जिसका समय-समय पर उनके कोमल दिखनेवाले कठोर हाथों से सदुपयोग होता रहता है.  वो संपादक के जीवन की स्वामिनी हैं. वो उनके सारे सुखों को हरने वाली है और उनका जीवन दुखों से भरने वाली हैं. संपादक जी वैसे तो अपने घर से बाहर शेर हैं, किन्तु घर में पहुँचकर अपनी परम परमेश्वरी पत्नी के सामने कोल्हू का बैल बनकर हो जाते ढेर हैं. कोल्हू का बैल बनना उनकी नियति है. दिन भर दफ्तर में पिरते हैं फिर अपने घर में थके-मांदे अपनी पत्नी के निर्देश पर पिरते-पिरते आहें भरते हैं. उनका घर उनके कठिन परिश्रम से बना हुआ उनकी पत्नी का साम्राज्यिक संसार है और उस साम्राज्य में संपादक की हर साँस पत्नी के आदेश से ही भीतर व बाहर आती और जाती है. संपादक द्वारा अस्वीकारे व दुत्कारे जाने पर हम लेखकों की अंतिम आस हैं संपादक की पत्नी. उन्होंने यदि स्वीकृति दे दी, तो समझो लेखकों का भाग्य जाग गया और यदि उन्होंने भी दुत्कार दिया, तो लेखनी छोड़कर दूसरा कार्य करने में ही भलाई है. इसलिए यदि वो थोड़ी-बहुत बदसूरत भी हैं, तो भी उनकी खूबसूरती की शान में कसीदे पढ़े जा सकते हैं. उनकी आँखों में थोड़ी-बहुत विकृति है या थोड़ा-बहुत भेंगा भी देखती हैं तो क्या हुआ ? हम लेखकों के लिए तो वो मृगनयनी ही हैं. वो चाहे लगड़ाकर चलें या फिर बैसाखी के सहारे पर हमारी दृष्टि में उनकी चाल हिरनी की चाल को भी मात देती है. उनकी कर्कश बोली भी हमारे कानों में रस घोल देती है. चाहे उनकी आवाज सुनते-सुनते हमारा सिर दर्द से फटने लगे, किन्तु फिर भी हमें अपने मुस्कुराते चेहरे संग वाह-वाह करने का धर्म ही निभाना चाहिए. उनके रूखे-सूखे बाल भी काली घटाओं से प्रतीत होते हैं और उनकी छोटी सी चोटी भी काली नागिन का आभास करती प्रतीत होती है.  उनकी बेढंगी स्थूल काया भी मॉडलों की छरहरी काया को मात देती है. उनकी हँसी बेशक औरों को भयानक लगे किन्तु हम लेखकों के लिए वो ऐसी लगती है जैसे फूल झर रहे हों. अनेक कमियाँ होते हुए भी इस धरा पर वो एक संपूर्ण नारी हैं, क्योंकि वो एक पत्नी हैं वह भी किसी ऐरे-गैरे या नत्थू-खैरे की नहीं की नहीं, बल्कि माननीय संपादक महोदय की पत्नी हैं. वो जो कहें वह सत्य है और जो न कहें वह भी सत्य है. वो हम लेखकों को लेखन की वैतरणी पार करवाने वाली खेवा हैं. संपादक द्वारा हम लेखकों पर की गईं ज्यादतियों के लिए उन्हें सबक सिखाने का हमारा अचूक अस्त्र और शस्त्र हैं  संपादक की पत्नी. यदि उनका वरद हस्त हम लेखकों को मिल जाये तो लेखकीय कैरियर बिगड़ते- बिगड़ते बन जाये, अन्यथा संवरते-संवरते बिगड़ जाये. इसलिए आइये हाथ जोड़कर नमन करें इस वसुंधरा पर अवतरित हुई उस महान नारी को, जिसके हाथ में हम लेखकों के भाग्य को बनाने व बिगाड़ने की कुंजी है.
सुमित प्रताप सिंह 
इटावा, नई दिल्ली, भारत 

Friday, January 3, 2014

कहानी: एक प्रेम कहानी ऐसी भी

  वाराणसी के पावन घाट पर ज्योति और कुलदीप के बीच प्रेम का बीज उपजा था. दोनों ही वाराणसी के होस्टलों में रहते हुए शिक्षा ग्रहण कर रहे थे. एक दिन कुलदीप अपने दोस्तों और ज्योति अपनी सहेलियों के साथ वाराणसी के घाट पर गंगा मैया के दर्शन करने आये और उनकी एक-दूसरे से ऐसी नज़रें मिलीं तो एक-दूसरे के हो गए. धीरे-धीरे मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ और दोनों में प्यार बढ़ता गया. अब ज्योति को अपना नीरस सा जीवन उमंगों से भरा लगने लगा था. पहले वह किताबों के संसार में सिमटकर खोयी रहती थी. उसका मकसद था पढ़-लिखकर एक मुकाम पाना और अपने माता-पिता का सिर गर्व से ऊँचा करना. इसी संसार में खोये हुए अक्सर वह हर युवा लड़की की भांति स्वप्न देखा करती थी उस सपनों के राजकुमार के जो आसमान से घोड़े पर सवार होकर आएगा और उसे अपने साथ अपने सपनों की रानी बनाकर ले जाएगा.
कुलदीप के रूप में ज्योति को उसके सपनों का राजकुमार मिल चुका था. अब वह अपने सपनों के राजकुमार के साथ भविष्य के सपने सजोने लगी. एक दिन ज्योति की गोद में लेटे हुए कुलदीप ने ज्योति को उदास देख उसकी उदासी का कारण जानना चाहा तो उसने टालने की कोशिश की. जब कुलदीप नहीं माना तो उसकी जिद के आगे उसे झुकना पड़ा.
ज्योति धीमे स्वर में बोली, “कुलदीप मैं तुम्हें कई दिनों से बताना चाह रही थी, लेकिन अक्सर झेंप जाती थी. मेरे पेट में तुम्हारा बच्चा है.”
“ये क्या कह रही हो?” कुलदीप को विश्वास नहीं हुआ.
ज्योति उसके गले से लगती हुई बोली, “सच कह रही हूँ. हम दोनों के प्यार का बीज मेरे गर्भ में पल रहा है.”
“मैं कैसे मान लूँ कि यह बच्चा हमारे प्यार का ही फल है?” कुलदीप ने कठोर बनते हुए कहा.
ज्योति उसकी बात सुनकर हैरान हो गई, “तुम ये कैसी बातें कर रहे हो? ये हमारे प्यार का फल नहीं है तो फिर किसके प्यार का फल है?”
“अब जाने तुमने कितनों के साथ प्रेमलीला खेली हो और उसके फल को मेरे माथे मढ़ रही हो.” कुलदीप व्यंग्यात्मक हँसी हँसते हुए बोला.
ज्योति को जैसे आघात सा लगा, “तुमने मुझे क्या धन्धेवाली समझा है, जो मैं सबसे प्रेमलीला रचाती फिरुंगी.”
“मैं कुछ नहीं जानता. आज से मेरा तुमसे कोई संबंध नहीं है. तुम्हारी होने वाली संतान तुम्हें ही मुबारक हो.” इतना कहकर कुलदीप वहाँ से चला गया और ज्योति वहीं पार्क के कोने में बिलखती रही. 
इस मुसीबत की घड़ी में ज्योति की प्रिय सहेली रेनू ने उसका बहुत साथ दिया. ज्योति के गर्भ में बच्चा छः महीने का हो चुका था, सो डॉक्टर ने गर्भपात से इनकार कर दिया. अब रेनू  शहर में एक किराये का मकान खोजकर ज्योति को रखकर उसकी देखभाल करने लगी. एक दिन ज्योति ने एक सुंदर बालक को जन्म दिया. अब ज्योति सोचने लगी कि बिन ब्याही होकर माँ बनने की बात अगर माँ-बाप को पता लगी तो वे तो जीते-जी मर जायेंगे.
रेनू ने इस विपदा से बचने का उपाय सुझाया. दोनों सहेलियाँ सवेरे-सवेरे वाराणसी के घाट के पास स्थित एक मंदिर में गईं और मंदिर के मुख्य द्वार पर ज्योति ने सुबकते हुए अपनी संतान को रखा और वहाँ से भारी मन लिए चली आई.
जब मंदिर के पुजारी ने नन्हे बालक को देखा तो चौंक गए और चीखकर बोले, “अरे ये कौन अपना बच्चा छोड़ गया है यहाँ पर.”
वहीं बगल से निकल रही सफाई कर्मचारी शन्नो ने जब यह देखा तो झट से बोली, “पुजारी जी मेरा बच्चा है. भगवान का आशीर्वाद दिलवाने आई थी.”
पुजारी जी क्रोधित होकर बोले, ”आशीर्वाद दिलवाने लाई थी तो अपनी गोद में रखती. यहाँ रास्ते में क्यों पटक दिया? कहीं पैर इसके ऊपर पड़ जाता तो.”
शन्नो बोली, “पुजारी जी माफ कर दीजिए. छोटी जाति की हूँ न सो आप बड़ी जाति वालों जितना दिमाग नहीं चलता.” इतना कहकर शन्नो उस बच्चे को लेकर चंपत हो गई.
शन्नो उस बच्चे को गोद में छुपाये तेजी से चलते हुए बड़बडा रही थी, “हे भगवान आज तूने मेरी लोटरी खोल दी. मेमसाब की सूनी गोद में यह बच्चा जब डालूँगी तो मालामाल कर देगीं. जाने किसका पाप सुबह-सुबह मेरे लिए वरदान बनकर आ गया?”
उसके बड़बडाने को मुनेश सुन रहा था. वह हाल ही में पुलिस में भर्ती हुआ था और भर्ती होने के लिए मांगी गंगा स्नान की मन्नत पूरी करने वाराणसी के घाट पर आया था. वह फुर्ती से उसकी ओर लपका और उसे टोकते हुए बोला, “ए बुढिया ये किसका बच्चा चुरा लाई?”
शन्नो एकदम घबराते हुए संभली और जवाब दिया, “किसका बच्चा? अरे मेरा बच्चा है.”
मुनेश उसे हड़कते हुए बोला, “तेरी उम्र और रंग को देखकर कहीं से भी ये तेरा बच्चा नहीं लगता. सही-सही बता नहीं तो हवालात में जायेगी. मैं पुलिस में ही हूँ.”
शन्नो के डर के मारे पसीने छूटने लगे, “बाबू जी माफ कर दो. ये बच्चा तो मुझे मंदिर के द्वार पर पड़ा मिला था. मैंने सोचा इसे पाल-पोस लूंगी. वरना बेचारा भूख से ही मर जाता.”
“पाल-पोस लेगी या फिर इसे बेच देगी.” मुनेश ने गुस्से में उससे बच्चा छीन लिया.
 उस बच्चे को लेकर मुनेश मेरठ ले आया. मुनेश भी अनाथ ही था. उसके माता-पिता बचपन में ही दुर्घटना के शिकार हो स्वर्ग सिधार गए थे. उसे उस बच्चे में अपना बचपन दिखाई दिया. उसने उसे अपने बच्चे की तरह पालना शुरू कर दिया.
समय का पहिया चलता रहा और वह बच्चा, जिसका नाम मुनेश ने प्यार से आकाश रखा था, दस साल का शरारती बच्चा बन चुका था. पुलिस लाइन्स में अक्सर उसकी शिकायत मुनेश के पास आती रहती थीं, लेकिन मुनेश उन्हें हंसकर टाल देता था. एक दिन आकाश ने एस.पी. के घर में स्थित बाग में घुसकर अमरुद तोड़ लिए. उस बाग में काम करनेवाले माली ने आकाश को पकड़कर उसके गाल पर झापड़ झड़ दिए. जब आकाश ने घर जाकर रोते हुए यह बात मुनेश को बताई तो उसका खून खौल उठा. वह बाग में गया और माली के गालों को मार-मार कर लालकर दिया.
मुनेश की पेशी एस.पी. साहिबा के पास हुई. उन्होंने माली और मुनेश से सारे हालत जाने और मुनेश से पूछा, “तुम्हारी तो शादी नहीं हुई फिर ये बच्चा किसका है?”
मुनेश ने मन्नत पूरी करने के लिए वाराणसी के घाट पर गंगा स्नान करने और अजय को बुढिया से लेने की पूरी घटना एस.पी. साहिबा को बता दी. मुनेश को चेतावनी देकर माफ कर दिया गया और माली को आइन्दा किसी बच्चे पर हाथ न उठाने की सख्त हिदायत दी गई.
मुनेश के जाने के बाद एस. पी. साहिबा ने अपने अर्दली से कहा, “अगर कोई मिलने आये तो उससे कह देना मेरी तबियत ठीक नहीं है. आज मैं आराम करूँगी.”
इतना कहकर एस. पी. साहिबा बीते दिनों में खो गयीं. अपनी सहेली रेनू के साथ जब वह यानि कि ज्योति अपने बच्चे को ईश्वर के सहारे छोड़कर आई थी तो कितना रोई थी. वो रेनू जैसी सहेली ही थी, वरना जाने क्या हाल होता उसका. रेनू के समझाने पर ज्योति ने अपनी पढ़ाई में फिर से ध्यान देना शुरू कर दिया और कड़े परिश्रम के परिणामस्वरुप पुलिस सेवा में चुनी गई. घरवालों ने खूब जोर डाला पर ज्योति की किसी से विवाह करने की इच्छा ही न हुई. उसे हर आदमी में अपने भूतपूर्व प्रेमी कुलदीप का घृणित चेहरा ही दिखाई देता था. अचानक ही उसके हृदय में फिर से प्रेम की अनुभूति होने लगी. यह प्रेम मुनेश के लिए था. जिसने उसके बच्चे को अपना बच्चा समझकर इतने दिनों पाला पोसा और इस कारण अभी तक शादी भी नहीं की. वह सोच रही थी कि कुलदीप से उसका प्यार शायद यौवनावस्था में की हुई केवल एक भूल थी और मुनेश के प्रति प्यार आदरभाव से भरा हुआ सच्चा प्रेम था.
उधर मुनेश के हृदय में भी उथल-पुथल चल रही थी. वह अपने आपसे बतिया रहा था, “मैंने एस.पी. साहिबा के माली को मारा और फिर भी उन्होंने मुझे माफ कर दिया. बड़ी ही नेक महिला हैं. पर एक बात समझ में नहीं आई, कि उन्होंने अभी तक शादी क्यों नहीं की. इतने उच्च पद पर आसीन विनम्र युवती का अभी तक कुँवारी रहना अजीब ही लगता है. उनकी आयु मेरे बराबर की ही होगी. मेरे तो माँ-बाप नहीं थे जो कोई बाप अपनी बेटी मेरे साथ ब्याहता. वैसे भी आकाश ही अब मेरा जीवन है. अब उसे पढ़ा-लिखाकर लायक इंसान बनाना ही मेरा लक्ष्य है. पर उनकी क्या मजबूरी होगी? सुना है उनका तो भरा-पूरा परिवार है. फिर क्या कारण रहा होगा? हो सकता है कोई उनके लायक लड़का ही न मिला हो. वैसे कोई किस्मतवाला ही होगा जिससे उनकी शादी होगी.” और इन्हीं विचारों में खोये हुए उसकी आँख लग गई.
सुबह शोर सुनकर मुनेश की नींद टूट गई. एस.पी. साहिबा का अर्दली मुनेश के घर का दरवाजा पीट रहा था.
मुनेश ने दरवाजा खोलकर उससे पूछा, “अरे भाई क्यों इतने बेचैन हो रखे हो? क्या मुसीबत आई है?”
अर्दली ने कहा, “तुम्हें एस.पी. साहिबा ने बुलाया है.”

मुनेश अर्दली के साथ एस.पी. साहिबा यानि कि ज्योति के घर पहुँचा तो वहाँ उसकी सहेली रेनू मुनेश को एकांत में ले गई और उसे बीती सारी बात बताई तथा यह भी बताया कि ज्योति उससे शादी करना चाहती है. मुनेश ने उससे कहा कि कहाँ वह एक सिपाही और कहाँ वह एस.पी. कैसे जोड़ बनेगा? रेनू ने उसे समझाया कि अपने बेटे के प्रति तुम्हारे समर्पण और प्रेम से प्रभावित होकर ज्योति उसे प्यार करने लगी है और प्यार में कोई जाति, धर्म या पद नहीं देखा जाता. चूँकि मुनेश भी ज्योति को मन ही मन चाहने लगा था सो उसने बिना संकोच किये इस रिश्ते के लिए हाँ कर दी और एक शुभ महूर्त में उन दोनों का विवाह हो गया.  

सुमित प्रताप सिंह 
इटावा, दिल्ली, भारत 

Saturday, November 2, 2013

गीत: अपना तो है दिवाला

आदरणीय मित्रो 
सादर ब्लॉगस्ते!
दीपावली के शुभ अवसर पर आप सभी को दीपावली की शुभकामनाएँ देते हुए प्रस्तुत है मेरा गीत "अपना तो है दिवाला". कृपया इसे सुनकर अपनी उचित प्रतिक्रिया देने की कृपा करें. धन्यवाद...



Friday, October 11, 2013

हास्य व्यंग्य: वो मेरा पहला प्यार

    न दिनों स्कूल में गर्मियों छुट्टियां पड़ी थीं और मैं अपनी ननिहाल में था. एक दिन नाना जी के घर में हम सभी गप्प मार रहे थे, कि तभी उसका आगमन हुआ. वह अपनी बहनों के साथ मेरी मौसी से मिलने आई थी. मासूम, भोला सा चेहरा व करतबी आखों संग वह गजब रूप लिए हुए थी. उसे पहली बार देखा और एक नज़र में ही दिल उसी का हो गया. वह अक्सर नाना जी के घर आती थी और मेरे दिल की धडकनें डीजल-पेट्रोल के भाव की भांति बढ़ाकर चली जाती थी. जिस प्रकार इन दिनों कुछ महोदय व महोदया पी.एम. की कुर्सी हथियाने का तरीका खोजते रहते हैं, उसी तरह उन दिनों मेरा दिल भी बस उसको ही खोजने में व्यस्त रहता था. जब भी आखें बंद करता था तो बस उसका ही मासूम व मुस्कुराता चेहरा दीखता था. जब भी वह दिखी तो उसकी आखों में आँखें डालकर पूछना चाहा कि उसके दिल में मेरे लिए कुछ है भी कि नहीं या फिर जैसे छद्म निरपेक्ष महानुभाव देश को उल्लू बना रहे हैं वैसे ही वह भी मुझे मूर्ख तो नहीं बना रही है. उसके हाव-भाव को देख कर ऐसा लगा कि वह देश की राजनीति जैसी दोगुली नहीं थी और शायद वह भी मुझे चाहने लगी थी. एक दिन गाँव के बाग़ में टहल रहा था कि वह भी वहीं मिल गयी. मैं हिम्मत करके उससे बात करने के लिए आगे बढ़ा. वह मुझे देख कर शरमा रही थी. उससे कुछ ख़ास बात नहीं हो पाई. वह कौन से स्कूल में पढ़ती है? कौन सी कक्षा है? इसके अलावा थोडा-बहुत उसके दोस्तों के बारे में ही पूछ पाया. उसने बताया कि वह भी स्कूल की गर्मियों की छुट्टियों में अपने नाना जी के पास आई थी. तभी हमने वहाँ किसी के आने की आहट सुनी और हम वहाँ से खिसक लिए. जैसे इन दिनों मंहगाई ने आम आदमी की नींद उड़ा रखी है, मैं भी उस रात नहीं सो पाया और उसके ही ख्यालों में खोया रहा. अगला दिन मेरे लिए बहुत बुरा था. किसी दुष्ट ने मेरे नाना जी को बीते कल की सारी घटना के बारे में खबर दे दी थी. नाना जी गुस्से में कीमती टमाटरों जैसे लाल हो रखे थे और मुझे भला-बुरा कहने में लगे हुए थे. मेरे मामा, मामी व मौसी इत्यादि सभी उनका समर्थन कर रहे थे. मैंने जब उन्हें बताया कि मैं उस लड़की से प्यार करने लगा हूँ, तो मेरे दायें गाल पर नाना जी का ऐसा ज़ोरदार झापड़ पढ़ा, कि दिन में ही अन्तरिक्ष दीखने लगा. जब मैं अन्तरिक्ष से धरती पर वापस लौटा यानि कि होश में आया तो मैंने नाना जी से पूछा कि आखिर उस लड़की से प्रेम करने में बुराई क्या है? तो नाना जी दांत पीसते हुए बोले, ” प्रेम करने में कोई बुराई नहीं है, किन्तु जिस लड़की से तूने प्रेम किया है वह तेरे ही गोत्र की है. इस तरह वह तेरी बहन लगी और बहन से इस प्रकार का प्यार पाप है.यह सुन दिल में इतनी जोर का झटका लगा, जैसा झटका किसी ईमानदार अफसर द्वारा जमा किए गए काले धन पर आयकर विभाग का छापा पड़ गया हो. किन्तु प्रेम का कीड़ा मेरे मन में पैठ बना चुका था. अब ये गोत्र व जाति-पांति के बंधन मेरे लिए कोई मायने नहीं रखते थे. बात उसके नाना तक भी पहुँच गई और उस मासूम का भी वही हाल हुआ जो मुझ गरीब का हुआ था. लड़की की बदनामी न हो इसलिए उसका बोरिया-बिस्तर बंधवाकर उसके परिवार संग वापस उसके शहर को रवाना कर दिया गया. उस दिन मेरी आँखों से गिरते आंसुओं को देख कर ऐसा लग रहा था, कि जैसे मैंने कई बोरे प्याज छील लिया हो. खैर धीरे-धीरे समय बीता और बात आई-गई हो गई. एक वो दिन थे और एक आज का समय जब एक गोत्र में प्यार होने पर ऑनर किलिंगद्वारा प्रेमी जोड़ों का राम नाम सत्य कर दिया जाता है. अब जब कभी भी अकेले बैठे-बैठे उसकी याद आती है तो आसमान की ओर देखकर कहता हूँ हे भगवान्! तूने बाल-बाल बचा लिया.

सुमित प्रताप सिंह 


इटावा, दिल्ली, भारत 

Wednesday, October 2, 2013

व्यंग्य: देहाती औरत


भौजी राम-राम!

राम-राम देवर जी!

अरे भौजी कैसे मरे-मरे बोल रही हो? कोई गम है क्या?

गम बहुत तगडो है.

कौन सा गम है, जो आपको इतना परेशान कर रहा है?

हमाई इज्ज़त से खिलवाड़ करो गओ है.

किसकी हिम्मत हुई, जो हमारी भौजी की इज्ज़त से खिलवाड़ करने की हिमाकत की?
कोई कलमुआं हैगो जाने काऊ दूसरे आदमी को देहाती औरत की उपमा दई है.

आपको किसने ये बात बताई?

अरे बू अपने गाँव में दलीपा प्रधान को मोड़ा है न. बई ने हमें जा बात बताई हती.

तो उसने उस कलमुएँ का नाम नहीं बताया?

बताओ तो हतो पर हमईं भूल गए. का नाम हतो शायद खरीफ हतो.

खरीफ नहीं कुछ और नाम बताया होगा.

जोऊ नाम हुइए. बा कमीन ने हमाई इज्ज़त को खराब करबे की कोशिश करी है. बस जा बात हम जानत हैं.

भौजी अब गुस्सा छोड़ भी दो. जिन्हें उसने देहाती औरत कहा था, जब वो ही बुरा नहीं मान रहे.

बे बेशक न माने पर हमाई चार गाँव में इज्ज़त है. हम तो बुरो मानयें. जरूरी हतो देहाती औरत कहबो. गंवारू औरत, कस्बाई औरत या शहरी औरत कुछऊ कह देतो.

अब क्या बताएँ भौजी उसने तो उन्हें कोहनी मार कर भी गिरा दिया, फिर भी वे इतने क्षमाशील हैं कि उसके माफ़ी माँगने पर झट से माफ़ी दे डाली.

धत तेरे की कैसे आदमी हैं. उनसे अच्छी तो हम औरतईं हैं. हमें कोई कोहनी गलती सेऊ मार के देखे. अगर बाकी कोहनी मार-मारके पीठ न टोर डारी, तो हमऊ तुम्हारी भौजाई नहीं.

भौजी इतना गुस्सा सेहत के लिए ठीक नहीं है.

अरे भाड़ में गई सेहत. जब इज्ज़तई नहीं रहिए, तो सेहत को का अचार डारियें.

भौजी मैं पहले ही आपको बता चुका हूँ, कि देहाती औरत आपके लिए नहीं किसी और के लिए कहा गया था और जिसने ये शब्द कहे थे वह खुद ही दूसरे देश के ठुमको पर मुज़रा करने वाली बेगैरत औरतरुपी आदमी है.

ठीक है हमने तुम्हारी जा बात मानी, कि बू आदमी बेगैरत औरत है पर अपने देश वाले को तो गैरत वालो हुईबे चाहिए. ससुरे ने अगर कछु उलटो-सीधो कहो हतो तो एक घुमाय के बाके दे नहीं सकत हते.

भाभी अब क्या बोलूँ?

हमाय से गाँव में कोई जरऊ सी बदतमीजी करत है, बाकी तो हम ऐसी मरम्मत करत हैं कि जा जनम में तो बू हमसे उलझबे से रहो.

अब भौजी आप जैसी शक्ति और स्वाभिमान तो हर किसी में नहीं हो सकता न.

काहे नहीं हुय सकत. स्वाभिमान आसमान से थोड़े ही तपकत है. बू तो इंसान की सोच में होत है.
भौजी इसी सोच की तो कमी है और शायद इसी कारण उनसे स्वाभिमान दूर भागता है.

अच्छा देवर जी एक बात तो बताओ?

हाँ पूछिए.

दालीपा को मोड़ा बताय रहो हतो, कि अपने देश के वे महाराज इत्ती बेईज्ज़ती सुनबे के बादऊ बा 
आदमी से बात करन गए हैं. ऐसी का बात है जो इत्ती जरूरी हती, कि बेईज्ज़ती सहबे के बादऊ करी जाय.

भौजी जो भी आपने सुना है वो बिल्कुल ठीक सुना है. ये बात कई सालों से चल रही है और यूँ ही चलती रहेगी.

तो बातचीत से कछु हल नहीं निकरो?

हल निकलेगा न! अगली बातचीत या कहें अगली वार्ता का प्रस्ताव.

दोनों लोग बातें करबे के तगड़े शौक़ीन लगत हैं.

हाँ शायद आपकी बात सच है. तभी तो सालों-साल से बातचीत का ये सिलसिला जारी है.

जाको मतलब गाँव में हम बिना बातई में बदनाम हैं, कि हम जादा बात करत हैं. हमाए उस्ताद तो
जे बातचीत करन वाले हैं.

हा हा हा भौजी शायद आप ठीक ही कह रहीं हैं.

चलो छोड़ो जब उनहईं को शरम नहीं है तो हम देहाती औरत काहे बिना बात में परेशान होयें.

भौजी आपने अब बिल्कुल ठीक फैसला लिया है. चलिए अब मुझे आज्ञा दें. दरवाजे पर आपकी पड़ोसन चुन्नी आपसे मिलने को खड़ी है.

ठीक है देवर जी आत रहियो अपनी भौजी से मिलन को. हाँ चुन्नी का बात हुय गई?

कछु नहीं हम तो जा देखन आए हते, कि शहरी देबर को आज देहाती औरत याद कैसे आय गई?

कलमुँही तूने फिर मोय देहाती औरत कहके चिड़ाओ. अब तू बच के दिखा. आज हम तेरी पीठ अपनी कोहनी से टोर के रहियें.

और भौजी चुन्नी के पीछे चीते की फुर्ती से भागीं. उन्हें भागते देखकर मेरे मन में प्रश्न कौंध रहा था, कि देहाती औरत की संज्ञा अपमानजनक है या फिर सम्मानजनक?

सुमित प्रताप सिंह
इटावा, दिल्ली, भारत