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Friday, February 3, 2017

लघुकथा : भांड

जिले ने गंभीर हो नफे से पूछा, "भाई ये भांड किसे कहते हैं?"
"कोई कलाकार जब स्वार्थवश अपनी कला को बेच देता है तो वह भांड बन जाता है।" नफे ने समझाया।
जिले सिर खुजाते हुए बोला, "भाई मैं कुछ समझा नहीं।"
नफे बोला, "जब कोई व्यक्ति कला के प्रति तन-मन से समर्पित हो उसकी समृद्धि में योगदान देता है तो वह कलाकार कहलाता है।"
"और भांड किसे कहते हैं?" जिले ने उत्सुकता से पूछा।
"जब वही कलाकार चंद सिक्कों के लालच में अपनी कला और ज़मीर का सौदा कर लेता है तो..." इससे पहले कि नफे अपनी बात पूरी करता जिले खिलखिलाते हुए बोला, "तो वह भांड कहलाता है।"
 
लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

Thursday, February 2, 2017

मेरा नया व्यंग्य संग्रह 'सहिष्णुता की खोज'

 मित्रो इस विश्व पुस्तक मेले में मेरी पाँचवी पुस्तक व तीसरे व्यंग्य संग्रह 'सहिष्णुता की खोज' का विमोचन शोभना सम्मान समारोह व पहले ऐतिहासिक युवा व्यंग्य सम्मेलन में दो दिनों तक लगातार दो बार किया गया। मेरे इस व्यंग्य संग्रह में कुल 42 संग्रह संकलित हैं। इसे चिसलिंग पब्लिकेशन हाउस ने प्रकाशित किया है। इस प्रकाशन से प्रकाशित होनेवाली अन्य पुस्तकें क्रमशः हल्द्वानी, उत्तराखंड के चर्चित युवा व्यंग्यकार गौरव त्रिपाठी का हास्य व्यंग्य उपन्यास 'कपूत' तथा भुवनेश्वर, उड़ीसा की युवा लेखिका इति श्री राठौर का उपन्यास 'वो लड़की' है। यह प्रकाशन युवा लेखकों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से बनाया गया है। फ़िलहाल आप मेरी पुस्तक 'सहिष्णुता की खोज' को मँगवाकर और इसे पढ़कर अपनी राय देना मत भूलिएगा।

Sunday, December 18, 2016

क्या देश वाकई में चीख रहा है (व्यंग्य)


    देश में इन दिनों चीख-पुकार मची हुई है। जब भी देश में कुछ नया होता है तो लोग चीखते हैं और पूरा दम लगाकर चीखते हैं। इस बार चीखने की शुरुआत नवंबर2016 को हुई थी। बड़े नोटों की बंदी ने देश के कुछ भले और ईमानदार लोगों के दिलों पर करारा आघात किया, जिससे वो एकदम से बिलबिला उठे। उनसे ज्यादा परेशान उनके संरक्षक और आका हो गए और सड़क से लेकर संसद तक उन्होंने जमकर चीख-पुकार मचानी शुरू कर दी। हालाँकि इस फैसले से उनका नेक दिल बहुत दुखा और उन्होंने काफी कष्ट और परेशानी महसूस की पर उन्होंने देश की जनता के कष्टों को ढाल बनाकर तलवारबाजी करनी शुरू कर दी। वैसे अगर देखा जाए तो उनका चीखना जायज भी है। देश की जनता का खून चूस-चूसकर ईमानदारी और मेहनत से जमा किया इतना ढेर सारा धन यूँ अचानक रद्दी हो जाए तो भला कोई चुप रह भी कैसे सकता है। इसलिए भुक्तभोगी चीख रहे हैं और इस चीख-पुकार से जनता को दिग्भ्रमित करते हुए अपने रद्दी हो चुके धन को फिर से धन की श्रेणी में लाने की भरपूर जुगत लगा रहे हैं। बैंक कर्मचारियों के रूप में अपने देश में एक नई ईमानदार कौम का उदय हुआ है और ईमानदारी में वो बाकी कौमों को तेजी से पीछे छोड़ने को तत्पर है। उनकी ईमानदारी देखनी हो तो बैंक के पिछले दरवाजे पर खड़े हो जाएँ। आपको बिना किसी विशेष परिश्रम के ही बैंककर्मियों के दिलों से झाँकती हुई विशेष ईमानदारी के दर्शन हो जाएँगे। साथ ही साथ दिख जाएँगे चीखते रहनेवाले वे भले और ईमानदार लोग भी। बैंक कर्मचारियों द्वारा चीखनेवाले भले मानवों को पूरी ईमानदारी और निष्ठा से गड्डियों का भोग लगाया जाता हैजिसे वे अपने सेवकों को प्रसाद के रूप में वितरित करके फिर से चीखना-चिल्लाना शुरू कर देते हैं। यह देख उनके चमचे भी प्रसाद को ठिकाने लगाकर अपने गुरुओं का समर्थन करते हुए उनका साथ देते हुए रेंकना शुरू कर देते हैं। जो चमचे चीखने में असमर्थ हैं और कलम तोड़ने में सिद्धहस्त हैं उन्हें आभासी दुनिया पर बिठा दिया जाता है और वो सभी निष्ठापूर्वक अपने आकाओं के समर्थन व नोटबंदी के विरोध में आभासी दुनिया पर चिल्ल-पों मचाना आरंभ कर देते हैं तथा ये घोषित करने का पूरा प्रयास करते हैं कि पूरा देश उनके संग विरोध में चीख रहा है जबकि मामला कुछ और ही होता है। दरअसल पूरा देश उन सबकी चीख-पुकार सुनते हुए खिलखिलाकर हँस रहा होता है।


लेखक : सुमित प्रताप सिंह

Saturday, November 19, 2016

अब तेरा क्या होगा कालिया (व्यंग्य)


   काले धन उर्फ़ कल्लूकल्लनकालिया इन दिनों अधिकांश देशवासी तुम्हें दे रहे हैं जी भरकर गालियाँ। सरकार ने तुम्हें बाहर निकलने को कहा था लेकिन तुम नहीं निकले। फलस्वरूप तुम्हें बाहर निकालने को सरकार को बड़ा कदम उठाना पड़ा और उसके एक कदम उठाने से ही तुम्हारी ढिमरी टाइट हो गई तथा तुम्हारे आकाओं की चूलें तक हिल गईं। अब ये और बात है कि तुम्हें बाहर निकालने के लिए सरकार के इस औचक हमले का परिणाम आम जनता को भी झेलना पड़ रहा है। नोट चेंज करवाना और नोट छुट्टे करवाना अब राष्ट्रीय चिंता और समस्या बन गई है। इन दिनों लोगों का समय ए.टी.एम.बैंकों व डाकघरों की चौखट पर लाइन लगाकर नए नोटों के दर्शन करने की इच्छा लिए हुए ही बीत रहा है। उनका सुबह का ब्रेकफास्टदोपहर का लंच और रात का डिनर वहीं लाइन में लगे हुए ही हो रहा है। जो लोग खुशनसीब हैं वे तो नए नोटों के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त कर पाते हैं, लेकिन जो अभागे मानव हैं वे बेचारे नए नोटों के दर्शनों का स्वप्न देखते हुए ही लाइन में लगे रहते हैं। इन दिनों बैंककर्मी देवदूतों से कम प्रतीत नहीं हो रहे हैं और हर व्यक्ति लाइन में लगे हुए ये कामना कर रहा है कि उसपर इन देवदूतों की कृपा हो जाए और उसकी मुट्ठी नई करेंसी से गर्म हो जाए। अब ये और बात है कि ये देवदूत गुपचुप दानवपना दिखा रहे हैं और अपने परिचितों और सगे-सम्बन्धियों को नवनोट मिलन परियोजना का भरपूर लाभ प्रदान कर रहे हैं। लोग नोट दर्शन की आस लिए रात से ही बिस्तर डालकर ए.टी.एम.बैंकों व डाकघरों के आगे धरना सा दिए बैठे हुए हैं। एक बार को तो लगता है कि जितनी शिद्दत से लोग नवनोट मिलन की इच्छा कर रहे हैंउतनी शिद्दत से अगर ऊपवाले को याद कर लिया जाए तो उसके दर्शन पाकर इस जीवन-मरण के बंधन से मुक्ति मिल जाए।
वैसे मजे की बात ये है कि जनता इतने कष्टों को झेलकर भी प्रसन्न है और सरकार के इस सार्थक कदम की प्रशंसा कर-करके विपक्षी दलों का कलेजा फूँककर कोयला बनाने की साजिश में लगी हुई है। गांधी जी हरे से गुलाबी हो मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं। अचानक नोटबंदी से अवैध खजानों में बंदी बन रखे नोट रद्दी का ढेर बन चुके हैंजिससे नक्सलियों और आतंकियों के पाक कामों में अचानक विराम लग गया है। कश्मीर में पत्थरबाजी नामक लघु उद्योग को करारा झटका लगा है। पड़ोसी देश के शांति मिशन में अवरोध उत्पन्न हुआ है और वो शांतिदूतों की सप्लाई में काफी दिक्कत महसूस कर रहा है। तुम्हारे आकाओं के ताऊ-ताईचाचा-चाचीमामा-मामी व अन्य सगे-संबंधी विरोध का झंडा उठाए हुए कभी मार्च कर रहे हैं तो कभी संसद का सदन जाम करने के लिए कमर कस रहे हैं। इन सबसे इतर अधिकतर देशवासी एक नए भारत के उदय होने की आहट सुन रहे हैं। इन दिनों देश भी मुस्कुराकर तुमसे गब्बरी अंदाज में पूछ रहा है "अब तेरा क्या होगा कालिया?"
लेखक : सुमित प्रताप सिंह
*कार्टून गूगल से साभार 

Friday, October 21, 2016

राम नाम की शक्ति (व्यंग्य)

-भाई नफे!
-हाँ बोल भाई जिले!
-आज तू क्या बुदबुदाने में लगा हुआ है?
-भाई मैं राम नाम का जाप कर रहा था।
-भाई आज तुझे राम का नाम का जाप करने की क्या सूझ पड़ी?
-राम नाम में बहुत शक्ति है भाई।
-अच्छा ऐसा क्या?
-हाँ भाई! राम नाम का प्रयोग करते हुए देश की शीर्ष सत्ता तक पहुँचा जा सकता है और राम नाम को गरियाते हुए देश की सत्ता को पलटा भी जा सकता है।  
-क्या वास्तव में ऐसा कुछ है?
-हाँ भाई बिलकुल ऐसा ही है। और तो और अगर किसी भी गलत कार्य को सही सिद्ध करना हो तो राम का नाम बड़ा ही काम आता है।
-वो कैसे भाई?
-एक महोदय हैं। काफी चर्चित व्यक्ति हैं। एक बार उनसे किसी ने कह दिया कि ब्राम्हण होकर माँसाहार करते हुए शर्म नहीं आती।
-अच्छा तो फिर उन्होंने क्या जवाब दिया?
-जवाब क्या देना था उन्होंने झट से राम का सहारा ले लिया।
-वो भला कैसे?
-वो ऐसे कि उन्होंने राम द्वारा सोने के हिरण को मारने की घटना का उल्लेख करते हुए उनका माँसाहार प्रेमी होना सिद्ध कर दिया और उसी घटना का उदारहण देते हुए स्वयं के माँसाहारी होने को सही साबित कर डाला।
-मतलब कि उन महोदय ने अपने उदर को माँसाहार से तुष्ट करने के लिए राम नाम की बैसाखी का सहारा लिया।
-और नहीं तो क्या। वैसे भाई तुझे नहीं लगता कि लोग शाकाहारी या माँसाहारी चाहे जैसा भी भोजन करें लेकिन उसको सही साबित करने के लिए लोगों की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाने का उन्हें कोई अधिकार नहीं होना चाहिए।
-भाई बात तो तेरी ठीक है पर क्या करें अपने देश में बहुसंख्यक अपने धर्म के पक्ष में चूँ भी कर दें तो उनको सांप्रदायिक होने का तमगा देने के लिए कुछ लोग हमेशा तैयार बैठे रहते हैं।  
-पर दूसरा पक्ष देखें तो राम के नाम से इन लोगों को इतना प्रेम है कि वो राम का नाम मुँह में और बगल में छुरी रखकर अपना काम सिद्ध करते हुए औरों का काम-तमाम करने को तत्पर रहते हैं।   
-इसका मतलब कि राम का नाम बस दिखावे के लिए ही बचा है।
-ये मैंने कब कहा?
-तो फिर तेरे कहने का मतलब क्या है?
-भाई माना कि राम के कपूत राम नाम का अपने स्वार्थों के लिए मानमर्दन कर रहे हैं लेकिन ये सब होने के बावजूद भी राम नाम की महत्ता अब भी मौजूद है।
-भाई क्या सचमुच में ऐसा है?
-हाँ भाई बिलकुल ऐसा ही है। राम के पूत अभी भी अपने राम और उनके आदर्शों को अपने-अपने दिलों में बसाए हुए समाज की बेहतरी के लिए निरंतर प्रयासरत हैं।
-भाई अब तो मेरा दिल भी कर रहा है कि मैं भी तेरे साथ बैठकर राम नाम का जाप करूँ।
-ठीक है पर पहले अपने बगल की छुरी तो निकालकर बाहर फैंक दे।
-हा हा हा भाई हम राम के पूतों में से हैं न कि कपूतों में से। इसलिए हमें बगल में छुरी रखने की न तो इच्छा रहती है और न ही कोई जरुरत। 
-
तो फिर दिल से बोल राम-राम।
-
राम-रामजय श्री राम।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

Friday, October 14, 2016

राम जाने (कविता)




एक विश्वविद्यालय में 
रावण के वंशजों ने 
राम के वंशज का 
पुतला जलाया
और जोर-जोर से
हो-हल्ला मचाया
देखो-देखो हमने
रावण को जलाया 
ये देख रावण ने
अपना सिर खुजाया
और उनकी मूर्खता पर 
मंद-मंद मुस्कुराया 
फिर अपने वंशजों से
हँसते हुए बोला 
बेटा राम से 
लिया था मैंने पंगा तो 
उन्होंने मुझको 
लगा दिया था ठिकाने 
अब तुमने उसके 
वंशज को छेड़ा है 
अब तुम्हारा क्या होगा
ये तो राम ही जाने।





लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

Friday, September 30, 2016

अभी असल तो है बाकी (गीत)

जब 56 इंची सीनों ने

गोलीं बंदूक से दागीं 
दहशतगर्दों के अब्बू भागे
और अम्मी खौफ से काँपीं
ये तो सिर्फ नमूना था
अभी असल तो है बाकी...

धोखेबाजी और कायरता 

जिन दुष्टों के गहने थे
गीदड़ बनकर ढेर हुए 
जो खाल शेर की पहने थे 
हमपे गुर्रानेवालों की रूहें 
हूरों से जा मिलने भागीं 
ये तो सिर्फ नमूना था
अभी असल तो है बाकी...

नापाक पडोसी देता धमकी

एटम बम बरसाने की 
जबकि औकात नहीं उसकी 
खुद के बल रोटी खाने की
अब जान बचाने की चिंता में
डूबा होगा वो पाजी
ये तो सिर्फ नमूना था
अभी असल तो है बाकी...

शांतिवार्ता में खोकर 

हमने तो वक़्त गुजारा है
और उस बैरी ने धोखे से
खंजर ही पीठ में मारा है
ख़त्म करेंगे अब मिलके
उस मुद्दई की बदमाशी
ये तो सिर्फ नमूना था
अभी असल तो है बाकी...


दुनियावालो तुम ही समझा दो

अब भी वो होश में आ जाए
चरण वंदना कर भारत की
माफ़ी की भीख को ले जाए
वरना क्षणों में मिट जाएगा
दुनिया से मुल्क वो पापी
ये तो सिर्फ नमूना था
अभी असल तो है बाकी...

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

Friday, September 23, 2016

प्रतिक्रिया (व्यंग्य)

    मेशा की तरह फिर से पड़ोस से आतंकी हमला हुआ और इस आतंकी हमले में हमारे कई वीर सैनिक शहीद हो गए। इस लोमहर्षक घटना पर देश में सभी ने अपने-अपने तरीके से प्रतिक्रिया दी।
एक वीर रस के कवि ने इस आतंकी हमले पर त्वरित कार्यवाही की। उसने फटाफट एक आशु कविता का सृजन कर डाला। उसने कविता का आरंभ देश के सत्ता पक्ष को गरियाने और कोसने से किया और समापन शत्रु देश पर बम-गोले बरसाने के साथ किया। तभी उसके पड़ोस के किसी शरारती बच्चे ने उसके घर के बाहर पटाखा फोड़ दिया। पटाखे की आवाज सुन उस वीर रस के कवि ने अपने भय से काँपते हुए मजबूत हृदय पर अपने दोनों हाथ रखे और भागकर अपने घर के कोने में जाकर छुप गया।
सत्ता पक्ष ने सदा की भाँति निंदा नामक गोला निकाला और पड़ोसी देश पर दाग दिया। विपक्ष ने इस सुनहरे अवसर को हाथ से न निकल जाने देने के लिए अपनी कमर कसी और धरना-प्रदर्शन कर सत्ता पक्ष के नाक में दम कर दिया।
मीडिया ने भी इस मौके को भुनाने के लिए कुछ खाली टाइप के इंसानों को न्यूज़ रूम में आमंत्रित कर बहस का माहौल बनाया और धीमे-धीमे बहस इतनी गरमागरम हो गई कि जूतम-पैजार तक की नौबत आ गई। न्यूज़ चैनल ने इस बहस को दिन-रात बार-बार दिखाकर जनता के दिमाग का दही बना डाला।
देश के तथाकथित बुद्धिजीवियों ने इस दुर्घटना पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया और उन्होंने इसे आम घटना मानकर अपनी बुद्धि घिसने पर ही ध्यान केंद्रित रखा।
मानवाधिकार प्रेमियों ने भी इसे सामान्य घटना मानकर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, बल्कि वे प्रतीक्षा करने लगे कि कोई एनकाउंटर वगैरह हो और अपराधी अथवा आतंकी नामक कोई भला जीव सुरक्षाकर्मियों द्वारा पकड़ा अथवा मारा जाए और फिर वे सभी मानवाधिकार की दुहाई देते हुए छाती पीटते हुए विधवा विलाप करना आरम्भ करें।
देश की जनता को ये सब देख बड़ा रोष हुआ और उसने इसके लिए अपनी आवाज बुलंद की पर जनता की आवाज तो पाँच सालों में एक बार ही सुनी जाती है और अभी उसमें काफी समय बाकी था। सो जनता ने कुछ देर चिल्ल-पौं की और फिर शांत हो अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गई।

इन सबसे इतर शहीद जवानों की माएँ और पत्नियाँ अपने-अपने लालों को सैनिक बन मातृभूमि की रक्षा करने के लिए पाल-पोसकर तैयार करने लगी। यह देख जननी जन्मभूमि ने उन वीरांगनाओं को कई-कई बार नमन किया। 
लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

Wednesday, September 21, 2016

हल्के लोग (कविता)

हल्के लोग
करते हैं सदैव
हल्की ही बातें
और करते हैं 
सबसे ये उम्मीद क़ि
उनकी हल्की बातों को
भारी माना जाए
इसके लिए देते हैं
वे बड़े-बड़े और
भारी-भारी तर्क
जब भी उन्हें 
समझाया जाए 
उनके हल्के
होने के बारे में 
तो उतर आते हैं
वे अपने हल्केपन पर।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

Friday, September 16, 2016

मच्छर तंत्र (व्यंग्य)


    पिछले दिनों अपना पड़ोसी देश मलेरिया मुक्त घोषित कर दिया गया है जैसे हर नेक पड़ोसी के दिल में अपने पड़ोसी की अच्छी खबर को सुनकर आग लगती है वैसे ही इस खबर को सुनकर हमारा भी कलेजा धधकने लगा है देशवासी सोच रहे हैं कि एक छोटा सा देश इतना बड़ा काम कर गया और हमारा इतना बड़ा देश ये छोटा सा काम क्यों नहीं कर पाया? असल में देश तो अपना भी मलेरिया अथवा अन्य मच्छर जनित रोगों से अब तक मुक्त हो जाता लेकिन हमारे देश के सफेदपोश मच्छरों ने ऐसा होने ही नहीं दिया  वे तो आपस में लड़ने-झगड़ने और एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने में भी ही व्यस्त रहे उनकी व्यस्तता का लाभ पारंपरिक मच्छरों ने उठाया और जनता को अपने जहरीले डंक से इस दुनिया के मोह-माया और दुखों से मुक्ति दिलवाने में योगदान देते रहे जनता तड़पते-तड़पते मरने को विवश होती रही, लेकिन सफेद्फोश मच्छरों को कोई फर्क नहीं पड़ा फर्क पड़ता भी क्यों? सफेदपोश मच्छरों ने आंकड़ा नामक शस्त्र का ऐसा प्रयोग किया कि उनपर लगनेवाले सारे आरोप इस शस्त्र के सामने पल भर में धराशाही हो गए आंकड़ा शस्त्र धारण किए हुए योद्धाओं ने ऐसा चक्रव्यूह रचा कि मच्छर जनित बीमारियों से हुईं मौतों की असली संख्या उस चक्रव्यूह से निकलकर कभी बाहर आ ही न सकी भूले से किसी मौत की सच्चाई सामने आ भी गई तो जवाब में झट से आश्वासन का झुनझुना पकड़ा दिया गया जनता बेचारी उस झुनझुने में उलझकर रह गई और मच्छरों ने निर्भय होकर फिर से अपने आदमी मारू मिशन के लिए कमर कस ली मच्छरों को भी ये मालूम था कि अगर वो लाचार मानवों का खून चूसकर उनके शरीर में डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया अथवा जीका इत्यादि बीमारियों का जहर भर रहे थे तो उसी प्रकार सफेदपोश मच्छरों ने भी देश का खून चूस-चूसकर उस ख़ून को स्विस बैंकों को सप्लाई कर बदले में गरीबी और बेकारी जैसी बीमारियों का जहर उसके शरीर में भर दिया था हमेशा की तरह इस बार भी कागजों पर अब भी जमकर फोगिंग हो रही है और मच्छर जनित रोगों से लड़ने की विभिन्न योजनाएँ बन रही हैं सफेदपोश मच्छर पारंपरिक मच्छरों के साथ मिलकर मच्छर राग गा रहे हैं और इस मच्छर राग के शोर में मरती जनता की करुण पुकार किसी को सुनाई नहीं दे पा रही है कभी-कभी लगता है कि जैसे हम लोकतंत्र में नहीं बल्कि मच्छर तंत्र में जी रहे हैं

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

Friday, August 19, 2016

कविता : मैं बहुत बहादुर हूँ

मुझे मरने से 
डर नहीं लगता
क्योंकि मैं बहुत बहादुर हूँ
पर जब भी लगता है कि
मैं मर भी सकता हूँ तो 
मुझे अपने जाने के
मतलब मरने के 
बाद की परिस्थितियां 
अचानक से ही 
दिखाई देने लगती हैं
जिसमें मैं अपने
बिलखते माँ-बाप को
बार-बार देखता हूँ
जिनके बुढ़ापे का 
मैं ही हूँ सहारा
जिनके सपनों और 
ढेर सारी आशाओं को
पूरा करने का किया है
मैंने उनसे वायदा
मेरे जाने के बाद
क्या होगा उन आशाओं
और सपनों का 
और क्या होगा
उनसे बार-बार किए
मेरे उन वायदों का 
कैसे जिएंगे 
मेरे बिना 
मेरी ऊँगली पकड़कर 
मुझे चलना सिखानेवाले 
सच कहूँ
यही सोचकर 
मैं अचानक डर जाता हूँ
और अगले ही पल
मैं जीवन के रण को 
जीतने के लिए
उठ खड़ा होता हूँ
क्योंकि मैं बहुत बहादुर हूँ
हूँ न?

लेखक  : सुमित प्रताप सिंह

Thursday, June 30, 2016

एक देशप्रेमी महाराजा की निशानी


ब अंग्रेजों ने नई दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया तो उससे पहले राजधानी में वायसराय हाउस (वर्तमान में राष्ट्रपति भवन) में स्थित दिल्ली दरबार व अन्य इमारतों का निर्माण करवाया गया, जिनमें इस्तेमाल होनेवाले पत्थरों को उपलब्ध करवाया था जयपुर के महाराजा माधो सिंह द्वितीय ने। वायसराय हाउस के दिल्ली दरबार में वायसराय के सिंहासन के बिलकुल सामने राजपथ के छोर पर इंडिया गेट स्थित था और जब वायसराय अपने सिंहासन पर बैठता था तो इंडिया गेट का ऊपरी भाग उसके पैरों के नीचे की सीध में दीखता था। इसपर अक्सर वायसराय खिलखिलाकर कहता था, "इंडिया इज़ अंडर माय फ़ीट।"


यह सुनकर महाराजा माधो सिंह को बहुत बुरा लगता था और वो वायसराय द्वारा अपने देश भारत का निरंतर अपमान किए जाने पर व्यथित रहते थे। इंग्लैंड जाने से पहले एक दिन वायसराय ने महाराजा माधो सिंह से कहा कि वो वायसराय हाउस और उसके इर्द-गिर्द बनी इमारतों को पत्थर उपलब्ध करवाने के बदले अपनी निशानी के रूप में किसी मनपसंद इमारत का निर्माण करवा सकते हैं। महाराजा माधो सिंह ने वायसराय के सिंहासन और इंडिया गेट के बीच जयपुर कॉलम नामक एक विशाल खम्बानुमा इमारत बनवा दी ताकि वायसराय को 'इंडिया इज़ अंडर माय फ़ीट' कहने का फिर से मौका न मिल सके। जब वायसराय इंग्लैंड से वापस लौटा तो जयपुर कॉलम देखकर उसे बड़ी खीज हुई पर वह कुछ नहीं कर सकता था क्योंकि उसने ही महाराजा माधो सिंह को इमारत बनवाने की इजाजत दी थी सो उसने जयपुर कॉलम के ठीक ऊपर विक्टोरिया क्रॉस लगवा दिया, जो कि 90 साल की लीज पूरी होने पर ही शायद हट पाएगा।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

Sunday, June 19, 2016

माफ़ कीजिएगा पिता जी (लघु व्यंग्य)


   ज मैं रोज की तरह जल्दी नहीं उठ पाया। मजबूरी थी। रात को देर रात ड्यूटी करके लौटा तो देर तक सोना लाजिमी था। मतलब कि मैं अपनी नींद पूरी कर रहा था ताकि ड्यूटी पर न ऊँघूं और कर्मठता से अपने कर्तव्य का पालन कर सकूँ। जब मैं देरी से उठा तो मैंने रोज की तरह अपने माता-पिता के चरण छुए। हर बार की तरह माता-पिता ने मुझे मन ही मन आशीर्वाद दिया। फिर मैं नित्य कर्म करने चला गया। नहा-धोकर माँ के हाथों का बना स्वादिष्ट भोजन कर कुछ जरुरी काम निपटाकर मैं ड्यूटी को रवाना हो गया। ड्यूटी पर पहुँचकर सहकर्मी से पता चला कि आज तो पिता दिवस यानि कि फादर्स डे है। मुझे बहुत अजीब लगा कि क्यों नहीं मैंने आज अपने पिता चरणों को विशेष प्रकार से छुआ जिससे उन्हें आभास हो पाता कि आज उनका दिन है। कम से कम उन्हें तो मुझे बताना बनता ही था कि आज पिता दिवस है। आज सब लोग पिता दिवस मनायेगें। कोई वृद्धाश्रम में जाकर अपनी व्यस्त जीवनचर्या में से कुछ अमूल्य क्षण निकालकर अपने पिता के साथ फादर्स डे मनाकर अपने पुत्र होने के फ़र्ज़ को निभायेगा तो कोई भला मानव आज घर के एक कोने में अपने जीवन के अंतिम दिन गुजार रहे पिता को एक दिन ताज़ा और स्वादिष्ट भोजन खिलाकर अपने अच्छे बेटे होने का सबूत देते हुए मिल जाएगा। एक-दो सुसंस्कारी संतानें ऐसी भी होंगीं जो पिता दिवस के पावन अवसर का सदुपयोग करते हुए अपने पिता का अंगूठा इस्तेमाल कर उन्हें जमीन-जायजाद के झंझट से मुक्त कर पिता दिवस की सार्थकता सिद्ध करेंगीं। इन सबसे इतर मैं ड्यूटी करने के बाद आधी रात को घर पहुंचूंगा और सोते हुए पिता को जगाकर उनके चरण छूकर बोलूँगा, “माफ़ कीजिएगा पिता जी आज मैं पिता दिवस मनाना भूल गया।“ और मुझे यकीन है कि पिता जी मेरी इस बड़ी भूल पर मुझे माफ़ी देते हुए प्यार से मेरे सिर पर अपना हाथ फिरायेंगे। तब मैं खुश होकर अगले दिन ड्यूटी पर जाने के लिए बिस्तर पर जाकर फिर से ढेर हो जाऊंगा। 

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

Wednesday, June 15, 2016

कलियुग का तीर्थ (व्यंग्य)


   तीर्थयात्रा आरम्भ हो चुकी है। सभी तीर्थयात्री अपना लोटा-बाल्टी और सामान-सट्टा लेकर तीर्थयात्रा को निकल चुके हैं। अन्य पारंपरिक तीर्थों से इतर यह तीर्थ कलियुग में विशेष स्थान रखता है। सत्ता को पाने के लिए सत्ताप्रेमी माननीय महोदयों के लिए यह दंडवत होने के लिए अतिप्रिय स्थल है। हम जैसे कमअक्ल प्राणी भूलवश अथवा अज्ञानता से इसे झोपड़पट्टी अथवा स्लम एरिया के नाम से बदनाम करते रहते हैंजबकि कलियुग का सबसे पसंदीदा तीर्थस्थान फ़िलवक़्त तो यही है। बहरहाल आरम्भ हो चुकी इस तीर्थयात्रा के पूर्ण होने की सभी कुर्सी रुपी मछली की आँख पर अर्जुन की भांति धनुष पर बाण से निशाना लगाए हुए भले मानुष कामना कर रहे हैंकि काश ये तीर्थ यात्रा सफल हो जाये और उनकी नैया पार हो जाए। पारंपरिक तीर्थ यात्रा से बिलकुल हटकर है ये तीर्थ यात्रा। असल में ये कलियुगी तीर्थयात्रा है। ये तीर्थयात्रियों के घर अथवा दफ्तर से आरम्भ होकर कलियुगी तीर्थस्थान पर जाकर ही समाप्त होती है। इस तीर्थयात्रा में शामिल होनेवाले तीर्थयात्रियों के हृदय में पारंपरिक तीर्थयात्रियों जैसा ही तीर्थस्थान के प्रति श्रद्धा भाव होता है और उसमें अनेकों सपने पलते हुए जवान होने की राह तक रहे होते हैं। अन्य तीर्थयात्राओं की तरह ये तीर्थयात्रा हर वर्ष या किसी निश्चित समय पर नहीं होती। ये तो हर पाँच साल में एक बार देश के विभिन्न स्थानों में आयोजित की जाती है। हाँ यदि कुछ गड़बड़ हो जाए तो ये जल्दी-जल्दी भी आयोजित होती रहती है। इस तीर्थ यात्रा में जो भी यात्री तीर्थस्थान और वहाँ निवास करनेवाले प्राणियों को अधिक से अधिक चढ़ावा चढ़ाएगा और अधिकाधिक  सेवा भाव प्रदर्शित करेगा कृपा उसी को प्राप्त हो पाएगी। हर तीर्थयात्री तीर्थस्थान में स्वयं को अन्य तीर्थयात्रियों से अधिक भक्त सिद्ध करने का प्रयास करेगा। देश में मौजूद अन्य तीर्थों को बेशक आँच आए अथवा उन्हें इस धरा में विलीन कर दिया जाए, लेकिन कलियुगी तीर्थ का कोई बाल-बाँका भी नहीं कर सकता। भक्तजन अपनी जान की परवाह किये बिना इस तीर्थ को बचाने की खातिर बुलडोजर के आगे तक लोटने को तत्पर रहते हैं। अब ये और बात है कि अपनी जान की सबसे अधिक परवाह इन्हें ही होती है। इनके लाख चाहने के बावजूद प्रकृति इनके तीर्थस्थानों पर विपदा भेजती रहती है। कभी-कभी भक्तजन भी प्रकृति का नाम लगाकर स्वयं भी विपदा उत्पन्न करते रहते हैं। इस बहाने उन्हें तीर्थयात्रा का अवसर प्राप्त हो जाता है। हालाँकि  कलियुगी तीर्थ के वासियों को वंचित कहा जाता हैकिन्तु इन वंचितों के चरण चाटनेवालों की संख्या को देखकर अक्सर मन में प्रश्न उछल-कूद मचाने लगता है कि वंचित कलियुगी तीर्थ के वासी हैं या फिर ये तीर्थयात्रीकुछ समय के लिए ही सही किन्तु तीर्थवासी वंचित से संचित और तीर्थयात्री संचित से वंचित की श्रेणी में परिवर्तित हो जाते हैं। यह अल्पका तीर्थ के निवासियों के लिए खुशनुमा होता है और एक अलग ही अनुभूति से भरा हुआ होता है। इस छोटे से काल में उनके इर्द-गिर्द दुःखपीड़ाअभाव एवं परेशानी जैसे कलियुगी गुण फटकने से भी हिचकते हैं। उनकी सारी कठिनाईयों एवं दिक्कतों को तीर्थयात्री अपने सिर-माथे पर ले लेते हैं। और फिर एक दिन ऐसा आता है जब तीर्थयात्री तीर्थ के निवासियों के पास संचित वोट नामक धन हथियाकर चंपत हो जाते हैं। इस प्रका तीर्थ के निवासी अचानक संचित से वंचित में परिवर्तित हो जाते हैं और लुटी-पिटी अवस्था में फिर से वंचित से संचित होने की प्रतीक्षा करते हुए आगामी अच्छे दिनों के दिवास्वप्न में खो जाते हैं।
 लेखक : सुमित प्रताप सिंह 
 

चित्र गूगल से साभार