मित्रो इस विश्व पुस्तक मेले में मेरी पाँचवी पुस्तक व तीसरे व्यंग्य संग्रह 'सहिष्णुता की खोज' का विमोचन शोभना सम्मान समारोह व पहले ऐतिहासिक युवा व्यंग्य सम्मेलन में दो दिनों तक लगातार दो बार किया गया। मेरे इस व्यंग्य संग्रह में कुल 42 संग्रह संकलित हैं। इसे चिसलिंग पब्लिकेशन हाउस ने प्रकाशित किया है। इस प्रकाशन से प्रकाशित होनेवाली अन्य पुस्तकें क्रमशः हल्द्वानी, उत्तराखंड के चर्चित युवा व्यंग्यकार गौरव त्रिपाठी का हास्य व्यंग्य उपन्यास 'कपूत' तथा भुवनेश्वर, उड़ीसा की युवा लेखिका इति श्री राठौर का उपन्यास 'वो लड़की' है। यह प्रकाशन युवा लेखकों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से बनाया गया है। फ़िलहाल आप मेरी पुस्तक 'सहिष्णुता की खोज' को मँगवाकर और इसे पढ़कर अपनी राय देना मत भूलिएगा।
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Thursday, February 2, 2017
Wednesday, June 17, 2015
कविता : वो बच्ची
बाज़ार में गुमसुम सी
खड़ी वो बच्ची
लगभग अपने बराबर के
बच्चे को अपनी गोद में
टाँगे लग रही थी अनमनी सी
बच्चे को उसकी माँ द्वारा
खरीदकर दिए जा रहे
खिलौने, आइस क्रीम, टॉफियाँ
नहीं ला पा रहे थे
उसके बाल मन में
थोड़ा सा भी आकर्षण
न ही बाजार की चकाचौंध
जगा पा रही थी
उसके रोम-रोम में उत्सुकता
उसका मन तो अटका था
अपने मालिक की
शानदार हवेली की
उस बड़ी सी रसोई में
जहाँ बर्तन धोने की सिंक में
छोड़ आयी थी
ढेर सारे झूठे बर्तन
दोपहर की आधे घंटे की
नींद ले शरीर की थकावट को
मारने का यत्न करने के कारण
हो गया था उससे
बहुत बड़ा ये अपराध
अचानक उसके रोंये
होने लगे थे खड़े और
बाज़ार में मुस्कुराती हुई मालकिन
दिखने लगी थी उसे
एक खूंखार डायन
जो घर जाते ही
उसके बड़े अपराध की सज़ा
अपने डंडे से
उसका शरीर लहूलुहान
करके ही देती
अचानक दिखाई दिया
उस बच्ची के भीतर का
बचपन बेमौत मरते हुए
और अब वो बच्ची
बचपन की चिता जला
विवशता के वस्त्रों से लिपटी हुई
एक स्त्री बन चुकी थी।
लेखक : सुमित प्रताप सिंह
खड़ी वो बच्ची
लगभग अपने बराबर के
बच्चे को अपनी गोद में
टाँगे लग रही थी अनमनी सी
बच्चे को उसकी माँ द्वारा
खरीदकर दिए जा रहे
खिलौने, आइस क्रीम, टॉफियाँ
नहीं ला पा रहे थे
उसके बाल मन में
थोड़ा सा भी आकर्षण
न ही बाजार की चकाचौंध
जगा पा रही थी
उसके रोम-रोम में उत्सुकता
उसका मन तो अटका था
अपने मालिक की
शानदार हवेली की
उस बड़ी सी रसोई में
जहाँ बर्तन धोने की सिंक में
छोड़ आयी थी
ढेर सारे झूठे बर्तन
दोपहर की आधे घंटे की
नींद ले शरीर की थकावट को
मारने का यत्न करने के कारण
हो गया था उससे
बहुत बड़ा ये अपराध
अचानक उसके रोंये
होने लगे थे खड़े और
बाज़ार में मुस्कुराती हुई मालकिन
दिखने लगी थी उसे
एक खूंखार डायन
जो घर जाते ही
उसके बड़े अपराध की सज़ा
अपने डंडे से
उसका शरीर लहूलुहान
करके ही देती
अचानक दिखाई दिया
उस बच्ची के भीतर का
बचपन बेमौत मरते हुए
और अब वो बच्ची
बचपन की चिता जला
विवशता के वस्त्रों से लिपटी हुई
एक स्त्री बन चुकी थी।
लेखक : सुमित प्रताप सिंह
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