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Friday, October 14, 2016

राम जाने (कविता)




एक विश्वविद्यालय में 
रावण के वंशजों ने 
राम के वंशज का 
पुतला जलाया
और जोर-जोर से
हो-हल्ला मचाया
देखो-देखो हमने
रावण को जलाया 
ये देख रावण ने
अपना सिर खुजाया
और उनकी मूर्खता पर 
मंद-मंद मुस्कुराया 
फिर अपने वंशजों से
हँसते हुए बोला 
बेटा राम से 
लिया था मैंने पंगा तो 
उन्होंने मुझको 
लगा दिया था ठिकाने 
अब तुमने उसके 
वंशज को छेड़ा है 
अब तुम्हारा क्या होगा
ये तो राम ही जाने।





लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

Wednesday, September 21, 2016

हल्के लोग (कविता)

हल्के लोग
करते हैं सदैव
हल्की ही बातें
और करते हैं 
सबसे ये उम्मीद क़ि
उनकी हल्की बातों को
भारी माना जाए
इसके लिए देते हैं
वे बड़े-बड़े और
भारी-भारी तर्क
जब भी उन्हें 
समझाया जाए 
उनके हल्के
होने के बारे में 
तो उतर आते हैं
वे अपने हल्केपन पर।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

Friday, August 19, 2016

कविता : मैं बहुत बहादुर हूँ

मुझे मरने से 
डर नहीं लगता
क्योंकि मैं बहुत बहादुर हूँ
पर जब भी लगता है कि
मैं मर भी सकता हूँ तो 
मुझे अपने जाने के
मतलब मरने के 
बाद की परिस्थितियां 
अचानक से ही 
दिखाई देने लगती हैं
जिसमें मैं अपने
बिलखते माँ-बाप को
बार-बार देखता हूँ
जिनके बुढ़ापे का 
मैं ही हूँ सहारा
जिनके सपनों और 
ढेर सारी आशाओं को
पूरा करने का किया है
मैंने उनसे वायदा
मेरे जाने के बाद
क्या होगा उन आशाओं
और सपनों का 
और क्या होगा
उनसे बार-बार किए
मेरे उन वायदों का 
कैसे जिएंगे 
मेरे बिना 
मेरी ऊँगली पकड़कर 
मुझे चलना सिखानेवाले 
सच कहूँ
यही सोचकर 
मैं अचानक डर जाता हूँ
और अगले ही पल
मैं जीवन के रण को 
जीतने के लिए
उठ खड़ा होता हूँ
क्योंकि मैं बहुत बहादुर हूँ
हूँ न?

लेखक  : सुमित प्रताप सिंह

Tuesday, January 5, 2016

कविता : अब वक़्त लात का आया है


बातें-मुलाक़ातें बहुत हो चुकीं 
अब वक़्त लात का आया है
अब तक दूध पिला साँप को 
हमने खुद को ही डसवाया है

वो मर्म नहीं समझेगा कभी भी 
बातों और मुलाक़ातों का
वो पापी है बस पाप करेगा
उसका धर्म है छद्म घातों का
बार-बार धोखा दे उसने 
हम सबको ही बतलाया है
दूध पिला...

कब तक अपने लालों को
हम यूँ ही क़ुर्बान करेंगे
नाश पाप का करने को 
आखिर कब हुंकार भरेंगे
देश के कोने-कोने से
ये प्रश्न उभरकर आया है
दूध पिला...

शांति वार्ता को दे तिलांजलि
अब वीर वार्ता होने दो
भुजा फड़कती हैं वीरों की
अब मारने या मर लेने दो 
भारत माँ को शीश चढ़ाने
टोला वीरों का आया है 
दूध पिला...

मत रोको अब इन क़दमों को
इनको बढ़ते ही जाने दो
पाप की उस नापाक ज़मीं को 
बूटों से रौंद के आने दो 
जय हिन्द के नारों से
अब आसमान थर्राया है
दूध पिला...

लेखक : सुमित प्रताप सिंह
चित्र : गूगल से साभार 

Friday, January 1, 2016

कविता : मन का बादशाह


नहीं सल्तनत पास तो क्या 
मन ही है मिलकियत हमारी 
और मन की इसी सल्तनत के 
हम हैं बेताज बादशाह
नहीं किसी का बुरा यहाँ
सोचा और किया जाता है
अपनी इस सल्तनत में
न ही किसी का दिल दुखाने की
मिलती है जरा भी इजाजत
यहाँ इश्क़, मोहब्बत, अपनेपन की
साजिश रोज ही चलती हैं
यहाँ आता है जो भी
वो खुश होकर ही जाता है
और कोई दिलवाला तो
इसमें ही आ जाता है बस
यहाँ आने पर नहीं रोक
और लौटने का न होता
फरमान कोई भी
जिसको आना है तो
वो आए पूरे दिल से
करने को इस्तेकबाल
खड़ा ये मन का बादशाह।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

Wednesday, December 30, 2015

कविता : सपने



सपने 
सच होते हैं

यदि उन्हें
मेहनत के पसीने से
सींचा जाये
सपने 
सच होते हैं
यदि उन्हें
प्रयास के सिलबटने पर
पीसा जाये
सपने 
माँगते हैं
उन्हें देखते हुए
उनमें ही 
खो जाना
सपने
चाहते हैं
निरंतरता से 
उन तक
बढ़ते जाना
सपने
होते हैं 
वास्तव में
वास्तविकता के
प्रथम चरण
सपने
कहते हैं
देखो उन्हें जागते-सोते 
होंगे वो पूरे 
इक न इक दिन।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

चित्र गूगल से साभार 

Friday, October 23, 2015

कविता : रावण तुमको मरना होगा



त्रेता युग में
जब श्री राम ने रावण पर
अंतिम प्रहार किया होगा
तब रावण ने अट्टहास लगा
श्री राम से शायद बोला हो
हे राम सुनो
ये युग है तुम्हारा
सबके हृदय में
बस बसे तुम्हीं हो
इसलिए नहीं टिक पाया
समक्ष तुम्हारे ये रावण
किन्तु द्वापर युग के बाद
आएगा युग कलि का
तब मैं वास करूँगा
हर प्राणी के मन-मस्तिष्क में
तब देखूँगा कि कैसे
कर पाओगे अंत मेरा तुम
सुन वचन रावण के
श्री राम ने शायद 
कुछ ऐसा बोला होगा
हे रावण मुझको है 
विश्वास अपनी संतति पर
जिस भी युग में तुम 
उपजने का यदि 
करोगे साहस तो 
मेरी संतति मेरे रूप को
आत्मसात कर अपने भीतर
करेगी बार-बार
संहार तुम्हारा
हर युग में ही होगा तुमको 
राम के हाथों ही मरना।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

*चित्र गूगल से साभार 

Tuesday, October 6, 2015

कविता : थू


यूँ तो रोज ही
जंगपुरा फ्लाईओवर से
आना-जाना अच्छा लगता है
और अच्छे लगते हैं
फ्लाईओवर के बीचों-बीच
दाना चुगते और
एक-दूसरे से लड़ते-झगड़ते
वहाँ मौजूद शरारती कबूतर
वहीं मिल जाते हैं
स्नेहवश अथवा विवशता में
उन कबूतरों को
दाना डालते कुछ लोग
पर आज फ्लाईओवर से
गुजरते हुए जब दिखा
रोम-रोम कंपानेवाला वह दृश्य
तो आँखें अचानक ही डबडबा गयीं
दाना चुगते कबूतरों के बीच
एक बूढ़े आदमी को
चुगते देखा कई दिनों की
बासी और लगभग सड़ चुकी रोटी
तो आत्मा पीड़ा से कराह उठी
और वह पीड़ा थूक का रूप धर
निकल पड़ी मुँह से एकदम ही
सबसे पहले थूका खुद पर
फिर प्रशासन और समाज पे
जो हमारे रहते हुए भी
एक आदमी भूख से
इतना हुआ विवश कि
उस विवशता ने
सड़ी-गली रोटी खाने को
उसको विवश कर डाला
हमने अपने नफे के लिए
बाँट डाला खुद को
जाने कितने धर्मों और
अनगिनत जातियों में
जिनके लिए हम
कर रहे हैं नित नए संघर्ष
जबकि असल में बंटा है
समाज सिर्फ भागों में
भुखमरे और पेटभरे लोगों के बीच
पेटभरे लोग अपने पेट को
अधिकाधिक भरने की खातिर
भुखमरे लोगों को मृत्यु की ओर
धीमे-धीमे धकेले जा रहे हैं
सच कहूँ तो भुखमरों का
हक़ छीनेवाले पेटभरों को
देखकर कभी-कभी
होता है बड़ा क्षोभ
और जी करता है कि
अपने भीतर की
सारी पीड़ा और सारा क्षोभ
पूरी शक्ति से लाऊँ
मुँह में थूक के रूप में
और इन दुष्टों के मुँह पर
जोर से करूँ
एक नहीं बल्कि
कई -कई सौ बार
थू।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

Sunday, September 27, 2015

कविता : खूनी दरवाजा



दिल्ली गेट के पास
इतिहास के दुःख भरे पलों को 
अपने सीने में दबाए
उदास गुमसुम सा
खड़ा है खूनी दरवाजा
जब भी सुनता है 
कोई अनजान सी आहट तो
हो उठता है चौकन्ना
और अपने विशाल शरीर को 
कड़ा कर मजबूत करने लगता है
कुछ देर बाद 
अपने इस प्रयास में 
असफल होने पर
सुबकने लगता है खूनी दरवाजा
उसे अचानक याद आते हैं वो क्षण 
जब आजादी की चाह में
बादशाह ने फूँका था
विद्रोह का बिगुल
बदले में बादशाह ने
पाया था निर्वासन
और उसके शहजादों को
इसी दरवाजे पर 
सरेआम भून दिया था
सफ़ेद शैतानों ने गोलियों से
उन हत्यारे पलों को 
याद करते हुए
खूनी दरवाजा बेबसी से
तड़पने लगता है
फिर अचानक गर्वित हो
खड़ा हो जाता है तन कर
और माँग करता है कि
जब बदल दिए गए
कई शहरों, सड़कों और 
मोहल्लों के नाम 
तो क्यों न 
उसका भी नाम बदला जाये
और खूनी दरवाजा में 
दरवाजे को ज्यों का त्यों
बेशक रखा जाये लेकिन
खूनी के बदले कर दिया जाये
शहीद या फिर क़ुरबानी
तब खूनी दरवाजा 
शहीद दरवाजा या क़ुरबानी दरवाजा हो
रहेगा सदा ही गर्व से तना
और करेगा स्वागत 
हर राहगीर का 
उत्साह और प्रफुल्लता से।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

Sunday, August 9, 2015

क्या हूँ मैं

क्या हूँ मैं 
अपनों की आस हूँ 
माँ ममता हूँ 
पिता के कन्धों का सहारा हूँ 
आखिर क्या हूँ मैं 

जी करे छोड़ दूँ खुद को 
खुला उड़ता सपनों के आसमान में,
क्या पता कब तक हूँ मैं
आखिर क्या हूँ मैं 

कहाँ जायेगा मन का पंछी,
दुनिया तो एक छोटा सा पिंजरा 
जहाँ कैद हूँ हर पल शायद 
इसमें ही मन मेरा ठहरा 
आखिर क्या हूँ मैं 

रंग दूँ जीवन के इस कोरे कागज को,
ये कागज तो एक दिन जलना है 
समय के झंझावातों में न खोऊँ 
अब जीवन के संग चलना 
अब लगे कि जो भी हूँ 
बिलकुल अच्छा हूँ मैं। 

कुलदीप सिंह राठौड़

  
नागौर, राजस्थान 

Wednesday, June 17, 2015

कविता : वो बच्ची

बाज़ार में गुमसुम सी
खड़ी वो बच्ची 
लगभग अपने बराबर के 
बच्चे को अपनी गोद में 
टाँगे लग रही थी अनमनी सी
बच्चे को उसकी माँ द्वारा
खरीदकर दिए जा रहे
खिलौने, आइस क्रीम, टॉफियाँ
नहीं ला पा रहे थे
उसके बाल मन में
थोड़ा सा भी आकर्षण
न ही बाजार की चकाचौंध
जगा पा रही थी
उसके रोम-रोम में उत्सुकता
उसका मन तो अटका था
अपने मालिक की
शानदार हवेली की
उस बड़ी सी रसोई में
जहाँ बर्तन धोने की सिंक में
छोड़ आयी थी
ढेर सारे झूठे बर्तन
दोपहर की आधे घंटे की
नींद ले शरीर की थकावट को
मारने का यत्न करने के कारण
हो गया था उससे
बहुत बड़ा ये अपराध
अचानक उसके रोंये
होने लगे थे खड़े और
बाज़ार में मुस्कुराती हुई मालकिन
दिखने लगी थी उसे
एक खूंखार डायन
जो घर जाते ही
उसके बड़े अपराध की सज़ा
अपने डंडे से
उसका शरीर लहूलुहान
करके ही देती
अचानक दिखाई दिया
उस बच्ची के भीतर का
बचपन बेमौत मरते हुए
और अब वो बच्ची
बचपन की चिता जला
विवशता के वस्त्रों से लिपटी हुई
एक स्त्री बन चुकी थी।
लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

Wednesday, June 10, 2015

कविता : मित्र

सुख-दुःख के साथी
मित्र-सखा भी होते हैं
सुख में हँसते संग हमारे
दुःख में संग वो रोते हैं
जब अपने ठुकरा देते हैं
और निराशा छा जाती है
मन विचलित हो उठता फिर
कोई आस नज़र न आती है
तब बनके सहारा मित्र हृदय में
बीज आस के बोते हैं
सुख में हँसते संग हमारे
दुःख में संग वो रोते हैं...
कभी बनके मात-पिता वो
कभी भाई-बहन रूप में
देते काँधा निश्छल मन से
कष्टों की दोपहरी धूप में
हमको सुखमय जीवन देने को
वो नित नए सपन संजोते हैं
सुख में हँसते संग हमारे
दुःख में संग वो रोते हैं...


Wednesday, December 24, 2014

एक दिवस

जीवन व मृत्यु में संवाद होने लगा
दोनों में कौन श्रेष्ठ ,वाद होने लगा,
बात बढ़ते-बढ़ते विवाद होने लगा
जीवन की हर बात का प्रतिवाद होने लगा |

अंतिम सत्य मृत्यु है, प्रचार होने लगा,
विपरीत वातावरण,जीवन भी निराश होने लगा,
मृत्यु के पक्ष में ही सरोबार होने लगा,
हर आस छोड़कर निढाल हो रोने लगा |

रोते-रोते उसको अचानक ,ये ख्याल आ गया
कर्म ही जीवन है ,इसका भाव छा गया
निराश भावों को उसने ,एक पल में भगा दिया
मृत्यु तो निष्क्रिय है,यह सबको बता दिया |

कर्म केवल जीव करता, जिंदगी की शान है
आत्मा भटकती रहती ,मृत्यु के उपरांत है
जीव उसको आश्रय देता, जीवन की पहचान है
जीवन ही सर्व श्रेष्ठ है,सत्कर्म उसकी पहचान है |

डॉ अ कीर्तिवर्धन
मुजफ्फर नगर, उ. प्र.

Thursday, October 23, 2014

कविता : मत ठुकराओ

आदरणीय बंधुजनों एवं मित्र जनों 
सादर ब्लॉगस्ते!

आप सभी को दीपों के इस पर्वर दीपावली की अशेष शुभकामनाएँ।आज दीपावली के शुभ अवसर पर आदरणीय माता-पिता के चरणों में बैठकर निम्नलिखित कविता का निर्माण हुआ है। आशा है आप सबको पसंद आएगी।



न न मुझको
अब नहीं रही है  
स्वर्ग पाने की
वो बेकार सी चाहत
क्योंकि मैं तो पहले ही
रहता हूँ स्वर्ग सरीखी
माता की ममतामयी और
पिता की स्नेहिल छाया में
न न मुझको
अब नहीं भातीं   
स्वर्ग की सुख-सुविधाएँ
न करता हूँ इच्छा
वहाँ के छप्पन भोगों की
मेरा मन तो रमता है
माँ के हाथ की
दाल और रोटी में
न न मुझको
अब नहीं रिझातीं
स्वर्ग की वो सुंदर परियाँ
मैं तो खो जाता हूँ
सीधी-सादी भोली सी
उस लड़की के भोले चेहरे में
न न मुझको नहीं सुहाता
देवों संग जा मिलना-जुलना
मेरा तो मन लगता है
अपने मित्र-सखाओं में  
और बंधुओं की टोली में
न न मुझको
नहीं छोड़ना इस धरती को
मुझे तो भगवन
बार-बार भेजना यहीं
भारत की इस देव भूमि में
इसी की खातिर जियूँ
इसी की खातिर मरूँ हमेशा
न न मुझको
नहीं चाहिए सिवा इसी के
दे दो बस ये छोटा सा वर
मत ठुकराओ मत ठुकराओ

© सुमित प्रताप सिंह 
इटावा, नई दिल्ली, भारत 

Wednesday, October 8, 2014

कविता : सपने

कुछ ख्वाब सुनहरे देखे थे 
जीवन की उलझी राहों में 
कुछ आशायें कुछ उम्मीदें जो 
थीं भविष्य की बाहों में 
सपने वो मेरे ऐसे थे 
जो कभी किसी से कह न सका 
पर हरदम छाये रहते थे 
इन सूनी - सूनी आँखों में 
कुछ ख्वाब हमारे पूर्ण हुए 
कुछ छूट गए हैं अब पीछे
पर कुछ अब भी हैं अडिग खड़े 
आशाओं के जल से सींचे 
ये सपने पूरे हुए नहीं 
पूरी कोशिश करने पर भी 
पर हार न मैंने मानी है 
सौ बार हुआ असफल तो भी 
अपनों और परायों से 
जब - जब भी धोखे खाएं हैं 
शीशे से नाज़ुक ये सपने 
मुश्किल से ही बच पाए हैं 
इन्हें संजो कर रखा है मैंने 
अपनी इन आँखों में 
कहीं चटख न जाएँ सपने ये 
लम्बी पथरीली राहों में 
पूरा करने की कोशिश में 
अंतिम दम तक न हारूंगा 
जीवन की बची हुई साँसे 
इन सपनों पर ही वारूंगा 
पर जो फिर भी न पूर्ण हुए
तो तुम्हें सौंपकर जाऊँगा 
तुम ही होंगे वारिस इनके 
फिर मैं तो लौट न पाऊँगा 
तुमको पूरे करने होंगे 
मेहनत तुम सुबह शाम करो 
है कसम तुम्हें सपनों की 
जो इससे पहले आराम करो
  
प्रमोद शर्मा असर
हौज़ खासनई दिल्ली