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Thursday, March 17, 2016
Wednesday, March 16, 2016
Wednesday, February 3, 2016
एक पत्र आँसू गैंग के नाम (व्यंग्य)
प्यारे आँसू गैंग
सादर दोगुलस्ते!
आशा है सकुशल होंगे और अपने-अपने बिलों में चैन से सो रहे होंगे। जानता हूँ बीते दिनों आप सबने कठिन परिश्रम करके अपना पसीना बहाया था सो थकान होना अवश्यम्भावी है। पाकिस्तानी गवैये के कार्यक्रम पर प्रतिबन्ध, मालदा दंगे, असहिष्णुता व आतंकी याकूब प्रेमी छात्र की आत्महत्या इत्यादि बहुतेरे मुद्दे थे जिनमें आप सब कुछ ज्यादा ही व्यस्त रहे। सो इतनी व्यस्तता और परिश्रम के पश्चात् आराम करना तो बनता है। पर आप तो स्वयं को न्याय के लिए आवाज बुलंद करने के लिए प्रतिबद्ध हैं इसलिए मैंने सोचा कि आपकी निंद्रा में खलल डालने की कोशिश कर ही दूँ। शायद आपको पता चल गया हो कि हमारे एक कलाकार को पड़ोस के अति शांतिप्रिय देश ने अपने देश में आने के लिए वीसा देने से इंकार कर दिया है। अब ये और बात है कि उस अति शांतिप्रिय देश के शांति दूत आए दिन बिना वीसा के हमारे देश में शांति में वृद्धि करने में समय-समय पर अपना अतुलनीय योगदान देते रहते हैं। क्या कहा आपको ये समाचार मिल गया था? फिर आपकी आँखों में आँसुओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज क्यों नहीं करवाई और न ही आपके मोमबत्ती गैंग व धरना विशेषज्ञ बंधुओं की इस समाचार पर मोमबत्ती मार्च और धरना दिए जाने की घोषणा करने की कोई खबर मिली। अच्छा तो ये बात है। आप असली वाले धर्मनिरपेक्ष प्राणी हैं जो सिर्फ और सिर्फ बहुसंख्यक हो चुके अल्पसंख्यकों और देश की ऐसी-तैसी करनेवाले सदपुरुषों के पक्ष में ही आवाज उठाते हैं और उस कलाकार ने उन अल्पसंख्यकों द्वारा खुद के बंधुओं पर हुए अत्याचार और कत्लेआम के विरोध में आवाज उठाने का घोर पाप किया है। ओहो मतलब आप भी विवश हैं। यदि आप ऐसे छोटे-मोटे मुद्दे पर विरोध का झंडा उठायेंगे तो अरब के तेलियों और यूरोप के मिशनरीज से आप सबके कटोरों में नियमित रूप से डाली जानेवाली भीख बंद हो जाएगी। सीधे-सादे शब्दों में कहें तो ये पापी पेट का मामला है। खैर छोडिए किसी के पेट पर लात मारना अपने स्वभाव में भी नहीं है। हम आपकी सहायता के बिना ही ये समस्या सुलझा लेंगे। आपकी नींद में खलल डाला इसके लिए माफ़ कीजिएगा। आप तब तक चैन से सोइए जब तक कोई देशद्रोही मुसीबत में न फँस जाए या फिर कोई शांतिप्रिय आतंकी देश में शांतिपूर्ण कार्य करते हुए 72 हूरों के लालच में अपनी पवित्र देह को त्याग न दे। तब तक हम राष्ट्रवादी राष्ट्रवाद की अलख जगाते हुए अपने और अपने बंधुओं के हृदय में सो चुके राष्ट्रप्रेम को जगाने का प्रयत्न करते हैं ताकि आनेवाले समय में आप सबकी नींद में कभी भी व्यवधान न पड़ सके।
आपके यूँ ही सोये रहने की आशा करता हुआ
आपके अनुसार असहिष्णु देश का वासी
एक असहिष्णु भारतीय।
लेखक : सुमित प्रताप सिंह
Monday, February 1, 2016
एक पत्र रायते के नाम (व्यंग्य)
प्यारे रायते
सादर फैलस्ते!
और सब कुशल मंगल है न? अरे नाराज मत हो मैं भली-भाँति जानता हूँ तुम्हारे साथ कुछ भी कुशल मंगल नहीं है इसीलिए तो तुम्हें ये पत्र लिख रहा हूँ। अब पत्र के आरंभ में कुशल क्षेम पूछने की अपनी पुरानी परंपरा जो ठहरी सो मैं भी उसी प्राचीन परंपरा का निर्वहन कर रहा था। अब ये और बात है कि इन दिनों कुछ महानुभाव आधुनिकता की दुहाई देते हुए प्राचीन परंपरा और संस्कृति से किनारा करने में ही अपना बड़प्पन समझने लगे हैं। पर हम ठहरे पुराने विचारों के आधुनिक लोग जो चाहकर भी अपनी परंपरा और संस्कृति को नहीं छोड़ सकते। खैर छोड़ो इन बातों को तुम तो ये बताओ कि आजकल काहे को इतना उदास रहते हो? इतने स्वादिष्ट व्यंजन को यूँ उदास और गुमसुम रहना भी भला कहीं जँचता है। एक तुम्हीं तो हो जिसे भोजन में ग्रहण करके पेट की गर्मी से राहत मिलती है और पाचन भी दुरुस्त रहता है। तुम्हारे भिन्न-भिन्न रूप स्वाद से भरपूर होते हैं। बूँदी का रायता, बथुए का रायता, कद्दू का रायता और घीये का रायता तो खाते-पीते हुए जी ही नहीं भरता। सच कहूँ तो तुम तो हमारे भोजन का अभिन्न अंग हो। अरे देखो तो तुम्हारे विभिन्न रूपों का स्मरण करते ही जीभ से लार टपकने लगी। जीभ में हींग, जीरे, काले नमक और चाट मसाले का स्वाद लार के साथ तैरने लगा। जिस प्राणी ने तुम्हारा स्वाद नहीं लिया उसने भला जीवन जिया भी तो क्या जिया। अरे-अरे तुम तो रोने लगे। अब रोना बंद भी करो। मैं तुम्हारी पीड़ा अच्छी तरह जानता और समझता हूँ। तुम्हें भोजन में ग्रहण करने की बजाय इन दिनों बिना-बात में निरंतर फैलाए जाने से तुम्हारा हृदय जिस अपमान और पीड़ा से गुज़र रहा है वो किसी से छिपा नहीं है। तुम्हारे स्वाद के दीवाने उस दिन को कैसे भूल सकते हैं जब एक माननीय महोदय आए और रैलियों के महानगर की सत्ता हथियाकर सड़कों पर रायता फैलाने की परम्परा आरंभ कर दी। अपनी हर असफलता का ठीकरा दूसरे के सिर पर फोड़ने में सिद्धहस्त उन माननीय महोदय का अनुसरण भेड़ बनकर तूफ़ान की मार से अपने जहाज डुबो चुके अन्य माननीय महोदय भी कर रहे हैं। अब जनता के हित में क्या ठीक है सोचने की बजाय ये महोदय नित्य किसी न किसी ऐसे मुद्दे की खोज में रहते हैं जिसके बल पर रायता फैलाया जा सके। कभी जाति मुद्दा बनती है तो कभी धर्म। कभी मंदिर मुद्दा बनता है तो कभी मस्जिद। आजकल इनका सारा समय रायता फैलाकर शोर-शराबा करने में ही बीतता है। इनका शायद एकमात्र उद्देश्य है कि न कुछ खुद करो न किसी को कुछ करने दो। विकास की माँग पर हो-हल्ला मचाकर रायता फैलानेवाले इन महोदयों का प्रयास रहता है कि इनके द्वारा फैलाए गए रायते से विकास का पैर फिसल जाए और वो फिसलकर ऐसा गिरे कि उसकी कमर टूट जाए तथा वो थोड़ा-बहुत भी चलने-फिरने के लायक न रहे। इन्हें ये अंदाजा नहीं है कि जिस दिन तुम सही तरीके से फैलने पर आ गए, उस दिन ये सब ऐसे फैलकर फेल होंगे कि कोई इन्हें पास करनेवाला भी नहीं मिलेगा। इसलिए यदि ये सब तुम्हें समय-असमय बिना-बात के फैलाकर बर्बाद करते हैं तो तुम निराश और दुखी मत होना क्योंकि जैसे कि कहावत है कि बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद वैसे ही रायता फैलानेवाले क्या जाने रायता खाने का स्वाद। सो जो तुम्हारे स्वाद के प्रेमी हैं वो तुम्हें पहले जितना ही प्यार और आदर देते रहेंगे और जो तुम्हारे स्वाद और गुणों से अनभिज्ञ हैं वो तुम्हें फैलाते ही रहेंगे। इसलिए अब टेंशन-वेंशन छोड़कर झट से अपने उसी रूप में फिर से वापस लौट आओ क्योंकि तुम्हारा स्वाद लेने को जी बहुत मचल रहा है।
तुम्हारे जैसे थे की स्थिति में वापस लौटने की प्रतीक्षा की आस लिए हुए तुम्हारे स्वाद का दीवाना
एक रायता प्रेमी भारतीय
लेखक : सुमित प्रताप सिंह
Wednesday, January 27, 2016
अगला विश्वयुद्ध पार्किंग के लिए होगा (व्यंग्य)
विश्व अब तक दो विश्वयुद्धों की मार झेल चुका है। हम सभी इस बात से भली-भांति परिचित हैं कि विश्व की महाशक्तियों ने किस प्रकार निजी स्वार्थों के लिए बाकी संसार को दो विश्वयुद्धों की आग में झोंक दिया था। पर शायद दो-दो विश्व युद्धों से हम लोगों का जी नहीं भरा है सो अक्सर हम अपने मस्तिष्क को कष्ट देते हुए विचारमग्न रहते हैं कि अगला अर्थात तीसरा विश्व युद्ध किस कारण होगा? विभिन्न रायवीरों ने तीसरा विश्व युद्ध भड़कने के लिए विभिन्न कारण बताये हैं। उनमें से ही एक कारण है कि तीसरा विश्व युद्ध जल यानि पानी के लिए होगा। यह कारण अधिकांश महानुभावों द्वारा स्वीकार भी किया जा चुका है। इसके पीछे तर्क दिया जाता है कि दिन-प्रतिदिन विश्व की आबादी बढ़ती ही जा रही है और एक दिन ऐसा भी आएगा जब आबादी के अनुपात में पर्याप्त जल उपलब्ध नहीं होगा। हालाँकि उनके इस तर्क में थोड़ी-बहुत सच्चाई भी अनुभव होती है, क्योंकि जिन नारियों का कलेजा घर में कॉकरोच को ही देखकर बुरी तरह काँप उठता है वे पानी के टैंकर पर खड़ी होकर इतनी वीरता से युद्ध करती हैं कि ऐसा प्रतीत होता है कि न पहले कभी इतनी वीर नारियाँ जन्मी होंगी और न ही जन्म लेंगी। पर पानी के लिए होनेवाली ये छिटपुट लड़ाइयाँ तो गर्मी के मौसम में होनेवाली लड़ाइयों के कुछेक उदाहरण मात्र हैं। सर्दी का मौसम आते ही ये सभी युद्धप्रेमी स्वेटर अथवा रजाई की ओट में छिपे हुए पानी से अधिकाधिक दूरी बनाने के लिए प्रयासरत रहते हैं। कई महानुभाव तो इन दिनों ठंडे पानी के प्रकोप से डरकर नहाने से ही सन्यास ले लेते हैं। बेचारा पानी भी इन दिनों निराश और उदास रहता और कामना करने लगता है कि जल्द से जल्द गर्मी का आगमन हो और उसकी प्रतिष्ठा फिर से स्थापित हो जाए।
अब सोचनेवाली बात ये है कि यदि तीसरा विश्व युद्ध पानी के कारण नहीं होगा तो फिर किस कारण से होगा? फिर एक बार को ख्याल आता है कि तीसरा विश्व युद्ध होना क्या इतना जरूरी है कि उसके सोच-विचार में अपना बहुमूल्य समय ख़राब किया जाए। अचानक मन ये विचार करने लगता है कि यदि विश्व युद्ध नहीं हो पायेगा तो फिर दुनिया के ठेकेदार देशों की रोजी-रोटी कैसे चल पायेगी। उनके द्वारा प्रेमपूर्वक बनाये गए विध्वंशक हथियार बिना युद्ध के जंग नहीं खा जायेंगे। इसलिए युद्ध होने बहुत जरूरी हैं ताकि हथियारों का सदुपयोग होता रहे तथा हम जैसे दुखी मानवों को इस जीवन मुक्ति मिलती रहे। बहरहाल हम अपने मुद्दे पर जैसे थे कि स्थिति में फिर से आते हैं और अपने मस्तिष्क को कष्ट देकर मिलजुलकर ये विचार करते हैं कि ये ससुरा तीसरा विश्वयुद्ध आखिर किस वजह से होगा?
अब आप चाहे जो भी उल्टा-सीधा सोचते रहें पर मेरे अनुपजाऊ मस्तिष्क में एक अनुपजाऊ सा विचार कबड्डी खेल रहा है कि अगला विश्वयुद्ध पार्किंग के लिए होगा। अब भला इसमें चौंकने जैसी बात कहाँ से आ गयी? पूरे संसार में कंक्रीट के जंगल तेजी से पनपते जा रहे हैं और उन जंगलों में वास करनेवाले भले लोगों के दिल भी कंक्रीट जैसे ही हो गए हैं, जिनमें मानवीय संवेदनायें दम तोड़ती जा रही हैं। इन्हीं संकुचित दिलों वाले भले मानुषों ने अपने घर के आजू-बाजू वाली सड़क को अपहृत करके अपने बड़े-बड़े फ्लैटों का आकार बढ़ाने का अद्भुत कार्य किया है और ये सब इन्होंने सरकारी सड़क को अपनी बपौती समझकर किया है। इसके अलावा बाकी बची सड़क को भी ये अपने पुश्तैनी अधिकार की श्रेणी में रखकर उसपर अपने गाड़ियों के संग्रह की प्रदर्शनी लगाये हुए मिल जाते हैं। इनके घरों में रहनेवाले विभिन्न सदस्य गणों की निजी वाहन की चाहत गाड़ियों के संग्रह में वृद्धि रुपी योगदान देती रहती है। हालाँकि उनका काम एक वाहन से भी चल सकता है किन्तु इसके लिए एकता की भावना भी होनी आवश्यक है किन्तु एकता नामक अवगुण हमारे दिलों से जाने कबका लापता हो चुका है। वाहनों की भीड़ और बोझ से सड़कें हाँफती रहती हैं लेकिन वाहनों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही है। वाहनों की इस भीड़-भाड़ में जाने-अनजाने एक-दूसरे के वाहनों में हलकी-फुलकी खरोंच आ ही जाती है, जिसका बदला वाहन चालक एक-दूसरे को खरोंचों से भरकर लेते हैं। पार्किंग के मुद्दे पर लोग सड़कों, गलियों, मोहल्लों और अपने आस-पड़ोस में कर्मठता से लड़ते-झगड़ते हुए मिल रहे हैं। कई बार कर्मठता से लड़ते हुए वे एक-दूसरे का राम नाम सत्य भी कर डालते हैं। एक बार के लिए विचार करें तो असल में यह तीसरे विश्व युद्ध की तैयारी चल रही है, जिसके लिए हम भले लोग निरंतर अभ्यासरत हैं। अब देखते हैं कि किस शहर के किस कोने में पार्किंग विवाद पर छिड़ा संघर्ष बढ़ते-बढ़ते विश्व युद्ध का रूप धारण करता है। अब आप सभी के मन में यह प्रश्न कौंध रहा होगा कि विश्व युद्ध का शुभारंभ किसी शहर से ही क्यों होगा? इसका शुभारंभ किसी गाँव से भी तो हो सकता है। तो गौर करनेवाली बात ये है कि यदि गाँवों को किसी भी देश की राजनीति में इतना महत्त्व मिल पाता तो गाँव का किसान इतना गरीब न होता और न ही उसे इस मोहमाया के बंधन से मुक्त होने के लिए किसी पेड़ पर फाँसी के फंदे में झूलकर बेमौत मरना पड़ता। खैर हम भी कहाँ महत्वहीन किसान की दुखभरी व्यथा में उलझ गए। उसका जीवन तो कर्ज के भंवर में फँसने से आरंभ होता है और किसी पेड़ की डाली पर फाँसी के फंदे पर झूलते हुए ही समाप्त होता है। अब आप ही सोचिये कि भला गाँव शहर द्वारा किये जानेवाले विश्व युद्ध के शुभारंभ जैसे पुनीत कार्य में व्यवधान डालने की धृष्टता कैसे करेगा। इसलिए इस पावन कार्य की अगुवाई का सर्वाधिकार तो शहर के पास ही सुरक्षित रहेगा। इसलिए आप सब शहरियों से निवेदन है कि इस पावन यज्ञ में अपनी आहुति देने के लिए तैयार रहें और इसके लिए कर्मठता और परिश्रम से अभ्यास करते रहें। ॐ अशांति!
लेखक : सुमित प्रताप सिंह
चित्र गूगल से साभार
Saturday, January 23, 2016
यादगार रहा विश्व पुस्तक मेला 2016
-भाई नफे!
-हाँ बोल भाई जिले!
-कैसे उदास बैठा है?
-उदास नहीं हूँ भाई मैं तो यादों में खोया हुआ हूँ।
-कौन है वो खुशनसीब हसीना जिसकी यादों में खोया हुआ है?
-भाई किसी हसीना की यादों में नहीं मैं तो विश्व पुस्तक मेले की मधुर यादों में खोया हुआ था।
-अच्छा तो ये बात है। तो हमें भी विश्व पुस्तक मेले की मधुर स्मृतियों से रूबरू करवा।
-भाई विश्व पुस्तक मेला 9 जनवरी, 2016 को शुरू हुआ। शोभना वेलफेयर सोसाइटी द्वारा आयोजित शोभना सम्मान समारोह में देश के गिने-चुने लोगों को विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने के लिए शोभना सम्मान-2015 से विभूषित किया गया।
-अरे वाह! भाई शोभना सम्मान किस-किसको दिया गया?
- साहित्य में शोभना सम्मान प्राप्त करने वाले प्रसिद्द कथाकार बल राम, मुम्बई के कहानीकार सूरज प्रकाश, पंजाब के लघुकथाकार श्याम सुंदर अग्रवाल व लखनऊ के व्यंग्यकार अनूप श्रीवास्तव को दिया गया। संपादन में प्रवासी संसार के डॉ. राकेश पाण्डेय, हल्द्वानी के अनूप वाजपेयी, बिहार के रणविजय राव, अट्टहास की शिल्पा श्रीवास्तव, दिल्ली के आशीष कंधवे व मेरठ के प्रदीप कुमार को मिला। समाज सेवा के क्षेत्र में युवाओं के लिए कार्यरत झारखण्ड के गोपाल भगत व बाल शिक्षा के लिए जयपुर व गुड़गाँव में संघर्षरत डॉ. अनुभूति भटनागर को शोभना सम्मान प्रदान किया गया। आलोचना के क्षेत्र में रांची के डॉ. रमेश तिवारी को तथा व्यंग्य के क्षेत्र में शोभना सम्मान 'पैकेज का पपलू' व 'दोराहे पर जिंदगी' के लेखक हल्द्वानी के गौरव त्रिपाठी को दिया गया वहीँ कला के क्षेत्र में अर्चना शाह अग्रवाल को सम्मानित किया गया तथा इटावा के नितिन जैन को कंप्यूटर शिक्षा के क्षेत्र में शोभना सम्मान दिया गया।
-इसका मतलब है विश्व पुस्तक मेले की शुरुआत शोभना सम्मान से ही हुई।
-नहीं यह विश्व पुस्तक मेले का दूसरा कार्यक्रम था। पर हाँ इसमें लोकार्पित हुई पुस्तक 'सावधान पुलिस मंच पर है' मेले में सबसे पहले लोकार्पित होनेवाली पुस्तक थी।
-अरे वाह! भाई इस कार्यक्रम के अतिथि कौन-कौन थे?
-भाई कार्यक्रम की अध्यक्षता व्यंग्य यात्रा के संपादक डॉ. प्रेम जनमेजय ने की, मुख्य अतिथि डॉ. हरीश नवल रहे तथा विशिष्ट अतिथि प्रताप सहगल थे। वक्ता के रूप में डॉ. शशि सहगल उपस्थित रहीं। सानिध्य सोसाइटी की अध्यक्षा शोभना तोमर का रहा तथा कार्यक्रम का संचालन अपने सुमित प्रताप सिंह ने किया।
-तो मेले में उपस्थित जनसमूह की क्या प्रतिक्रिया रही?
-प्रतिक्रिया अच्छी रही। श्रोताओं ने सभी अतिथियों व वक्ताओं को सुना एवं सराहा।
-ये तो बहुत बढ़िया बात है। अच्छा वहाँ किन-किनसे मिलने का अवसर मिला?
-बहुत से जाने-अनजाने लोग मिले। नरेंद्र कोहली, ज्ञान चतुर्वेदी, गिरिराजशरण अग्रवाल, सुधाकर अदीब, लालित्य ललित, सुभाष चंदर, अशोक मिश्र, कौशलेन्द्र प्रपन्न, मलय जैन, अनुज त्यागी, सुधांशु माथुर, प्रदीप राय, विजय शंकर चतुर्वेदी, हरीश अरोड़ा, मीना अरोड़ा, अलका अग्रवाल, नेहा शरद, संगीता कुमारी, दीपक सरीन इत्यादि सुधीजनों से मिलने और खिलने का अवसर मिला।
-भाई मेले में भीड़ कैसी रही?
-भीड़ खूब रही। इस बार बड़ी संख्या में पुस्तक प्रेमी पुस्तक मेले में आए और अपने साथ पुस्तकों से भरे थैले लेकर गए।
-कमाल है। डिजिटल युग में भी थैला भर किताबें ले गए?
-हाँ भाई क्योंकि पुस्तक के पन्नों को उँगलियों से स्पर्श कर पढ़ने की अनुभूति का आनंद वो भली-भाँति जानते हैं। इसलिए डिजिटल युग में भी अपने-अपने पसंद के लेखक की पुस्तकें खरीदने की चाहत लिए हुए वो भागे-भागे पुस्तक मेले घूमने पहुँचे थे।
-ये तो अच्छी बात है। अच्छा मेले में और क्या-क्या हुआ?
-मेले में अनेक लेखकों की पुस्तकों का लोकार्पण हुआ। भिन्न-भिन्न विषयों पर विचार गोष्ठियों का आयोजन हुआ। लेखकों व पाठकों का आपसी परिचय हुआ। कुछ नए लेखकों के लेखन को जहाँ प्रतिष्ठा मिली वहीँ पुराने व वरिष्ठ लेखकों के अनुभवों से युवा हस्ताक्षरों को कुछ सार्थक सीखने को मिला। व्यंग्य यात्रा पत्रिका द्वारा आयोजित व्यंग्य की तीन पीढ़ियों के बीच संवाद द्वारा व्यंग्य विधा ने विश्व पुस्तक मेले में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज़ करवाई। इसके अलावा कुछ लोगों ने मंच से चिपकने का व कुछ ने शाल ओढ़ने में रिकॉर्ड भी बनाया।
-हा हा हा तू ये बता कि तूने कोई रिकॉर्ड बनाया या नहीं?
-हाँ बिलकुल बनाया।
-वो भला क्या?
-इस बार सबसे ज्यादा पुस्तक मेले में घूमने का।
-हा हा हा ये भी सही है। इसका मतलब है कि तूने पुस्तक मेले का खूब मजा लूटा।
-हाँ भाई और अगले साल भी इसका पूरा मजा लूटने की योजना है।
-अगली बार तू पूरा मजा नहीं लूट पाएगा।
-वो कैसे?
-क्योंकि अगले विश्व पुस्तक मेले में नफे के साथ आधा मजा जिले भी लूटनेवाला है।
-ऐसा क्या?
-हाँ भाई बिलकुल। अगली बार मैं भी तेरे विश्व पुस्तक मेले में मौजूद रहूँगा।
-अरे वाह भाई फिर तो मेले में घूमने का मजा दुगुना हो जाएगा।
लेखक : सुमित प्रताप सिंह
Saturday, January 16, 2016
लघुकथा : फ़िक्र
विश्व पुस्तक मेले में मुफ़्त में बाँटी जा रहीं कुरान की ढेर सारी किताबों को फिरंगी लाल ने अपने बैग में ठूँसकरभर लिया और उस बैग को अपने साथी फिकर चंद को पकड़ा दिया। फिकर चंद ने सरल स्वभाव के कारण बैग को अपने कंधे पर टाँग लिया और सभी साथियों संग पुस्तक मेला घूमने के बाद अपने घर जाने के लिए ट्रेन पकड़ने के लिए रेलवे स्टेशन जा पहुँचे और ट्रेन में सवार हो घर की ओर चल दिए।
ट्रेन चलते ही फिरंगी लाल सीट पर लंबवत हो रंग-बिरंगे सपनों में खो गया तथा बाकी साथी भी ऊँघने लगे, लेकिन फिकर चंद की नींद उड़ चुकी थी। रेल सफ़र के दौरान फिकर चंद फिक्रमंद हो रखे थे। वो सोच रहे थे कि फिरंगी लाल की जाने कैसी गन्दी आदत है कि मुफ़्त में अगर ज़हर भी मिल जाए तो उसे भी लेने से परहेज नहीं करता और ये कुरान की इतनी सारी किताबों को इसे पढ़ना-वढ़ना तो है नहीं, लेकिन ईश्वर न करे किसी दिन कुरान का कोई पेज गलती से भी फटकर अगर किसी मुसलमान के हाथ पड़ गया तो शहर में दंगा जरूर हो जाएगा। ये विचार आते ही कड़ी ठण्ड के मौसम में भी फिकर चंद के माथे पर पसीने की बूँदें नज़र आने लगीं।
लेखक - सुमित प्रताप सिंह
चित्र गूगल से साभार
Tuesday, January 5, 2016
कविता : अब वक़्त लात का आया है
बातें-मुलाक़ातें बहुत हो चुकीं
अब वक़्त लात का आया है
अब तक दूध पिला साँप को
हमने खुद को ही डसवाया है
वो मर्म नहीं समझेगा कभी भी
बातों और मुलाक़ातों का
वो पापी है बस पाप करेगा
उसका धर्म है छद्म घातों का
बार-बार धोखा दे उसने
हम सबको ही बतलाया है
दूध पिला...
कब तक अपने लालों को
हम यूँ ही क़ुर्बान करेंगे
नाश पाप का करने को
आखिर कब हुंकार भरेंगे
देश के कोने-कोने से
ये प्रश्न उभरकर आया है
दूध पिला...
शांति वार्ता को दे तिलांजलि
अब वीर वार्ता होने दो
भुजा फड़कती हैं वीरों की
अब मारने या मर लेने दो
भारत माँ को शीश चढ़ाने
टोला वीरों का आया है
दूध पिला...
मत रोको अब इन क़दमों को
इनको बढ़ते ही जाने दो
पाप की उस नापाक ज़मीं को
बूटों से रौंद के आने दो
जय हिन्द के नारों से
अब आसमान थर्राया है
दूध पिला...
लेखक : सुमित प्रताप सिंह
चित्र : गूगल से साभार
Friday, January 1, 2016
कविता : मन का बादशाह
नहीं सल्तनत पास तो क्या
मन ही है मिलकियत हमारी
और मन की इसी सल्तनत के
हम हैं बेताज बादशाह
नहीं किसी का बुरा यहाँ
सोचा और किया जाता है
अपनी इस सल्तनत में
न ही किसी का दिल दुखाने की
मिलती है जरा भी इजाजत
यहाँ इश्क़, मोहब्बत, अपनेपन की
साजिश रोज ही चलती हैं
यहाँ आता है जो भी
वो खुश होकर ही जाता है
और कोई दिलवाला तो
इसमें ही आ जाता है बस
यहाँ आने पर नहीं रोक
और लौटने का न होता
फरमान कोई भी
जिसको आना है तो
वो आए पूरे दिल से
करने को इस्तेकबाल
खड़ा ये मन का बादशाह।
मन ही है मिलकियत हमारी
और मन की इसी सल्तनत के
हम हैं बेताज बादशाह
नहीं किसी का बुरा यहाँ
सोचा और किया जाता है
अपनी इस सल्तनत में
न ही किसी का दिल दुखाने की
मिलती है जरा भी इजाजत
यहाँ इश्क़, मोहब्बत, अपनेपन की
साजिश रोज ही चलती हैं
यहाँ आता है जो भी
वो खुश होकर ही जाता है
और कोई दिलवाला तो
इसमें ही आ जाता है बस
यहाँ आने पर नहीं रोक
और लौटने का न होता
फरमान कोई भी
जिसको आना है तो
वो आए पूरे दिल से
करने को इस्तेकबाल
खड़ा ये मन का बादशाह।
लेखक : सुमित प्रताप सिंह
Wednesday, December 30, 2015
कविता : सपने
सपने
सच होते हैं
यदि उन्हें
मेहनत के पसीने से
सींचा जाये
सपने
सच होते हैं
यदि उन्हें
प्रयास के सिलबटने पर
पीसा जाये
सपने
माँगते हैं
उन्हें देखते हुए
उनमें ही
खो जाना
सपने
चाहते हैं
निरंतरता से
उन तक
बढ़ते जाना
सपने
होते हैं
वास्तव में
वास्तविकता के
प्रथम चरण
सपने
कहते हैं
देखो उन्हें जागते-सोते
होंगे वो पूरे
इक न इक दिन।
लेखक : सुमित प्रताप सिंह
चित्र गूगल से साभार
Monday, December 28, 2015
छोटे शहर के बड़े दाज्यू
- भाई नफे!
- हाँ बोल भाई जिले!
- हल्द्वानी की सैर कैसी रही?
- भाई बहुत बढ़िया रही। छोटे शहर के बड़े दाज्यूओं के संग दो दिन बहुत शानदार बीते।
- भाई ये दाज्यू का मतलब क्या है?
- कुमाऊनी भाषा में दाज्यू का अर्थ होता है भाई।
- तो नफे दाज्यू अब खोलके बता कि वहाँ दो दिन क्या-क्या किया?
- जिले दाज्यू 24 दिसंबर की रात हम दिल्ली से हल्द्वानी पहुँचे। वहाँ हमारा स्वागत देश के चर्चित युवा कवि एवं व्यंग्यकार दाज्यू गौरव त्रिपाठी ने किया। दाज्यू गौरव हल्द्वानी में अमर उजाला में वरिष्ठ उपसंपादक हैं। हल्द्वानी में अमर उजाला के संपादक दाज्यू अनूप वाजपेयी ने दाज्यू गौरव त्रिपाठी को शहर में पर्वतीय उत्थान मंच द्वारा आयोजित होनेवाले मेले में कवि सम्मेलन को संयोजित करने की कमान सौंपी थी। जिस होटल में दाज्यू गौरव हमें ठहराने के लिए ले गए वहाँ आगरा से गीतकार दाज्यू दीपक सरीन भी पहले से पहुँचे हुए थे। आधी रात के बाद वहाँ अगले दिन होनेवाले कवि सम्मेलन का पूर्वाभ्यास ऐसा चला कि सुबह होटल के संचालक ने उलझन में पूछ डाला कि रात को इतनी तेज आवाजें क्यों आ रही थीं। तो दाज्यू गौरव ने उसे समझा दिया कि दिल्ली और आगरा से दो कवि आए हैं और रात को कविता सम्मेलन से पहले एक कवि गोष्ठी चल रही थी।
- हा हा हा दाज्यू मतलब कि तीनों कवियों ने आधी रात को हल्द्वानी के उस होटल को अपनी कविताओं से कँपा डाला।
- हाँ बिलकुल दाज्यू जोश में तीनों कवि ऐसे बहके कि उन कुछ घंटों के दौरान होटल के उस कमरे में बस कविता ही कविता छाई रही।
- अच्छा दाज्यू अब अगले दिन का हाल बता कि कवि सम्मेलन कैसा रहा?
- कवि सम्मेलन बहुत ही शानदार रहा। हल्द्वानी बेशक छोटा शहर है लेकिन यहाँ के लोग दिल से बड़े हैं।
- अच्छा तूने तभी मेरे पूछने पर इनके लिए कहा था छोटे शहर के बड़े दाज्यू।
- हाँ बिलकुल! शहर के सभी कवियों व कवियित्रियों ने इस कवि सम्मेलन को ऊर्जावान बना दिया। दाज्यू दीपक सरीन ने जहाँ अपने हसीन गीतों से शमा बाँधा, वहीं हल्द्वानी की युवा कवियित्री गौरी मिश्रा 'काजल' के मधुर स्वर में सुनाए गीतों ने श्रोताओं के दिलों में हलचल पैदा कर दी। वरिष्ठ और सबसे सेहतमंद हास्य कवि दाज्यू राजुकुमार भंडारी ने खूब हँसाया और इस कवि सम्मेलन के संयोजक दाज्यू गौरव त्रिपाठी ने अपनी रचनाओं से हम सबके दिलों को गुदगुदाया। विवेक वशिष्ठ ‘नीलकंठ’, वेद प्रकाश ‘अंकुर’, मंजू पांडेय ‘उदिता’ व वीणा जोशी ‘हर्षिता’ इत्यादि कवियों और कवियित्रियों ने भी अपने-अपने अंदाज में श्रोतागणों का मनोरंजन किया।
- और दाज्यू सुमित प्रताप सिंह का कविता पाठ कैसा रहा?
- अगर उनका कविता पाठ बढ़िया न रहता तो क्या उनकी कलम हमें बोलने देती?
- हा हा हा दाज्यू बात तो तूने पते की कही है।
- दाज्यू सुमित प्रताप सिंह और दाज्यू दीपक सरीन के प्रस्तुतीकरण का अंजाम ये रहा कि हल्द्वानी की जनता ने उन्हें जल्द ही फिर से किसी कवि सम्मेलन में बुलाने की इच्छा जताई है।
- अरे वाह! इसका मतलब है कि हल्द्वानी की जनता कविताप्रेमी है।
- हाँ दाज्यू हल्द्वानीवाले कविताप्रेमी होने के साथ-साथ बहुत अच्छे श्रोता भी हैं। कवि सम्मेलन के मुख्य अतिथि हल्द्वानी के मेयर दाज्यू जोगेन्द्र सिंह रौतेला, पी.एफ. सहायक आयुक्त दाज्यू एम.सी. पांडेय, युवा व्यापार मंडल जिलाध्यक्ष दाज्यू जसविंदर भसीन इत्यादि अतिथिगण श्रोताओं के साथ कवि सम्मेलन में आखिरी समय तक बने रहे। कवि सम्मेलन के सूत्रधार व अमर उजाला हल्द्वानी के संपादक दाज्यू अनूप वाजपेयी ने प्रसन्नतापूर्वक कवि सम्मेलन के सफलतापूर्ण समापन की घोषणा की। इसकी व्यवस्था देख रहे इवेंट मैनेजर दाज्यू नागेश दुबे तो इसकी सफलता के बाद दुबे से चौबे हो गए।
- दाज्यू हल्द्वानी से कोई परिचित आकर मिला या नहीं?
- हल्द्वानी से व्यंग्य यात्रा की सहयात्री मीना अरोड़ा मिलने आयीं थीं और हम सबके लिए प्रेम और स्नेह से भरा उपहार भी लायीं थीं।
- अरे वाह! अच्छा दाज्यू ये बता कि कवि सम्मेलन के तुम सबने मेला घूमा कि नहीं?
- हाँ दाज्यू मेला घूमने का सुख भला कैसे छोड़ते। जहाँ हम कवियों ने मेले में विवेक वशिष्ठ 'नीलकंठ' द्वारा आयोजित चटपटी भेलपूरी पार्टी और दाज्यू गौरव त्रिपाठी द्वारा दी गयी स्वादिष्ट मुंगोड़ों की पार्टी का आनंद लिया वहीं मुख्य अतिथि दाज्यू जोगेन्द्र सिंह रौतेला ने ऊँट की सवारी का लुफ्त उठाया।
- चटपटी भेलपुरी और मुंगोड़ों का सुनके तो मुँह में पानी आ गया। और ऊँट की सवारी। दाज्यू ये रेगिस्तान का जहाज पहाड़ों में कहाँ से पहुँच गया?
- दाज्यू ऊँट की सवारी ही तो इस मेले का मुख्य आकर्षण थी।
- तो तुम सबने ऊँट की सवारी की या नहीं?
- नहीं दाज्यू फुरसत ही नहीं मिली। हम मेले से निकलकर अगले दिन की योजना बनाकर होटल के कमरा नंबर 102 में रात को बिस्तर में गोल हो गए।
- अच्छा दाज्यू अगले दिन कहाँ घूमे-फिरे?
- दाज्यू दीपक सरीन का बावरा मन हल्द्वानी में नहीं लगा और वो सुबह जल्दी ही आगरा को रफू-चक्कर हो गए। वो बता रहे थे कि उनके घर से कुछ दूर स्थित पागलखाने से बहती हुई हवा उनके घर के बगल से होकर गुजरती है और उनका बावरा मन उस हवा से बिछोह ज्यादा दिन नहीं झेल सकता है सो उन्हें तो जल्द से जल्द आगरा पहुँचना ही था।
- दाज्यू वाकई में अजब-गजब हैं दाज्यू दीपक सरीन का बावरा मन। खैर छोड़ दाज्यू ये बता कि तुम सब कहाँ-कहाँ घूमने गए?
- दाज्यू पहले तो हमारा मन नैनीताल घूमने का था पर दाज्यू गौरव त्रिपाठी ने बताया कि नैनीताल में बहुत भीड़ चल रही है सो हम भीमताल घूमने निकल पड़े।
- भीमताल में कहाँ-कहाँ घूमे और क्या-क्या किया?
- सबसे पहले हमने स्वादिष्ट मोमो का स्वाद लिया फिर भीमताल के आजू-बाजू फोटोग्राफी की। इसके बाद हमने भीमताल में बोटिंग का आनंद लिया। फिर दाज्यू सुमित प्रताप सिंह का मन बादशाह बनने का हुआ और वो अचानक बादशाह के वस्त्र धारण कर शाही अंदाज में आ गए। इसके कुछ पलों के बाद उन्होंने बगावत कर दी और बागी का वेश धर उन्होंने दाज्यू गौरव त्रिपाठी पर बंदूक तान दी।
- बंदूक तान दी! पर दाज्यू क्यों?
- दाज्यू सुमित प्रताप सिंह ने दाज्यू गौरव त्रिपाठी के सीने पर बंदूक की नली लगा पूछा कि उत्तराखंड में जल्दी ही कवि सम्मेलन करवाओगे या नहीं?
- हा हा हा! तो फिर दाज्यू गौरव त्रिपाठी ने क्या कहा?
- उन्होंने हाथ जोड़कर घोषणा की कि हल्द्वानी और उत्तराखंड में कविता और व्यंग्य को और अधिक समृद्ध करने के लिए समय-समय पर कार्यक्रम होते रहेंगे।
- जे बात! तो भीमताल भ्रमण के साथ ही तुम्हारे दो दिवसीय यात्रा कार्यक्रम का समापन हो गया।
- नहीं भीमताल के बाद हम फिर से हल्द्वानी के मेले में गए।
- मेला दोबारा घूमने का कोई खास मकसद था?
- हाँ बिलकुल ख़ास मकसद ही था। दाज्यू सुमित प्रताप सिंह की ऊँट सवारी की तीव्र इच्छा को पूर्ण करना था और उन्हें मेले में कुछ खरीदारी भी करनी थी। अंततः दाज्यू गौरव त्रिपाठी द्वारा दिए गए स्वादिष्ट रात्रि भोज के साथ दूसरे दिन की समाप्ति हुयी। अगले दिन दाज्यू गौरव त्रिपाठी के पहले व्यंग्य संग्रह 'पैकेज का पपलू' और दूसरी पुस्तक 'दोराहे पर जिंदगी', जो कि कहानी व व्यंग्यों का कॉम्बो पैक है, को प्राप्त करने के साथ ही हल्द्वानी यात्रा का समापन संपन्न हुआ। दाज्यू गौरव त्रिपाठी हमें हल्द्वानी रेलवे स्टेशन तक इस भय से अपनी कार से छोड़ कर गए कि कहीं हम हल्द्वानी में ही न बस जाएँ।
- हा हा हा! दाज्यू हो सकता है हल्द्वानी से तुम्हें लगाव हो गया हो और यह लगाव ही उनके भय का कारण हो। वैसे तू हल्द्वानी से मेरे लिए कुछ लाया है या नहीं?
- दाज्यू तेरे लिए भी कुछ लाना था?
- देख दाज्यू अगर तू मेरे लिए कुछ नहीं लाया होगा तो आज से तेरी-मेरी कट्टी।
- अरे दाज्यू तेरे लिए हल्द्वानी की स्पेशल बाल मिठाई लाया हूँ। अब रूठना छोड़के मान जा और ले ये मिठाई खा।
- एक शर्त पर मानूँगा।
- कौन सी शर्त दाज्यू?
- अगली बार अपने साथ मुझे भी हल्द्वानी ले चलेगा।
- हाँ हाँ क्यों नहीं दाज्यू। चल इसी बात पर बाल मिठाई से अपना मुँह मीठा कर।
- दाज्यू तो फिर हम एक-दूसरे को बाल मिठाई खिलाकर एक-साथ मुँह मीठा करते हैं।
- ठीक है दाज्यू।
लेखक : सुमित प्रताप सिंह
Wednesday, December 16, 2015
सावधान! पुलिस मंच पर है का लोकार्पण नौ को
दिल्ली और इटावा गान के रचयिता व इटावा में जन्मे चर्चित युवा लेखक सुमित प्रताप सिंह की चौथी पुस्तक 'सावधान! पुलिस मंच पर है' का लोकार्पण दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित होनेवाले विश्व पुस्तक मेले के लेखक मंच पर शोभना वेलफेयर सोसाइटी द्वारा 9 जनवरी, 2016 को आयोजित किए जा रहे शोभना सम्मान-2015 समारोह के दौरान किया जाएगा। 'सावधान! पुलिस मंच पर है' एक कविता संग्रह है। इससे पहले सुमित की तीन पुस्तकें पुलिस की ट्रेनिंग, मुसीबतों की रेनिंग (कविता संग्रह), व्यंग्यस्ते तथा नो कमेंट (व्यंग्य संग्रह) प्रकाशित हो चुकी हैं। अभी हाल ही में इनकी कुछ रचनाओं का पंजाबी भाषा में अनुवाद हुआ है। इनकी पुस्तक व्यंग्यस्ते का मराठी भाषा में अनुवाद किया जा चुका है तथा इनकी तीसरी पुस्तक नो कमेंट का गुजराती व मराठी भाषा में अनुवाद किया जा रहा है।
Monday, December 14, 2015
नेक सलाह (व्यंग्य)
जरा सोचिए इस महँगाई के दौर
में यदि हमें कुछ मुफ़्त में मिल जाता है तो यह अचंभित होनेवाली बात ही होगी। पर यह
सुखद अनुभूति आप और हम अक्सर न चाहते हुए भी प्राप्त करते रहते हैं और हमें ऐसी
सुखद अनुभूति प्रदान करने का कार्य करते हैं हमारे अगल-बगल में वास करनेवाले कुछ
सलाहवीर, जो बिन माँगे अपनी सलाह
हमारी झोली में डालकर अपनी राह को निकल लेते हैं। अब ये और बात है कि ऐसे सलाहवीर
शायद ही अपनी सलाह को अपने ऊपर भी कभी आजमाते हों।
ऐसे ही एक
सलाहवीर हमारे दूर के एक चाचा हैं। स्वास्थ्य के ऊपर जब भाषण देने को आएँ तो एक
घंटे से पहले उनका मुख विराम नहीं लेता, लेकिन
उन्होंने अपनी सलाह अपने ऊपर आजमाने का कभी भी प्रयत्न नहीं किया। फल ये
मिला कि एक दिन अचानक उनको हृदयाघात हुआ और उन्हें अपने हृदय की सर्जरी करवानी
पड़ी। बावजूद इसके चाचा अपनी सलाहबाजी से बाज नहीं आए।
हमारे
पड़ोस में एक ताई रहती हैं। वो हमारी कॉलोनी की जानी-मानी सलाहवीर हैं। कॉलोनी की
हर लड़की के चरित्र पर शक करते हुए वो लड़कियों की माँओं को अपनी लड़की के चाल-चलन पर
ध्यान रखने की सलाह देती रहती थीं। बहरहाल हुआ ये कि कॉलोनी की लड़कियों की चिंता
में डूबी रहनेवाली ताई की इकलौती लड़की ही ताई के घरेलू नौकर के साथ घर से भाग गयी।
अब इन दिनों ताई दूसरों की सलाह माँगती हुयीं मिल जाती
हैं।
हमारे
दफ्तर में भी एक सलाहवीर मौजूद हैं। उनकी सलाह का क्षेत्र शिक्षा है। वो अक्सर
अपने सहकर्मियों को उनके बच्चों के भविष्य के विषय में शिक्षा संबंधी सलाह थोक के
भाव में बाँटते हुए मिल जाते थे। उनसे भूल ये हुई कि उन्होंने अपने दोनों बेटों को
सलाह देने का कभी भी समय नहीं निकाला। परिणाम ये हुआ कि उनके दोनों बच्चे
अपनी-अपनी कक्षाओं में सभी विषयों में चारों खाने चित हो गए। इस दुर्घटना से उन
सलाहवीर के ज्ञान चक्षु खुल गए और उन्हें अनुभव हुआ कि उनकी सलाह की बाहर की
अपेक्षा घर में अधिक आवश्यकता है।
ऐसे बहुत
से सलाहवीर हमें अक्सर रोज ही मिलते रहते हैं, जो बिन
माँगे अपनी सलाह हम पर थोपना अपना परम कर्तव्य समझते हैं। आप कभी मुसीबत में पड़कर
तो देखिए, आपके समक्ष सलाहवीर और उनकी अजब-गजब सलाह हाज़िरी बजाती हुयीं मिल जाएँगीं।
उनके द्वारा भेंट की गयीं सलाह और कुछ करें या न करें पर आपकी मुसीबत में वृद्धि
करने का सुकार्य अवश्य करेंगी। अब ये और बात है कि इन सलाहवीरों का व्यक्तिगत जीवन
उलझनों से भरा ही मिल जाएगा। इसलिए कभी-कभी जी करता है कि इन सलाहवीरों को समझाते
हुए कहूँ कि हे सलाहवीरो एक नेक सलाह मानिए कि आप अपनी सलाह का शुभारम्भ अपने घर
से किया कीजिए क्योंकि यदि घर ठीक रहेगा तो समाज स्वस्थ रहेगा और स्वस्थ समाज ही
देश की प्रगति में सहायक बनता है।
लेखक : सुमित प्रताप सिंह
चित्र गूगल से साभार
Saturday, December 12, 2015
सहिष्णुता की खोज
"भाई जिले!"
"हाँ बोल भाई नफे!"
"ये दूरबीन से किसकी जासूसी हो रही है?"
"भाई किसी की भी नहीं।"
"पर तू दूरबीन तो ऐसे इस्तेमाल कर रहा है, जैसे किसी जासूसी एजेंसी ने तुझे किसी की जासूसी करने के लिए नियुक्त कर रखा हो।"
"भाई ऐसा कुछ नहीं है। तू बेकार में ही शक कर रहा है।"
"शक करनेवाली बात ही है। हम यहाँ घाना पक्षी विहार में इसलिए आए थे ताकि प्रकृति का आनंद लेते हुए पक्षियों की चहचहाहट सुनकर घूमने-फिरने का मजा लें पर तू तो इस दूरबीन में खो गया।"
"असल में भाई मैं कुछ खोज रहा था।"
"वो क्या भला?"
"भाई सूबे और फत्ते ने इतने दिनों से हल्ला मचा रखा है कि देश से सहिष्णुता लापता हो गयी है।"
"तो फिर।"
"मैंने सोचा उसे खोजने में ये दूरबीन ही शायद कुछ मदद कर दे।"
"तो कुछ सफलता मिली?"
"अभी तक तो कोई सफलता नहीं मिली।"
"और मिलेगी भी नहीं।
वो क्यों भाई?"
"जो चीज कहीं गयी ही नहीं और पास ही हो तो वो ढूढ़ने पर भी नहीं मिलने की।"
"भाई तूने ऐसा क्यों बोला?"
"भाई सहिष्णुता तो हमारे दिलों में भरी हुई है।"
"ये तू कैसे कह सकता है?"
"अपने गाँव में रशीद चाचा रहते हैं।"
"हाँ तो।"
"तो जब उनकी बेटी रेहाना की शादी हुई थी, तब तूने उनकी तन, मन और धन से कितनी सेवा की थी। मुझे याद है कि तू उस दिन इतना व्यस्त हो गया था कि खाना खाना भी भूल गया था। सही कहूँ तो तू इतना मगन हो रखा था, जैसे कि तेरी सगी बहन की शादी हो।"
"हाँ तो वो सगी बहन से कम थोड़े ही है। बचपन से ही मुझे राखी बाँधती है। अब उसकी शादी में इतना कुछ करना तो अपना फर्ज बनता था।"
"हाँ बिलकुल फर्ज बनता था। पर एक बात बता। कभी तेरे मन में एक पल को भी ख्याल आया कि जिसकी शादी में तू अपनी देह तोड़ रहा था वो किसी और धर्म की है।"
"सही बोलूँ तो भाई मैंने अपनी बहन और रेहाना में कभी कोई भेद नहीं किया और न कभी मेरे दिमाग में ख्याल आया कि वो अलग धर्म की है।"
"जब किसी से सम्बन्ध प्रेम और स्नेह से पूर्ण हों तो इस तरह के ख्याल आते भी नहीं हैं।"
"भाई तू ठीक कह रहा है।"
"हाँ और इससे सिद्ध होता है कि सहिष्णुता तेरे भीतर कूट-कूटकर भरी हुई है। और तुझमें ही क्यों हर भारतीय के दिल में इसका वास है।"
"फिर भाई ये सूबे और फत्ते सहिष्णुता गायब होने का मुद्दा उठाकर हल्ला क्यों मचा रहे हैं?"
"भाई सूबे तुक्कड़ कवि है और इधर-उधर से उड़ाकर उसने दो-चार कविताएँ बना लीं और उन्हीं कविताओं को कवि सम्मेलनों और अन्य कार्यक्रमों में सुनाकर अपनी रोजी-रोटी चला लेता है। उसे ये कार्यक्रम उसके गुरु फकीर चंद की कृपा से हासिल हो रहते थे। फकीर चंद पर पिछली सरकार की विशेष कृपा रहती थी। इस तरह गुरु-चेले की जिंदगी मौज से कट रही थी, लेकिन जबसे नई सरकार आयी फ़कीर चंद के साथ-साथ उनका चेला सूबे भी फ़कीर बनकर जीवनयापन को विवश हो गया। इसी प्रकार फत्ते जिस अख़बार में टटपुंजा पत्रकार है उसका बॉस भी अपने अख़बार द्वारा पिछली सरकार के गुण गा-गाकर जहाँ अख़बार के लिए ढेर सारे विज्ञापन पाता था, वहीं विदेश यात्राओं का सुख भी भोगता था। पिछली सरकार के संग-संग अख़बार की भी नैया डूब गयी और अब हालत यह है फत्ते और उसके साथी पत्रकारों की रोजी-रोटी तो किसी तरह चल रही है पर वो पहले वाला सुख नहीं मिल पा रहा है। इसीलिए सूबे, फत्ते और उन जैसे जाने कितने पट्ठे सहिष्णुता गायब होने को लेकर विधवा विलाप कर रहे हैं।"
"बड़े धूर्त हैं ये तो।"
"बिलकुल भाई। अच्छा सहिष्णुता ही देखनी है तो सामने देख।"
"सामने! भाई सामने क्या देखूँ?"
"सामने उन सफ़ेद सारसों को देख। ये सारस इस समय साइबेरिया से यहाँ घूमने आते हैं। इनकी मस्ती से की जाने वाली अठखेलियाँ को देखकर लगता कि यहाँ इस देश में इन्हें कोई खतरा हो सकता है। ये उदाहरण उन लोगों को दिया जा सकता है जो सहिष्णुता के लापता होने का डर दिखा गाँव, शहर या फिर देश छोड़ने की बात करते हैं। "
"हाँ भाई ये बात तो ठीक है पर सहिष्णुता का ये उदाहरण दिखाने के लिए इन सारसों को गाँव कैसे ले जाया जाए?"
"इन सारसों को साथ ले जाने की कोई जरुरत नहीं। तू उन्हें अपना दिल और उसमें भरी सहिष्णुता दिखा देना।"
"पर भाई मैं कोई बजरंग बली थोड़े ही हूँ जो अपना सीना चीर के सहिष्णुता दिखा दूँगा।"
"भाई सीना चीरकर दिखाने की कोई जरुरत नहीं लोग मन की आँखों से इसे देख लेंगे।"
"और जो न देख पाये तो।"
"तो समझो उनका मन ही दूषित है।"
"हा हा हा ये भी तूने खूब कही।"
"हाँ बोल भाई नफे!"
"ये दूरबीन से किसकी जासूसी हो रही है?"
"भाई किसी की भी नहीं।"
"पर तू दूरबीन तो ऐसे इस्तेमाल कर रहा है, जैसे किसी जासूसी एजेंसी ने तुझे किसी की जासूसी करने के लिए नियुक्त कर रखा हो।"
"भाई ऐसा कुछ नहीं है। तू बेकार में ही शक कर रहा है।"
"शक करनेवाली बात ही है। हम यहाँ घाना पक्षी विहार में इसलिए आए थे ताकि प्रकृति का आनंद लेते हुए पक्षियों की चहचहाहट सुनकर घूमने-फिरने का मजा लें पर तू तो इस दूरबीन में खो गया।"
"असल में भाई मैं कुछ खोज रहा था।"
"वो क्या भला?"
"भाई सूबे और फत्ते ने इतने दिनों से हल्ला मचा रखा है कि देश से सहिष्णुता लापता हो गयी है।"
"तो फिर।"
"मैंने सोचा उसे खोजने में ये दूरबीन ही शायद कुछ मदद कर दे।"
"तो कुछ सफलता मिली?"
"अभी तक तो कोई सफलता नहीं मिली।"
"और मिलेगी भी नहीं।
वो क्यों भाई?"
"जो चीज कहीं गयी ही नहीं और पास ही हो तो वो ढूढ़ने पर भी नहीं मिलने की।"
"भाई तूने ऐसा क्यों बोला?"
"भाई सहिष्णुता तो हमारे दिलों में भरी हुई है।"
"ये तू कैसे कह सकता है?"
"अपने गाँव में रशीद चाचा रहते हैं।"
"हाँ तो।"
"तो जब उनकी बेटी रेहाना की शादी हुई थी, तब तूने उनकी तन, मन और धन से कितनी सेवा की थी। मुझे याद है कि तू उस दिन इतना व्यस्त हो गया था कि खाना खाना भी भूल गया था। सही कहूँ तो तू इतना मगन हो रखा था, जैसे कि तेरी सगी बहन की शादी हो।"
"हाँ तो वो सगी बहन से कम थोड़े ही है। बचपन से ही मुझे राखी बाँधती है। अब उसकी शादी में इतना कुछ करना तो अपना फर्ज बनता था।"
"हाँ बिलकुल फर्ज बनता था। पर एक बात बता। कभी तेरे मन में एक पल को भी ख्याल आया कि जिसकी शादी में तू अपनी देह तोड़ रहा था वो किसी और धर्म की है।"
"सही बोलूँ तो भाई मैंने अपनी बहन और रेहाना में कभी कोई भेद नहीं किया और न कभी मेरे दिमाग में ख्याल आया कि वो अलग धर्म की है।"
"जब किसी से सम्बन्ध प्रेम और स्नेह से पूर्ण हों तो इस तरह के ख्याल आते भी नहीं हैं।"
"भाई तू ठीक कह रहा है।"
"हाँ और इससे सिद्ध होता है कि सहिष्णुता तेरे भीतर कूट-कूटकर भरी हुई है। और तुझमें ही क्यों हर भारतीय के दिल में इसका वास है।"
"फिर भाई ये सूबे और फत्ते सहिष्णुता गायब होने का मुद्दा उठाकर हल्ला क्यों मचा रहे हैं?"
"भाई सूबे तुक्कड़ कवि है और इधर-उधर से उड़ाकर उसने दो-चार कविताएँ बना लीं और उन्हीं कविताओं को कवि सम्मेलनों और अन्य कार्यक्रमों में सुनाकर अपनी रोजी-रोटी चला लेता है। उसे ये कार्यक्रम उसके गुरु फकीर चंद की कृपा से हासिल हो रहते थे। फकीर चंद पर पिछली सरकार की विशेष कृपा रहती थी। इस तरह गुरु-चेले की जिंदगी मौज से कट रही थी, लेकिन जबसे नई सरकार आयी फ़कीर चंद के साथ-साथ उनका चेला सूबे भी फ़कीर बनकर जीवनयापन को विवश हो गया। इसी प्रकार फत्ते जिस अख़बार में टटपुंजा पत्रकार है उसका बॉस भी अपने अख़बार द्वारा पिछली सरकार के गुण गा-गाकर जहाँ अख़बार के लिए ढेर सारे विज्ञापन पाता था, वहीं विदेश यात्राओं का सुख भी भोगता था। पिछली सरकार के संग-संग अख़बार की भी नैया डूब गयी और अब हालत यह है फत्ते और उसके साथी पत्रकारों की रोजी-रोटी तो किसी तरह चल रही है पर वो पहले वाला सुख नहीं मिल पा रहा है। इसीलिए सूबे, फत्ते और उन जैसे जाने कितने पट्ठे सहिष्णुता गायब होने को लेकर विधवा विलाप कर रहे हैं।"
"बड़े धूर्त हैं ये तो।"
"बिलकुल भाई। अच्छा सहिष्णुता ही देखनी है तो सामने देख।"
"सामने! भाई सामने क्या देखूँ?"
"सामने उन सफ़ेद सारसों को देख। ये सारस इस समय साइबेरिया से यहाँ घूमने आते हैं। इनकी मस्ती से की जाने वाली अठखेलियाँ को देखकर लगता कि यहाँ इस देश में इन्हें कोई खतरा हो सकता है। ये उदाहरण उन लोगों को दिया जा सकता है जो सहिष्णुता के लापता होने का डर दिखा गाँव, शहर या फिर देश छोड़ने की बात करते हैं। "
"हाँ भाई ये बात तो ठीक है पर सहिष्णुता का ये उदाहरण दिखाने के लिए इन सारसों को गाँव कैसे ले जाया जाए?"
"इन सारसों को साथ ले जाने की कोई जरुरत नहीं। तू उन्हें अपना दिल और उसमें भरी सहिष्णुता दिखा देना।"
"पर भाई मैं कोई बजरंग बली थोड़े ही हूँ जो अपना सीना चीर के सहिष्णुता दिखा दूँगा।"
"भाई सीना चीरकर दिखाने की कोई जरुरत नहीं लोग मन की आँखों से इसे देख लेंगे।"
"और जो न देख पाये तो।"
"तो समझो उनका मन ही दूषित है।"
"हा हा हा ये भी तूने खूब कही।"
लेखक : सुमित प्रताप सिंह
Wednesday, October 14, 2015
व्यंग्य कविता : भेड़ों की चिंता
सुना है कल
भेड़ों की हुई थी
बहुत बड़ी पंचायत
जिसमें दूर-दूर से
आयीं थीं भेड़ें
कुछ भेड़ें थीं डरीं-डरीं
और कुछ थीं सहमी-सहमी
कुछ बड़ी दिलेर थीं
और कुछ थीं बिंदास बहुत
काले-भूरे बाल थे कुछ के
और कुछ के थे सफ़ेद-सलेटी
किन्तु एक बात
समान थी सब में
सब ही चिंता में थीं डूबीं
उनकी चिंता थी जायज
मनुष्य ने पहले तो
कुत्ते से कुत्तापन चुराया
फिर छीन ली लोमड़ी से धूर्तता
भेड़िये से लिया कमीनापन
और झपटी सियार से मक्कारी
अब बेचारी भेड़ों से
उनकी भेड़चाल छीनने की
मनुष्य कर रहा है कोशिश
बिल्ली की चाल को
कैट वाक कह ले लिया
इस पर नहीं है
भेड़ों को कोई आपत्ति
किन्तु यदि मनुष्य
चाहता है करना प्रयोग
उनकी भेड़ चाल का
तो करना पड़ेगा उसको
इसका पूरा पेमेंट
क्योंकि इसका कॉपीराइट
सिर्फ भेड़ों के पास ही
है सर्वाधिकार सुरक्षित।
लेखक : सुमित प्रताप सिंह
*कार्टून गूगल से साभार
Sunday, September 27, 2015
कविता : खूनी दरवाजा
दिल्ली गेट के पास
इतिहास के दुःख भरे पलों को
अपने सीने में दबाए
उदास गुमसुम सा
खड़ा है खूनी दरवाजा
जब भी सुनता है
कोई अनजान सी आहट तो
हो उठता है चौकन्ना
और अपने विशाल शरीर को
कड़ा कर मजबूत करने लगता है
कुछ देर बाद
अपने इस प्रयास में
असफल होने पर
सुबकने लगता है खूनी दरवाजा
उसे अचानक याद आते हैं वो क्षण
जब आजादी की चाह में
बादशाह ने फूँका था
विद्रोह का बिगुल
बदले में बादशाह ने
पाया था निर्वासन
और उसके शहजादों को
इसी दरवाजे पर
सरेआम भून दिया था
सफ़ेद शैतानों ने गोलियों से
उन हत्यारे पलों को
याद करते हुए
खूनी दरवाजा बेबसी से
तड़पने लगता है
फिर अचानक गर्वित हो
खड़ा हो जाता है तन कर
और माँग करता है कि
जब बदल दिए गए
कई शहरों, सड़कों और
मोहल्लों के नाम
तो क्यों न
उसका भी नाम बदला जाये
और खूनी दरवाजा में
दरवाजे को ज्यों का त्यों
बेशक रखा जाये लेकिन
खूनी के बदले कर दिया जाये
शहीद या फिर क़ुरबानी
तब खूनी दरवाजा
शहीद दरवाजा या क़ुरबानी दरवाजा हो
रहेगा सदा ही गर्व से तना
और करेगा स्वागत
हर राहगीर का
उत्साह और प्रफुल्लता से।
लेखक : सुमित प्रताप सिंह
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