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Monday, March 23, 2015

ग़ज़ल

फिरेंगे दर बदर सोचा नहीं था।।
मैं निकला था अकेले ही सफ़र पर।
मिलेगा हमसफ़र सोचा नहीं था।।
न उसने कद्र की माँ बाप तक की।
गिरेगा इस कदर सोचा नहीं था।।
पता था उम्र काट जायेगी तुझ बिन।
कटेगी यूँ मगर सोचा नहीं था।।
अता करके मुझे वो अपनी रहमत।
करेगा मोतबर सोचा नहीं था।।
'असर' यूँ छोड़ देगा राह में तू।
कभी ए राहबर सोचा नहीं था।।
प्रमोद शर्मा 'असर'
नई दिल्ली, भारत 

Thursday, November 13, 2014

ग़ज़ल

सुबहदम हमको जगाता कौन है।
रात होने पर सुलाता कौन है।।

फूल कलियाँ पेड़ पौधे और फ़सल।
इनमे छुप कर लहलहाता कौन है।।

सोचता हूँ चाँद तारे देखकर
इनमें शब् भर झिलमिलाता कौन है।।

जो अभी पैदा हुआ समझे न कुछ।
उसके अंदर मुस्कुराता कौन है।।

कौन है जो भेजता है मुश्किलें।
और उनके हल सुझाता कौन है।।

भेजकर दुनिया में कुछ दिन के लिए।
हमको फिर वापस बुलाता कौन है।।

दे हुनर तेरे कलम को ए असर।
अज़्मते फ़न से मिलाता कौन है।।
   प्रमोद शर्मा ‘असर’
   हौज़ खास, नई दिल्ली 

Wednesday, October 8, 2014

कविता : सपने

कुछ ख्वाब सुनहरे देखे थे 
जीवन की उलझी राहों में 
कुछ आशायें कुछ उम्मीदें जो 
थीं भविष्य की बाहों में 
सपने वो मेरे ऐसे थे 
जो कभी किसी से कह न सका 
पर हरदम छाये रहते थे 
इन सूनी - सूनी आँखों में 
कुछ ख्वाब हमारे पूर्ण हुए 
कुछ छूट गए हैं अब पीछे
पर कुछ अब भी हैं अडिग खड़े 
आशाओं के जल से सींचे 
ये सपने पूरे हुए नहीं 
पूरी कोशिश करने पर भी 
पर हार न मैंने मानी है 
सौ बार हुआ असफल तो भी 
अपनों और परायों से 
जब - जब भी धोखे खाएं हैं 
शीशे से नाज़ुक ये सपने 
मुश्किल से ही बच पाए हैं 
इन्हें संजो कर रखा है मैंने 
अपनी इन आँखों में 
कहीं चटख न जाएँ सपने ये 
लम्बी पथरीली राहों में 
पूरा करने की कोशिश में 
अंतिम दम तक न हारूंगा 
जीवन की बची हुई साँसे 
इन सपनों पर ही वारूंगा 
पर जो फिर भी न पूर्ण हुए
तो तुम्हें सौंपकर जाऊँगा 
तुम ही होंगे वारिस इनके 
फिर मैं तो लौट न पाऊँगा 
तुमको पूरे करने होंगे 
मेहनत तुम सुबह शाम करो 
है कसम तुम्हें सपनों की 
जो इससे पहले आराम करो
  
प्रमोद शर्मा असर
हौज़ खासनई दिल्ली

Wednesday, September 3, 2014

ग़ज़ल


मुझको आवाज़ देकर जगाता है वो।
रहगुज़र* पुरखतर* है बताता है वो।।
ऐसा रिश्ता मेरे उसके है दरमियाँ।
जो मैं ज़िद भी करूँ मान जाता है वो।।
भूखा सो जाऊँ मैं तो उठाकर मुझे।
अपने हाथों से खाना खिलाता है वो।।
बाँध पाया न कुछ उस सफर के लिए।
हौसला मेरा फिर भी बढाता है वो।।
मेरे घर भेजता है कभी रहमतें।
और कभी अपने दर पर बुलाता है वो।।
मैं तो मतलब निकलते ही भूला उसे।
राह माकूल* फिर भी दिखता है  वो।।
रंग सपनों के उड़ने लगें जब ‘असर’।
मेरे सपनों को खुद ही सजाता है वो।।

*रहगुज़र - रास्ता, 
पुरखतर - खतरों से भरा 
माकूल - उचित  
© प्रमोद शर्मा ‘असर’
हौज़ खास, नई दिल्ली 

Tuesday, August 26, 2014

ग़ज़ल

कर रहे हैं हम अलल* एलान सब।
है अता कर्दा* तेरा अहसान सब।।
कुछ गलतफहमी न दिल में पाल तू।
है उसी के दम से तेरी शान सब।।
कोशिशें मत छोड़ पहले जाँच ले।
अपने गिर्दो-पेश* के इम्कान* सब।।
तिश्नगी* सहरा की बढ़ती जाए यूँ।
खत्म हो जाएँगे नखलिस्तान सब।।
ऐशो – इशरत की तलब जिनकी बढ़ी।
बेचते फिरते हैं वो ईमान सब।।
आदमी मत खेल तू बारूद से।
छोटे पड़ जाएँगे ये शमशान सब।।
सुन ‘असर’ मालिक तो बस वो एक है।
चार दिन के हैं यहाँ मेहमान सब।।


अलल – खुल्लम-खुल्ला, अता कर्दा – दिया हुआ, 
गिर्दो-पेश – हर-तरफ, इम्कान - संभावनाएँ, 
तिश्नगी – प्यास 
© प्रमोद शर्मा ‘असर’
हौज़ ख़ास, नई दिल्ली

Friday, August 15, 2014

ग़ज़ल

पनपती ही जाये उदासी ज़मीं पर
ये फैली है क्यूँ बदहवासी ज़मीं पर
यहाँ भाई का भाई दुश्मन हुआ है
सबब कुछ नहीं बस ज़रा सी ज़मीं पर
अगर फैंके खाना उन्हें देख जिनको
मय्यसर नहीं झूठा, बासी ज़मीं पर
खता तूने कैसी बसर कर दी जिससे
बरसता नहीं अब्र प्यासी ज़मीं पर
औरत को देवी बताते तो हो तुम
बना कर रखो घर की दासी ज़मीं पर
हुई रौशनी तेरे घर मैं ‘असर’ जब
उतर आयी बेटी दुआ सी ज़मीं पर  

रचनाकार : प्रमोद शर्मा 'असर'
हौज़खास, नई दिल्ली 
फोन नंबर- 09910492264