सादर ब्लॉगस्ते पर आपका स्वागत है।
Showing posts with label ग़ज़ल. Show all posts
Showing posts with label ग़ज़ल. Show all posts

Sunday, April 26, 2020

ग़ज़ल


वतन में हाँ सियासत और क्या है
सिवा इसके मुसीबत और क्या है
सितम अपने ही ढाते हो जहां पर
वहाँ ग़ैरों की हिम्मत और क्या है
तुम्हारा दो घड़ी दीदार कर लूँ
निग़ाहों की ज़रूरत और क्या है
मेरा कहना तेरा तसलीम करना
इसी का नाम उल्फ़त और क्या है
मोहब्बत करने वालों की तबाही
ज़माने की रवायत और क्या है।
रचनाकार : बलजीत सिंह' 'बेनाम'

Monday, March 23, 2015

ग़ज़ल

फिरेंगे दर बदर सोचा नहीं था।।
मैं निकला था अकेले ही सफ़र पर।
मिलेगा हमसफ़र सोचा नहीं था।।
न उसने कद्र की माँ बाप तक की।
गिरेगा इस कदर सोचा नहीं था।।
पता था उम्र काट जायेगी तुझ बिन।
कटेगी यूँ मगर सोचा नहीं था।।
अता करके मुझे वो अपनी रहमत।
करेगा मोतबर सोचा नहीं था।।
'असर' यूँ छोड़ देगा राह में तू।
कभी ए राहबर सोचा नहीं था।।
प्रमोद शर्मा 'असर'
नई दिल्ली, भारत 

Thursday, November 13, 2014

ग़ज़ल

सुबहदम हमको जगाता कौन है।
रात होने पर सुलाता कौन है।।

फूल कलियाँ पेड़ पौधे और फ़सल।
इनमे छुप कर लहलहाता कौन है।।

सोचता हूँ चाँद तारे देखकर
इनमें शब् भर झिलमिलाता कौन है।।

जो अभी पैदा हुआ समझे न कुछ।
उसके अंदर मुस्कुराता कौन है।।

कौन है जो भेजता है मुश्किलें।
और उनके हल सुझाता कौन है।।

भेजकर दुनिया में कुछ दिन के लिए।
हमको फिर वापस बुलाता कौन है।।

दे हुनर तेरे कलम को ए असर।
अज़्मते फ़न से मिलाता कौन है।।
   प्रमोद शर्मा ‘असर’
   हौज़ खास, नई दिल्ली 

Wednesday, September 24, 2014

ग़ज़ल

जो सहीफ़ों* का लिखा हो जाएगा ।
तो ज़माने का भला हो जाएगा ।।
साथ देगा जब किसी छोटे का तू ।
बस उसी दम तू बड़ा हो जाएगा ।।
ये नहीं सोचा था कल मैंने कि तू ।
बे सबब मुझसे जुदा हो जाएगा ।।
बात तो कुछ भी न थी बे बात ही ।
मुझसे तू इतना ख़फ़ा हो जाएगा ।।
दौरे – गर्दिश मे मुझे मालूम है ।
यार तू भी बे वफ़ा हो जाएगा ।।
तेरी रहमत जो रही तो वक़्त का ।
हर निशाना फिर ख़ता हो जाएगा ।।
सच कहा तो मार ही देगा न तू ।
और इसके सिवा हो जाएगा ।।
कर भला तू काम कोई भी असर
तेरे हक़ मे वो दुआ हो जाएगा ।।

*सहीफ़ों – धर्म ग्रंथों

© प्रमोद शर्मा ‘असर’
हौज़ खास, नई दिल्ली 

Wednesday, September 3, 2014

ग़ज़ल


मुझको आवाज़ देकर जगाता है वो।
रहगुज़र* पुरखतर* है बताता है वो।।
ऐसा रिश्ता मेरे उसके है दरमियाँ।
जो मैं ज़िद भी करूँ मान जाता है वो।।
भूखा सो जाऊँ मैं तो उठाकर मुझे।
अपने हाथों से खाना खिलाता है वो।।
बाँध पाया न कुछ उस सफर के लिए।
हौसला मेरा फिर भी बढाता है वो।।
मेरे घर भेजता है कभी रहमतें।
और कभी अपने दर पर बुलाता है वो।।
मैं तो मतलब निकलते ही भूला उसे।
राह माकूल* फिर भी दिखता है  वो।।
रंग सपनों के उड़ने लगें जब ‘असर’।
मेरे सपनों को खुद ही सजाता है वो।।

*रहगुज़र - रास्ता, 
पुरखतर - खतरों से भरा 
माकूल - उचित  
© प्रमोद शर्मा ‘असर’
हौज़ खास, नई दिल्ली 

Saturday, August 23, 2014

ग़ज़ल

साथ रहकर मेरे शादमाँ कुछ नहीं ǀ
लाख पूछूं वो करता बयाँ कुछ नहीं ǀǀ
आपसी रिश्ते से, डर से, लालच से या ǀ
सच जो कह न सके वो ज़ुबां कुछ नहीं ǀǀ
जो भी जैसा करे पाए वैसा सिला ǀ
सब तेरे सामने है निहाँ कुछ नहीं ǀǀ
काम आए न गर्दिश में बच्चों के जो ǀ
कहना पड़ता है दुःख से वो माँ कुछ नहीं ǀǀ
जो रियाया के दुःख से रहे बेख़बर ǀ
मेरा दावा है वो हुक्मरां कुछ नहीं ǀǀ
आए दर पर सवाली जो उम्मीद ले ǀ
जाए मायूस तो आस्तां कुछ नहीं ǀǀ
मेहनतें चाहे जितनी करे वो ‘असर’ ǀ
जो चमन उजड़ा तो बागबां कुछ नहीं ǀǀ

© प्रमोद शर्मा ‘असर’
हौज़ ख़ास, नई दिल्ली

Monday, August 18, 2014

ग़ज़ल

अक्ल आ जाएगी ठिकाने पर
वो जो उतरेगा आज़माने पर
तीर दुनिया ने ताक़ कर मारे
हम ही आये नहीं निशाने पर
वो ही मेरा ख्याल रखता है
सारी दुनिया के भूल जाने पर
हस्ती शाहों की मिट ही जाती है
इक फ़क़त उसके रूठ जाने पर
डूबी कश्ती भी आ लगे साहिल
वो उतर आये जो बचाने पर
तू चला आएगा सदा पे मेरी
मैं फ़िदा तेरे इस बहाने पर
मैंने आवाज़ दी मैं रोया भी
तुम न आये मेरे बुलाने पर
राह जनमों से तक रहा है ‘असर’
अब तो आ जा गरीबखाने पर 

प्रमोद शर्मा 'असर'
हौजखास, नई दिल्ली