सादर ब्लॉगस्ते पर आपका स्वागत है।
Showing posts with label सुमित के तड़के. Show all posts
Showing posts with label सुमित के तड़के. Show all posts

Monday, November 2, 2015

व्यंग्य : काश हम भी सम्मान लौटा पाते



     इन दिनों चहुँ ओर चर्चा है कि फलां महोदय फलां कारण से अपना सम्मान लौटा रहे हैं। सच कहूँ यह खबर सुनकर दिल में टीस सी उठती है कि काश हमें भी कोई ऐसा सम्मान मिलता जिसे लौटाते हुए हम भी इधर-उधर हल्ला-गुल्ला मचाते फिरते कि भैया हम तो सम्मान लौटा रहे हैं और जिस सम्मान से लिया था उसी सम्मान से वापस भी लौटा भी रहे हैं। पर क्या करें हमें अभी तक कोई ऐसा बड़ा सम्मान पाने का सुअवसर ही नहीं मिला जिसे पाकर हम भी अपना सीना चौड़ा करके घूमते। वैसे ऐसी बात नहीं है कि हमें अभी तक कोई सम्मान नहीं मिला। सम्मान तो बहुत मिले हैं लेकिन सरकारी सम्मान के आगे उन्हें सम्मान कहने में भी शर्म आती है। अब ये ससुरी शर्म चाहे कितनी भी आये पर बेशर्म बनके हमें ये स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है कि न तो हम किसी साहित्यिक खानदान से हैं, जो साहित्यिक परिवार की कृपा हम पर बरसे, न ही किसी ऐसे उच्च पद पर विराजमान हैं कि सम्मान हमारे चरण छूने में भी सम्मान समझें और न ही देश के किसी प्रदेश में अपनी जातीय बंधुओं की सरकार है जो और कुछ न देख पर जाति की शर्म करके ही दो-चार सरकारी सम्मान हमें ससम्मान प्रदान कर दे। अच्छा इन सब कारणों के अलावा अपनी कम उम्र भी धोखा दे जाती है। हालाँकि लिखते हुए एक दशक बीत गया लेकिन साहित्यिक खाँचे में अपनी उम्र फिट नहीं होती । यहाँ सम्मान भी तब मिलने का मन बनाता है जब लेखक जीवन के सभी कर्मों से निच्चू हो लेता है।
उम्र बीत जाने पर सम्मान पानेवालों को देखकर एक बार को ख्याल आता है कि क्या युवावस्था में वो अच्छा नहीं लिखते थे जो उस समय उन्हें सम्मान से दूर रखा गया या वृद्धावस्था में वो इतना श्रेष्ठ लिखने लगे जो उन्हें सम्मान देकर अच्छे लेखक की मोहर लगा दी गयी। कहीं इस उम्र में आकर उन्हें इसलिए तो सम्मानित नहीं किया गया कि भैया ये लो सम्मान और अब अपने लेखन का दि एन्ड कर डालो। सम्मान देनेवाले माननीय महोदय ये क्यों नहीं सोचते कि सम्मान की जरुरत वृद्धावस्था से अधिक युवावस्था में होती है। यदि युवावस्था में सम्मान मिले तो बेचारा युवा लेखक अपनी पुस्तकों के प्रकाशन हेतु प्रकाशकों को चढ़ावा समय से चढ़ा पाएगा और निरंतर उत्साह पाकर उसका मस्तिष्क नित नई रचनाओं का सृजन करता रहेगा। और क्या मालूम उसके निरंतर सृजन के परिणामस्वरूप किसी ऐसी रचना की उत्पत्ति उसके मस्तिष्क में हो जाये जो साहित्य का गौरव बढ़ाने का काम करे। पर युवा लेखक की उम्र उत्साह को पाने के लिए उसके पीछे-पीछे भागते हुए ही बीत जाती है।
माना कि युवा से वृद्ध होने तक हम लेखकों की सम्मान प्राप्ति हेतु दौड़ निश्चित है, फिर भी इस लालची मन में ये लालच कभी भी ख़त्म नहीं होता कि हमें भी ऐसा कोई सम्मान मिले कि वापस लौटाते हुए भी हम सम्मानित अनुभव करें। वैसे भी हम सरकारी सेवक हैं और कम से कम ये बहाना तो चलना ही चाहिए कि सरकारी सेवा करते हुए सरकारी सम्मान प्राप्त करना हमारा भी अधिकार है। अरे भैया कब तक प्राइवेट सम्मानों से स्वयं को तुष्ट करते रहने को विवश होता रहना पड़ेगा? अब प्राइवेट सम्मानों को लौटाने से कोई वाहवाही भी तो नहीं होती। मजा तो तभी आए जब लेखकीय संसार में गुमनामी में हम खोये हुए हों और फलां आदमी के लिए फलां सरकारी सम्मान फलां दिन को फलां चमचे या चमची के हाथों फलां अकादमी में ससम्मान लौटाएँ और फिर से लेखकीय संसार में सितारा बनके चमक जाएँ। सरकारी सम्मानों से विनम्र निवेदन है कि उन्हें प्रदान करनेवालों तक हमारी करुण पुकार न पहुँच पाए तो आप स्वयं ही हमारी झोली में आ टपकें ताकि हम भी आपको लौटाकर गौरव के कुछ पलों के भागीदार बन सकें।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

Friday, October 23, 2015

कविता : रावण तुमको मरना होगा



त्रेता युग में
जब श्री राम ने रावण पर
अंतिम प्रहार किया होगा
तब रावण ने अट्टहास लगा
श्री राम से शायद बोला हो
हे राम सुनो
ये युग है तुम्हारा
सबके हृदय में
बस बसे तुम्हीं हो
इसलिए नहीं टिक पाया
समक्ष तुम्हारे ये रावण
किन्तु द्वापर युग के बाद
आएगा युग कलि का
तब मैं वास करूँगा
हर प्राणी के मन-मस्तिष्क में
तब देखूँगा कि कैसे
कर पाओगे अंत मेरा तुम
सुन वचन रावण के
श्री राम ने शायद 
कुछ ऐसा बोला होगा
हे रावण मुझको है 
विश्वास अपनी संतति पर
जिस भी युग में तुम 
उपजने का यदि 
करोगे साहस तो 
मेरी संतति मेरे रूप को
आत्मसात कर अपने भीतर
करेगी बार-बार
संहार तुम्हारा
हर युग में ही होगा तुमको 
राम के हाथों ही मरना।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

*चित्र गूगल से साभार 

Friday, September 25, 2015

क़ुरबानी (लघुकथा)




    रफ़ीक़ असलम के कान में फुसफुसाया - "भाई जान सामने देखो सलमा आ रही है। क्यों न आज इस गली के सूनेपन का फायदा उठा लिया जाये?"
असलम रफ़ीक के गाल पर जोरदार झापड़ मारते हुए गुस्से में बोला - "हरामखोर आज के पाक दिन ऐसी बात सोचना भी हराम है।"
रफ़ीक़ अपना गाल सहलाते हुए बोला- "माफ़ करना भाई जान गलती हो गयी।"
असलम ने रफ़ीक़ के कंधे पर हाथ धरकर मुस्कुराते हुए कहा - "आज बकरीद पर अल्लाह को बकरे की क़ुरबानी दे आते हैं फिर किसी और रोज हम दोनों इस हसीना की क़ुरबानी ले लेंगे।" 
"हा हा हा भाई जान आईडिया अच्छा है।" रफ़ीक़ खिलखिलाया। और दोनों मस्जिद की ओर बढ़ चले।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

इटावा, नई दिल्ली, भारत 

Saturday, July 25, 2015

विकास गया तेल लेने (व्यंग्य)

        
        देश की जनता इन दिनों हल्ला मचाये हुए है कि विकास कहाँ गया? एक साल हो गया पर विकास क्यों नहीं आया? अब पगली जनता को कौन समझाए कि विकास तो यहाँ है ही नहीं। अरे वो तो तेल लेने गया है। हर साल ही तो जाता है। 67 साल हो गए जाते-जाते फिर 68वें साल में भला क्यों रुकता। इसलिए इस साल भी चला गया। हालाँकि हर पाँचवें साल ये सपना दिखाया गया कि विकास कहीं नहीं जाएगा बल्कि यहीं रहेगा, लेकिन सपना केवल सपना ही बनकर रह गया और साल दर साल विकास जाता रहा तेल लेने। वैसे तो विकास हर साल ही तेल लेने जाता है, पर जाने क्यों इस साल ही इतना हो-हल्ला मचा हुआ है कि विकास को तेल लेने जाने से क्यों नहीं रोका गया। पर जब इतने सालों से विकास को जाने से कोई रोक नहीं पाया तो भला इस बार वो कैसे रुक पाता। वैसे एक बात तो है कि ये ससुरा विकास कुछ ज्यादा ही घुमक्कड़ हो गया है। अपने देश में कभी रुकता ही नहीं। इधर-उधर घूमता रहता है और हम देशवासी इसकी वापसी की राह पलकें बिछाए देखते रहते हैं। ऐसी बात नहीं है कि विकास अपने देश में नहीं रहता। वह बेशक बाहर घूमता फिरे लेकिन सरकारी फाइलों में वह सदैव विराजमान रहता है। इसलिए जब भी जनता पूछती है कि विकास कहाँ है उसके होने का सबूत दिखाओ तो सरकारी बाबू अपनी विशेष ईमानदारी से विकसित की गयी भारी-भरकम तोंद पर फाइल रखकर उसे खोलकर लल्लू जनता को फाइल में मुस्कुराते हुए विकास को दिखाकर झट से फाइल को बंद कर लेता है और बेचारी जनता इस सोच-विचार में खो जाती है कि वो तो नाहक ही परेशान थी कि देश में विकास नहीं रहता। अब उस भोली जनता को कौन समझाए कि जैसे श्रीराम माता सीता के शरीर को एक गुफा में छोड़कर उनकी छाया को अपने साथ ले गए थे कुछ वैसा ही कारनामा विकास ने भी किया है। अब ये और बात है विकास अपने असली रूप में तो तेल लेने चला गया और सरकारी फाइलों में अपना छाया वाला रूप छोड़ गया। जैसे लंकापति रावण सीता माता की छाया का अपहरण करके प्रसन्न रहता था वैसे भारत की जनता भी सरकारी फाइल में विकास के छाया रूप को देखकर मस्त रहती है। अब सोचनेवाली बात ये है कि विकास तेल लेने तो गया है पर वो कौन सा तेल लाएगा? अब इसमें भी सोचने की बात है। हर बार ही तो लाता है भांति-भांति प्रकार के तेल, क्योंकि अलग-अलग लोगों को भिन्न-भिन्न प्रकार के तेल की आवश्यकता होती है। सो विकास हर बार की तरह इस बार भी कई प्रकार के तेल लाएगा। विकास चमेली का तेल लाएगा उन लोगों के लिए जो हमेशा इसकी खुशबू में खोकर आनंदित रहते हैं और उन्हें दीन-दुनिया की न तो कोई खबर रहती है और न ही कोई मतलब। वह हर साल की तरह इस साल भी उन माननीय महोदयों के सिर में चमेली का तेल लगाएगा और वे सब चमेली के तेल के प्रेमी चमेली बाई बनकर विकास के आजू-बाजू ही नाचेंगे। विकास के देश में न रहने को दिन-रात कोसनेवाले महानुभावों के लिए वह सरसों का तेल लाएगा। पहले तो उन महानुभावों की हड्डियों को चटकाकर उनकी मरम्मत करते हुए उन्हें भाव विहीन बनाया जाएगा फिर प्रेमपूर्वक सरसों के तेल से उनके शरीर की मालिश की जायेगी। सरसों के तेल से इनके शरीर की मालिश होने से उनकी सारी थकान जाती रहेगी और उनकी विकास के न रहने की शिकायत भी ख़त्म हो जायेगी। हो सकता है कि शिकायत दूर होने का कारण फिर से हड्डियाँ चटकाए जाने का डर ही हो। विकास धतूरे का तेल उन लोगों के लिए लाएगा जो विकास का नाम ले-लेकर सरकार को आये दिन आँखें दिखाते रहते हैं। धतूरे के बीजों के तेल को दिव्य तेल बताकर दिया जाएगा तथा इसमें तेजाब मिलाकर इसे और दिव्य बनाया जाएगा। इस दिव्य तेल को सरकार को आँखें दिखाने की धृष्टता करनेवालों की आँखों में डालकर ‘न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी’ की कहावत को चरितार्थ किया जाएगा। विकास द्वारा बादाम का तेल उन तथाकथित बुद्धिजीवियों को भेंट स्वरुप दिया जाएगा, जिनकी तीव्र बुद्धि सदा यह सिद्द करने को तत्पर रहती है कि विकास तो देश में था, है और सदैव रहेगा। बादाम का तेल उन तथाकथित बुद्धिजीवियों की बुद्धि में और अधिक वृद्धि करेगा। विकास द्वारा मिट्टी का तेल उन लोगों के लिए लाया जाएगा जो लोकतंत्र के प्रहरी होने का दावा करते हैं और चौथे खंबे की शक्ति प्रदर्शित करते हुए सत्ता के गलत कार्यों के विरुद्ध लिखते हुए लोकतंत्र की भावना को जीवित रखने को प्रयासरत रहते हैं। ऐसे लोगों को मिट्टी का तेल डालकर सरेआम जला दिया जाएगा। उनके साथ लोकतंत्र भी तड़प-तड़पकर मर रहा होगा, लेकिन डर के मारे देश की बहादुर जनता कुछ भी नहीं कहेगी, बल्कि एक स्वर में बोलेगी कि अपना देश तो विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और विकास है इसका मस्तक। जबकि असल में लोकतंत्र तो मृत्युशैया पर पड़ा हुआ अपनी अंतिम साँसें गिन रहा होगा। और विकास वो तो चला जाएगा फिर से तेल लेने। 

लेखक: सुमित प्रताप सिंह

ई-1/4, डिफेन्स कॉलोनी पुलिस फ्लैट्स,
नई दिल्ली- 110049
कार्टूनिस्ट : श्री राम जनम सिंह भदौरिया 

Friday, July 17, 2015

कागा अब बोले नहीं मुंडेर पे (व्यंग्य)


   बहुत दिन गुज़र गए पर अपनी मुंडेर पर कोई कागा अर्थात कौआ काँव-काँव करते नहीं दिखा। एक वो भी दिन थे जब अक्सर कौए काँव-काँव करते मुंडेर पर दिख जाते थे और हम बालक चीखते हुए उनसे कहते थे ‘उड़ जा कौआ चाचा आते हों’ या फिर ‘उड़ जा कौआ मामा आते हों’। सच कहें बेशक हम इतने बड़े हो गए लेकिन बचपन दिल में अभी भी जीवित है और ये बचपन अक्सर जिद करता है कि हमारी मुंडेर पर कोई कौआ आकर बैठे और जोर से काँव-काँव करे और फिर हम चीखकर बोलें ‘उड़ जा कौआ कोई अपना आता हो’। पर दिल की बात दिल में ही रह जाती है और कोई कौआ मुंडेर की ओर मुंह भी नहीं मारता और ये बचपन दिल के भीतर ही बैठा हुआ तड़पता रहता है। आजकल कौए भी ईद के चाँद बन चुके हैं वो साल में दो बार दिख भी जाता है लेकिन ये कौए तो साल में एक ही बार दीखते हैं वो भी श्राद्धों में। आखिर कौओं ने घर पर आना और आकर मुंडेर पर बैठकर काँव-काँव करने की परम्परा का त्याग क्यों कर दिया? कहीं उन्हें भी कलियुगी संस्कृति ने अपनी छत्रछाया में जगह तो नहीं दे दी जो वो दूत बनना छोड़कर यूँ अचानक लापता हो गए। फिर मन सोचता है कि कौए बेचारे भी क्या करें आज के युग में बेटा बाप का नहीं रहा, भाई को भाई फूटी आँख नहीं सुहाता तो रिश्तेदार अपने दूसरे रिश्तेदारों को सीधी आँख भला कैसे देख सकते हैं? जैसे-जैसे समय बीत रहा है, लोगों की आशाएँ विशाल और ह्रदय सिकुड़कर छोटे होते जा रहे हैं और उन सिकुड़ते हृदयों में रिश्तेदार तो कभी रह ही नहीं सकते। पहले रिश्तेदार एक दूसरे के सुख-दुःख के साथी होते थे। मुसीबत के समय अपने रिश्तेदार के कंधे से कन्धा मिलाकर खड़े हो जाना सच्चे रिश्तेदार की निशानी होती थी। पर समय के कोल्हू ने रिश्तेदारी को ऐसा पेरा कि न तो सच्ची रिश्तेदारी सलामत बची और न ही सच्चे रिश्तेदार। छोटे-छोटे स्वार्थ की खातिर रिश्तेदार का राम नाम सत्य तक कर देने को तत्पर रिश्तेदारों को रिश्तेदारी का र भी ठीक ज्ञात नहीं रहा हो तो कौए बेचारे क्या करें? वो कैसे पता लगायें कि घर आनेवाला वाकई में रिश्तेदार है क्योंकि उसके हृदय में तो रिश्तेदारी नामक तत्व पहले ही तार-तार हो चुका मिलता है। शायद इसीलिए कोई कौआ भूले-भटके घर की मुंडेर पर बैठ भी जाए तो किसी रिश्तेदार के आने की सूचना देने को काँव-काँव नहीं करता। असल में उसे रिश्तेदार के दिल में वो पुराना प्रेम व स्नेह दिखाई ही नहीं देता इसलिए उसके भीतर काँव-काँव कर ख़ुशी मनाने की भावना भी दम तोड़ देती है। इसलिए कौओं ने अब काँव-काँव करना छोड़ दिया है। शहरों में बड़े-बड़े मकानों और संकुचित दिलों वाले भले लोग भी भला कहाँ कामना करते हैं कि कोई कौआ काँव-काँव करे और कोई रिश्तेदार आ टपके तथा उनकी व्यस्तता में खलल डाल दे। इसलिए उन्होंने अपने घर की मुंडेर पर काँच या लोहे के कंटीले तार लगाकर कौओं को वहाँ बैठने से अवरुद्ध कर दिया। अब कौओं को भी मुंडेर पर काँव-काँव कर मेहमान या रिश्तेदार के आने का संदेशा देने का चाव नहीं रहा है। अब वे अपना समय या तो किसी लाश का माँस नोंचने में व्यतीत करते हैं या फिर मनुष्य का वेश धरकर किसी सदन में जाकर काँव-काँव करने लगते हैं।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 


Tuesday, May 5, 2015

अपना-अपना प्रेम (लघु कथा)


  एक उत्साही पत्रकार दूर-दराज गाँव में अपने न्यूज़ चैनल पर लाइव टेलीकास्ट के माध्यम से मौजूद था।
पत्रकार – “जी हाँ इस समय आप देख रहे हैं कि हमारे बगल में एक खेत किसान अपने पूरे परिवार के साथ फाँसी लगाने को तैयार खड़ा हुआ है। आइये हम किसान से ही पूछते हैं कि आखिर ऐसा खतरनाक कदम उठाने के लिए ये क्यों विवश हुआ”?
पत्रकार किसान के मुँह पर माइक सटा देता है – “हाँ तो पपुआ क्या आप हमारे चैनल को बताएँगे कि आप अपने पूरे परिवार के साथ फाँसी क्यों लगाने जा रहे हैं”?
पपुआ – “प्रेम के कारण”।
पत्रकार – “प्रेम के कारण। क्या बकवास कर रहे हो? तुम तो कह रहे थे कि फसल बर्बाद होने की वजह से फाँसी लगाने जा रहे हो। 
पपुआ – “साब हम अपने खेतों और ज़मीन को अपनी माँ मानते हैं और जितना आपको अपने चैनल की टी.आर.पी. से प्रेम है उससे कहीं ज्यादा प्रेम हम इस माँ से करते हैं। फसल बर्बाद होने की वजह से हमारे ऊपर इतना कर्ज़ा चढ़ गया है कि हमारी माँ के नीलाम होने की नौबत आ गयी है और यही हमसे नहीं देखा जाएगा। इसलिए हमने फैसला किया था अपनी धरती माँ से बिछुड़कर घुट-घुटके मरने की बजाय फाँसी लगाकर एक बार में ही अपने सारे कष्टों से मुक्त हो जायें।

Monday, March 16, 2015

व्यंग्य : सबसे बड़े साहब


    हर सरकारी कार्यालय में एक बड़े साहब होते हैं और बाकी उनके अंतर्गत कार्य करनेवाले छोटे-मोटे प्राणी। बड़े साहब के निर्देशन में पूरा कार्यालय और कार्यालय के कर्मचारी कर्मठता और विवशता से जुटे रहते हैं। कार्यालय में बड़े साहब से भी बड़े एक साहब विराजमान होते हैं और वो होते हैं सबसे बड़े साहब। कहने को तो वो बड़े साहब के अंतर्गत उनकी सेवा में नियुक्त एक सरकारी कर्मचारी मात्र होते हैं लेकिन असल में जो दिखता है वो होता नहीं है और जो होता नहीं है वो न दिखकर भी देखना पड़ता है। इसलिए बड़े साहब बेशक बड़े दीखते हों लेकिन असल में वो सबसे बड़े साहब नहीं होते या यूँ कहें कि उनमें सबसे बड़े साहब बनने का सामर्थ्य ही नहीं होता।
कार्यालय के अल्प बुद्धि धारक कर्मचारी सबसे बड़े साहब को बड़े साहब का मात्र मातहत कर्मचारी मानकर उनको छोटा समझने की भूल अक्सर करते रहते हैं। यही भूल उनकी कठिनाइयों का सबसे बड़ा कारण होती है। सबसे बड़े साहब बड़े साहब की सेवा में दिन भर रत रहते हैं और उनकी हर सुख-सुविधा का ध्यान रखते हैं। उनका कर्तव्य होता है ऐसा प्रत्येक कार्य करना जो हम आम जीवों के वश के बाहर की बात हो और जो बड़े साहब को तन और मन का सुख प्रदान कर सके तथा सबसे बड़े साहब को सबसे बड़ा बना रहने में सहायक बना रहे। हम कमअक्लों को ये कार्य शायद छोटे लगते हों लेकिन ये छोटी सोच ही हमें छोटा बनाये रखती है और जो इस छोटी सोच से ऊपर उठकर कार्य करता है वो बनता है सबसे बड़ा साहब।
    बड़े साहब के इर्द-गिर्द लगभग पाँच वर्ग मीटर का घेरा होता है जिसमें तैनात रहते हैं सबसे बड़े साब। दूसरे शब्दों में कहें तो यह घेरा सबसे बड़े साहब का साम्राज्य होता है जिसके वो अघोषित सम्राट होते हैं। आदमी तो आदमी किसी पंछी की भी मजाल है जो इस घेरे में पर भी मार जाये। बड़े साब के कानों के आस-पास ही सबसे बड़े साब मुख रहता है और उस मुख से दफ्तर की हर टुच्ची से टुच्ची बात बड़े साब के कानों से होती हुई उनके मस्तिष्क में सप्लाई होती रहती है।
   बड़े साहब बेशक थोड़ा-बहुत नाराज भी हो जाएँ तो कुछ नहीं बिगड़ेगा लेकिन अगर सबसे बड़े साहब हमसे नाराज हो गए तो समझो कि भैंस गई पानी में। हमारे इस डर को सबसे बड़े साहब भी बखूबी जानते हैं इसलिए वो अक्सर हमें डराए रखते हुए हमारे डर को अपने फायदे में इस्तेमाल करते रहते हैं और हम सभी भोंदू बनकर इस्तेमाल होते रहने में ही अपनी भलाई समझते हैं।
   सबसे बड़े साहब के मातहत भी कुछ जीव कार्यरत होते हैं। उन्हें हम बहुत बड़े साहब कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। सबसे बड़े साहब को सबसे बड़ा बनाए रखने में इन बहुत बड़े साहबों का भरपूर योगदान होता है। जहाँ सबसे बड़े साहब का कर्मक्षेत्र बड़े साहब के इर्द-गिर्द ही होता है वहीं इन बहुत बड़े साहबों का कर्मक्षेत्र पूरा कार्यालय होता है। कार्यालय की हर छोटी-बड़ी खबर बहुत बड़े साहबों से प्राप्त कर सबसे बड़े साहब अपने बड़े साहब के चरणों में प्रस्तुत करते रहते हैं। परिणामस्वरुप आये दिन कार्यालय के किसी न किसी बेचारे कर्मचारी पर गाज गिरती रहती है। कार्यालय के कर्मचारी सबसे बड़े साहब के अत्याचारों से तंग आकर दिन-रात उन्हें गरियाते रहते हैं और श्राप देते रहते हैं। एक दिन ऐसा भी आता है जब दुखी कर्मचारियों द्वारा दुखी मन से दिया गया श्राप सिद्ध हो जाता है और बड़े साहब जरा सी गलती होने पर सबसे बड़े साहब से इतना नाराज हो जाते हैं कि सबसे बड़े साहब को सबसे छोटा साहब बनने में अधिक समय नहीं लगता।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

Tuesday, September 30, 2014

कहानी : कमीना

   छज्जन मियाँ काफी समय से सड़क पर परेशान खड़े हुए थे। वहाँ से गुजरती हुई हर गाड़ी को रोकने की उन्होंने लाख कोशिश कर ली थी, लेकिन उन्हें निराशा ही मिली। कोई भी दुपहिया, तिपहिया या चौपहिया उनकी वेशभूषा देखकर रुकने को तैयार नहीं था। ज्यों-ज्यों रात बढ़ रही थी, छज्जन मियां के दिल की धडकनें भी तेज होती जा रहीं थी। अब उन्हें यह अहसास होने लगा था, कि जितना वो सोचते थे दुनिया उससे कुछ ज्यादा ही निर्दयी थी। एक मुसीबत के मारे को कोई भी मदद करने को तैयार नहीं हो रहा था। वो सोच रहे थे, कि जाने किस घड़ी में उनसे जाने क्या पाप हुआ होगा, जो आज उन्हें यह दिन देखना पड़ रहा था। समय गुजरने के साथ-साथ रात अँधेरे की चादर ओढ़ते हुए और काली और घनी होती जा रही थी। जैसे-जैसे रात बढती जा रही थी, वैसे-वैसे सड़क सुनसान होती जा रही थी। अब छज्जन मियाँ डरते-डरते ऊपरवाले को याद करने लगे। धीमे-धीमे वो विश्व में मौजूद ईश्वर के सभी रूपों का स्मरण करने लगे। आखिर उनकी मेहनत और दुआएँ रंग लाईं और एक मोटर साइकिल उनकी मदद  के लिए उनके पास आकर रुकी। उन्होंने ऊपरवाले का शुक्रिया किया और मोटरसाइकिल पर सवार हो गए।
अब छज्जन मियां तनावमुक्त हो मोटर साइकिल पर पीछे बैठ चले जा रहे थे।
तभी मोटर साइकिल सवार ने उनसे पूछा, "आप इतनी रात को यहाँ क्या कर रहे थे?"
ऐसा लगा कि उस आदमी ने  छज्जन मियां  की दुखती रग पर हाथ रख दिया हो। छज्जन मियाँ नाराजगी और गुस्से के मिले-जुले भाव संग बोले, "क्या बताएँ हुजूर दुकान बंद करके घर को आ रहे थे, पर रास्ते मे पुलिसवाले मिल गये और हमारी गाड़ी ही जब्त कर ली।" "पुलिसवालों ने आपकी गाड़ी क्यों जब्त कर ली?" मोटर साइकिल सवार ने पूछा। 
छज्जन मियाँ अपनी टोपी संभालते हुए बोले, "अम्माँ क्या बताएँ जरा जल्दी में थे, सो लाल बत्ती पार कर ली थी और अपन हैलमेट तो कभी पहनते नहीं है सो पकड़ लिया हमें।"
मोटर साइकिल सवार बोला; “अरे पकड़ लिया तो चालान कटवा लेते। कम से कम गाड़ी तो जब्त न होती।"
"चालान और हमारा। अरे हम तो उलझ गये उनसे हमने साफ़ कह दिया कि एक फूटी कौड़ी नहीं देंगे उनको और उन्हें नौकरी खराब करवाने की धमकी भी दे डाली। बदले में उन नामुरादों ने हमारे गाल पर दो-चार झापड़ रसीद कर दिये और हमारी गाड़ी भी जब्त कर ली। खैर उन्हें भी हम देख लेंगे।" इतना कहकर छज्जन मियां दुखी हो अपने गालों पर हाथ फेरते हुए सहलाने लगे।
"मतलब आपने गलती की और उसकी आपको सजा भी मिली।" मोटर साइकिल सवार हँसते हुए बोला। 
छज्जन मियाँ झल्लाते हुए बोले, “गलती अमाँ जल्दबाजी में रेड लाइट देखता कौन है?”
“अगर सभी आपकी तरह सोचने लगेंगे तो सड़कें तो मछली बाज़ार बन जाएँगी।” मोटर साइकिल सवार ने मुस्कुराते हुए कहा।
छज्जन मियाँ खिलखिला उठे, “अमाँ आप ने भी उदारहण तो जबरदस्त दिया। मछली बाज़ार। हा हा हा।”
“इसमें हँसने की बात नहीं बल्कि गौर करने वाली बात है। हम सबको जिम्मेदार शहरी बनना चाहिए। अगर हम सब सड़क पर अनुशासन से चलेंगे तो सड़कें अपने आप सुरक्षित रहेंगी।” मोटर साइकिल सवार ने उन्हें समझाया।
छज्जन मियाँ ने उनकी बात में पहली बार रूचि दिखाई, “मियाँ आप बात तो पते की कह रहे हैं।”
“एक और बात पर ध्यान दीजिए। आप हेलमेट पहनने से ऐतराज करते हैं। हेलमेट से आपके सिर की सुरक्षा होती न कि पुलिसवालों की। सोचिये किसी दिन आपका किसी गाड़ी से एक्सीडेंट हो जाए और आपका बिना हेलमेट पहने सिर सड़क से टकराएगा तो वह तो तरबूज की तरह फट जाएगा।” मोटर साइकिल सवार ने अपनी राय रखी।
छज्जन मियाँ थोड़े से डर गए, “हुजूर एक तो ये रात वैसे ही इतनी भयानक है ऊपर से आप और हमें डराए जा रहे हैं।”
“अजी हम डरा कहाँ रहे हैं? आप ही बिना बात के डरे जा रहे हैं।” यह कहकर मोटर साइकिल सवार ने ठहाका लगाया।
छज्जन मियाँ ने भी उसकी हँसी में साथ दिया, “वैसे आप इंसान हैं मजेदार।”
“आज शायद आपकी संगत का असर हो गया है।” उसने छज्जन मियाँ को खुश करने की कोशिश की।
छज्जन मियाँ शरमाते हुए बोले,”हाँ वो तो है हमारे साथ वाले अक्सर इस डायलोग को इस्तेमाल करते रहते हैं।”
“इसका मतलब मैंने आपको गलत नहीं पहचाना।” मोटर साइकिल सवार बोला।
छज्जन मियाँ कुछ गंभीर होकर बोले, “आदमी आप समझदार लगते हैं।”
“अजी बस थोड़ा बहुत आप जैसे समझदारों के साथ रह-रहकर समझदारी आ गई। वैसे एक बात तो बताइए।” मोटर साइकिल सवार ने पीछे मुँह करके छज्जन मियाँ से पूछा।
छज्जन मियाँ उत्सुक हो गए, “हाँ हाँ अमाँ एक क्यों दो सवाल पूछिए।”
“दो नहीं बस एक ही सवाल है आपसे।” मोटर साइकिल सवार बोला।
छज्जन मियाँ ने गंभीरता का आवरण धरा, “चलिए तो एक ही पूछिए।”
“आप इतने मजेदार इंसान हैं फिर भी आपकी पुलिसवालों के साथ झड़प क्यों हो गई? आप उनसे प्यार से भी तो निबट सकते थे?” मोटर साइकिल सवार ने अपना सवाल पूछ ही डाला।
छज्जन मियाँ को पुलिसवालों द्वारा उनके गालों पर जड़े गए चांटे फिर याद आ गए, “अमाँ प्यार से तो तभी निबटते जब पुलिसवाले निबटने देते।”
“अजी आपने प्यार से निबटने की कोशिश ही नहीं की होगी।” मोटर साइकिल वाले ने अपनी ठोस राय रखी।
छज्जन मियां मुँह बनाते हुए बोले, "हुजूर आप जो भी समझें, लेकिन ये पुलिसवाले होते बहुत कमीने हैं। इनमें इंसानियत नाम की कोई चीज नहीं होती।"
"लेकिन आप यह भी जानते होंगें कि सब उंगलियाँ बराबर नहीं होती।" मोटर साइकिल सवार ने उन्हें समझाते हुए बोला।
 "अरे जाने भी दीजिए। सभी पुलिसवाले एक नंबर के हरामी होते हैं। अच्छा यहीं रोक लीजिए यहाँ से कुछ दूर ही अपना घर है।" मोटर साइकिल से उतरकर "देखिए हमारा नाम छज्जन मियां है। दरिया गंज में अपनी औजारों की एक छोटी दुकान हैं। कभी खिदमत का मौका ज़रूर दीजिएगा। आप बहुत भले आदमी लगते है। वैसे आपका नाम क्या है?" 
मोटर साइकिल सवार बोला, "जी मेरा नाम कमीना है। वैसे आप मुझे हरामी भी कह सकते हैं।"  
छज्जन मियां चौककर बोले, "अमाँ यार मजाक अच्छा कर लेते हैं।" 
मोटर साइकिल सवार हँसते हुए बोला, "मजाक नहीं कर रहा हूँ। चूँकि मैं भी एक पुलिसवाला हूँ और आपके लिए पुलिसवाले कमीने और हरामी ही तो हैं।"

इतना सुनते ही छज्जन मियां ने झेंपते हुए अपनी नज़रें झुका लीं।

सुमित प्रताप सिंह
इटावा, नई दिल्ली, भारत 
*चित्र गूगल बाबा से साभार