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Friday, February 3, 2017

लघुकथा : भांड

जिले ने गंभीर हो नफे से पूछा, "भाई ये भांड किसे कहते हैं?"
"कोई कलाकार जब स्वार्थवश अपनी कला को बेच देता है तो वह भांड बन जाता है।" नफे ने समझाया।
जिले सिर खुजाते हुए बोला, "भाई मैं कुछ समझा नहीं।"
नफे बोला, "जब कोई व्यक्ति कला के प्रति तन-मन से समर्पित हो उसकी समृद्धि में योगदान देता है तो वह कलाकार कहलाता है।"
"और भांड किसे कहते हैं?" जिले ने उत्सुकता से पूछा।
"जब वही कलाकार चंद सिक्कों के लालच में अपनी कला और ज़मीर का सौदा कर लेता है तो..." इससे पहले कि नफे अपनी बात पूरी करता जिले खिलखिलाते हुए बोला, "तो वह भांड कहलाता है।"
 
लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

Thursday, June 9, 2016

वो सिपाही (लघुकथा)



    कार में जा रहे प्रेमी युगल में से प्रेमिका ने जब जून की तपती दोपहर में सड़क पर पिकेट पर खड़े सिपाही को देखा तो प्रेमी से कहा, "डार्लिंग देखो तो कितनी गर्मी हो रही है और ये सिपाही इस गर्मी में भी रोड पर खड़ा हुआ है।"
"
डिअर ये अपनी ड्यूटी कर रहा है।" प्रेमी ने समझाया।
प्रेमिका बोली, "वो तो ठीक है। पर यार सोचो तो सही। टेम्परेचर 46° से ऊपर हो रखा है। न तो इसके आसपास पानी का इंतजाम है और न ही ऐसी कोई जगह जहाँ ये कुछ देर के लिए छाँव में जाकर सुस्ता ले। यार ये लोग इतनी गर्मी कैसे सह लेते हैं। अगर ए.सी. न हो तो मैं तो कुछ पलों में गर्मी के मारे मर ही जाऊँ।"
"
स्वीट हार्ट जैसे हम लोग सुविधाओं के आदी हो चुके हैं, वैसे ही ये पुलिसवाले दुविधाओं के आदी हो चुके हैं। खैर हम भी कहाँ इन फालतू लोगों के चक्कर में पड़ गए। वैसे एक बताऊँ आज तुम बहुत हॉट लग रही हो।" प्रेमी ने रोमांटिक होते हुए कार को तेजी से उस सिपाही के बगल से निकालते हुए कहा।
प्रेमिका हर बार की तरह शरमाई नहीं, बल्कि हॉट शब्द को सुनते ही उसको अपने सामने पसीने से सनी वर्दी पहने, गर्मी से तमतमाए चेहरे और प्यास से सूख रहे गले संग उस तपती दोपहर में जलती सड़क पर ड्यूटी दे रहा पीछे छूटा वो सिपाही नज़र याद आने लगा।


लेखक : सुमित प्रताप सिंह

Friday, September 25, 2015

क़ुरबानी (लघुकथा)




    रफ़ीक़ असलम के कान में फुसफुसाया - "भाई जान सामने देखो सलमा आ रही है। क्यों न आज इस गली के सूनेपन का फायदा उठा लिया जाये?"
असलम रफ़ीक के गाल पर जोरदार झापड़ मारते हुए गुस्से में बोला - "हरामखोर आज के पाक दिन ऐसी बात सोचना भी हराम है।"
रफ़ीक़ अपना गाल सहलाते हुए बोला- "माफ़ करना भाई जान गलती हो गयी।"
असलम ने रफ़ीक़ के कंधे पर हाथ धरकर मुस्कुराते हुए कहा - "आज बकरीद पर अल्लाह को बकरे की क़ुरबानी दे आते हैं फिर किसी और रोज हम दोनों इस हसीना की क़ुरबानी ले लेंगे।" 
"हा हा हा भाई जान आईडिया अच्छा है।" रफ़ीक़ खिलखिलाया। और दोनों मस्जिद की ओर बढ़ चले।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

इटावा, नई दिल्ली, भारत 

Saturday, June 22, 2013

लघुकथा: एक रुपया


   मरीजों की लम्बी कतार लगी  थी। रजत भी अपनी बारी आने  की प्रतीक्षा कर रहा था। तीन दिन से उसका सर दर्द से फटा जा रहा था। जब घरेलू  उपचार और स्वचिकित्सा से लाभ न हुआ, तो मजबूरन आना ही पड़ा डॉक्टर की शरण में।
      तीसरे नम्बर  पर उसकी बारी थी , कि तभी उसे डॉक्टर के चैकअप रूम से कुछ आवाज़ें सुनाई दीं। डॉ० सहगल, जो कि बहुत  ही धीमी आवाज़ में बोलने के लिए प्रसिद्द था, शायद मरीज़ पर चिल्ला रहा था, "क्या समझ रखा है इसे ? कोई खैरात बंट रही है क्या ? देखते नहीं, बाहर साफ-साफ लिखा है, कि एक विज़िट की फीस पच्चीस रूपये ?"
तब तक कम्पाऊँडर ने केबिन  का दरवाज़ा खोल दिया था। आवाज़ें और भी स्पष्ट हो गयीं थीं। ......"डॉ०  साब ! मेरे पास कुल चौबीस  ही रूपये हैं ! अभी ले लो, मैं कल एक रुपया जरुर दे जाऊंगा !".... वेश भूषा से दीन - हीन और बेहद कमज़ोर दिखने वाला वह मरीज़ भरसक मिन्नतें कर रहा था, पर डॉ० के इशारे पर  कम्पाउंडर ने बड़ी बेरहमी से उसे लगभग धक्के मारते हुए बाहर का रास्ता दिखा दिया। अगला मरीज़ अंदर चला गया।
             रजत अवाक सा यह दृश्य  देखता रह गया। उसे विश्वास  नहीं हो रहा था, कि  जो डॉ० पढ़ाई पूरी करने  पर लोगों की जीवन रक्षा  का प्रण लेते हैं और जिन्हें भगवान का दर्जा दिया जाता है, वह मात्र एक रूपये के लिए ऐसी हरकत भी कर सकते हैं। जाने उसे क्या सूझी, उसने झट से उस गिरे हुए मरीज़ को उठाया, और धड़धड़ाते हुए डॉ० के केबिन का दरवाज़ा खोलकर अंदर गया और बेहद रुखाई के साथ डॉ० के सामने एक रुपया फेंकते हुए बोला, "ये लीजिये आपका एक रुपया! आपकी फीस पूरी हुई ? अब इसका इलाज कर दीजिये।"
       डॉ० इस अप्रत्याशित  घटना के लिए तैयार न  था। फटी आँखों से कभी  रजत, तो कभी उस एक रूपये को देखता रहा। रजत कुछ बड़बडाता हुआ बड़ी तेज़ी से मुडकर चला गया , और उसके शब्द डॉ० के कानों में गूंजते रहे,  "माफ़ कीजिये ! आगे से जरूरत पड़ने पर मैं आपके पास न आ सकूंगा इलाज के लिए…….”। 

 रचना 'आभा'
मालवीय नगर, नई दिल्ली 
चित्र गूगल से साभार 

Monday, April 22, 2013

लघुकथा:ख्वाब

रोज छोटू को सामने वाली दूकान पर काम करते हुए देखती थी , रोज ऑफिस में चाय देने आता था , हँसता , बोलता  पर आँखों में कुछ  ख्वाब से तैरते थे .

एक दिन मैंने उससे कहा 

" छोटू पढने नहीं जाते "

"नहीं दीदी समय नहीं मिलता "
"क्यूँ घर में कौन-कौन है  "
"माँ ,बापू बड़ी बहन ,छोटी बहन "
"तो सब क्या करते है "
"सभी काम करते है "
"तुम्हे पढना नहीं अच्छा लगता ?"
वह चुप हो गया ,और नीहिर भाव आँखों में था  ,धीरे से बोला ---
" हाँ बहुत मन करता है पढूं , अच्छे अच्छे कपडे पहनूँ, स्कूल जाऊँ और मैं भी एक दिन ऐसे ही नौकरी कर बड़ा इंसान बनूँ, पर इतने पैसे नहीं है, जो मिलता है सब मिलकर उससे खाना ले कर आते है ,".........काश  में भी बड़े घर में जन्म लेता.......
शब्द खामोश हो गए और नयन सजल ,यह सजा भगवान् ने नहीं दी , इंसानों ने ही तो अमीर गरीब बनाये है ,स्वप्न तो सभी की आँखों में एक जैसे ही आते है.

रचनाकार: सुश्री शशि पुरवार
इंदौर, मध्य प्रदेश