सादर ब्लॉगस्ते पर आपका स्वागत है।
Showing posts with label Story. Show all posts
Showing posts with label Story. Show all posts

Tuesday, September 30, 2014

कहानी : कमीना

   ज्जन मियाँ काफी समय से सड़क पर परेशान खड़े हुए थे। वहाँ से गुजरती हुई हर गाड़ी को रोकने की उन्होंने लाख कोशिश कर ली थी, लेकिन उन्हें निराशा ही मिली। कोई भी दुपहिया, तिपहिया या चौपहिया उनकी वेशभूषा देखकर रुकने को तैयार नहीं था। ज्यों-ज्यों रात बढ़ रही थी, छज्जन मियां के दिल की धडकनें भी तेज होती जा रहीं थी। अब उन्हें यह अहसास होने लगा था, कि जितना वो सोचते थे दुनिया उससे कुछ ज्यादा ही निर्दयी थी। एक मुसीबत के मारे को कोई भी मदद करने को तैयार नहीं हो रहा था। वो सोच रहे थे, कि जाने किस घड़ी में उनसे जाने क्या पाप हुआ होगा, जो आज उन्हें यह दिन देखना पड़ रहा था। समय गुजरने के साथ-साथ रात अँधेरे की चादर ओढ़ते हुए और काली और घनी होती जा रही थी। जैसे-जैसे रात बढती जा रही थी, वैसे-वैसे सड़क सुनसान होती जा रही थी। अब छज्जन मियाँ डरते-डरते ऊपरवाले को याद करने लगे। धीमे-धीमे वो विश्व में मौजूद ईश्वर के सभी रूपों का स्मरण करने लगे। आखिर उनकी मेहनत और दुआएँ रंग लाईं और एक मोटर साइकिल उनकी मदद  के लिए उनके पास आकर रुकी। उन्होंने ऊपरवाले का शुक्रिया किया और मोटरसाइकिल पर सवार हो गए।
अब छज्जन मियां तनावमुक्त हो मोटर साइकिल पर पीछे बैठ चले जा रहे थे।
तभी मोटर साइकिल सवार ने उनसे पूछा, "आप इतनी रात को यहाँ क्या कर रहे थे?"
ऐसा लगा कि उस आदमी ने  छज्जन मियां  की दुखती रग पर हाथ रख दिया हो। छज्जन मियाँ नाराजगी और गुस्से के मिले-जुले भाव संग बोले, "क्या बताएँ हुजूर दुकान बंद करके घर को आ रहे थे, पर रास्ते मे पुलिसवाले मिल गये और हमारी गाड़ी ही जब्त कर ली।" "पुलिसवालों ने आपकी गाड़ी क्यों जब्त कर ली?" मोटर साइकिल सवार ने पूछा। 
छज्जन मियाँ अपनी टोपी संभालते हुए बोले, "अम्माँ क्या बताएँ जरा जल्दी में थे, सो लाल बत्ती पार कर ली थी और अपन हैलमेट तो कभी पहनते नहीं है सो पकड़ लिया हमें।"
मोटर साइकिल सवार बोला; अरे पकड़ लिया तो चालान कटवा लेते। कम से कम गाड़ी तो जब्त न होती।"
"चालान और हमारा। अरे हम तो उलझ गये उनसे हमने साफ़ कह दिया कि एक फूटी कौड़ी नहीं देंगे उनको और उन्हें नौकरी खराब करवाने की धमकी भी दे डाली। बदले में उन नामुरादों ने हमारे गाल पर दो-चार झापड़ रसीद कर दिये और हमारी गाड़ी भी जब्त कर ली। खैर उन्हें भी हम देख लेंगे।" इतना कहकर छज्जन मियां दुखी हो अपने गालों पर हाथ फेरते हुए सहलाने लगे।
"मतलब आपने गलती की और उसकी आपको सजा भी मिली।" मोटर साइकिल सवार हँसते हुए बोला। 
छज्जन मियाँ झल्लाते हुए बोले, “गलती अमाँ जल्दबाजी में रेड लाइट देखता कौन है?”
“अगर सभी आपकी तरह सोचने लगेंगे तो सड़कें तो मछली बाज़ार बन जाएँगी” मोटर साइकिल सवार ने मुस्कुराते हुए कहा
छज्जन मियाँ खिलखिला उठे, “अमाँ आप ने भी उदारहण तो जबरदस्त दिया मछली बाज़ार हा हा हा
“इसमें हँसने की बात नहीं बल्कि गौर करने वाली बात है हम सबको जिम्मेदार शहरी बनना चाहिए अगर हम सब सड़क पर अनुशासन से चलेंगे तो सड़कें अपने आप सुरक्षित रहेंगी” मोटर साइकिल सवार ने उन्हें समझाया
छज्जन मियाँ ने उनकी बात में पहली बार रूचि दिखाई, “मियाँ आप बात तो पते की कह रहे हैं
“एक और बात पर ध्यान दीजिए आप हेलमेट पहनने से ऐतराज करते हैं हेलमेट से आपके सिर की सुरक्षा होती न कि पुलिसवालों की सोचिये किसी दिन आपका किसी गाड़ी से एक्सीडेंट हो जाए और आपका बिना हेलमेट पहने सिर सड़क से टकराएगा तो वह तो तरबूज की तरह फट जाएगा” मोटर साइकिल सवार ने अपनी राय रखी
छज्जन मियाँ थोड़े से डर गए, “हुजूर एक तो ये रात वैसे ही इतनी भयानक है ऊपर से आप और हमें डराए जा रहे हैं
“अजी हम डरा कहाँ रहे हैं? आप ही बिना बात के डरे जा रहे हैं” यह कहकर मोटर साइकिल सवार ने ठहाका लगाया
छज्जन मियाँ ने भी उसकी हँसी में साथ दिया, “वैसे आप इंसान हैं मजेदार
“आज शायद आपकी संगत का असर हो गया है” उसने छज्जन मियाँ को खुश करने की कोशिश की
छज्जन मियाँ शरमाते हुए बोले,”हाँ वो तो है हमारे साथ वाले अक्सर इस डायलोग को इस्तेमाल करते रहते हैं
“इसका मतलब मैंने आपको गलत नहीं पहचाना” मोटर साइकिल सवार बोला
छज्जन मियाँ कुछ गंभीर होकर बोले, “आदमी आप समझदार लगते हैं
“अजी बस थोड़ा बहुत आप जैसे समझदारों के साथ रह-रहकर समझदारी आ गई वैसे एक बात तो बताइए” मोटर साइकिल सवार ने पीछे मुँह करके छज्जन मियाँ से पूछा
छज्जन मियाँ उत्सुक हो गए, “हाँ हाँ अमाँ एक क्यों दो सवाल पूछिए
“दो नहीं बस एक ही सवाल है आपसे” मोटर साइकिल सवार बोला
छज्जन मियाँ ने गंभीरता का आवरण धरा, “चलिए तो एक ही पूछिए
“आप इतने मजेदार इंसान हैं फिर भी आपकी पुलिसवालों के साथ झड़प क्यों हो गई? आप उनसे प्यार से भी तो निबट सकते थे?” मोटर साइकिल सवार ने अपना सवाल पूछ ही डाला
छज्जन मियाँ को पुलिसवालों द्वारा उनके गालों पर जड़े गए चांटे फिर याद आ गए, “अमाँ प्यार से तो तभी निबटते जब पुलिसवाले निबटने देते
“अजी आपने प्यार से निबटने की कोशिश ही नहीं की होगी” मोटर साइकिल वाले ने अपनी ठोस राय रखी
छज्जन मियां मुँह बनाते हुए बोले, "हुजूर आप जो भी समझें, लेकिन ये पुलिसवाले होते बहुत कमीने हैं। इनमें इंसानियत नाम की कोई चीज नहीं होती।"
"लेकिन आप यह भी जानते होंगें कि सब उंगलियाँ बराबर नहीं होती।" मोटर साइकिल सवार ने उन्हें समझाते हुए बोला।
 "अरे जाने भी दीजिए। सभी पुलिसवाले एक नंबर के हरामी होते हैं। अच्छा यहीं रोक लीजिए यहाँ से कुछ दूर ही अपना घर है।" मोटर साइकिल से उतरकर "देखिए हमारा नाम छज्जन मियां है। दरिया गंज में अपनी औजारों की एक छोटी दुकान हैं। कभी खिदमत का मौका ज़रूर दीजिएगा। आप बहुत भले आदमी लगते है। वैसे आपका नाम क्या है?" 
मोटर साइकिल सवार बोला, "जी मेरा नाम कमीना है। वैसे आप मुझे हरामी भी कह सकते हैं।"  
छज्जन मियां चौककर बोले, "अमाँ यार मजाक अच्छा कर लेते हैं।" 
मोटर साइकिल सवार हँसते हुए बोला, "मजाक नहीं कर रहा हूँ। चूँकि मैं भी एक पुलिसवाला हूँ और आपके लिए पुलिसवाले कमीने और हरामी ही तो हैं।"

इतना सुनते ही छज्जन मियां ने झेंपते हुए अपनी नज़रें झुका लीं।

सुमित प्रताप सिंह
इटावा, नई दिल्ली, भारत 
*चित्र गूगल बाबा से साभार 

Saturday, September 27, 2014

कहानी : नकेल

    राधिका जी के सामने अख़बार पड़ा था। ख़बर कल दोपहर की थी। यह खबर  उन्ही के शहर की एक दुर्घटना की थी। विचलित थी वह , अख़बार की  खबर  से नहीं बल्कि वह दुर्घटना उनके सामने ही घटी थी। कल दोपहर बाद जब वह भोजन के पश्चात घर से अपने ऑफिस आने को निकली थी कि राह में एक आवारा सांड ने एक मोटरसाईकल चला रहे युवक को टक्कर मार दी। टक्कर इतनी जोर से थी कि युवक तेजी से आती एक जीप से टकरा गया। जीप युवक को कुचलते हुए थोड़ी दूर जा कर रुकी लेकिन  देखते ही देखते एक घर का चिराग बुझ गया। भीड़ इक्क्ठी हो गई।
      लोगों  ने जब राधिका जी की कार देखी तो उनकी कार को घेर लिया। कुछ लोगों ने नारे भी लगाने शुरू कर दिए। राधिका नगरपालिका अध्यक्ष  थी तो लोगों का रोष दिखाना स्वाभाविक ही था। वह परेशान हो उठी कि वह अब लोगों को क्या जवाब दे। आवारा पशु तो सच में ही परेशानी के  कारण बनते  जा रहा था।
      " मैडम ! गाड़ी आगे बढ़ा दूँ क्या !!" ड्राइवर ने उनसे पूछा।
 " नहीं रोको गाडी को , मुझे बात करने दो और बच्चे को देखने दो। "
तब तक युवक के परिवार के कुछ लोग आ गए थे। राधिका जी गाडी से उत्तर कर भीड़ से जगह बनाती हुई युवक के शव तक पहुंची। देख कर आंसू ना रोक सकी।
     " मैडम ! घड़ियाली आंसू ना बहाओ और शहर के हालात पर नज़र डालो !! यहाँ हर रोज़ एक -दो ऐसी ही दुर्घटना होती है। " भीड़ में से किसी ने कहा।
     वह किसी तरह युवक के परिज़नों को सांत्वना देकर और लोगों को कुछ कर ने का आश्वासन दे कर कार में बैठ कर ऑफिस आ गई। ऑफिस में मन तो नहीं लगा लेकिन मन का क्या ? लगे या न लगे !जिम्मेदारियों से भाग तो नहीं सकती थी ! वह सोचने लगी कि आखिर यह समस्या कैसे सुलझेगी। उन्होंने कुछ समाज सेवी  संस्थाओं को सम्पर्क किया और उनके प्रधान को  अगले दिन आने का आग्रह किया।
    अगले दिन  शहर के कुछ सामाजिक संस्थाओं  के प्रधान और पार्षदों के साथ  उनकी मीटिंग थी। सबसे पहली चिंता यह कि  शहर में  ये पशु आते कहाँ से हैं और गौशालाओं में इनका प्रबंधन क्यों नहीं हो रहा क्यों ये सड़कों पर आवारा भटकने को छोड़ दिए जाते हैं।
    गौशाला प्रबंधक बोले , " मैडम ये पशु गाँव से लोग रातो - रात शहर की सीमा में छोड़ जाते है।क्यों कि  गाँव में इनके लिए कोई भी उचित प्रबंध ही नहीं है। इनमे से कुछ पशु शहर में आ जाते हैं और कुछ वहीँ सड़क के साथ लगते खेतों में चले जाते हैं। वहां से हड़काए जाने पर वे सड़कों पर टहलते -भागते दुर्घटना का कारण बनते हैं। ऐसे ही ये शहर में भी दुर्घटनाओं के कारण बनते हैं। जहाँ तक गौशाला में इनको रखने की बात है तो वहां पहले से ही पशु बहुत अधिक संख्या में हैं तो और पशु रखना संभव ही नहीं है। "
  "  लेकिन  इन पशुओं की संख्या बढ़ती क्यों जा रही है ? एक दिन तो ऐसा होगा की पशु अधिक और इंसान काम नज़र आएंगे यहाँ ! " सवाल फिर से रखा गया।
" देखिये पुराने ज़माने में बैलगाड़ी होती थी।  बैलों को हल चलाने के लिए काम लिया जाता था। बछड़ों को उनके जन्म के साथ तय कर दिया जाता था कि कौनसा बछड़ा बैल बनाया जायेगा और कौनसा सांड बना कर प्रजनन के लिए तैयार किया जायेगा। दोनों का  अलग तरीके से खान -पान होता था। बैल बनाये जाने वाले बछड़ों की नाक में समय रहते ही नकेल डाल दी जाती थी। जिस कारण  वे सधे हुए सीधे चल सकें।
   लेकिन अब मशीनों अंधानुकरण  ने सारी  व्यवस्था ही बिगाड़  दी है । छोटे से छोटा किसान भी हल चला कर नहीं बल्कि आधुनिक मशीनों से खेती करना चाहता है। चाहे उसे वे सभी साधन किराये पर ही क्यों ना लेना पड़े। ऐसे में किसान पर आर्थिक भार हो जाता है। वह कर्ज़दार हो कर कई बार प्राण घातक कदम भी उठा लेते हैं।
    किसानअनपढ़ है तो जागरूक नहीं है घर में सस्ती खेती का साधन उपलब्ध होते हुए भी महंगी मशीनो की तरफ भाग रहा है। " एक सामाजिक संस्था के प्रधान जी कह रहे थे।
 " सही बात है आपकी !  गायों को दूध के लिए पाल ली जाती हैं और बछड़ों को खुला छोड़ दिया जाता है जो एक दिन आवारा सांड बन लोगों के लिए मुश्किल पैदा करते हैं। " राधिका जी ने समर्थन किया।
" गाँव ही क्यों शहर में भी तो यही हाल है ! कई लोग गाय आदि रखते है , दूध दुह कर दिन में खुला छोड़ देते है। गलियों में आवारा घूम कर शाम को फिर से ठिकाने पहुँच जाती है। "
 " हाँ जी सच है ! और ये भी सच है कि कई धर्म -कर्म करने वाले लोग गली -चौराहों पर चारा डलवाते हैं। अपने घरों के आगे उनके लिए पीने का पानी के लिए व्यवस्था करते हैं। लेकिन ये वह नहीं जानते की ऐसा करके वे ' रक्षा में हत्या 'वाली कहावत को चरितार्थ ही करते हैं। "
   " और नहीं तो क्या ! इस तरह ही तो ये एक जगह जमा हो कर लड़ते हैं या बीच राह में खड़े हो जाते हैं। "
" हाँ , समस्या बहुत गंभीर है। लेकिन हर समस्या का हल तो होता ही है। और इसी समस्या का हल करने में मेरा सहयोग कीजिये। " राधिका जी ने कहा।
" जी हाँ !! हल क्यों नहीं है। लेकिन जब हर काम सरकार पर थोप दिया जाये और अपने -अपने कर्तव्य हर नागरिक भूल जाये  तो हमें हल मिल ही नहीं सकता।"
" हाँ नागरिकों का जागरूक होना भी जरुरी है। "
" अभी तो हमारे पास इन आवारा पशुओं की समस्या से निजात पाने की प्राथमिकता है। सबसे पहले तो बाहर से जो पशु हमारे शहर में छोड़े जाने पर रोक लगनी चाहिए। इसके किये हर नाके  पर पुलिस की व्यवस्था होनी चाहिए। दूसरी बात ये कि शहर वासी हर कहीं पशुओं के लिए चारा और पानी की व्यवस्था ना करें। इसके लिए नियत जगह गौशाला है। जो भी शहरवासी अपने घरों में पशु रखे वह नगरपालिका से लाइसेंस लें और उनके पशु शहर आवारा घूमते हुए पकडे जाने पर सजा का या जुर्माने का कड़ा प्रावधान रखा जाय। "
" देखिये राधिका जी ! मेरे पास एक बहुत बड़ा प्लाट खाली है। जब तक मैं वहां निर्माण कार्य ना करवाऊँ तब तक वहां आवारा  पशुओं को रखा जा सकता है। लेकिन उनके चारा -पानी की व्यवस्था आपको ही करनी होगी। " एक  सज्जन ने कहा तो राधिका जी को राहत  सी महसूस हुई।
  उन्होंने मान लिया।लेकिन यह समस्या का हल तो नहीं था। बस फ़ौरी तौर पर राहत थी। जब तक आम जन अपने कर्तव्य नहीं समझेगा वह ही क्यों , कोई भी क्या कर सकता है।लेकिन उम्मीद पर ही दुनिया कायम है।
   उस दिन मौसम बादलों की उमस भरा था। शाम तक बादल बरस गए। राधिका जी का मन और आसमान दोनों ही हलके से हो गए।
   शाम को अपनी बालकॉनी से हलकी फुहार का आनंद ले रही थी राधिका जी कि एक शोर ने उनका ध्यान भंग कर दिया। कई  मोटर बाइक सवार तेज़ स्पीड में विचित्र से  हॉर्न बजाते हुए और हो-हल्ला मचाते हुए  गली से गुज़रे  थे।  ये अभी युवा होते बच्चे थे।
   दिशाहीन बच्चे ! राधिका जी ने तो यही सोचा कि ये दिशाहीन बच्चे ही हैं। इनको नहीं मालूम कि इन्हे क्या करना है। माता-पिता अपनी दुनिया में व्यस्त , बच्चे अपनी दुनिया में। आधुनिक सुख सुविधाएं बच्चों को अकर्मण्य और दिशाविहीन कर रही है। वे चिंतित थी कि  देश का भविष्य यूँ सड़कों पर आवारा घूम कर लोगों की परेशानी का कारण  बन रहा है।उनको दुःख होता था कि ये भटके हुए बच्चे ही दुष्कर्म जैसा कदम उठा लेते हैं।
उनको अपना जमाना याद आया कि उनके पास एक दिशा थी कि उन्हें भविष्य में क्या करना है और क्या बनना है और यही दिशा अपने बच्चों के सामने भी रखी।
      आज कल बच्चों को क्या होता जा रहा है। जिन बच्चों के सामने उनका लक्ष्य हैं वे तो अपनी मंज़िल की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। जिनका कोई लक्ष्य नहीं वे परेशानी का कारण  बनते जा रहे हैं। और यही खाली दिमाग शैतानी कर जाता है कि ' लम्हों ने खता  की है सदियों ने सज़ा पाई ' , वाली बात हो जाती है।
    वह सोच रही थी कि इतनी धार्मिक संस्थाए है जो सभाएं करती है ,लोगों पर कृपा बरसाती है । वे अगर स्कूलों में सप्ताह में दो दिन भी एक -एक घंटा दे और बच्चों में सुविचार और सोहार्द्य पैदा करें तो कितना अच्छा होगा।
    राधिका जी  की रोज़ की आदत है की वह सुबह उठ कर गायत्री मन्त्र की सीडी लगा देती है। उसी दौरान उनके पोता -पोती भी स्कूल के लिए तैयार हो रहे होते हैं। एक दिन उनको सुखद आश्चर्य हुआ कि उनका पोता भी अपना काम करते हुए गायत्री मन्त्र गुनगुना रहा था।बच्चे कच्ची मिट्टी होते हैं उन पर असर भी होता है। जैसा माहोल देंगे वैसे ही बच्चे बनेंगे।
    " माँ ! आरती का समय हो गया चलिए। " बहू  ने कहा तो उनकी तन्द्रा भंग हुई। आरती करते हुए उन्होंने सोचा कि बालकों को भी सही दिशा निर्देश देना भी जैसे नकेल डाल देना ही तो हैं। सही समय पर सही सलाह -मार्ग दिखाया जाय  तो वे क्या नहीं कर सकते।   वह अगले दिन कुछ ऐसी ही संस्थाओं और स्कूलों से संपर्क साधेगी। सोच कर मन हल्का सा हुआ उनका। लेकिन मन शांत तो तभी होगा जब सब कुछ सही तरीके से समस्याएं हल हो जाएँगी। परन्तु क्या इसप्रकार उनके अकेले  सोचने से हल होगा ! वह तो यही सोचती है कि  हां ! क्यों नहीं होगा ! वह एक बहुत लोगों की सोच बदलेगी तो दायरा बढ़ता ही जायेगा। वह पहल करने का दृढ़ -निश्चय कर चुकी थी।
 
उपासना सियाग
अबोहर, पंजाब 

Wednesday, September 17, 2014

प्रकृति से छेड़छाड़

    
   जंगल के बिल्कुल किनारे बाले तालाब पर लगे बरगद के पेड़ पर उठने वाली भिनभिनाहट ने पेड़ के बाकी पक्षियों को परेशान कर दिया ।मामला अत्यंत गंभीर सा था सो सभी कौतुहल बस मधुमक्खी के छत्ते की तरफ देख रहे थे छत्ते की सभी मधुमक्खियाँ अपने छत्ते से बाहर इक्कठे होकर नारे बाजे कर रहीं थीं।......हमारी मांगे पूरी करो .......हम सब एक है........मधुमक्खी एकता जिंदाबाद.......
     आवाज सुनकर रानी मक्खी तुरंत अपने घर से बाहर आ गयी उसने अपने जीवन में पहली बार ऐसा नजारा देखा था सो समझ में नहीं आ रहा था कि समस्या क्या है और यह क्या हो रहा है और आखिर ये सब लोग कर क्या चाहते हैं
          .......क्या समस्या है ....ये सब क्या हो रहा है......रानी मक्खी ने कड़ककर पुछा।सभी मधुमक्खी एक सुर में बोली आपकी मनमानी नहीं चलेगी.....हमारी मांगे पूरी करो।
    रानी मक्खी इतनी सारी आवाज एक साथ सुनकर हैरान रह गयी और उसने चिल्लाकर कहा ......एक एक करके बोलो......सभी मक्खियाँ फिर चिल्लाने लगी ।क्रोधित रानी मक्खी ने आदेश दिया कि केवल एक मक्खी ही बात करेगी...कुछ देर के लिए सन्नाटा खिच गया और खुसुर पुसुर के बाद भीड़ से एक बुजुर्ग मक्खी ने बाहर आकर रानी मक्खी को नमस्कार कर बात सुरु की......हम जबसे पैदा हुई है हमारा सारा काम एक ढर्रे पर आपके द्वारा दिए गए आदेश पर चल रहा है जिसमे कभी कोई बदलाव नहीं किया गया श्रमिक मक्खियाँ प्रतिदिन सुबह से शाम तक फूलों से पराग इकट्ठा करतीं है और सैनिक मक्खियाँ बस छत्ते में पड़ी पड़ी आराम फरमाती रहती है हमें कोई छुट्टी भी नहीं दी जाती है हमारे साथ हमारी पत्नियों से भी उतना ही काम लिया जाता है इसलिए हमारे काम में बदलाव किया जाए और जिस प्रकार मनुष्यों में समानता का अधिकार दिया गया है उसी तरह हमें भी अधिकार मिलने चाहिए।
रानी मक्खी की समझ में आ गया कि कोई इंटेलीजेंट मक्खी मनुष्य की सामाजिक व्यवस्था से प्रेरित होकर नेता बन गयी है और उसी के इशारे पर ये सब हो रहा है लेकिन बात अधिक ना ख़राब हो सो उसने तुरंत आदेश किया कि आप में से कोई पांच मक्खियाँ समित बनाकर अपनी सारी मांगे बताएं और अभी सब लोग अपने अपने कोटर में जाकर आराम करें।
     आदेश मिलते ही सभी मक्खियों ने दो श्रमिक मक्खियों और दो सैनिक मक्खियों और एक महिला मक्खी को मिलाकर समिति तैयार कर ली और उसी दिन शाम को रानी मक्खी के पास पहुच गए ।
रानी मक्खी बोली....बताओ क्या चाहते हो तुम सब ....हम चाहते है कि हमारे काम में अदला बदली हो ,पहला प्रस्ताव श्रमिक मक्खी की तरफ से आया ....क्या सैनिक माक्खियों को ये मंजूर है रानी ने पूछा...सैनिक मक्खियों के मन में भी बाहर घुमने की ख्वाहिश थी सो उन्होंने तुरंत हामी भर दी। ...और क्या चाहिए......साल में कम से कम एक महीने का अवकाश और महिलाओं को बच्चों की देख रेख के लिए 3 महीने का विशेष अवकाश महिला मक्खी ने तुरंत कहा ..........रानी मक्खी जानती थी कि अभी सब विरोध में है सो उसने तुरंत हां कर दी।
अगले दिन से मधुमक्खी समाज की व्यवस्था नए नियमों के अनुसार प्रारंभ हुई सैनिक मक्खियाँ शहद के लिए पराग लेने जंगल चली गयीं और श्रमिक मक्खियों ने सुरक्षा सम्हाल ली मादा मक्खियों ने प्रसूति कालीन अवकाश का आवेदन लगा दिया और छत्ते में आराम फरमाने लगीं। शाम को जब दिन भर के काम की समीक्षा हुई तो पता चला कि आज रोज के मुकावले पराग आधा ही इकट्ठा हुआ है जब कारण पुछा तो पता चला कि सैनिक मक्खियों को पराग वाले फूलों की पहचान ही नहीं है और पराग के चक्कर में घूमते घूमते थक कर चूर हो गयी है श्रमिक मक्खियाँ मंद मंद मुस्करा रही थी ।
   प्रतिदिन लगभग यही क्रम चलने लगा ।पराग कम इकट्ठा होने से शहद का उत्पादन कम होने लगा उधर श्रमिक मक्खियों दिन भर पड़े पड़े सोती रहती थी सो शहद चोरी की घटनाएँ बढ़ने लगी और सैनिक मक्खियाँ ज्यादा बीमार पढ़ने लगीं। एक महीने के बाद छत्ते का शहद उत्पादन घटकर 40 प्रतिशत रह गया और खुद के खाने लायक शहद भी नहीं बचा ।श्रमिक मक्खियों की कमर छत्ते में पड़े पड़े अकड़ गयी थी छत्ते की पूरी व्यवस्था तहस नहस हो चुकी थी पर रानी मक्खी ने कोई हस्तक्षेप नहीं किया सभी परेशान थे पर रानी मक्खी से कौन कहे लेकिन एक दूसरे पर आरोप लगाने लगे ।
    एक महीने बाद रानी मक्खी ने सभी की बैठक बुलाई और पूछा ......कैसा लग रहा है नए काम से .....सभी चुप थे ......सुना है छत्ते में खाने लायक भी शहद नहीं बचा है ,रानी ने प्रश्न पूछा तो सभी एक दूसरे पर इल्जाम लगाने लगे।
      रानी ने बात शुरू की....... मुझे पता है कि कारण क्या है .... प्रकृति ने हमें विशेष कार्यो के लिए बनाया है सैनिक मक्खियाँ पराग नहीं चुन सकती है इसके लिए उन्हें सिखाना पड़ेगा और उसमे काफी वक़्त लगेगा........इसी प्रकार श्रमिक मक्खियाँ भी सुरक्षा नहीं कर सकती है क्यूंकि उन्हें सुरक्षा के तौर तरीके नहीं पता है ....मादा मधुमक्खियाँ अपनी जिम्मेदारी से भागना चाहती है इसलिए उन्होंने छुट्टी ले ली है ......हम मनुष्य नहीं है हमारी सामाजिक व्यवस्था प्रकृति की देन है उसमे थोडा सा भी परिवर्तन हमारे लिए नुकसानदायक साबित होगा .....मनुष्य की प्रकृति के साथ छेड़छाड़  से वैसे भी हमारा अस्तित्व खतरे में है और आप सब उनकी व्यवस्थाओं से प्रेरित हो रहे है ।हम सब प्राकृतिक व्यवस्थाओं में ही भरोसा रखते है और उसी से ही हमारा जीवन सुखमय रहेगा
कल से सभी अपने अपने कार्य पूर्व की व्यवस्था के अनुसार ही करें। सभी मधुमक्खियों ने सहमति प्रदान की और अपने कार्य में लग गयीं।

Sunday, March 2, 2014

गौना (कहानी)


  माज सेवा का चाव लिए एक दिन कुछ मित्रों के साथ मिलकर हमने भी एक एन.जी.ओ. रजिस्टर्ड करवा लिया. अब हमारे सामने प्रश्न यह था, कि अपने एन.जी.ओ. के द्वारा पहला भला काम क्या किया जाए? हमने यह निश्चय किया कि अपने एन.जी.ओ. की शुरुआत किसी ऐसे भले काम से करेंगे जो वास्तव में भला हो. हमने अपने सभी मित्रों, नाते-रिश्तेदारों को इस विषय में सूचित करके इस बारे में उनकी नेक राय माँगी, लेकिन भले काम के बारे में सुनकर वे राय देने से शायद इसलिए डर गए, कि कहीं उनकी राय के साथ हम उनकी जेब भी ढीली न करवा दें. सो उन्होंने हमें यह राय दी कि फालतू चक्करों में पड़ने के बजाय अपने काम पर ध्यान दें और जीवन जैसा चल रहा है उसे वैसा ही चलने दें. यह एन.जी.ओ. वगैरह चलाना नेताओं और बड़े लोगों काम है और हम मिडिल क्लास वाले इस लायक नहीं हैं, कि एन.जी.ओ. जैसी बड़ी चीज के विषय में सोचें भी. उनकी मिडिल क्लास सोच पर गुस्सा भी आया और हँसी भी. अरे भई अब क्या अच्छा काम करने के लिए भी हाई क्लास या मिडिल क्लास के होने या न होने के बारे में भी सोचना पड़ेगा? 
सब ओर से निराशा मिलने के बाद  हमने फैसला किया कि अब हम स्वयं ही यह निर्णय करेंगे, कि एन.जी.ओ. का शुभारंभ किस भले कार्य से किया जाए. आख़िरकार दो दिन की चर्चा में हमारी मेहनत रंग लाई और हमने अपने एन.जी.ओ. की ओपनिंग के लिए एक भला कार्य चुन लिया. हमने निर्णय लिया कि हम अपने एन.जी.ओ. के द्वारा  किसी गरीब कन्या का विवाह करवाएँगे. हमने अपने खास-खास रिश्तेदारों में इस बारे में विधिवत सूचना भिजवा दी और उन सबसे विनम्र आग्रह किया कि किसी गरीब कन्या की तलाश करें ताकि इस नेक कार्य को करके हमारे एन.जी.ओ. का शुभारंभ हो सके.
अगले दिन ही नाना जी का फोन आया कि उन्होंने एक गरीब कन्या की खोज कर ली है. वह नाना जी के घर के सामने भाड़ भूनने वाले भुज्जी की लड़की थी.  भुज्जी, जिसका नाम संतोष था और गाँव में उसे सब प्यार से संतोषा कहते थे, ने बेटा पाने की लालसा में लड़कियों की कतार लगा दी थी. छः लड़कियाँ होने के पश्चात आखिर उनकी मनोकामना पूर्ण हुई और उसके घर एक बेटा पैदा हुआ. अब संतोषा के घर में बूढ़े माँ-बाप, पत्नी, बच्चों  और स्वयं को जोड़कर एक क्रिकेट टीम तैयार हो चुकी थी, जिसने उसके घर के बजट को क्लीन बोल्ड कर दिया था. वो तो नाना जी के घर में नानी और मामियों के काम में उसकी लड़कियाँ सहायता कर देती थीं और बदले में नाना जी की ओर से उसके घर के गुजारे लायक मदद मिल जाती थी. जब नाना जी को फोन पर गला फाड़ कर हमारी शुभ काम करने की योजना के बारे में संतोषा ने सुना, उसने नाना जी के तब तक पैर नहीं छोड़े जब तक कि उन्होंने इस बात का वादा नहीं कर दिया कि हमारे एन.जी.ओ. का शुभारंभ उसकी बड़ी बेटी के विवाह से ही होगा.
हालाँकि इस बारे में शायद पूरा गाँव ही सुन चुका होगा, क्योंकि नाना जी फोन पर इतनी तेज आवाज में बात करते हैं, कि उनकी बिटिया यानि कि मेरी माँ भी यह अनुभव करने लगती हैं वो अपने दामाद यानि कि मेरे पिता के मुकाबले फोन पर कुछ ज्यादा ही चीखते हुए बतियाते हैं. अब जाने नाना जी के कान में सुनने में कोई दिक्कत है या फिर वो फोन के दूसरी ओर बात कर रहे इंसान को ही बहरा समझते हैं.  
नाना जी ने हमें आदेश दिया कि जल्द से जल्द इस शुभ कार्य को अंजाम किया जाए. हमारी सबसे छोटी मौसी का फोन आया कि वह भी इस शुभ कार्य में हमारे साथ रहेंगी और उनसे बात करने पर पता चल गया कि वो केवल विवाह मंडप पर ही हमारे साथ रहेंगी. मामाओं व मामियों ने भी इस भले कार्य में हमारा पूरा साथ देने का वादा किया. अब यह पता नहीं चल पाया कि वे कितना साथ देंगे. वैसे हमने उनके साथ के प्रकार के बारे में ज्यादा पूछना भी उचित नहीं समझा, क्योंकि हमें लगा कि वे सब मन से भी हमारे साथ रहें तो भी कम से कम कुछ सहारा तो मिलेगा ही.
जहाँ हमारे रिश्तेदार इस कार्य में सहयोग करने को उत्सुक हो रहे थे, वहीं हमारे एन.जी.ओ. के एक सदस्य, जो अपने विचारों से विद्रोही स्वाभाव का था, के प्रभाव में आकर अन्य सदस्य हमारे विरोध पर उतर आए. उन सबने मिलकर तर्क दिया कि एन.जी.ओ. का आरंभ किसी छोटे-मोटे भले कार्य के माध्यम से होना चाहिए न कि ऐसे भारी-भरकम बजट वाले काम से. हम गंभीर सोच में पड़ गए, लेकिन हमारी टीम, जिसमें अब केवल मैं और मेरी माँ ही बचे थे, ने फैसला लिया कि एक बार जिस काम को करने का फैसला कर लिया है तो उसे पूरा करके ही दम लेंगे. एन.जी.ओ. के सदस्यों के अलावा हमें अपने पारिवारिक सदस्यों का विरोध भी झेलना पड़ा. पिता जी और बड़े भाई को जब हमारी योजना के बारे में पता चला तो उन्होंने कहा कि यहाँ क्या अनाप-शनाप पैसा आ रहा जो इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठा ली.
चारों ओर से होनेवाले विरोध से हमारा उत्साह कुछ पल के लिए भंग हो गया, लेकिन शरीर में राजपूती खून ने उबाल मारा और “रघुकुल रीत सदा चलि आई / प्राण जायें पर वचन न जाई” दोहे को दोहराते हुए हमने निर्णय किया कि इस भले कार्य को हम करके ही रहेंगे चाहे कोई बुरा माने या भला. एन.जी.ओ. के बाकी सदस्यों को जब हमारे इस दृढ फैसले के बारे में पता चला तो उन्होंने कोई भी सहायता करने से साफ़ इंकार कर दिया और पिता जी और बड़े भाई से किसी मदद की उम्मीद हमने कभी की ही नहीं थी. हम हमें जो कुछ करना था खुद ही करना था.
माँ ने अपनी बचत पोटली और मैंने अपनी एक्स्ट्रा पे को इस भले कार्य में होम करने का निर्णय किया. अपनी आर्थिक तैयारी के उपरांत हमने नाना जी से संतोषा की बेटी के विवाह के लिए शुभ मुहूर्त निकलवाने के लिए कहा. नाना जी ने विवाह का मुहूर्त निकलवा कर आदेश दिया, कि विवाह तिथि से एक सप्ताह पहले ही विवाह की तैयारी करवाने के लिए हम उनके घर हाज़िर हो जायें. 
हम माँ और बेटे विवाह की तय तिथि से एक सप्ताह पहले ही  नाना जी की हवेली में पहुँच गए. हमें वहाँ सभी मौसा-मौसियाँ अपने बाल-बच्चों के साथ उपस्थित मिले. पूरे घर में उत्सव सा माहौल था. हमारे लिए उत्सव का माहौल कुछ देर बाद ही मायूसी से भर गया. कारण यह था कि नाना जी ने संतोषा की बेटी के विवाह का जो बजट बनाया था वह मेरी एक्स्ट्रा पे और माँ की बचत से कई गुना अधिक था. हमने नाना जी से हिम्मत जुटाकर यह पूछने की हिम्मत की, कि हम गरीब कन्या का विवाह करने जा रहे हैं या फिर राजसी घराने की किसी लाडली का? यह सुनते ही नाना जी भड़क उठे और बोले कि उन्होंने आस-पास के गाँवों में इस विवाह की घोषणा कर दी है और हम संतोषा की बेटी का विवाह राजपूती आन-बान के साथ किया जाएगा. अगर ऐसा नहीं हुआ तो वो कहीं मुँह दिखाने के लायक नहीं रहेंगे.
राजपूती आन-बान पर कुर्बान होना अब हमारी विवशता बन गई थी. अब हमारे सामने यक्ष प्रश्न यह था, कि इस लंबे-तगड़े बजट के लिए धन का इंतज़ाम आखिर कैसे किया जाए? पिता जी और भाई से इस बारे में बात करना ओखली में सिर देना होता. एन.जी.ओ. के अन्य सदस्यों से कोई आस थी नहीं. हमें निराश देख हमेशा की तरह माँ की माँ यानि कि मेरी नानी जी ने संकटमोचक की भूमिका निभाई और हमें चुपचाप उधार के तौर पर विवाह में खर्च होनेवाली राशि प्रदान कर दी.
हमने राजपूती परंपरा के अनुसार संतोषा की बेटी के लिए दहेज का सामान ख़रीदा व विवाह हेतु जरूरी सामान का प्रबंध किया. आस-पास गाँवों में इस विवाह के बारे में खबर फैल गई और सभी नाना जी की तारीफों के पुल बाँधने लगे. गाँव वाले इस बात से अनजान थे कि विवाह हम अपने एन.जी.ओ. के अंतर्गत करवा रहे थे. वे तो यह समझ रहे थे कि यह सब नाना जी की कृपा से हो रहा है. हालाँकि ऐसी बात नहीं थी कि नाना जी ने कोई मदद नहीं की. नाना जी के आदेश पर घरातियों व बारातियों के भोजन में खर्च होने के लिए आटा और दाल की बोरियाँ गोदाम से निकाल कर हाज़िर कर दी गईं.
निश्चित दिन व समय पर संतोषा की बेटी का विवाह बड़े धूम-धाम से संपन्न हुआ. आस-पास के गाँवों में रहनेवाले लोग इस विवाह को कौतूहलवश देखने आए और नाना जी की जय-जयकार करते हुए वापस गए. हमने मामा की लड़की को इस विवाह की तस्वीरें खींचने के लिए उसके हाथ में कैमरा देकर नियुक्त कर दिया, ताकि वो तस्वीरें हमारे नवनिर्मित एन.जी.ओ. की ऑडिट रिपोर्ट के काम आ सकें, लेकिन उसका कैमरा अपने दादा के मूछों पर ताव देते हुए अंदाज से दूसरी ओर घूमा ही नहीं. विवाह होने के बाद संतोषा की बेटी को नम आँखों से हम सबने विदा किया. विवाहरुपी शुभ कार्य करने के दो दिन बाद ही हम वापस अपने घररुपी ठिकाने में पहुँच गए.
हम इस आर्थिक झटके से उबरने की कोशिश कर ही रहे थे, कि एक दिन नाना जी का फोन आ गया. घर की खैर-खबर पूछने के बाद उन्होंने बताया, कि उनके पास सुबह संतोषा आया था और पूछ रहा था कि बेटी का गौना करवाने की तारीख कबकी रखी जाए? नाना जी ने कहा, कि जिस प्रकार ठाट-बाट से संतोष की बेटी का विवाह हुआ था, उसी प्रकार गौना भी होना चाहिए वरना इलाके में हाल ही में बनी इज्ज़त मिटटी में मिल जायेगी. फोन रखने के बाद निराश और दुखी हो माँ मेरा और मैं उनका मुँह देखने लगा.  
कुछ देर बाद फिर से फोन की घंटी बजी. दूसरी ओर संतोषा था. वह माँ को प्रणाम करके बोला, “जीजी रचना के गौना की तारीख कब की रखी जाए?”

इतना सुनते ही माँ ने घबराकर फोन काट दिया और हम माँ-बेटे अपना-अपना सिर पकड़कर गहरी सोच में डूब गए.

सुमित प्रताप सिंह

इटावा, नई दिल्ली, भारत 

Friday, January 10, 2014

कहानी: चाय गरम

पांडे जी के बगल में बैठे यात्री ने उन्हें टोकते हुए कहा, “क्या पांडे जी आपकी चाय से कोई दुश्मनी है क्या?”
“नहीं ऐसी कोई बात तो नहीं है.” पांडे जी ने उसे समझाने की कोशिश की.
उस यात्री ने शिकायती लहजे में कहा, “तो फिर चाय के नाम से आपका मुँह क्यों उतर जाता है?”
“नहीं असल में आज मेरा चाय पीने का मन नहीं हो रहा है.” पांडे जी ने अंगड़ाई लेते हुए कहा.
अब ये साथ वाले यात्री को कौन समझाता कि पांडे जी और चाय का नाता बचपन से ही कितना अटूट रहा है. बचपन में ये कहावत थी, कि पांडे जी चाय की चम्मच पीते हुए पैदा हुए थे. उनका चाय का रिश्ता अपने बड़े भाई के माध्यम से बना था. बड़े भाई ने मजाक ही मजाक में एक दिन सात महीने के नन्हे पांडे जी को थोड़ी सी चाय क्या पिला दी, उन्होंने चाय के स्वाद से प्रभावित होकर माँ का दूध ही पीना छोड़ दिया. अब जाने यह चाय का ही प्रभाव था, जो उनके शरीर में चुस्ती सदैव विराजमान रहती थी. उनसे कुछ भी काम निकलवाना हो तो बस उन्हें बढ़िया सी कड़क चाय पिला दीजिए और पांडे जी प्रसन्न होकर काम करने को तत्पर हो जाते. बचपन से ही मेहनती होने के कारण पांडे जी अपनी पढ़ाई का खर्चा बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर निकाला करते थे. बच्चों के माँ-बाप भी यह भली-भांति जानते थे कि यदि अपने बच्चों को अच्छी तरह पढ़वाना है तो पांडे जी को चाय भी बढ़िया ही पिलानी पड़ेगी. एक बार एक बालक की माँ से भूल हो गई और उसने पांडे जी को चाय पिलाने की जरुरत नहीं समझी. उसी दिन पांडे जी ने उस बालक को ट्यूशन पढ़ाने से संन्यास ले लिया और उस बालक के माँ-बाप के लाख मनाने के बावजूद नहीं माने.
पांडे जी के माँ-बाप ने अपने बेटे की प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें सिविल सर्विस की तैयारी करने के लिए दिल्ली भेज दिया. पांडे जी बिहार से दिल्ली तो पहुँच गए, लेकिन चाय की दीवानगी ने उनका साथ नहीं छोड़ा. दिल्ली में उनके साथ सिविल सर्विस की तैयारी कर रहे उनके साथियों को उनकी चाय नामक कमजोरी का पता चल गया था और वे अक्सर उनकी इस कमजोरी का फायदा उठाते रहते थे. लड़कों के साथ-साथ लड़कियाँ भी पांडे जी का उनकी चाय नामक प्रेमिका से मिलन करवाने के बदले अपने नोट्स बनवाकर पांडे जी का बखूबी इस्तेमाल करती रहती थीं.
पांडे जी के चाय प्रेम की लोकप्रियता का आलम यह था कि अक्सर उनके मित्र चाय पार्टी का आयोजन करते रहते थे. एक बार तो ऐसी ही एक चाय पार्टी में पांडे जी के मित्रों ने चाय को राष्ट्रीय पेय बनाने की बात छेड़ दी, जिसका पांडे जी ने पुरजोर समर्थन किया.
चाय प्रेम का पांडे जी को घाटा ये हुआ कि उनकी मेहनत के बल पर उनके साथी सफल होकर अपनी मंज़िल पाते रहे और पांडे जी चाय का पल्लू पकड़े जस के तस हालत में बने रहे.
एक रोज देर रात तक पढ़ाई करते रहने के कारण पांडे जी की आँख खुलते-खुलते दोपहर हो गई. पास का चाय वाला अपनी दुकान बंद करके कहीं गायब था. सो चाय की तलब मिटाने के लिए पांडे जी कुछ दूर पर सड़क के किनारे स्थित चाय की दुकान पर चाय पीने जा पहुँचे. वहाँ युवाओं की भीड़ को देखकर उन्होंने चायवाले से उस भीड़ का कारण पूछा, तो उसने बताया कि वे युवा विपक्ष दल के हैं और सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन कर रहे हैं. अभी पांडे जी ने चाय के दो-चार घूँट ही लिए थे कि युवाओं ने पुलिस पर पत्थरबाजी आरंभ कर दी. पुलिस ने भी बदले में लाठी चार्ज कर दिया. दो-चार लाठी वहीं चाय का स्वाद लेते पांडे जी के भी पड़ गईं. लाठी खाकर युवाओं की भीड़ वहाँ से भाग ली और उनके साथ-साथ पांडे जी भी अपने कमरे की ओर भागे. पर किस्मत को शायद कुछ और ही मंज़ूर था. उनकी चप्पल टूट गई और उसे ठीक करने के लिए उन्हें रुकना पड़ा और बेचारे पुलिस की पकड़ में आ गए.
हवालात में जाने से पहले उन्होंने थानेदार के बहुत हाथ-पैर जोड़े, लेकिन वह उनकी कोई बात सुनने को तैयार नहीं हुआ. उन्होंने मित्रों के द्वारा इधर-उधर से सिफारिश भी लगवाई, लेकिन शायद उनकी कुंडली में भगवान कृष्ण के जन्म स्थान में हाज़िरी लगवाना ही लिखा था, सो जब कोर्ट में उनकी पेशी हुई तो जज साहब ने उनका जेल जाने का मुहूर्त निश्चित कर दिया. अब वे उस घड़ी को कोसने लगे जब वे चाय पीने फुटपाथ की दुकान पर पहुँचे थे और इस आफत में आ फँसे. उन्हें चाय के नाम से अब नफरत सी होने लगी थी.
उन्होंने जेल में प्रवेश किया तो पुराने कैदियों ने उनकी खिचाई शुरू कर दी. उन्हें आदेश सुनाया गया कि उन्हें सुबह-शाम अपने जेल वार्ड की लैट्रीन साफ़ करनी पड़ेगी और नियम से उसमें में झाड़ू से सफाई करनी पड़ेगी. पांडे जी ने ऐसा करने से साफ़ मना कर दिया तो कैदियों ने उनकी ढंग से मरम्मत कर डाली. अब पांडे जी का गुस्सा फूट पड़ा. उनकी आँखों से आंसुओं की धार बहे जा रही थी. रोते-रोते ही उन्होंने ऐलान कर दिया कि चाहे उनकी जान चली जाये, पर वे ऐसा गंदा काम हरगिज न करेंगे. उन्होंने साफ-साफ कह दिया कि जेल से निकलकर जेल में होनेवाली संदिग्ध गतिविधियों के बारे में अपनी जेलयात्रा नामक वृतांत में विस्तार से लिखेंगे. पांडे जी का गुस्सा देखकर पुराने कैदी नरम पड़ गए. उन्होंने पांडे जी के साथ अच्छा व्यवहार करना आरंभ कर दिया. जबकि असल बात ये थी कि जेल में नशे का धंधा करनेवाले पुराने कैदी इस बात से डर रहे थे, कि कहीं पांडे जी उनकी पोल खोलकर उनका धंधा चौपट न कर दें. धीमे-धीमे पांडे जी की सज़ा के सात दिन समाप्त हो गए. उनका जेल के कैदियों के साथ ऐसा लगाव हो गया था, कि उनसे बिछुड़ते हुए उनकी आँखें भर आईं. कैदियों ने उनसे आग्रह किया कि यदि वो अपना जेलयात्रा वृतांत लिखें तो जेल में कैदियों द्वारा झेली जा रहीं परेशानियों का जिक्र करना न भूलें. जेल के दादा टाइप के कैदियों ने उनके कान में फुसफुसाकर आग्रह किया कि वो जेल में होने वाली छोटी-मोटी चिंदी चोरी का जिक्र न करें. पांडे जी उन सबको ऐसा करने का वादा करके वहाँ से चल पड़े.
जब वो अपने कमरे पर वापस आये तो आस-पड़ोस वालों का व्यवहार उन्हें अच्छा नहीं लगा. जेलयात्रा का तमगा मिलने से पांडे जी आस-पड़ोस में चर्चा का विषय बन चुके थे. अब कुछ दिनों के लिए माहौल ठीक करने के वास्ते उन्होंने सोचा कि चलो अपने माँ-बाप के पास पटना ही घूम आया जाए.
अचानक ही उनके कान में फिर से पड़ोस के यात्री की आवाज आई, “अरे पांडे जी अब ऐसी भी क्या नाराजगी? अब हठ छोड़कर एक-एक कप चाय हो ही जाए.”
पांडे जी भी मन ही मन सोचने लगे, कि जो होना था वो तो शायद भाग्य में होना लिखा ही था. अब इस बात पर अपनी पुरानी दिलरुबा चाय से क्या खफा होना. इतना सोचकर उन्होंने अपने सहयात्रियों के हाथ से चाय का गरमागरम प्याला लेकर अपने कलेजे में उतार लिया. इतने दिनों बाद अपनी चाय नामक महबूबा से मिलकर वह स्वप्नलोक में विचरने लगे.  अचानक ही किसी ने उन्हें बुरी तरह झंझोड डाला.
वो आँख मलकर उठते हुए बोले, “कौन सा स्टेशन आ गया?”
“पटना स्टेशन आ गया है वो भी दो घंटे पहले. मैं सफाईवाला हूँ. चलो निकलो बोगी से मुझे इसकी सफाई करनी है.” सफाईवाले ने पांडे जी को हड़कते हुए बोला.
पांडे जी हैरान हो गए उन्होंने अपना सामान चारों ओर ढूँढा पर नहीं मिला. इसका मतलब था, कि साथ वाले यात्री के माध्यम से चाय नामक डायन एक बार फिर से उन्हें दगा दे गई थी. अब उन्हें चाय के नाम से नफरत के साथ-साथ डर भी लगने लगा था.
कुछ समय बाद उन्हें प्लेटफार्म पर आवाज़ सुनाई दी, “चाय गरम.”

इतना सुनना था कि पांडे जी डर के मारे बोगी की सीट के नीचे घुस गए.

सुमित प्रताप सिंह 
इटावा, नई दिल्ली, भारत 
*चित्र गूगल से साभार