सादर ब्लॉगस्ते पर आपका स्वागत है।
Showing posts with label कहानी. Show all posts
Showing posts with label कहानी. Show all posts

Tuesday, September 30, 2014

कहानी : कमीना

   ज्जन मियाँ काफी समय से सड़क पर परेशान खड़े हुए थे। वहाँ से गुजरती हुई हर गाड़ी को रोकने की उन्होंने लाख कोशिश कर ली थी, लेकिन उन्हें निराशा ही मिली। कोई भी दुपहिया, तिपहिया या चौपहिया उनकी वेशभूषा देखकर रुकने को तैयार नहीं था। ज्यों-ज्यों रात बढ़ रही थी, छज्जन मियां के दिल की धडकनें भी तेज होती जा रहीं थी। अब उन्हें यह अहसास होने लगा था, कि जितना वो सोचते थे दुनिया उससे कुछ ज्यादा ही निर्दयी थी। एक मुसीबत के मारे को कोई भी मदद करने को तैयार नहीं हो रहा था। वो सोच रहे थे, कि जाने किस घड़ी में उनसे जाने क्या पाप हुआ होगा, जो आज उन्हें यह दिन देखना पड़ रहा था। समय गुजरने के साथ-साथ रात अँधेरे की चादर ओढ़ते हुए और काली और घनी होती जा रही थी। जैसे-जैसे रात बढती जा रही थी, वैसे-वैसे सड़क सुनसान होती जा रही थी। अब छज्जन मियाँ डरते-डरते ऊपरवाले को याद करने लगे। धीमे-धीमे वो विश्व में मौजूद ईश्वर के सभी रूपों का स्मरण करने लगे। आखिर उनकी मेहनत और दुआएँ रंग लाईं और एक मोटर साइकिल उनकी मदद  के लिए उनके पास आकर रुकी। उन्होंने ऊपरवाले का शुक्रिया किया और मोटरसाइकिल पर सवार हो गए।
अब छज्जन मियां तनावमुक्त हो मोटर साइकिल पर पीछे बैठ चले जा रहे थे।
तभी मोटर साइकिल सवार ने उनसे पूछा, "आप इतनी रात को यहाँ क्या कर रहे थे?"
ऐसा लगा कि उस आदमी ने  छज्जन मियां  की दुखती रग पर हाथ रख दिया हो। छज्जन मियाँ नाराजगी और गुस्से के मिले-जुले भाव संग बोले, "क्या बताएँ हुजूर दुकान बंद करके घर को आ रहे थे, पर रास्ते मे पुलिसवाले मिल गये और हमारी गाड़ी ही जब्त कर ली।" "पुलिसवालों ने आपकी गाड़ी क्यों जब्त कर ली?" मोटर साइकिल सवार ने पूछा। 
छज्जन मियाँ अपनी टोपी संभालते हुए बोले, "अम्माँ क्या बताएँ जरा जल्दी में थे, सो लाल बत्ती पार कर ली थी और अपन हैलमेट तो कभी पहनते नहीं है सो पकड़ लिया हमें।"
मोटर साइकिल सवार बोला; अरे पकड़ लिया तो चालान कटवा लेते। कम से कम गाड़ी तो जब्त न होती।"
"चालान और हमारा। अरे हम तो उलझ गये उनसे हमने साफ़ कह दिया कि एक फूटी कौड़ी नहीं देंगे उनको और उन्हें नौकरी खराब करवाने की धमकी भी दे डाली। बदले में उन नामुरादों ने हमारे गाल पर दो-चार झापड़ रसीद कर दिये और हमारी गाड़ी भी जब्त कर ली। खैर उन्हें भी हम देख लेंगे।" इतना कहकर छज्जन मियां दुखी हो अपने गालों पर हाथ फेरते हुए सहलाने लगे।
"मतलब आपने गलती की और उसकी आपको सजा भी मिली।" मोटर साइकिल सवार हँसते हुए बोला। 
छज्जन मियाँ झल्लाते हुए बोले, “गलती अमाँ जल्दबाजी में रेड लाइट देखता कौन है?”
“अगर सभी आपकी तरह सोचने लगेंगे तो सड़कें तो मछली बाज़ार बन जाएँगी” मोटर साइकिल सवार ने मुस्कुराते हुए कहा
छज्जन मियाँ खिलखिला उठे, “अमाँ आप ने भी उदारहण तो जबरदस्त दिया मछली बाज़ार हा हा हा
“इसमें हँसने की बात नहीं बल्कि गौर करने वाली बात है हम सबको जिम्मेदार शहरी बनना चाहिए अगर हम सब सड़क पर अनुशासन से चलेंगे तो सड़कें अपने आप सुरक्षित रहेंगी” मोटर साइकिल सवार ने उन्हें समझाया
छज्जन मियाँ ने उनकी बात में पहली बार रूचि दिखाई, “मियाँ आप बात तो पते की कह रहे हैं
“एक और बात पर ध्यान दीजिए आप हेलमेट पहनने से ऐतराज करते हैं हेलमेट से आपके सिर की सुरक्षा होती न कि पुलिसवालों की सोचिये किसी दिन आपका किसी गाड़ी से एक्सीडेंट हो जाए और आपका बिना हेलमेट पहने सिर सड़क से टकराएगा तो वह तो तरबूज की तरह फट जाएगा” मोटर साइकिल सवार ने अपनी राय रखी
छज्जन मियाँ थोड़े से डर गए, “हुजूर एक तो ये रात वैसे ही इतनी भयानक है ऊपर से आप और हमें डराए जा रहे हैं
“अजी हम डरा कहाँ रहे हैं? आप ही बिना बात के डरे जा रहे हैं” यह कहकर मोटर साइकिल सवार ने ठहाका लगाया
छज्जन मियाँ ने भी उसकी हँसी में साथ दिया, “वैसे आप इंसान हैं मजेदार
“आज शायद आपकी संगत का असर हो गया है” उसने छज्जन मियाँ को खुश करने की कोशिश की
छज्जन मियाँ शरमाते हुए बोले,”हाँ वो तो है हमारे साथ वाले अक्सर इस डायलोग को इस्तेमाल करते रहते हैं
“इसका मतलब मैंने आपको गलत नहीं पहचाना” मोटर साइकिल सवार बोला
छज्जन मियाँ कुछ गंभीर होकर बोले, “आदमी आप समझदार लगते हैं
“अजी बस थोड़ा बहुत आप जैसे समझदारों के साथ रह-रहकर समझदारी आ गई वैसे एक बात तो बताइए” मोटर साइकिल सवार ने पीछे मुँह करके छज्जन मियाँ से पूछा
छज्जन मियाँ उत्सुक हो गए, “हाँ हाँ अमाँ एक क्यों दो सवाल पूछिए
“दो नहीं बस एक ही सवाल है आपसे” मोटर साइकिल सवार बोला
छज्जन मियाँ ने गंभीरता का आवरण धरा, “चलिए तो एक ही पूछिए
“आप इतने मजेदार इंसान हैं फिर भी आपकी पुलिसवालों के साथ झड़प क्यों हो गई? आप उनसे प्यार से भी तो निबट सकते थे?” मोटर साइकिल सवार ने अपना सवाल पूछ ही डाला
छज्जन मियाँ को पुलिसवालों द्वारा उनके गालों पर जड़े गए चांटे फिर याद आ गए, “अमाँ प्यार से तो तभी निबटते जब पुलिसवाले निबटने देते
“अजी आपने प्यार से निबटने की कोशिश ही नहीं की होगी” मोटर साइकिल वाले ने अपनी ठोस राय रखी
छज्जन मियां मुँह बनाते हुए बोले, "हुजूर आप जो भी समझें, लेकिन ये पुलिसवाले होते बहुत कमीने हैं। इनमें इंसानियत नाम की कोई चीज नहीं होती।"
"लेकिन आप यह भी जानते होंगें कि सब उंगलियाँ बराबर नहीं होती।" मोटर साइकिल सवार ने उन्हें समझाते हुए बोला।
 "अरे जाने भी दीजिए। सभी पुलिसवाले एक नंबर के हरामी होते हैं। अच्छा यहीं रोक लीजिए यहाँ से कुछ दूर ही अपना घर है।" मोटर साइकिल से उतरकर "देखिए हमारा नाम छज्जन मियां है। दरिया गंज में अपनी औजारों की एक छोटी दुकान हैं। कभी खिदमत का मौका ज़रूर दीजिएगा। आप बहुत भले आदमी लगते है। वैसे आपका नाम क्या है?" 
मोटर साइकिल सवार बोला, "जी मेरा नाम कमीना है। वैसे आप मुझे हरामी भी कह सकते हैं।"  
छज्जन मियां चौककर बोले, "अमाँ यार मजाक अच्छा कर लेते हैं।" 
मोटर साइकिल सवार हँसते हुए बोला, "मजाक नहीं कर रहा हूँ। चूँकि मैं भी एक पुलिसवाला हूँ और आपके लिए पुलिसवाले कमीने और हरामी ही तो हैं।"

इतना सुनते ही छज्जन मियां ने झेंपते हुए अपनी नज़रें झुका लीं।

सुमित प्रताप सिंह
इटावा, नई दिल्ली, भारत 
*चित्र गूगल बाबा से साभार 

Saturday, September 27, 2014

कहानी : नकेल

    राधिका जी के सामने अख़बार पड़ा था। ख़बर कल दोपहर की थी। यह खबर  उन्ही के शहर की एक दुर्घटना की थी। विचलित थी वह , अख़बार की  खबर  से नहीं बल्कि वह दुर्घटना उनके सामने ही घटी थी। कल दोपहर बाद जब वह भोजन के पश्चात घर से अपने ऑफिस आने को निकली थी कि राह में एक आवारा सांड ने एक मोटरसाईकल चला रहे युवक को टक्कर मार दी। टक्कर इतनी जोर से थी कि युवक तेजी से आती एक जीप से टकरा गया। जीप युवक को कुचलते हुए थोड़ी दूर जा कर रुकी लेकिन  देखते ही देखते एक घर का चिराग बुझ गया। भीड़ इक्क्ठी हो गई।
      लोगों  ने जब राधिका जी की कार देखी तो उनकी कार को घेर लिया। कुछ लोगों ने नारे भी लगाने शुरू कर दिए। राधिका नगरपालिका अध्यक्ष  थी तो लोगों का रोष दिखाना स्वाभाविक ही था। वह परेशान हो उठी कि वह अब लोगों को क्या जवाब दे। आवारा पशु तो सच में ही परेशानी के  कारण बनते  जा रहा था।
      " मैडम ! गाड़ी आगे बढ़ा दूँ क्या !!" ड्राइवर ने उनसे पूछा।
 " नहीं रोको गाडी को , मुझे बात करने दो और बच्चे को देखने दो। "
तब तक युवक के परिवार के कुछ लोग आ गए थे। राधिका जी गाडी से उत्तर कर भीड़ से जगह बनाती हुई युवक के शव तक पहुंची। देख कर आंसू ना रोक सकी।
     " मैडम ! घड़ियाली आंसू ना बहाओ और शहर के हालात पर नज़र डालो !! यहाँ हर रोज़ एक -दो ऐसी ही दुर्घटना होती है। " भीड़ में से किसी ने कहा।
     वह किसी तरह युवक के परिज़नों को सांत्वना देकर और लोगों को कुछ कर ने का आश्वासन दे कर कार में बैठ कर ऑफिस आ गई। ऑफिस में मन तो नहीं लगा लेकिन मन का क्या ? लगे या न लगे !जिम्मेदारियों से भाग तो नहीं सकती थी ! वह सोचने लगी कि आखिर यह समस्या कैसे सुलझेगी। उन्होंने कुछ समाज सेवी  संस्थाओं को सम्पर्क किया और उनके प्रधान को  अगले दिन आने का आग्रह किया।
    अगले दिन  शहर के कुछ सामाजिक संस्थाओं  के प्रधान और पार्षदों के साथ  उनकी मीटिंग थी। सबसे पहली चिंता यह कि  शहर में  ये पशु आते कहाँ से हैं और गौशालाओं में इनका प्रबंधन क्यों नहीं हो रहा क्यों ये सड़कों पर आवारा भटकने को छोड़ दिए जाते हैं।
    गौशाला प्रबंधक बोले , " मैडम ये पशु गाँव से लोग रातो - रात शहर की सीमा में छोड़ जाते है।क्यों कि  गाँव में इनके लिए कोई भी उचित प्रबंध ही नहीं है। इनमे से कुछ पशु शहर में आ जाते हैं और कुछ वहीँ सड़क के साथ लगते खेतों में चले जाते हैं। वहां से हड़काए जाने पर वे सड़कों पर टहलते -भागते दुर्घटना का कारण बनते हैं। ऐसे ही ये शहर में भी दुर्घटनाओं के कारण बनते हैं। जहाँ तक गौशाला में इनको रखने की बात है तो वहां पहले से ही पशु बहुत अधिक संख्या में हैं तो और पशु रखना संभव ही नहीं है। "
  "  लेकिन  इन पशुओं की संख्या बढ़ती क्यों जा रही है ? एक दिन तो ऐसा होगा की पशु अधिक और इंसान काम नज़र आएंगे यहाँ ! " सवाल फिर से रखा गया।
" देखिये पुराने ज़माने में बैलगाड़ी होती थी।  बैलों को हल चलाने के लिए काम लिया जाता था। बछड़ों को उनके जन्म के साथ तय कर दिया जाता था कि कौनसा बछड़ा बैल बनाया जायेगा और कौनसा सांड बना कर प्रजनन के लिए तैयार किया जायेगा। दोनों का  अलग तरीके से खान -पान होता था। बैल बनाये जाने वाले बछड़ों की नाक में समय रहते ही नकेल डाल दी जाती थी। जिस कारण  वे सधे हुए सीधे चल सकें।
   लेकिन अब मशीनों अंधानुकरण  ने सारी  व्यवस्था ही बिगाड़  दी है । छोटे से छोटा किसान भी हल चला कर नहीं बल्कि आधुनिक मशीनों से खेती करना चाहता है। चाहे उसे वे सभी साधन किराये पर ही क्यों ना लेना पड़े। ऐसे में किसान पर आर्थिक भार हो जाता है। वह कर्ज़दार हो कर कई बार प्राण घातक कदम भी उठा लेते हैं।
    किसानअनपढ़ है तो जागरूक नहीं है घर में सस्ती खेती का साधन उपलब्ध होते हुए भी महंगी मशीनो की तरफ भाग रहा है। " एक सामाजिक संस्था के प्रधान जी कह रहे थे।
 " सही बात है आपकी !  गायों को दूध के लिए पाल ली जाती हैं और बछड़ों को खुला छोड़ दिया जाता है जो एक दिन आवारा सांड बन लोगों के लिए मुश्किल पैदा करते हैं। " राधिका जी ने समर्थन किया।
" गाँव ही क्यों शहर में भी तो यही हाल है ! कई लोग गाय आदि रखते है , दूध दुह कर दिन में खुला छोड़ देते है। गलियों में आवारा घूम कर शाम को फिर से ठिकाने पहुँच जाती है। "
 " हाँ जी सच है ! और ये भी सच है कि कई धर्म -कर्म करने वाले लोग गली -चौराहों पर चारा डलवाते हैं। अपने घरों के आगे उनके लिए पीने का पानी के लिए व्यवस्था करते हैं। लेकिन ये वह नहीं जानते की ऐसा करके वे ' रक्षा में हत्या 'वाली कहावत को चरितार्थ ही करते हैं। "
   " और नहीं तो क्या ! इस तरह ही तो ये एक जगह जमा हो कर लड़ते हैं या बीच राह में खड़े हो जाते हैं। "
" हाँ , समस्या बहुत गंभीर है। लेकिन हर समस्या का हल तो होता ही है। और इसी समस्या का हल करने में मेरा सहयोग कीजिये। " राधिका जी ने कहा।
" जी हाँ !! हल क्यों नहीं है। लेकिन जब हर काम सरकार पर थोप दिया जाये और अपने -अपने कर्तव्य हर नागरिक भूल जाये  तो हमें हल मिल ही नहीं सकता।"
" हाँ नागरिकों का जागरूक होना भी जरुरी है। "
" अभी तो हमारे पास इन आवारा पशुओं की समस्या से निजात पाने की प्राथमिकता है। सबसे पहले तो बाहर से जो पशु हमारे शहर में छोड़े जाने पर रोक लगनी चाहिए। इसके किये हर नाके  पर पुलिस की व्यवस्था होनी चाहिए। दूसरी बात ये कि शहर वासी हर कहीं पशुओं के लिए चारा और पानी की व्यवस्था ना करें। इसके लिए नियत जगह गौशाला है। जो भी शहरवासी अपने घरों में पशु रखे वह नगरपालिका से लाइसेंस लें और उनके पशु शहर आवारा घूमते हुए पकडे जाने पर सजा का या जुर्माने का कड़ा प्रावधान रखा जाय। "
" देखिये राधिका जी ! मेरे पास एक बहुत बड़ा प्लाट खाली है। जब तक मैं वहां निर्माण कार्य ना करवाऊँ तब तक वहां आवारा  पशुओं को रखा जा सकता है। लेकिन उनके चारा -पानी की व्यवस्था आपको ही करनी होगी। " एक  सज्जन ने कहा तो राधिका जी को राहत  सी महसूस हुई।
  उन्होंने मान लिया।लेकिन यह समस्या का हल तो नहीं था। बस फ़ौरी तौर पर राहत थी। जब तक आम जन अपने कर्तव्य नहीं समझेगा वह ही क्यों , कोई भी क्या कर सकता है।लेकिन उम्मीद पर ही दुनिया कायम है।
   उस दिन मौसम बादलों की उमस भरा था। शाम तक बादल बरस गए। राधिका जी का मन और आसमान दोनों ही हलके से हो गए।
   शाम को अपनी बालकॉनी से हलकी फुहार का आनंद ले रही थी राधिका जी कि एक शोर ने उनका ध्यान भंग कर दिया। कई  मोटर बाइक सवार तेज़ स्पीड में विचित्र से  हॉर्न बजाते हुए और हो-हल्ला मचाते हुए  गली से गुज़रे  थे।  ये अभी युवा होते बच्चे थे।
   दिशाहीन बच्चे ! राधिका जी ने तो यही सोचा कि ये दिशाहीन बच्चे ही हैं। इनको नहीं मालूम कि इन्हे क्या करना है। माता-पिता अपनी दुनिया में व्यस्त , बच्चे अपनी दुनिया में। आधुनिक सुख सुविधाएं बच्चों को अकर्मण्य और दिशाविहीन कर रही है। वे चिंतित थी कि  देश का भविष्य यूँ सड़कों पर आवारा घूम कर लोगों की परेशानी का कारण  बन रहा है।उनको दुःख होता था कि ये भटके हुए बच्चे ही दुष्कर्म जैसा कदम उठा लेते हैं।
उनको अपना जमाना याद आया कि उनके पास एक दिशा थी कि उन्हें भविष्य में क्या करना है और क्या बनना है और यही दिशा अपने बच्चों के सामने भी रखी।
      आज कल बच्चों को क्या होता जा रहा है। जिन बच्चों के सामने उनका लक्ष्य हैं वे तो अपनी मंज़िल की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। जिनका कोई लक्ष्य नहीं वे परेशानी का कारण  बनते जा रहे हैं। और यही खाली दिमाग शैतानी कर जाता है कि ' लम्हों ने खता  की है सदियों ने सज़ा पाई ' , वाली बात हो जाती है।
    वह सोच रही थी कि इतनी धार्मिक संस्थाए है जो सभाएं करती है ,लोगों पर कृपा बरसाती है । वे अगर स्कूलों में सप्ताह में दो दिन भी एक -एक घंटा दे और बच्चों में सुविचार और सोहार्द्य पैदा करें तो कितना अच्छा होगा।
    राधिका जी  की रोज़ की आदत है की वह सुबह उठ कर गायत्री मन्त्र की सीडी लगा देती है। उसी दौरान उनके पोता -पोती भी स्कूल के लिए तैयार हो रहे होते हैं। एक दिन उनको सुखद आश्चर्य हुआ कि उनका पोता भी अपना काम करते हुए गायत्री मन्त्र गुनगुना रहा था।बच्चे कच्ची मिट्टी होते हैं उन पर असर भी होता है। जैसा माहोल देंगे वैसे ही बच्चे बनेंगे।
    " माँ ! आरती का समय हो गया चलिए। " बहू  ने कहा तो उनकी तन्द्रा भंग हुई। आरती करते हुए उन्होंने सोचा कि बालकों को भी सही दिशा निर्देश देना भी जैसे नकेल डाल देना ही तो हैं। सही समय पर सही सलाह -मार्ग दिखाया जाय  तो वे क्या नहीं कर सकते।   वह अगले दिन कुछ ऐसी ही संस्थाओं और स्कूलों से संपर्क साधेगी। सोच कर मन हल्का सा हुआ उनका। लेकिन मन शांत तो तभी होगा जब सब कुछ सही तरीके से समस्याएं हल हो जाएँगी। परन्तु क्या इसप्रकार उनके अकेले  सोचने से हल होगा ! वह तो यही सोचती है कि  हां ! क्यों नहीं होगा ! वह एक बहुत लोगों की सोच बदलेगी तो दायरा बढ़ता ही जायेगा। वह पहल करने का दृढ़ -निश्चय कर चुकी थी।
 
उपासना सियाग
अबोहर, पंजाब 

Wednesday, September 17, 2014

प्रकृति से छेड़छाड़

    
   जंगल के बिल्कुल किनारे बाले तालाब पर लगे बरगद के पेड़ पर उठने वाली भिनभिनाहट ने पेड़ के बाकी पक्षियों को परेशान कर दिया ।मामला अत्यंत गंभीर सा था सो सभी कौतुहल बस मधुमक्खी के छत्ते की तरफ देख रहे थे छत्ते की सभी मधुमक्खियाँ अपने छत्ते से बाहर इक्कठे होकर नारे बाजे कर रहीं थीं।......हमारी मांगे पूरी करो .......हम सब एक है........मधुमक्खी एकता जिंदाबाद.......
     आवाज सुनकर रानी मक्खी तुरंत अपने घर से बाहर आ गयी उसने अपने जीवन में पहली बार ऐसा नजारा देखा था सो समझ में नहीं आ रहा था कि समस्या क्या है और यह क्या हो रहा है और आखिर ये सब लोग कर क्या चाहते हैं
          .......क्या समस्या है ....ये सब क्या हो रहा है......रानी मक्खी ने कड़ककर पुछा।सभी मधुमक्खी एक सुर में बोली आपकी मनमानी नहीं चलेगी.....हमारी मांगे पूरी करो।
    रानी मक्खी इतनी सारी आवाज एक साथ सुनकर हैरान रह गयी और उसने चिल्लाकर कहा ......एक एक करके बोलो......सभी मक्खियाँ फिर चिल्लाने लगी ।क्रोधित रानी मक्खी ने आदेश दिया कि केवल एक मक्खी ही बात करेगी...कुछ देर के लिए सन्नाटा खिच गया और खुसुर पुसुर के बाद भीड़ से एक बुजुर्ग मक्खी ने बाहर आकर रानी मक्खी को नमस्कार कर बात सुरु की......हम जबसे पैदा हुई है हमारा सारा काम एक ढर्रे पर आपके द्वारा दिए गए आदेश पर चल रहा है जिसमे कभी कोई बदलाव नहीं किया गया श्रमिक मक्खियाँ प्रतिदिन सुबह से शाम तक फूलों से पराग इकट्ठा करतीं है और सैनिक मक्खियाँ बस छत्ते में पड़ी पड़ी आराम फरमाती रहती है हमें कोई छुट्टी भी नहीं दी जाती है हमारे साथ हमारी पत्नियों से भी उतना ही काम लिया जाता है इसलिए हमारे काम में बदलाव किया जाए और जिस प्रकार मनुष्यों में समानता का अधिकार दिया गया है उसी तरह हमें भी अधिकार मिलने चाहिए।
रानी मक्खी की समझ में आ गया कि कोई इंटेलीजेंट मक्खी मनुष्य की सामाजिक व्यवस्था से प्रेरित होकर नेता बन गयी है और उसी के इशारे पर ये सब हो रहा है लेकिन बात अधिक ना ख़राब हो सो उसने तुरंत आदेश किया कि आप में से कोई पांच मक्खियाँ समित बनाकर अपनी सारी मांगे बताएं और अभी सब लोग अपने अपने कोटर में जाकर आराम करें।
     आदेश मिलते ही सभी मक्खियों ने दो श्रमिक मक्खियों और दो सैनिक मक्खियों और एक महिला मक्खी को मिलाकर समिति तैयार कर ली और उसी दिन शाम को रानी मक्खी के पास पहुच गए ।
रानी मक्खी बोली....बताओ क्या चाहते हो तुम सब ....हम चाहते है कि हमारे काम में अदला बदली हो ,पहला प्रस्ताव श्रमिक मक्खी की तरफ से आया ....क्या सैनिक माक्खियों को ये मंजूर है रानी ने पूछा...सैनिक मक्खियों के मन में भी बाहर घुमने की ख्वाहिश थी सो उन्होंने तुरंत हामी भर दी। ...और क्या चाहिए......साल में कम से कम एक महीने का अवकाश और महिलाओं को बच्चों की देख रेख के लिए 3 महीने का विशेष अवकाश महिला मक्खी ने तुरंत कहा ..........रानी मक्खी जानती थी कि अभी सब विरोध में है सो उसने तुरंत हां कर दी।
अगले दिन से मधुमक्खी समाज की व्यवस्था नए नियमों के अनुसार प्रारंभ हुई सैनिक मक्खियाँ शहद के लिए पराग लेने जंगल चली गयीं और श्रमिक मक्खियों ने सुरक्षा सम्हाल ली मादा मक्खियों ने प्रसूति कालीन अवकाश का आवेदन लगा दिया और छत्ते में आराम फरमाने लगीं। शाम को जब दिन भर के काम की समीक्षा हुई तो पता चला कि आज रोज के मुकावले पराग आधा ही इकट्ठा हुआ है जब कारण पुछा तो पता चला कि सैनिक मक्खियों को पराग वाले फूलों की पहचान ही नहीं है और पराग के चक्कर में घूमते घूमते थक कर चूर हो गयी है श्रमिक मक्खियाँ मंद मंद मुस्करा रही थी ।
   प्रतिदिन लगभग यही क्रम चलने लगा ।पराग कम इकट्ठा होने से शहद का उत्पादन कम होने लगा उधर श्रमिक मक्खियों दिन भर पड़े पड़े सोती रहती थी सो शहद चोरी की घटनाएँ बढ़ने लगी और सैनिक मक्खियाँ ज्यादा बीमार पढ़ने लगीं। एक महीने के बाद छत्ते का शहद उत्पादन घटकर 40 प्रतिशत रह गया और खुद के खाने लायक शहद भी नहीं बचा ।श्रमिक मक्खियों की कमर छत्ते में पड़े पड़े अकड़ गयी थी छत्ते की पूरी व्यवस्था तहस नहस हो चुकी थी पर रानी मक्खी ने कोई हस्तक्षेप नहीं किया सभी परेशान थे पर रानी मक्खी से कौन कहे लेकिन एक दूसरे पर आरोप लगाने लगे ।
    एक महीने बाद रानी मक्खी ने सभी की बैठक बुलाई और पूछा ......कैसा लग रहा है नए काम से .....सभी चुप थे ......सुना है छत्ते में खाने लायक भी शहद नहीं बचा है ,रानी ने प्रश्न पूछा तो सभी एक दूसरे पर इल्जाम लगाने लगे।
      रानी ने बात शुरू की....... मुझे पता है कि कारण क्या है .... प्रकृति ने हमें विशेष कार्यो के लिए बनाया है सैनिक मक्खियाँ पराग नहीं चुन सकती है इसके लिए उन्हें सिखाना पड़ेगा और उसमे काफी वक़्त लगेगा........इसी प्रकार श्रमिक मक्खियाँ भी सुरक्षा नहीं कर सकती है क्यूंकि उन्हें सुरक्षा के तौर तरीके नहीं पता है ....मादा मधुमक्खियाँ अपनी जिम्मेदारी से भागना चाहती है इसलिए उन्होंने छुट्टी ले ली है ......हम मनुष्य नहीं है हमारी सामाजिक व्यवस्था प्रकृति की देन है उसमे थोडा सा भी परिवर्तन हमारे लिए नुकसानदायक साबित होगा .....मनुष्य की प्रकृति के साथ छेड़छाड़  से वैसे भी हमारा अस्तित्व खतरे में है और आप सब उनकी व्यवस्थाओं से प्रेरित हो रहे है ।हम सब प्राकृतिक व्यवस्थाओं में ही भरोसा रखते है और उसी से ही हमारा जीवन सुखमय रहेगा
कल से सभी अपने अपने कार्य पूर्व की व्यवस्था के अनुसार ही करें। सभी मधुमक्खियों ने सहमति प्रदान की और अपने कार्य में लग गयीं।

Monday, August 25, 2014

कहानी : यकीन

   शाम का समय है हर कोई घर जाने की जल्दी में है। चूड़ी वाली गली में आज काफी भीड़ है। गली के नुक्कड़ पे छोटा सा मकान है । मकान के अन्दर चाचा करीम हुक्के का पाइप थामे न जाने क्या सोच रहे हैं? लगता है कि आज कारखाने से जल्दी आ गये हैं । उनके थोड़ी दूरी पर सकीना जो सब जगह सकीना चच्ची के नाम से मशहूर हैं, बैठी चूल्हे पर खाना पका रही हैं। बीस बर्ष की बेटी फरजाना कोई कपड़ा सिल रही है। खाना पकाते हुए सकीना पूछती हैं, "अजी किस सोच में बैठे हो?

करीम पाइप को होठों से निकालते हुए बोले, "आज मैं चारों बेटों के पास गया मैंने कहा दस दिन बाद तुम्हारी बहन फरजाना का निकाह है तुम सब लोग मदद करो लेकिन उन लोगों ने मदद करने से मना कर दिया। जब मैंने कहा कि मेरे पास जो था तुम चारों को दे दिया तो अनवर बोला हम पर कोई अहसान नहीं किया। ये तो हर  माँ बाप अपनी औलाद के लिए करते हैं।
सकीना – “खुदा के वास्ते ज्यादा मत सोचा करो तबियत खराब हो जायेगी। आप क्यों नहीं सोचते कि जो बेटे हमें अकेला छोड़कर चले गये एक पल के लिए भी ये नहीं सोचा कि बूढ़े माँ-बाप कैसे पेट भरेंगे तो उनसे और उम्मीद क्या करें?”
करीम- “दूसरे मोहल्ले के शख्स हैं शर्मा जी। उन्होंने कहा है कि वह अपनी जमीन पर कर्ज लेकर हमारी मदद करेंगे । देखो तो सकीना अपने काम नहीं आये और दूसरे मजहब के लोगों ने हमारी परेशानी को समझा।
सकीना – “आज भी इंसान के भेष में फरिश्ते हर मजहब में मौजूद हैं। अल्लाह हमें भी कोई मौका बक्शे जो हम उनके भी कभी काम आ सकें। चलिये अब आप खाना खा लीजिए।"

करीम खाना खाने जैसे ही बैठे वैसे ही गली में से तेज शोर-शराबे की आवाज़ आई और भगदड़ मच गई।

सकीना बेटी को इशारा करते हुए बोली, "फरजाना देखो तो बाहर कैसा शोर है?
फरजाना दरवाजे से चीखती है, "अम्मी दंगा हो गया। हिन्दू-मुसलमान एक दूसरे को मार-काट रहे हैं।" 
इतना कहकर डर के मारे फरजाना दरवाज़ा बंद कर लेती है।
करीम खाने की थाली एक ओर खिसकाकर खड़ा हो जाता है, "लाहौल विला कुव्वत !न जाने खुदा कब इन सब बेअक्लों को अक्ल देगा? ये सब क्यों नहीं समझते हम सब एक ही मालिक की औलाद हैं।
इतने कोई दरवाज़ा तेजी से खटखटाता है।
करीम- “कौन है?
जैसे ही वह दरवाज़ा खोलता है एक लड़की घर में अन्दर की ओर भागती है ।
करीम- “तुम कौन हो बेटी?
लड़की गौर से करीम को देखते हुए बहुत सहम कर बोलती है, " बाबा मुझे बचा लो मेरा नाम किरन है मैं आगे वाले मोहल्ले में रहती हूँ। हिन्दू होने की वजह से आपकी कौम वाले मुझे मार देना चाहते हैं।"
फिर कुछ डरते हुए, "बाबा आप भी तो मुसलमान है। कहीं आप भी मुझे मार तो नही डालेंगे?"
करीम- “न हिन्दू हूँ न मुसलमान हूँ। अब तुम ही तो कह रही हो बाबा मुझे तो मैं तुम्हारा बाबा ही हूँ। डरो नहीं बेटी तुमको कुछ नहीं होगा। अल्लाह मुझे तुम्हारी हिफाजत करने की ताकत दे।
इतना सुनकर किरन के चेहरे पर खौफ कुछ कम होता है।
बाहर से कोई चीखता है दरवाज़ा खोलो  हिन्दू लड़की को बाहर निकालो। नहीं तो दरवाज़ा तोड़ देंगे ।
करीम डरी आवाज़ में, "यहाँ कोई लड़की नहीं है।"
तभी लोग दरवाज़ा तोड़कर अन्दर आ जाते हैं।
तभी उन्हें करीम की बेटी फरजाना परदे की आड़ में खड़ी दिखती है और वे उसे हिंदू लड़की के वहम में गोली चलाकर मार देते हैं और फरजाना बेदम होकर ज़मीन पर गिर पड़ती है। करीम और सकीना दुःख के मारे चीख पड़ते हैं । इतने में पुलिस की गाड़ी के सायरन की आवाज़ सुनाई  देती है जिसे सुनकर दंगाई भाग जाते हैं।
घर के आसपास भीड़ इकट्ठी हो जाती है और पुलिस के आने पर किरन भी बाहर आ जाती है।
भीड़ में खड़ा फिरोज़, जो दूर से यह सब देख रहा था, किरन को देखकर बोलता है, “मियाँ जब तुमको पता था कि यह लड़की तुम्हारे घर छुपी है तो बताया क्यों नहीं? अपनी लड़की को मरवा कर आखिर तुमको क्या मिला?”
करीम आँसू पोंछते हुए बोला, "बेशक मेरी लड़की मारी गई लेकिन मैंने इस लड़की का यकीन नहीं तोड़ा। अगर आज मैं इस लड़की का यकीन तोड़ देता तो शायद फिर कभी कोई हिन्दू किसी मुसलमान पर विश्वास नहीं करता।“

इतना कहकर करीम फरज़ाना से लिपटकर रोने लगता है।

लेखक : अमित शुक्ला
बरेली, उत्तर प्रदेश 
संपादन : सुमित प्रताप सिंह  

Saturday, August 23, 2014

कहानी : बिलकुल सच्चा वाला


  शोक अपने कमरे में बैठा शून्य की ओर निहार रहा था कि तभी उसका मोबाइल फोन बजने लगा.
“हैलो दीपक! तू पीछे ही रुक मैं बस दो मिनट में आता हूँ.” इतना कहकर अशोक ने झटपट कपड़े पहने और कमरे के पिछले दरवाजे से बाहर निकल गया.
होस्टल से कुछ दूर झाड़ियों की ओट में दीपक कार लिए खड़ा हुआ था. अशोक ने उससे गले मिलते हुए पूछा, “काम हुआ?”
“हाँ काम तो हो गया. अब काम-तमाम कब करना है?” दीपक हलकी मुस्कराहट के साथ बोला.
अशोक ने भी मुस्कुराने की कोशिश की, “काम-तमाम आज शाम को ही होगा.”
दीपक फिर मुस्कुरा दिया, “लगता है बड़ी जल्दी है जनाब को.”
अशोक ने उसकी मुस्कराहट का बुरा नहीं माना, “कलेजे में आग लग रखी है भाई. उसका काम-तमाम करके ही ठंडक मिलेगी.”
“तो चल तेरे कलेजे को ठंडक पहुँचाकर ही दम लेते हैं. बता कहाँ चलना है?” दीपक ने कार स्टार्ट कर रोड पर दौड़ाते हुए पूछा.
अशोक ने बिना उसकी ओर देखते हुए कहा, “अशोक होटल के पास विनय मार्ग पर बने हनुमान मंदिर में. वहीं मिलेंगे वो.”
दीपक ने एकदम कार में ब्रेक लगाये, “अबे पागल हो गया है तू? वी.आई.पी. एरिया है वो. चारों ओर कितनी तगड़ी सिक्योरिटी रहती है. कहीं और का भी तो प्लान कर सकता था.”
“क्यों डर के मारे अम्मा मर गईं क्या? तुझे तो मैं बड़ा दिलेर मानता था.” अशोक व्यंग्यात्मक हँसी हँसते हुए बोला.
दीपक ने अशोक की आँखों में आँखें डालकर कहा, “मेरा जिगरा देखना चाहता है. तू बोल तो सही उसे पी.एम. हाउस के बाहर उड़ाकर आ आऊँ.”
अशोक थोड़ा शांत हुआ, “उसे उड़ाना तो मुझे ही है. बस तुझे जो कहा है उसे करता जा.”
दीपक ने कार फिर से स्टार्ट कर दी, “जैसी तेरी मर्जी. ये पकड़ रिवोल्वर और ये कारतूस. बस बारह हैं. छः रिवोल्वर में लोड हैं और छः इमरजेंसी के लिए.”
अशोक ने रिवोल्वर का मुआयना किया, “ओरिजिनल है न? पता चला कि देशी कट्टे की तरह फायर करते ही फट जाये और खुद के साथ-साथ मेरा हाथ भी उड़ा दे.”
“अबे ध्यान से देख जर्मनी मेड है. जिससे ली है साले ने पचास हजार किराया लिया है आज-आज का. फुल गारन्टी दी है चलने की. वरना पूरे पैसों के साथ दस हजार एक्स्ट्रा वापसी देगा.” दीपक ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा.
अशोक का एक बार रिवोल्वर का ठीक से मुआयना करने का था, “एक राउंड में ही उसका काम-तमाम हो जाएगा. दूसरे की जरूरत ही न पड़े शायद.”
“अरे एक गोली में ही उसका राम नाम सत्य हो जाएगा.” दीपक ने बेफिक्री से सिगरेट का धुआँ छोड़ते हुए कहा.
अशोक की आखें खून से लाल हो गईं, “एक गोली से काम नहीं चलेगा. छः की छः गोलियाँ उसके सीने पर उतारकर ही दम लूँगा.”
“जितनी चाहे गोलियाँ उसके सीने में उतार लेना पर दो-चार गोलियाँ बचाकर भी रखनी पड़ेगी. बचकर भागने के काम आएँगी.” ट्रैफिक जाम से उलझते हुए दीपक बोला.
“और अगर ऐसा ट्रैफिक जाम रहा तो फिर तो भाग लिए.” और कार के भीतर हँसी से माहौल कुछ पलों के लिए हल्का हो गया.
“ये पकड़ इसे रिवोल्वर की नली में पर लगा ले. इसे साइलेंसर कहते हैं. इससे गोली चलने की आवाज नहीं आएगी और जब तक लोगों को पता चलेगा कि उसे गोली लगी है तब तक हम दोनों जाने कहाँ पहुँच चुके होंगे.” दीपक ने साइलेंसर अशोक के हाथ में थमा दिया.
कुछ देर रूककर दीपक ने अशोक से पूछा, “यार ये इतना सब हो कैसे गया? आखिर कहानी क्या है?”
दीपक ने मानो अशोक की दुखती रग पर हाथ रख दिया हो, “स्कूल खत्म होते ही तूने तो मेरा साथ छोड़कर पूना की राह पकड़ ली और मैं यहाँ दिल्ली आ गया. जैसे तेरे माँ-बाप तुझे इंजीनियर बनाने के इच्छुक थे, वैसे ही मेरे माँ-बाप मुझे आई.ए.एस. बनाना चाहते थे सो ग्रेजुएशन करने दिल्ली भेज दिया. दो साल तो बढ़िया बीते लेकिन तीसरे साल अपने कोर्स की सेकेंड इयर की स्टूडेंट निशा से दिल लग गया. हालाँकि एक-दूसरे का साथ पाकर हम दोनों की ही पढ़ाई-लिखाई पर कोई कोई आँच न आई, बल्कि पहले से बेहतर हुई. फाइनल इयर में मैंने अच्छा स्कोर किया और उसने भी अपनी क्लास में सेकेण्ड डिवीजन हासिल की. इस एक साल में हमारा प्यार परवान चढ़ चुका था और हम दो दिल एक जान हो चुके थे.”
“मतलब कि तूने हम बिहारियों की उस परंपरा को जारी रखने का जिम्मा उठा लिया था, कि बिहार से बाहर पढ़ने जाओ तो एक अच्छी नौकरी और शादी के लिए एक बढ़िया सी छोकरी ढूँढकर ही बिहार को लौटो.” दीपक ने अशोक के हाथ में ताली मारी.
अशोक ने इसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.
दीपक थोड़ा झेंपते हुए बोला, “सॉरी यार मैं तो बस मजाक कर रहा था. अच्छा आगे क्या हुआ?”
“इधर निशा ने ग्रेजुएशन क्या की उसके घरवालों को उसकी शादी की चिंता लग गई. उसने मुझसे कहा कि मैं उसके मम्मी-डैडी से बात करूँ. एक दिन डरते-डरते मैं उसके घर पर निशा का रिश्ता माँगने गया. उसके मम्मी-डैडी से मैंने निशा का हाथ माँगा, लेकिन...” अशोक इससे पहले अपनी बात पूरी कर पाता दीपक ने बेचैनी से पूछा, “लेकिन क्या?”
“उसके बाप ने मेरे सामने एक अनोखी शर्त रख दी.” अशोक ने उदासी में कहा.
दीपक ने उत्सुकता पूछा, “कैसी शर्त.”
अशोक ने बिना दीपक की ओर देखे बोलना जारी रखा, “शर्त थी कि मुझे शादी के बाद निशा के बाप का सरनेम लगाना पड़ेगा. मुझे मिश्रा से गुप्ता बनना था.”
“अबे यार बस इतनी छोटी सी शर्त थी. तुझे बिना सोचे मान लेनी चाहिए थी.” दीपक कार की रफ़्तार को थोड़ा और तेज करते हुए बोला.
अशोक ने दीपक को धिक्कारते हुए देखा, “यह छोटी सी शर्त है. अपने वजूद को खत्म करके दूसरे के खोल में तू शायद जी ले पर मैं नहीं जी सकता.”
दीपक को अशोक की सोच पर तरस आ रहा था, “मेरे भाई कुछ नहीं रखा जात-पात में. ये सब पुरानी बातें हो गईं हैं.”
“वैसे तो मैं भी जाति के प्रति इतना कट्टर नहीं हूँ. अगर होता तो निशा से दिल नहीं लगाता. पर ये मामला कुछ अलग हो गया था. सोचो अगर मैं मिश्रा से गुप्ता बन जाता तो तेरे जैसे दोस्त ही मजाक कर-करके जीना हराम कर देते मेरा.” अशोक ने अपनी सफाई पेश की.
दीपक ने दूसरी सिगरेट जला ली और कश मारने लगा,”तेरी गलतफहमी थी ये. खैर छोड़ आगे क्या हुआ बता.”
अशोक हालाँकि दीपक को थोड़ी-थोड़ी देर में सिगरेट सुलगाने पर टोकना चाहता था, लेकिन फिर सिगरेट को भूलकर अपनी कहानी पर आ गया, “होना क्या था जब मैंने निशा के बाप का सुझाव नहीं माना तो उसने मुझसे कहा कि अगर मिश्रा से गुप्ता नहीं बनोगे तो निशा के जीवन से दूर जाना पड़ेगा.”
दीपक ने कार के शीशे में अपने बिखरे बालों को सँवारते हुए पूछा, “तो निशा ने अपने पापा से विरोध नहीं दर्शाया? आखिर तू ही तो उसे नहीं चाहता था वो भी तो तुझे प्यार करती थी.”
“हाँ उसने विरोध किया और बदले में अपने माँ का जोरदार झापड़ भी खाया. एक-दिनों में जब मामला नोर्मल हुआ तो वो मेरे पास आई भी.” अशोक के चेहरे पर हलकी सी मुसकुराहट आई.
दीपक से अशोक की चुप्पी बर्दाश्त न हुई,”अच्छा वो तेरे पास आई तो क्या वो शादी के लिए राजी थी.”
अशोक दीपक के मस्तिष्क में मूर्खता के कीटाणु खोजने की कोशिश कर रहा था, “राजी न होती तो क्यों आती. वह अपने बाप के इस निर्णय के समर्थन में नहीं थी. हमने फैसला किया कि हम चुपचाप कोर्ट में जाकर कानूनी तौर पर एक-दूसरे के हमसफ़र बन जायेंगे.”
“गुड तो मतलब तुम दोनों ने जाकर कोर्ट में जाकर शादी कर ली.” दीपक ने उत्साहित हो कहा.
अशोक को वह कहावत याद आ रही थी कि सिगरेट के एक तरफ धुआँ और दूसरी ओर गधा होता है. अब दीपक का चेहरा उसे गधे में परिवर्तित होता दिखने लगा, “नहीं की.”
दीपक आधी बची सिगरेट को एक कश में ही पी गया, “नहीं की. अबे क्यों नहीं की जब लड़की थी राजी तो क्या करता काजी?
“काजी यानि उसके पाजी बाप ने हमारी शादी नहीं होने दी. मैंने कोर्ट से शादी की तारीख लेकर निशा को बता दिया था. पूरे दिन कोर्ट के बाहर इंतज़ार करता रहा लेकिन निशा नहीं आयी.” अचानक अशोक की आखों में नमी छा गई.
“आई नहीं या फिर हो सकता है उसे आने ही नहीं दिया दिया गया हो.” दीपक ने अशोक को सांत्वना देने का प्रयास किया.
अशोक थोड़ा नोर्मल होते हुए बोला, “उस शाम को निशा का फोन आया कि वह मुझसे शादी नहीं कर सकती. उसने बताया कि उसके बाप ने उसके लिए मुझसे भी अच्छा लड़का ढूँढा है. जिसके साथ वह खुश रहेगी.”
“तुझे लगता है कि निशा ने अपने आप यह कहा होगा.” दीपक ने उसे समझाने की कोशिश की.
अशोक की आँखों में अचानक नमी की बजाय रक्त उतर आया, “अपने आप कहा हो या फिर उससे कहलाया गया हो. निशा को बेवफाई की सज़ा तो मिलकर रहेगी.”
“वो तो खैर तू दे ही देगा, लेकिन एक बात बता तुझे कैसे पता चला कि निशा आज हनुमान मंदिर में आ रही है.” दीपक ने अपनी उलझन दूर करनी चाही.
अशोक अजीब से अंदाज में मुस्कुराया, “निशा के पति की फेसबुक प्रोफाइल में मैं लड़की का फर्जी एकाउंट बना कर निशा की शादी के अगले रोज ही बैठ गया था. दो दिन पहले ही उसने फेसबुक पर अपडेट डाला था कि हनीमून मनाने के बाद आज हनुमान मंदिर में हवन का आयोजन करवाएगा.”
“हा हा हा यार ये फेसबुक ने तो लोगों की लाइफ ही बदलकर रख दी है. नहाना, धोना, हगना सब फेसबुक पर ही होता है. लाइक और कमेंट के लालच में लोग अपने घर की औरतों की ऐसी नुमाइश करते हैं जैसे फेसबुक न हो गई कोई रंडी बाज़ार हो गया. फेसबुक के जरिये एक-दूसरे के बेडरूम तक की खबर लोगों को रहने लगी है.” दीपक दिल खोलकर हँसा.
अशोक के चेहरे से तो मानो हँसी पास आकर छिटककर अलग हो जा रही थी, “बस यहीं कार रोक ले. यहाँ से पाँच सौ मीटर आगे ही मंदिर है. तू मुझे यहीं उतारकर मंदिर से करीब पाँच सौ मीटर दूर जाकर मेरा इंतज़ार करना और मेरे मोबाईल की मिस्ड काल मिलते ही कार स्टार्ट करके भागने के लिए तैयार रहना.”
“ओके बॉस! पर एक बात तो बता. तूने निशा से बिलकुल सच्चा वाला ही प्यार किया था न कहीं ये टाइम पास वाला प्यार तो नहीं था. अगर टाइम पास वाला था तो रिस्क मत ले अपनी जान का.” दीपक ने अशोक को टोकते हुए कहा.
अशोक का खून खौल उठा, “साले पहली बात तो ये कि तुझे बचपन से समझाता आ रहा हूँ, कि कभी शुभ काम में जाते हुए किसी को टोका नहीं जाता. दूसरी बात कि मैंने निशा से बिलकुल सच्चा वाला प्यार ही किया था और उसने फिर भी मुझे धोखा दिया और इसी की सज़ा उसे देने जा रहा हूँ.”
दीपक ने अशोक से उलझना मुनासिब नहीं समझा और चुपचाप उसे अपने मकसद में कामयाब होने की दुआ देते हुए जाने दिया. करीब आधा घंटा ही बीता था कि अशोक कार का दरवाजा खोलकर दीपक के बगल में आकर बैठ गया.
“तूने तो आने से पहले मिस्ड काल मारने को कहा था. निशा का कामतमाम कर आया?” दीपक ने हैरान हो पूछा.
“नहीं” अशोक का जवाब मिला.
“नहीं. क्यों नहीं टपकाया उसे? साले उसने तुझे धोखा दिया था. मतलब कि आज हमने बिना-बात में ऐसी-तैसी मरवाई और पचास हजार का खून हुआ सो अलग.” दीपक अचानक तैश में आ गया.
अशोक के चेहरे पर शांति थी, “तूने मुझसे जाते हुए पूछा था न कि मैंने निशा को बिलकुल सच्चा वाला प्यार ही किया था. हाँ मैंने उससे बिलकुल सच्चा वाला प्यार ही किया था. यहाँ से मैं गया तो था उसे इस दुनिया से दूर भेजने के लिए, लेकिन जब निशा का मासूम चेहरा देखा तो विचार बदल गया. वह तो मुझे बहुत प्यार करती थी. शायद रही होगी कोई उसकी भी मजबूरी. अगर उससे मेरी शादी नहीं हो पाई तो उससे मेरा प्यार खत्म तो नहीं हो गया. क्या प्रेम केवल दो शरीरों का ही मिलन है? दो आत्माओं का मिलन भी तो प्रेम ही होता है. निशा प्रत्यक्ष रूप से मेरी न हो सकी पर अप्रत्यक्ष रूप से सदा मेरी ही रहेगी और मैं भी उसे यह अहसास दिलाऊँगा कि मेरे दिल में उसके लिए कोई मैल नहीं है. उसे जब  भी मेरे सच्चे प्यार का अहसास होगा तो वह अपने फैसले पर जरूर पछताएगी और एक दिन ऊपरवाले से दुआ माँगेगी कि अगले जन्म में जीवनसाथी के रूप में उसे मैं ही मिलूँ.”

“तुम साले आशिक लोगों को भी भगवान चुनकर ही बनाता है.” इतना कहकर दीपक ने कार दौड़ा दी.     

सुमित प्रताप सिंह
इटावा, नई दिल्ली, भारत