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Wednesday, October 9, 2013

नवरात्र भाग 2.

भाग 1.
नवदुर्गा :-
नवरात्रि के नौ रातो में तीन देवियों - महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वतीया सरस्वतीकि तथा दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हे नवदुर्गा कहते हैं ।
नौ देवियाँ है :-
1.श्री शैलपुत्री
2.श्री ब्रह्मचारिणी
3.श्री चंद्रघंटा
4.श्री कुष्मांडा
5.श्री स्कंदमाता
6.श्री कात्यायनी
7.श्री कालरात्रि
8.श्री महागौरी
9.श्री सिद्धिदात्री 
इनका नौ जड़ी बूटी या ख़ास व्रत की चीज़ों से भी सम्बंध है, जिन्हें नवरात्र के व्रत में प्रयोग किया जाता है-
1.कुट्टू (शैलान्न)
2.दूध-दही
3.चौलाई (चंद्रघंटा)
4.पेठा (कूष्माण्डा)
5.श्यामक चावल (स्कन्दमाता)
6.हरी तरकारी (कात्यायनी)
7.काली मिर्च व तुलसी (कालरात्रि)
8.साबूदाना (महागौरी)
9.आंवला (सिद्धिदात्री)
क्रमश: ये नौ प्राकृतिक व्रत खाद्य पदार्थ हैं।
अष्टमी या नवमी:-
यह कुल परम्परा के अनुसार तय किया जाता है। भविष्योत्तर पुराण में और देवी भावगत के अनुसार, बेटों वाले परिवार में या पुत्र की चाहना वाले परिवार वालों को नवमी में व्रत खोलना चाहिए। 
कन्या पूजन:-
अष्टमी और नवमी दोनों ही दिन कन्या पूजन और लोंगड़ा पूजन किया जा सकता है। अतः श्रद्धापूर्वक कन्या पूजन करना चाहिये।
1.सर्वप्रथम माँ जगदम्बा के सभी नौ स्वरूपों का स्मरण करते हुए घर में प्रवेश करते ही कन्याओं के पाँव धोएं।
2.इसके बाद उन्हें उचित आसन पर बैठाकर उनके हाथ में मौली बांधे और माथे पर बिंदी लगाएं।
3.उनकी थाली में हलवा-पूरी और चने परोसे।
4.अब अपनी पूजा की थाली जिसमें दो पूरी और हलवा-चने रखे हुए हैं, के चारों ओर हलवा और चना भी रखें। बीच में आटे से बने एक दीपक को शुद्ध घी से जलाएं।
5.कन्या पूजन के बाद सभी कन्याओं को अपनी थाली में से यही प्रसाद खाने को दें।
6.अब कन्याओं को उचित उपहार तथा कुछ राशि भी भेंट में दें।
7.जय माता दी कहकर उनके चरण छुएं और उनके प्रस्थान के बाद स्वयं प्रसाद खाने से पहले पूरे घर में खेत्री के पास रखे कुंभ का जल सारे घर में बरसाएँ।
नवरात्रों का महत्त्व:-
नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्तियों में वृ्द्धि करने के लिये अनेक प्रकार के उपवास, संयम, नियम, भजन, पूजन योग साधना आदि करते हैं। सभी नवरात्रों में माता के सभी 51 पीठों पर भक्त विशेष रुप से माता एक दर्शनों के लिये एकत्रित होते हैं। जिनके लिये वहाँ जाना संभव नहीं होता है, उसे अपने निवास के निकट ही माता के मंदिर में दर्शन कर लेते हैं। नवरात्र शब्द, नव अहोरात्रों का बोध करता है। इस समय शक्ति के नव रूपों की उपासना की जाती है। रात्रि शब्द सिद्धि का प्रतीक है। उपासना और सिद्धियों के लिये दिन से अधिक रात्रियों को महत्त्व दिया जाता है। हिन्दू के अधिकतर पर्व रात्रियों में ही मनाये जाते हैं। रात्रि में मनाये जाने वाले पर्वों में दीपावली, होलिका दहन, दशहरा आदि आते हैं। शिवरात्रि और नवरात्रे भी इनमें से कुछ एक है। रात्रि समय में जिन पर्वों को मनाया जाता है, उन पर्वों में सिद्धि प्राप्ति के कार्य विशेष रुप से किये जाते हैं। नवरात्रों के साथ रात्रि जोड़ने का भी यही अर्थ है, कि माता शक्ति के इन नौ दिनों की रात्रियों को मनन व चिन्तन के लिये प्रयोग करना चाहिए।
धार्मिक महत्त्व:-
चैत्र और आश्चिन माह के नवरात्रों के अलावा भी वर्ष में दो बार गुप्त नवरात्रे आते हैं। पहला गुप्त नवरात्रा आषाढ शुक्ल पक्ष व दूसरा गुप्त नवरात्रा माघ शुक्ल पक्ष में आता है। आषाढ और माघ मास में आने वाले इन नवरात्रों को गुप्त विधाओं की प्राप्ति के लिये प्रयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त इन्हें साधना सिद्धि के लिये भी प्रयोग किया जा सकता है। तांन्त्रिकों व तंत्र-मंत्र में रुचि रखने वाले व्यक्तियों के लिये यह समय और भी अधिक उपयुक्त रहता है। गृहस्थ व्यक्ति भी इन दिनों में माता की पूजा आराधना कर अपनी आन्तरिक शक्तियों को जाग्रत करते हैं। इन दिनों में साधकों के साधन का फल व्यर्थ नहीं जाता है। मां अपने भक्तों को उनकी साधना के अनुसार फल देती है। इन दिनों में दान पुण्य का भी बहुत महत्त्व कहा गया है।

                                        लेखिका: सरिता भाटिया 

Tuesday, October 8, 2013

नवरात्र भाग 1.

 नवरात्र हिन्दू धर्म ग्रंथ पुराणों के अनुसार माता भगवती की आराधना का श्रेष्ठ समय होता है। भारत में नवरात्र का पर्व, एक ऐसा पर्व है जो हमारी संस्कृति में महिलाओं के गरिमामय स्थान को दर्शाता है। वर्ष के चार नवरात्रों में चैत्रआषाढ़आश्विन और माघ की शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक नौ दिन के होते हैं,परंतु प्रसिद्धि में चैत्र और आश्विन के नवरात्र ही मुख्य माने जाते हैं। इनमें भी देवीभक्त आश्विन के नवरात्र अधिक करते हैं। इनको यथाक्रम वासन्ती और शारदीय नवरात्र भी कहते हैं। इनका आरम्भ चैत्र और आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से होता है। 
शारदीय नवरात्र:-
शारदीय नवरात्र आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिप्रदा से शुरू होता है। आश्विन मास में आने वाले नवरात्र का अधिक महत्त्व माना गया है। इसी नवरात्र में जगह-जगह गरबों की धूम रहती है।
चैत्र या वासन्ती नवरात्र:-
चैत्र या वासन्ती नवरात्र का प्रारम्भ चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिप्रदा से होता है। इस नवरात्र को कुल देवी-देवताओं के पूजन की दृष्टि से विशेष मानते हैं। आज के भागमभाग के युग में अधिकाँश लोग अपने कुल देवी-देवताओं को भूलते जा रहे हैं। कुछ लोग समयाभाव के कारण भी पूजा-पाठ में कम ध्यान दे पाते हैं।
पुराणों में नवरात्र:-
मान्यता है कि नवरात्र में महाशक्ति की पूजा कर श्रीराम ने अपनी खोई हुई शक्ति पाई, इसलिए इस समय आदिशक्ति की आराधना पर विशेष बल दिया गया है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, दुर्गा सप्तशती में स्वयं भगवती ने इस समय शक्ति-पूजा को महापूजा बताया है। पौराणिक कथानुसार प्राचीन काल में दुर्गम नामक राक्षस ने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर लिया। उनसे वरदान लेने के बाद उसने चारों वेद व पुराणों को कब्जे में लेकर कहीं छिपा दिया। जिस कारण पूरे संसार में वैदिक कर्म बंद हो गया। इस वजह से चारों ओर घोर अकाल पड़ गया। पेड़-पौधे व नदी-नाले सूखने लगे। चारों ओर हाहाकार मच गया। जीव जंतु मरने लगे। सृष्टि का विनाश होने लगा। सृष्टि को बचाने के लिए देवताओं ने व्रत रखकर नौ दिन तक माँ जगदंबा की आराधना की और माता से सृष्टि को बचाने की विनती की। तब माँ भगवती व असुर दुर्गम के बीच घमासान युद्ध हुआ। माँ भगवती ने दुर्गम का वध कर देवताओं को निर्भय कर दिया। तभी से नवदुर्गा तथा नव व्रत का शुभारंभ हुआ।
कलश स्थापना, देवी दुर्गा की स्तुति, सुमधुर घंटियों की आवाज, धूप-बत्तियों की सुगंध – यह नौ दिनों तक चलने वाले साधना पर्व नवरात्र का चित्रण है। हमारी संस्कृति में नवरात्र पर्व की साधना का विशेष महत्त्व है। नवरात्र में ईश-साधना और अध्यात्म का अद्भुत संगम होता है। आश्विन माह की नवरात्र में रामलीला, रामायण, भागवत पाठ, अखंड कीर्तन जैसे सामूहिक धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। यही वजह है कि नवरात्र के दौरान प्रत्येक इंसान एक नए उत्साह और उमंग से भरा दिखाई पड़ता है। 
नवरात्र या नवरात्रि:-
संस्कृत व्याकरण के अनुसार नवरात्रि कहना त्रुटिपूर्ण हैं। नौ रात्रियों का समाहार, समूह होने के कारण से द्वन्द समास होने के कारण यह शब्द पुलिंग रूप 'नवरात्र' में ही शुद्ध है। पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के काल में एक साल की चार संधियाँ हैं। उनमें मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है। ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियाँ बढ़ती हैं, अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए, शरीर को शुद्ध रखने के लिए और तनमन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम 'नवरात्र' है।
नौ दिन या रात:-
अमावस्या की रात से अष्टमी तक या पड़वा से नवमी की दोपहर तक व्रत नियम चलने से नौ रात यानी 'नवरात्र' नाम सार्थक है। यहाँ रात गिनते हैं, इसलिए नवरात्र यानि नौ रातों का समूह कहा जाता है। रूपक के द्वारा हमारे शरीर को नौ मुख्य द्वारों वाला कहा गया है। इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा देवी है। इन मुख्य इन्द्रियों के अनुशासन, स्वच्छ्ता, तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में, शरीर तंत्र को पूरे साल के लिए सुचारू रूप से क्रियाशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुद्धि का पर्व नौ दिन मनाया जाता है। इनको व्यक्तिगत रूप से महत्त्व देने के लिए नौ दिन नौ दुर्गाओं के लिए कहे जाते हैं।
शरीर को सुचारू रखने के लिए विरेचन, सफाई या शुद्धि प्रतिदिन तो हम करते ही हैं किन्तु अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई करने के लिए हर छ: माह के अंतर से सफाई अभियान चलाया जाता है। सात्विक आहार के व्रत का पालन करने से शरीर की शुद्धि, साफ़ सुथरे शरीर में शुद्ध बुद्धि, उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म, कर्मों से सच्चरित्रता और क्रमश: मन शुद्ध होता है। स्वच्छ मन मंदिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है।
नवरात्र भाग 2.क्रमशः......
                                                    लेखिका....सरिता भाटिया 

Saturday, October 5, 2013

श्री खाटू श्याम जी भाग 2.

भाग 1.
आरती समय सारिणी :----
खाटू मंदिर में पाँच चरणों में आरती होती है- 
मंगला आरती प्रात: 5 बजे, 
धूप आरती प्रात:      7 बजे, 
भोग आरती दोपहर:12.15 बजे, 
संध्या आरती सायं : 7.30 बजे और 
शयन आरती रात्रि : 10 बजे होती है। 
गर्मियों के दिनों में हालाँकि इस समय थोड़ा बदलाव रहता है। कार्तिक शुक्ल एकादशी को श्यामजी के जन्मोत्सव के अवसर पर मंदिर के द्वार 24 घंटे खुले रहते हैं।

श्री खाटू श्याम जी की आरती :----
 जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे 
खाटू धाम विराजत, अनुपम रूप धरे || ॐ

रतन जड़ित सिंहासन, सिर पर चंवर ढुरे |
तन केसरिया बागो, कुण्डल श्रवण पड़े || ॐ

गल पुष्पों की माला, सिर पार मुकुट धरे |
खेवत धूप अग्नि पर दीपक ज्योति जले || ॐ

मोदक खीर चूरमा, सुवरण थाल भरे |
सेवक भोग लगावत, सेवा नित्य करे || ॐ

झांझ कटोरा और घडियावल, शंख मृदंग घुरे |
भक्त आरती गावे, जय - जयकार करे || ॐ

जो ध्यावे फल पावे, सब दुःख से उबरे |
सेवक जन निज मुख से, श्री श्याम - श्याम उचरे || ॐ

श्री श्याम बिहारी जी की आरती, जो कोई नर गावे |
कहत भक्त - जन, मनवांछित फल पावे || ॐ

जय श्री श्याम हरे, बाबा जी श्री श्याम हरे |

निज भक्तों के तुमने, पूरण काज करे || ॐ

प्रचलित नाम :----
बर्बरीक के बाल बाल्यकाल में बब्बर शेर की तरह से होने से इनका नाम बर्बरीक रखा गया जिनको आज कई नामों से पुकारा जाता है |खाटू के श्याम, कलयुग के आवतार, श्याम सरकार, तीन बाणधारी, शीश के दानी, खाटू नरेश, हारे का सहारा व अन्य अनगिनत नामों से जानते व मानते हैं |

दर्शनीय स्थल :---- 
श्याम भक्तों के लिए खाटू धाम में श्याम बाग और श्याम कुंड प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं। श्याम बाग में प्राकृतिक वातावरण की अनुभूति होती है। यहाँ परम भक्त आलूसिंह की समाधि भी बनाई गई है। श्याम कुंड के बारे में मान्यता है कि यहाँ स्नान करने से श्रद्धालुओं के पाप धुल जाते हैं। पुरुषों और महिलाओं के स्नान के लिए यहाँ पृथक-पृथक कुंड बनाए गए हैं।
                              पुरुषों के लिए जो कुंड है उसका रख रखाव तो फिर भी ठीक से किया जा रहा है ,लेकिन महिलाओं के लिए जो कुंड हैं उसके अंदर बहुत गंद है वहां जाने की ही हिम्मत नहीं हुई उसके पानी पर काई जमी हुई है बदबूदार है |

श्री श्याम कुण्ड 

ठहरने के स्थान :----
यहाँ पर बहुत सारी धर्मशालायें हैं जो कम पैसे में आधुनिक सुविधायें मुहैया करवाती हैं | कुछ होटल भी हैं यहाँ पर आप ठहर सकते हैं |अब काफी निर्माण जारी है |

उपलब्ध सामान:----
यहाँ की मोरपंखी ,चूड़ियाँ ,जुतियां प्रसिद्द हैं | खाने में कड़ी कचोरी ,दही कचोरी ,कैंची से काटकर समोसा जो दिया जाता है उसका स्वाद चखे बिना आप नहीं रह सकते |

प्रसाद :----
प्रसाद में यहाँ बूंदी के लड्डू, पेड़े,बेसन की बर्फी ,मिश्री,मेवे,चूरमा आदि चढ़ाया जाता है |

भिखारी :-----
भिखारिओं की समस्या यहाँ चरम सीमा पर है ,जो आपको गलिओं में कहीं पर भी मिल जाते हैं और आपका पीछा तब तक नहीं छोड़ते जब तक आप या तो गाड़ी में या धर्मशाला में ना घुस जाएँ ,इसे रोकने के लिए प्रशासन को सख्त कदम उठाने चाहिए |
जल्दी ही मिलते हैं सालासार बाला जी के सचित्र वर्णन के साथ ...


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Friday, October 4, 2013

श्री खाटू श्याम जी भाग 1.

दिल्ली से बाहर कहीं भी जाना हो तो सुबह सुबह का समय उत्तम रहता है , इस बार खाटू श्याम जी जाने के लिए समय अभाव के कारण हम दोपहर 2 बजे निकल पाए इसलिए हम भोजन करके ही निकले थे और फिर जाकर सीधा रुके जयपुर हाईवे पर बने किंग्स होटल पर ,जो कुछ  विश्राम करने और खाने के लिहाज से उत्तम जगह है हर प्रकार के  भोजन की बहुत ही उत्तम व्यवस्था है क्योंकि ज्यादा ट्रैफिक नहीं मिला था इसलिए हम ठीक 5 बजे यहाँ पहुँच गए थे रास्ते में सिर्फ टोल चुकाने के लिए रुके थे ,जोकि किस लिए और क्यों लिया जाता है वो समझ से बाहर है क्योंकि हर जगह अव्यवस्था फैली हुई है सडकों का बुरा हाल है और टोल पहले से दोगुना हो चुका है इतनी गाड़ियाँ निकलती हैं उनसे 20 रुपये या 25 रुपये लेना तो कुछ समझ आता है पर कहीं कहीं तो टोल 114रुपये तक है | 
                यहाँ से हमें  जयपुर होते हुए खाटू श्याम जी धाम जाना था ,वैसे तो 4..5 बार वहां जाना हुआ है हर बार का अनुभव अलग रहा है आज उन्हीं अनुभवों को आपके साथ बांटने जा रही हूँ |
खाटू श्याम जी 
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प्रवेश द्वार 
स्थिति :----
खाटूश्यामजी भारत देश के राजस्थान राज्य के सीकर जिले में एक प्रसिद्ध कस्बा है, जो रींगस से 17 किलोमीटर दूर है ,जहाँ पर बाबा श्याम का जग विख्यात मन्दिर है,यहाँ विराजित हैं भगवान श्री कृष्ण के कलयुगी अवतार खाटू श्याम जी | खाटू श्याम जी दिल्ली से लगभग 300 किलोमीटर व राजस्थान की राजधानी जयपुर से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं|



कैसे पहुँचें : -----

सड़क मार्ग : खाटू धाम से जयपुर, सीकर आदि प्रमुख स्थानों के लिए राजस्थान राज्य परिवहन निगम की बसों के साथ ही टैक्सी और जीपें भी यहाँ आसानी से उपलब्ध हैं।
रेलमार्ग : निकटतम रेलवे स्टेशन रींगस जंक्शन (15 किलोमीटर) है।
वायुमार्ग : यहाँ से निकटतम हवाई अड्‍डा जयपुर है, जो कि यहाँ से करीब 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
जैसा की विदित हुआ यहाँ तक कोई सुविधाजनक रेल यात्रा नहीं है केवल कुछ ही गाड़ियाँ यहाँ रूकती हैं | 

परिचय :----
राजस्थान की धरा यूँ तो अपने आँचल में अनेक गौरव गाथाओं को समेटे हुए है, लेकिन आस्था के प्रमुख केन्द्र खाटू की बात अपने आप में निराली है। श्याम मंदिर बहुत ही प्राचीन है, मूल मंदिर 1027 ई. में रूपसिंह चौहान और उनकी पत्नी नर्मदा कंवर द्वारा बनाया गया था. मारवाड़ के शासक ठाकुर के दीवान अभय सिंह ने ठाकुर के निर्देश पर वर्तमान मं‍दिर की आधारशिला सन 1720 में रखी गई थी। इतिहासकार पंडित झाबरमल्ल शर्मा के मुताबिक सन 1679 में औरंगजेब की सेना ने इस मंदिर को नष्ट कर दिया था। मंदिर की रक्षा के लिए उस समय अनेक राजपूतों ने अपना प्राणोत्सर्ग किया था।

पौराणिक प्रचलित कथा :----
श्याम बाबा की अपूर्व कहानी मध्यकालीन महाभारत से आरम्भ होती है। वे पहले बर्बरीक के नाम से जाने जाते थे। वे महान पान्डव भीम के पुत्र घटोतकच्छ और नाग कन्या मौरवी के पुत्र है। बाल्यकाल से ही वे बहुत वीर और महान यौद्धा थे।बालक वीर बर्बरीक के जन्म के पश्चात् घटोत्कच इन्हें भगवन श्री कृष्ण के पास लेकर गए और भगवन श्री कृष्ण ने वीर बर्बरीक के पूछने पर, जीवन का सर्वोत्तम उपयोग, परोपकार व निर्बल का साथी बनना बताया | उन्होने युद्ध कला अपनी माँ से सीखी। भगवान शिव की घोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया और तीन अभेध्य बाण प्राप्त किये और तीन बाणधारी का प्रसिद्ध नाम प्राप्त किया। अग्नि देव ने प्रसन्न होकर उन्हें धनुष प्रदान किया, जो कि उन्हें तीनो लोकों में विजयी बनाने में समर्थ थे।
                               जब बर्बरीक युद्ध में भाग लेने चले तब भगवन श्री कृष्ण ने राह में इनसे शीश दान में मांग लिया क्योकि अगर बर्बरीक युद्ध में भाग लेते तो कौरवों की समाप्ति केवल 18 दिनों में महाभारत युद्ध में नही हो सकती थी व युद्ध निरंतर चलता रहता | वीर बर्बरीक ने भगवान श्री कृष्ण के कहने पर जन-कल्याण, परोपकार व धर्म की रक्षा के लिए आपने शीश का दान उनको सहर्ष दे दिया व कलयुग में भगवान श्री कृष्ण के अति प्रिय नाम श्री श्याम नाम से पूजित होने का वरदान प्राप्त किया | बर्बरीक की युद्ध देखने की इच्छा भगवान श्री कृष्ण ने बर्बरीक के शीश को ऊंचे पर्वत पर रखकर पूर्ण की |



                    युद्ध की समाप्ति पर पांडवों ने जानना चाहा,युद्ध  में विजय का श्रेय किसको जाता है, इस पर कृष्ण ने उन्हें सुझाव दिया कि बर्बरीक का शीश सम्पूर्ण युद्ध का साक्षी है अतैव उससे बेहतर निर्णायक भला कौन हो सकता है। सभी इस बात से सहमत हो गये। बर्बरीक के शीश ने उत्तर दिया कि कृष्ण ही युद्ध मे विजय प्राप्त कराने में सबसे महान पात्र हैं, उनकी शिक्षा, उनकी उपस्थिति, उनकी युद्धनीति ही निर्णायक थी।
                    कृष्ण वीर बर्बरीक के महान बलिदान से काफी प्रसन्न हुये और वरदान दिया कि कलियुग में तुम श्याम नाम से जाने जाओगे, क्योंकि कलियुग में हारे हुये का साथ देने वाला ही श्याम नाम धारण करने में समर्थ है। खाटू में श्याम के मस्तक स्वरूप की पूजा होती है, जबकि निकट ही स्थित रींगस में धड़ स्वरूप की पूजा की जाती है।

विशेष तिथियाँ :----
फाल्गुन मास की द्वादशी को बर्बरीक ने शीश का दान दिया था इसलिए हर साल फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष में यहाँ विशाल मेला लगता है, जिसमें देश-विदेश से भक्तगण पहुँचते हैं। हजारों लोग यहाँ पदयात्रा कर पहुँचते हैं, वहीं कई लोग दंडवत करते हुए खाटू नरेश के दरबार में हाजिरी देते हैं। कार्तिक शुक्ल एकादशी जन्मोत्सव वाले दिन भी भारी संख्या में श्रद्धालु यहाँ माथा टेकने आते हैं |

कुछ तस्वीरें :----



होटल किंग ,जयपुर हाईवे

श्री खाटू श्याम जी भाग 2.क्रमशः......
                                                                   लेखिका :--सरिता भाटिया 

Saturday, September 7, 2013

हनुमान मंदिर ,कनॉट प्लेस ,दिल्ली भाग 2.

गर्भ गृह और चोला :----गर्भ गृह में स्वयंभू बाल हनुमान के साथ साथ राम दरबार, राधा कृष्ण विराजमान हैं | सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को मंदिर में चोला चढ़ाने की खास परंपरा है |मंगलवार के लिए सोमवार रात को और शनिवार के लिए शुक्रवार रात को चोला चढ़ाया जाता है |चोला चढ़ावे में श्रद्धालु घी, सिंदूर, चांदी का वर्क और इत्र की शीशी का इस्तेमाल करते हैं| कनाट प्लेस के हनुमान मंदिर की एक अद्भुद चमत्कारिक विशेषता है यहां हनुमानजी लगभग दस साल बाद अपना चोला छोड़कर अपने प्राचीन स्वरूप में आ जाते हैं।

चित्र:Hanuman and other deities in the Sanctum Santorum.JPG
गर्भ गृह की दीवार पर हनुमान जी 
एवं अन्य देवी देवता 

आज इसमें काफी परिवर्तन आ चुके हैं ,बाहर इसके प्रांगन का अभी लगभग दो वर्ष पहले ही नव निर्माण किया गया है ,पहले पार्किंग की व्यवस्था प्राइवेट ठेकेदार चलाते थे ,यहाँ कभी  कभी अपनी मनमानी भी करते थे ,जिसमें अब काफी सुधार हुआ है ,जबकि बहुत बढ़िया अंडर ग्राउंड पार्किंग बनाई गई है जिसका प्रयोग मैंने होते हुए कभी नहीं देखा है सब गाड़ियाँ आसपास की सडकों पर ही  खड़ी रहती हैं ,क्योंकि सामने ही कनॉट प्लेस थाना है इसलिए जब कोई उच्च अधिकारी जाँच के लिए आते हैं तो गाड़ियाँ उठा भी ली जाती हैं 
मंदिर के बाहर जूते वालों के टेंट 
         जूता घर ,शौचालयों का ,कुछ दुकानों का निर्माण भी इस निर्माण के साथ हुआ है जिनका प्रयोग ना के मात्र है ,सिर्फ शौचालय की सुविधा जरुर काम आ रही है ,जो पहले पास ही बने शनिमंदिर  तक जाना पड़ता था ,जूता घर का प्रयोग भी नहीं किया जाता क्योंकि कोई निशुल्क सेवा नहीं करना चाहता जो बहुत सारे लोग बाहर टेंट लगा कर बैठते हैं वोह बेकार हो जाते हैं ,क्योंकि 15...15 वर्षों से वो यहाँ से कमाई कर रहे हैं जो भी भक्तजन आते हैं अपनी श्रद्दा से 5...10 रुपये दे जाते हैं ,जबकि अब सुरक्षा की दृष्टि से टेंट हटा दिए गए हैं फिर भी जूता घर के बाहर ही  सब जूते वाले नजर आते हैं 

सुनसान जूता घर 
बाहर प्रांगन में बहुत सारी प्रसाद की ,भेंट खिलौने आदि की दुकानें हैं , कचोरी वाले मेंहदी वाले प्रांगन में जगह जगह पर कब्ज़ा जमाये हुए हैं बहुत सारे ज्योतिषी तांत्रिक भी मुख्यता मंगलवार और शनिवार को नजर आते हैं | त्योहारों पर मेहंदी लगवाने के लिए यहाँ औरतों का जमावड़ा रहता है |
नवभारत टाइम्स से साभार :----
यह मंदिर कनॉट प्लेस के व्यस्त इलाके में है, इसलिए इसकी सुरक्षा को लेकर खासे इंतजाम किए गए हैं। मंदिर के अंदर 21 सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं। मंगलवार व शनिवार को वहां खासी सुरक्षा होती है और पुलिस का पर्याप्त इंतजाम किया जाता है। मंदिर और उसके आसपास सफाई व्यवस्था को लेकर भी खासी सजगता भी दिखाता है मंदिर प्रशासन ,ऐसा यहाँ के महंतजी का कहना है । 
             यह मंदिर आम के साथ साथ खास लोगों में भी खासा लोकप्रिय है। पुराने कलाकारों में राजकुमार से लेकर आज के फिल्मी स्टार आमिर खान सचिन तेंदुलकर भी सीपी के इस भव्य मंदिर के दर्शन कर चुके हैं। देश और दिल्ली के छोटे बड़े नेता भी जब तब इस मंदिर में आकर शीश नवाते रहे हैं।
भगवान दर्शन की विशेष तिथियाँ :---
इसके अतिरिक्त साल में चार तिथियां इस मंदिर के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हैं. दीपावली, हनुमान जयंती, जन्माष्टमी, और शिवरात्रि के दिन मंदिर में बाल हनुमान का विशेष श्रृंगार किया जाता है. इस दिन भगवान को सोने का श्रंगार किया जाता है। यहां मनौती मानने वाले भक्त बड़ी संख्या में संसारभर से आते हैं और मनौती पूर्ण होने पर भगवान को सवामनी चढ़ाते हैं।
          कनॉट प्लेस में हनुमान मंदिर के निकट स्थित एशिया के सबसे बड़े फूलों के बाजार में पिछले पंद्रह सालों से फूलों का बाजार भी लगता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2006-2007 में कुल 649.84 करोड़ रुपये का निर्यात हुआ जबकि पिछले वर्ष यह 210.99 करोड़ रुपये का था। केवल दिल्ली से लगभग 100 करोड़ रुपये का निर्यात हुआ है।अभी दो वर्ष से यह बाजार लगना बंद हो गया है 
           कनाट प्लेस देश और दिल्ली का व्यावसायिक केंद्र होने के साथ ही धर्म और आस्था का भी केंद्र है | इस लिहाज से कनाट प्लेस स्थित हनुमान मंदिर पर्यटन और धार्मिक पर्यटन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है | अमूमन देश विदेश से आने वाले पर्यटक और श्रद्धालु इस मंदिर में शीश झुकाना नहीं भूलते | मंगलवार और शनिवार भगवान हनुमान के पूजन के दो विशेष दिन हैं | इन दिनों में मंदिर 24 घंटे के लिए खुला होता है यानि इन दिनों भगवान ओवरटाइम करते हैं |
कुछ विशेष जानकारी :----
        यहाँ गद्दी पर विराजमान पुरोहित जी से जब मैंने महंत परम्परा की  जानकारी मांगी तो उन्होंने बताया यहाँ इस समय 36 महंत हैं जिनके बेटे बारी बारी से यहाँ मंदिर का कार्य सँभालते हैं जैसे जिसका एक बेटा है वोह एक दिन जिसके दो बेटे हैं दो दिन जिसके चार हैं वोह उसी क्रम में मंदिर की सेवा करते हैं उनके दिन निश्चित हैं |
          दूसरी जानकारी मैंने मंदिर के बाहर बैठने वाले जय सिंह से ली जो 1984 से जूता सेवा कर रहे हैं ,जैसा की उन्होंने बताया कि उनके पिता कनी सिंह जी ने 50 वर्ष इसी मंदिर के बाहर जूता सेवा की है जो अपने पिता जी और एक किसी और सज्जन को सबसे पुराने सेवादार बताते हैं |इससे स्पष्ट है कि मंदिर संभालने का और जूता सेवा का यह काम पीड़ी दर पीड़ी चला आ रहा है |
      मैंने कई बार गद्दी पर बैठे महंत जी से अनुरोध किया है कि इस प्राचीन मंदिर की गरिमा बनाए रखने के लिए श्रद्धालुओं को माथा टेकने में आने वाली भीड़ की समस्या का उचित प्रबंध किया जाए ,जोकि थोड़ी सी सावधानी से हो सकता है ताकि उनको यह सूचना बार बार ना देनी पड़े कि जेबकतरों से सावधान रहें,लेकिन कोई कारवाई नहीं होती है अब मंदिर प्रशासन से बात कर इसका समाधान हो सकता है |

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Wednesday, August 28, 2013

कृष्ण जन्माष्टमी भाग 2.

जन्माष्टमी व्रत :---
'जन्माष्टमी व्रत' एवं 'जयन्ती व्रत' ,कालनिर्णय ने दोनों को पृथक व्रत माना है, दोनों के निमित्त पृथक हैं (प्रथम तो कृष्णपक्ष की अष्टमी है और दूसरी रोहिणी से संयुक्त कृष्णपक्ष की अष्टमी), दोनों की ही विशेषताएँ पृथक हैं, क्योंकि जन्माष्टमी व्रत में शास्त्र में उपवास की व्यवस्था दी है और जयन्ती व्रत में उपवास, दान आदि की व्यवस्था है। इसके अतिरिक्त जन्माष्टमी व्रत नित्य है (क्योंकि इसके न करने से केवल पाप लगने की बात कही गयी है) और जयन्ती व्रत नित्य एवं काम्य दोनों ही है, क्योंकि उसमें इसके न करने से न केवल पाप की व्यवस्था है प्रत्युत करने से फल की प्राप्ति की बात भी कही गयी है।
जन्माष्टमी मनाने का समय :---
सभी पुराणों एवं जन्माष्टमी सम्बन्धी ग्रन्थों से स्पष्ट होता है कि कृष्णजन्म के सम्पादन का प्रमुख समय है 'श्रावण कृष्ण पक्ष की अष्टमी की अर्धरात्रि' (यदि पूर्णिमान्त होता है तो भाद्रपद मास में किया जाता है)। 
जन्माष्टमी व्रत में प्रमुख कृत्य :--- 
जन्माष्टमी व्रत में प्रमुख कृत्य है उपवास, कृष्ण पूजा, रात का जागरण, स्तोत्र पाठ एवं कृष्ण जीवन सम्बन्धी कथाएँ सुनना एवं पारण करना।
उद्यापन एवं पारण में अंतर :---
एकादशी एवं जन्माष्टमी जैसे व्रत जीवन भर किये जाते हैं। उनमें जब कभी व्रत किया जाता है तो पारण होता है, किन्तु जब कोई व्रत केवल एक सीमित काल तक ही करता है और उसे समाप्त कर लेता है तो उसकी परिसमाप्ति का अन्तिम कृत्य है उद्यापन।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव :---
  • देश भर के श्रद्धालु जन्माष्टमी पर्व को बड़े भव्य तरीक़े से एक महान पर्व के रूप में मनाते हैं।
  • सभी कृष्ण मन्दिरों में अति शोभावान महोत्सव मनाए जाते हैं।
  • विशेष रूप से यह महोत्सव वृन्दावन, मथुरा (उत्तर प्रदेश), द्वारका (गुजरात), गुरुवयूर (केरल), उडृपी (कर्नाटक) तथा इस्कॉन के मन्दिरों में होते हैं।
  • श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव सम्पूर्ण ब्रजमण्डल में, घर–घर में, मन्दिर–मन्दिर में मनाया जाता है।
  • अधिकतर लोग व्रत रखते हैं और रात को बारह बजे ही 'पंचामृत या फलाहार' ग्रहण करते हैं।
  • मथुरा के जन्मस्थान में विशेष आयोजन होता है। सवारी निकाली जाती है। दूसरे दिन नन्दोत्सव मन्दिरों में दधिकाँदों होता है।
  • फल, मिष्ठान, वस्त्र, बर्तन, खिलौने और रुपये लुटाए जाते हैं। जिन्हें प्रायः सभी श्रद्धालु लूटकर धन्य होते हैं।
  • गोकुल, नन्दगाँव, वृन्दावन आदि में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की बड़ी धूम–धाम होती है।
दुग्धाभिषेक मथुरा 
छबीले का छप्पन भोग :---
श्रीकृष्ण आजीवन सुख तथा विलास में रहे, इसलिए जन्माष्टमी को इतने शानदार ढंग से मनाया जाता है। इस दिन अनेक प्रकार के मिष्ठान बनाए जाते हैं। जैसे लड्डू, चकली, पायसम (खीर) इत्यादि। इसके अतिरिक्त दूध से बने पकवान, विशेष रूप से मक्खन (जो श्रीकृष्ण के बाल्यकाल का सबसे प्रिय भोजन था), श्रीकृष्ण को अर्पित किया जाता है। तरह–तरह के फल भी अर्पित किए जाते हैं। 
प्रभु के विग्रह की भव्य सज्जा :---
पूजा कक्ष में जहाँ श्रीकृष्ण का विग्रह विराजमान होता है, वहाँ पर आकर्षक रंगों की रंगोली चित्रित की जाती है। इस रंगोली को 'धान के भूसे' से बनाया जाता है। घर की चौखट से पूजाकक्ष तक छोटे–छोटे पाँवों के चित्र इसी सामग्री से बनाए जाते हैं। ये प्रतीकात्मक चिह्न भगवान श्रीकृष्ण के आने का संकेत देते हैं। मिट्टी के दीप जलाकर उन्हें घर के सामने रखा जाता है। बाल श्रीकृष्ण को एक झूले में भी रखा जाता है। पूजा का समग्र स्थान पुष्पों से सजाया जाता है।


ब्रज भूमि में जन्माष्टमी महोत्सव :---
ब्रजभूमि महोत्सव अनूठा व आश्चर्यजनक होता है।सबसे पवित्रतम स्थान तो मथुरा को ही माना जाता है, और मथुरा में भी एक सुन्दर मन्दिर को जिसमें ऐसा विश्वास है कि यही वह स्थान है, जहाँ पर श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था।इसे श्री कृष्ण जन्मभूमि मंदिर भी कहा जाता है |ऐसा अनुमान है कि सात लाख लोगों से भी अधिक श्रद्धालु मथुरा व आस–पास के इलाक़ों से इस स्थान पर पूजा–अर्चना के लिए आते हैं। इसी मंदिर के साथ एक दम एक मस्जिद की दीवार साँझा है जिसे मंदिर की छत्त से देखा जा सकता है इसलिए यहाँ जाने के लिए बहुत चेकिंग होती है कोई कैमरा या फ़ोन ले जाना सख्त मना है |
दही-हांडी समारोह :---
इसमें एक मिट्टी के बर्तन में दही, मक्खन, शहद, फल इत्यादि रख दिए जाते हैं। इस बर्तन को धरती से 30 – 40 फुट ऊपर टाँग दिया जाता है। युवा लड़के–लड़कियाँ इस पुरस्कार को पाने के लिए समारोह में हिस्सा लेते हैं। ऐसा करने के लिए युवा पुरुष एक–दूसरे के कन्धे पर चढ़कर पिरामिड सा बना लेते हैं। जिससे एक व्यक्ति आसानी से उस बर्तन को तोड़कर उसमें रखी सामग्री को प्राप्त कर लेता है। प्रायः रुपयों की लड़ी रस्से से बाँधी जाती है। इसी रस्से से वह बर्तन भी बाँधा जाता है। इस धनराशि को उन सभी सहयोगियों में बाँट दिया जाता है, जो उस मानव पिरामिड में भाग लेते हैं।

पूरे विश्व में जन्माष्टमी उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है सभी जगह कृष्ण की झाँकियो  से मंदिर सजे होते हैं कृष्ण को हिंडोले में डाल कर झूला झुलाया जाता है 12 बजते ही आतिशबाजी के बीच कृष्ण जन्म होता है फिर प्रसाद वितरण किया जाता है | 
जय श्री कृष्णा 



Tuesday, November 13, 2012

आ गयी दिवाली !




 
चेहरे पर मुस्कराहट चिपकी,मन अंदर से खाली-खाली
चारों ओर घुप्प-अंधेरा ,वो कहते गयी दिवाली  I

कहाँ गये वो खील-बतासे,कहाँ गये वो खेल-तमाशे?
कमर-तोड़ मँहगाई ने, कर दी सबकी हालत माली  I

कहने को हम साथ-साथ हैं, हो जाती हर रात बात है
फिर भी क्यों लगता है ? सब कुछ है जाली-जाली I

इन्टरनेट के इस दौर में, तू भी एक -मेल भेज दे
उसके पास भी समय कहाँ है ,चल बस हो गयी दिवाली I

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