बंदर सिर्फ उछलने कूदने का नाम नहीं है। बंदर नकल मारने का भी खूब फेमस नाम
है। बंदर याद कर लेता है। अब वह बंदर नहीं है जो एक टोपी के बदले टोपियां वापिस
फेंक दे। टोपी के बदले पत्थर फेंकने वाले बंदरों का विकास हो चुका है। सब कुछ याद
की करामात है। याद करना मतलब अनुभव से सीखना। इंसान स्मरण करता है और खुद का मरण
कर लेता है पर सीखता सिर्फ पैसा कमाना है, सबको लूटना अच्छे से सीख लेता है। और
बंदर एक बार ठोकर खाई तो दूसरी बार उछलकर पार की खाई। टहनी चाहे कितनी ही हिला लो,
बंदर कभी नहीं गिरता। गिरता भी है तो अनुभव की तरह संभल जाता है। टहनी चाहे टूट
जाए पर बंदर संभलना नहीं भूलता जबकि हमारे देश के चालक बंदर की तरह भी नहीं हो पा
रहे हैं। फिर बापू की तरह ही कैसे हो पाएंगे।
मित्रो सादर ब्लॉगस्ते! आप यहाँ तक आएँ हैं तो निराश होकर नहीं जाएँगे I यहाँ आपको 99% उत्कृष्ट लेखन पढ़ने को मिलेगा I सादर ब्लॉगस्ते पर प्रकाशित रचनाएँ संपादक, संचालक अथवा रचनाकार की अनुमति के बिना कहीं और प्रकाशित करने का प्रयास न करें I अधिक जानकारी के लिए shobhanawelfare@gmail.com पर संपर्क करें I
Showing posts with label बंदर. Show all posts
Showing posts with label बंदर. Show all posts
Saturday, April 21, 2012
Subscribe to:
Posts (Atom)
