बंदर सिर्फ उछलने कूदने का नाम नहीं है। बंदर नकल मारने का भी खूब फेमस नाम
है। बंदर याद कर लेता है। अब वह बंदर नहीं है जो एक टोपी के बदले टोपियां वापिस
फेंक दे। टोपी के बदले पत्थर फेंकने वाले बंदरों का विकास हो चुका है। सब कुछ याद
की करामात है। याद करना मतलब अनुभव से सीखना। इंसान स्मरण करता है और खुद का मरण
कर लेता है पर सीखता सिर्फ पैसा कमाना है, सबको लूटना अच्छे से सीख लेता है। और
बंदर एक बार ठोकर खाई तो दूसरी बार उछलकर पार की खाई। टहनी चाहे कितनी ही हिला लो,
बंदर कभी नहीं गिरता। गिरता भी है तो अनुभव की तरह संभल जाता है। टहनी चाहे टूट
जाए पर बंदर संभलना नहीं भूलता जबकि हमारे देश के चालक बंदर की तरह भी नहीं हो पा
रहे हैं। फिर बापू की तरह ही कैसे हो पाएंगे।
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Saturday, April 21, 2012
Thursday, April 19, 2012
प्यार की पुंगी बजा के .........
अविनाश वाचस्पति अन्नास्वामी ने लिखा है :-
बोली घास की नहीं बापू के खून की हुई है। खरीदने वाले गधे थोड़े ही हैं जो घास के लालच में इतने नोट खर्च कर देंगे। उस घास में बापू का खून है, खून लाल ही रहा होगा लेकिन इतना लाल भी नहीं कि बापू के असर से घास का रंग बदल कर लाल हो गया हो और खरीदने वाले लाल रंग की घास उपजाने के लिए बोली लगा बैठे हैं। तब खून करने की कीमत थी, आज खूनी घास की कीमत है। खूनी घास कहने से घास को हत्यारा मत समझ लीजिए। हत्यारे तो वह भी नहीं हैं जिन्होंने बोली लगाई है। वह घास को बोली लगाकर इसलिए खरीद रहे हैं ताकि भावनाओं से खिलंदड़पना करने का जालिम अहसास किया जा सके। आप इसे प्यार की पुंगी बजाना समझ सकते हैं जबकि यह भावनाओं की पुंगी बजाई जा रही है।
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