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Sunday, July 28, 2013

दुमदार दोहे

हाय राम कैसे हुई, मतदाता से चूक
डाल-डाल पर डोलते, अब तक यहाँ उलूक 
जातिवाद में बह गये 
छीपा-लोटा ले चला, शहरों में फुटपाथ
जहाँ बसी सम्पन्नता, कुछ लग जाये हाथ 
श्रमकण के सहयोग से 
मानव का तानव मिला, ताना मारी देह 
संसद के प्राणी नहीं, राजा जनक विदेह 
खाते-पीते लोग हैं 
कदम-कदम पर ठहरते, महुआ और कबाब 
इंतजाम जनतंत्र का, तेरा नहीं जवाब 
आमदनी उछली फिरे 
गाँधी जी का मन्त्र था, मद्यपान हो बंद 
उनके चेलों को मगर, ये है बहुत पसंद 
चेले अब तक मौन हैं   

शिवानन्द सिंह "सहयोगी"

मेरठ, उत्तर प्रदेश
दूरभाष: 09412212255

Sunday, July 14, 2013

दुमदार दोहे

सरोकार अब छंद से, रखें न रचनाकार।
कविता बाजारू हुई, संयोजक बाजार।।
नौटंकी जमने लगी।
सोच रही है खोपड़ी, क्या है नक्सलवाद।
राजा घर मोती झरे, बदहाली अपवाद।।
कंकड़ मारे विषमता।
हल प्रमेय करता रहा, बीज गणित का प्रश्न।
श्यामपटों की श्यामता, रही मनाती  जश्न।।
हथेली रही चाकचक।
चलता फिरता आदमी, होता रहा फिरंट।
बिजलीघर से रातभर, निकला नहीं करंट।।
गरमी उबली उमस से।

शिवानन्द सिंह "सहयोगी"
मेरठ, उत्तर प्रदेश 
दूरभाष: 09412212255

Monday, July 8, 2013

दुमदार दोहे

जीवन के हर मोड़ पर, काँटों लड़े करील।
आँखों में तरती रहें, यादें मोती झील।
आद्य गीत आँसू लिखे।।
ज्ञान किताबों में भरा, हरियाली में अन्न।
फिर भी अपना देश यह, नहीं हुआ संपन्न।
कारण जीवन का पतन।।
अथक प्रगति की दौड़ में, आदम भरे कुलाच।
फिर भी बिखरे आज तक, कोलाहल के काँच।
प्रतिहति पर होनी विजय।।
सागर में लेकर चला, नाविक तो बस नाव।
उसने देखे  हैं  कहाँ, तन पर उभरे घाव।
रोटी की चिंता पड़ी।।
मूक दमा है मुकदमा, पैरोकार पुकार।
लेना-देना पेशकश, पेशकार का कार।
तारीखनामा कचहरी।।
छितराये आकाश में, हैं बादल घनघोर।
थिरक रही है मोरनी, कहाँ छिपे चितचोर।
मधुवन पड़ा है सूना।।

शिवानन्द सिंह "सहयोगी"
संपर्क- "शिवभा" ए- 233, गंगा नगर, 
मवाना मार्ग,  मेरठ, उत्तर प्रदेश। 
दूरभाष- 0941221225