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Wednesday, May 11, 2016

सावधान रहें अब पुलिस मंच पर है (पुस्तक समीक्षा)


 सुमित मानव मूल्यों के सप्तरंगी कवि हैं। उनके मूल्यों के विषय लोक व्यवहार के हैंमानवीय प्रवृत्तियों के हैंलोकाचार के हैंभारतीय परिवेश के है। उनका कविता संग्रह समाज में व्याप्त विसंगतियों, विषमताओं एवं विगलती होती परिस्थितियों पर प्रहार कर उन्हें रेखांकित करता है । कविता संग्रह भावनाओं और यथार्थ का समिश्रण है जिसकी कवितायें संवेदनाओं में बहकर प्रस्फुटित हो रही हैं। सुमित समय सचेत हैं। उन्होंने छोटी-छोटी बातों पर दृष्टि डालकर और उन्हें सहज संवेदनाओं में पिरोकर चिंतन के लिए कविता संग्रह में प्रस्तुत किया है ।
सुमित ने अपने इस काव्य संग्रह में आम आदमी की परेशानियों को समाज के साथ-साथ पुलिस विभाग से जोड़कर मुखरित किया प्रतीत होता है लेकिन हकीकत में बात यह है कि पुलिस भी इंसान होती है, पर लोग उसे पुलिस ही मानते हैं इंसान नहीं और समय आने पर उससे जनता दोयम दर्जे का व्यवहार करती है । एक सिपाही की कहानीपुराना सिपाहीमें ही देखिए । सुमित के अभिव्यक्त-कथन में यह पीड़ा उभरकर सामने आती है । सुमित के स्वर में जो उच्छवास प्रकट होता है वह सृजनशीलता की अकुलाहट-व्याकुलता है । वे एक स्वस्थ्य परिवेश को देखना चाहते हैं।
उनकी शीर्षक कविता सावधान! पुलिस मंच पर हैविशुद्ध व्यंग्य कविता है, जो मंचीय लोगों द्वारा किए जा रहे कारनामों पर खुलकर प्रहार कर उन्हें आईना दिखा रही है। विनती सुन लो भगवान’ ’तुम नागनाथ हम साँपनाथकविताओं में व्यंग्य की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता क्योंकि व्यंग्य के दर्शन भी कविता संग्रह में हो रहे हैं। एक बात और सुमित के लेखन हेतु कहना चाहूँगा कि वे सहजता से गंभीर बात कह जाते हैं और हमें चिंतन करने के लिए मजबूर होना पड़ता है यह उनकी लेखनी की सार्थकता है। ऐसा ही ‘गुलाम’, ‘भेड़ों की चिंता, ‘थू’ आओ जलाएं रावणपन आदि कविताओं में परिलक्षित हो रहा है।
जहाँ मंच पर कवियों के गिरते स्तर को उन्होंने अपनी लेखनी में सम्मिलित किया है तो वहीं वय उमर के चलतू प्रेम तू लड़की है झकासअपुन लड़का बिंदास’ ’तेरी चाहत में बना देवदास’ आदि समय के प्रभाव की रचना हैलेकिन बकरे का इंतजार’ और अच्छा है बकरापन’ ‘धंधेवाली’ ’वो बच्ची’ ‘खूनी दरवाजा’ लेखक के चिन्तन की पूर्ण परिपक्व रचनायें कहीं जा सकती हैंजिनके द्वारा वे समाज पर सटीक प्रहार करते हुए गंभीर चिन्तन के लिए प्रेरित करते हुए प्रतीत हो रहे हैं। इन कविताओं को राष्ट्रीय फलक पर रखा जा सकता है। लेखक वर्तमान परिस्थितियों से मनाएँ पन्द्रह अगस्त’ ‘बन जा भारत का किसान’ में भी रूबरू होता है । आज लोगों ने गिरगिट को भी मात कर दिया है इसीलिए तो ऐसे छली और प्रपंची लोगों का जमावड़ा समाज में है जो अपने स्वार्थ के लिए समाज में भ्रम फैला रहे हैं। ऐसे लोगों एव ऐसी परिस्थितियों को केन्द्र कें रखकर सुमित का रचनाकर्म सार्थक उॅचाईयों को छू रहा है। भाषा भी स्थानीयसहज और आम बोल चाल की है इसीलिए पाठक इस कविता संग्रह को सहजता से आत्मसात कर सकेंगे।
पुस्तक - सावधान ! पुलिस मंच पर है
लेखक - सुमित प्रताप सिंहनई दिल्ली
प्रकाशक- हिन्दी साहित्य निकेतनबिजनौरउ.प्र.
पृष्ठ - 104
मूल्य - 200 रुपए
समीक्षक - श्री रमाकान्त ताम्रकारजबलपुर, मध्य प्रदेश  

Tuesday, April 26, 2016

सावधान! अब पुलिस मंच पर भी है (समीक्षा)


‘सावधान! पुलिस मंच पर है’  यह सुनकर पाठकगण डरें नहीं, क्योंकि यह मात्र एक पुस्तक का नाम है,  जो कि व्यंग्य कविताओं का संग्रह है और इसके रचनाकार हैं युवा कवि और लेखक सुमित प्रताप सिंह। इस कविता संग्रह में कटाक्ष करती हुईं  कुछ कविताएँ खड़ी बोली हिन्दी की हैं और कुछ कविताएँ  ग्रामीण भाषा के लबादे में हैं।   इस संग्रह में संकलित  व्यंग्य कविताएँ काफी रोचक और सजीव हैं कि पढ़ते हुए मानस पटल पर एक छायाचित्र खींचने में सफल होती हैं। अधिकतर कविताएँ सामाजिक विषयों पर आधारित है। मुसीबतों के आने पर पर हमारा समाज पुलिस पर ही आश्रित होता है। कवि के अनुसार पुलिस की भूमिका और कर्तव्य इस कदर बढ़ चुके हैं, कि पुलिस को अब मंचों को भी सम्भालना होगाऔर उसकी मर्यादा की रक्षा के लिए तत्पर रहना पड़ेगा। इस संग्रह की पहली कविता लोक सभा चुनाव के दौरान लिखी गयी थी। कवि ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से देश के अच्छे भविष्य की उम्मीद की आशा के साथ इस कविता को लिखा है। हालांकि पहली कविता से मोदी विरोधी थोड़े और नाराज हो सकते हैं, क्योंकि उनकी नाराजगी तभी से आरंभ हो चुकी होगी जब उन्होंने पुस्तक का समर्पण पृष्ठ खोलकर देखा होगा, क्योंकि कवि ने अपने इस कविता संग्रह को देश के प्रधानसेवक श्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी को सादर समर्पित किया है।
           कविता संग्रह की दूसरी कविता "कवि घंटाल" आज के लेखक समुदाय पर करारा प्रहार करती है। आज का लेखक क्या सोचता है उसकी मानसिकता कैसी है? वह खुद में स्वयंभू है और सम्मान पाने के लिये किस तरह से सांठ-गांठ करता है इस पर एक दृष्टि कविता की निम्न पंक्तियों के माध्यम से डालिएगा : -
"हमने लिख लईं कविता चार
अब करनो है इनको प्रचार
दुय-चार हमें सम्मान दिलाय देओ
किनके पांव छूने बताय देओ
मालिश करनी तो बऊ करएँ
पदमश्री तक हम नहीं टरएँ
आओ एक- दूजे की पीठ खुजाएँ
मिल-जुल के आगे बढ़ जाएँ।
यकीनन उपरोक्त पंक्तियाँ आज के परिप्रेक्ष्य में एक ऐसी सच्चाई है जिसको समाज जानते हुए भी स्वीकार करने से परहेज करता है। इस संग्रह की यह कविता मुझे बेहद पसंद आयी। चूंकि कवि पुलिस विभाग में कार्यरत है तो इसकी रचनाओं में इसका असर भी दिखता है। कवि समाज और पुलिस दोनों की भूमिकाओं को तीसरी नजर से देखता और कम शब्दों में तीखे बाण तानता हुआ दिखा। कवि का पुलिसिया अनुभव भी इसकी कविताओं जगह बनाने में कामयाबी पाता है। जहाँ ये कविता के माध्यम से जेबकतरों से डरवाने के साथ-साथ सतर्क भी करता है। कवि कटाक्ष करने हेतु कहीं देवदास बन बैठा है तो कहीं बिंदास लड़का। असहिष्णुता की आड़ में राजनीति करने वाले साहित्यकार भी कवि की व्यंग्य दृष्टि  से बच नहीं पाए। सम्मान लौटाने की उत्कंठा इतनी कि उसके मन में विचार आता है : -
"हम अपुरस्कृत लोग
दुख व पीड़ा से
उदास और बेचैन हो
अक्सर छटपटाते
काश!
हम भी सम्मान लौटा पाते।
इन पंक्तियों को पढ़कर कवि की मानसिक छटपटाहट को महसूस कर सकता है कि वह क्या सोचता है? कविताओं के अगले क्रम में ही एक कविता शीर्षक है "विनती सुन लो भगवान" जो कि देश में मँहगाई की समस्या पर लिखी गई है। टमाटर और प्याज के बढ़ते दामों से कवि इतना प्रभावित है कि वह अगले जनम खुद ही टमाटर और प्याज बनने की प्रार्थना भगवान से कर बैठता है।
           संग्रह की एक कविता " होली तो हो ली" समाज व हमारे तीज-त्यौहारों पर  सोशल मीडिया किस तरह से काबिज़ हो चुका है इस पर कवि ने इस कविता के द्वारा जोरदार व्यंग्य कसा है। यह एक ऐसा कविता संग्रह हैं जिसमें पाठक को हर क्षेत्र व विषय पर हँसातीं और गुदगुदातीं रचनाएँ मौजूद हैं। चूंकि व्यंग्य एक ऐसी विधा है जिसके माध्यम से बड़े से बड़े गम्भीर मुद्दों पर चोटिल प्रहार किया जाता है । कवि ने समाज में व्याप्त छोटे-छोटे मुद्दों को भी बड़ी संजीदगी से उठाया  है और उठाकर आराम -आराम से धो-धो कर पछाड़ा है। अलबत्ता  इस संग्रह को मैं व्यंग्य कविताओं का मिक्स वेजिटेबल नाम देती हूँ जो थोड़ा मीठा-नमकीन और थोड़ा तीखा है। जिसको पढ़कर आपको भी उतना ही आनंद आयेगा जितना कि मुझे आया। समाज में व्याप्त अनियमितताओं, कुरीतियों व विद्रूपता को इस कविता संग्रह में इतने अच्छे ढंग से रखा गया है कि पाठकगण का ध्यान संग्रह पढ़ने के साथ-साथ सामाजिक मुद्दों पर विचार- विमर्श के लिए बाध्य करेगा है। सुमित प्रताप सिंह को इस कविता संग्रह हेतु हार्दिक बधाई एवं उज्जवल भविष्य हेतु शुभकामनाएँ!
पुस्तक -  सावधान!पुलिस मंच पर है।
लेखक-   सुमित प्रताप सिंह
प्रकाशक- हिन्दी साहित्य निकेतन, बिजनौर, उ.प्र.
पृष्ठ - 104
मूल्य -  200 रुपए
समीक्षक - शशि पाण्डेय, नई दिल्ली।
इस पुस्तक को आप निम्न लिंक पर क्लिक करके Online भी मँगवा सकते हैं : -

Monday, April 18, 2016

पुस्तक समीक्षा : कुछ अनोखी है ‘सावधान पुलिस मंच पर है’


सावधान पुलिस मंच पर है’ जितना अनोखा इस पुस्तक का नाम हैउतनी ही सावधानी रचनाकार ने कविताओं के चयन में की है। सुमित प्रताप सिंह अब सिर्फ नाम नहींअपितु व्यंग्य जगत में युवा रचनाकारों में जाना-माना चेहरा बन चुका है और यह बात कहने में मुझे कतई संकोच महसूस नहीं हो रहा है। मैं सुमित को तबसे जानती हूंजब उनकी पहली किताब पुलिस की ट्रैनिंगमुसीबतो की रेनिंग’ प्रकाशित हुई थी। आज इस बात को करीब 10 साल हो गए हैं और तब से लेकर अब तक सुमित की लेखन शैली में जो बदलाव आया है उसे देख मुझे हर्ष की अनुभूति होती है। अपनी रचनाओं में व्यंग्य के स्तर को सुमित ने किस स्तर पर पहुंच दिया हैउसका अंदाजा सावधान पुलिस मंच पर है’ को पढ़कर सहज लगाया जा सकता है।
सुमित की शुरू से खासियत रही है कि वो हमारे आसपास हो रहे घटनाक्रम को अलग नजरिए से देखते व परखते हैं और फिर उसे कविताकहानी अथवा व्यंग्य के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। सावधान पुलिस मंच पर है’ में भी उन्होंने कुछ ऐसा ही करने का प्रयास किया हैजिसमें वो काफी हद तक सफल भी हुए हैं। कहीं उन्होंने गंभीर विषय को चुटीले अंदाज में कहकर एक तरफ तो उस पर कटाक्ष करते हैं तो दूसरी तरफ पाठक को उस विषय पर सोचने को लिए विवश करते हैं। इस काव्य संग्रह की भाषाशैली भी ऐसी हैजो पाठकों को अपने साथ जोड़े रखने में मदद करती हैसाथ ही उनकी कविताओं का मर्म को समझने में दिमाग के घोड़े नहीं दौड़ाने पड़ते। अगर युवाओं की बात करें तो यह कहना गलत नहीं होगा कि उनका साहित्य खासकर हिंदी कविताओं से मोह भंग हो रहा हैलेकिन सुमित सावधान पुलिस मंच पर है’ के जरिए युवाओं को एक बार फिर से इससे जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। अब इस जरा इस कविता पर गौर कीजिए तू लड़की झकासअपुन लड़का बिंदास,तेरी आंखें कुछ खासअपुन हो गया खल्लास।
बड़ी मस्त तेरी बोलीतुझे देख नीयत डोली,मेरे दिल की खाली खोलीआ खेलें प्यार की होली।
तू पाव अपुन वड़ातेरे वेट में कबसे खड़ा,तेरे वास्ते सबसे लड़ातुझ बिन लाइफ बिल्कुल सड़ा।
अब इस भाषा शैली को आप क्या कहेंगे। बेशक इस कविता में जो वाक्य विन्यास है और जिन शब्दों का प्रयोग किया गया हैसंभवत: वो हिंदी साहित्य के मानकों पर इतर होलेकिन यह कहना भी गलत नहीं होगा कि इससे युवा वर्ग जरूर आकर्षित होगा और कविता पढ़ने पर मजबूर होगा। इसे पढ़कर वह यही सोचेगा कि अरे ये तो मेरे ही शब्द और भावनाएं हैं और अगर रचाकार ऐसा करने में सफल होता है तो यह न सिर्फ उसकीअपितु हिंदी साहित्य जगत की जीत होगी। अगर युवा पीढ़ी इस माध्यम से एक बार फिर हिंदी कविता व कहानियों की ओर आकर्षित होती है तो उसमें हर्ज ही क्या है। बड़े बुजुर्ग कहते भी हैं कि अगर हाजमा खराब हो तो कुछ हल्का-फुल्का आजमाना चाहिए। सुमित इस कॉम्बो पैकेज में यही करने का प्रयास कर रहे हैं। इस तरह के प्रयोग कई वरिष्ठ लेखक भी कर चुके हैं और वो उसमें सफल भी रहे हैं।
इस काव्य संग्रह से प्रभावित होने के और भी कई कारण रहे हैं। उनमें से एक यह है कि सुमित ने इस समाज में खत्म होती जा रही संवेदना को झकझोरने का प्रयास किया है। उसकी एक बानगी अच्छा है बकरापन’ कविता में झलकती है। इस कविता की निम्न पंक्तियों पर ध्यान दें : -
अबे ओ गुच्चन!
तूने बना डाला मुझे रंडवा,मेरे सामने ही बेचा
मेरी बकरी रानी का एक-एक खंडवा,आ आ मुझे काट,जितने चाहे टुकड़ों में ले बांट,तभी पड़ोस के फ़ज़लू ने आकर बताया,इलाके में हो गया है दंगा,सेना ने कस लिया शिंकजा,मुसलमानों ने मंदिरों में और
हिंदुओं ने मस्जिदों में लगा दी है आग,यह सुन गुच्चन की दुष्ट आत्मा गई जाग,उसने अपने बचपन के यार,सूरज पंडित को जाकर दो भागों में बांट दिया,सूरज के बेटे ने आकर,गुच्चन को बीच से काट दिया।
आगे की पंक्तियां देखिए कैसे लेखक शून्यहीन हो चुके समाज पर चोट करता है : -
अब मुझे दुख नहीं कि मैं बकरा पैदा हुआ,हम इन इंसानों से अच्छे हैं,इनसे कई गुना सच्चे हैं,कभी कोई बकरा या मुर्गा,किसी दूसरे बकरे या मुर्गे को
काटतालूटता या जलाता नहीं,आज मुझे हुआ यह अहसास है,मुझे अपने बकरेपन पर नाज है।
सुमित ने इस कविता के जरिए खंड-खंड होते सामाजिक मुद्दों को इतनी सहजता व सरलता से उठाया है कि हमें सोचने पर विवश हो जाते हैं हम किस तरह की दुनिया का निर्माण कर रहे हैं और आने वाली पीढ़ी को विरासत में क्या देकर जाने वाले हैं। इस कविता ने मेरे वजूद पर सवाल खड़ा कर दिया तथा साथ ही साथ सामाजिक मूल्यों को समझने की एक नई शक्ति दी। इतना ही यह उन लोगों के गाल पर करारा तमाचा है जो कहने को तो इंसान हैंलेकिन व्यवहार के मामले में बकरापन उनसे कहीं बेहतर है। यहां मैं ये जरूर कहना चाहूंगा कि अगर हम सभी इंसानीयत न सही बकरेपन पर ही उतर आए तो शायद एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकें।
एक और कविता का जिक्र करने से खुद को नहीं रोक पा रही हूं। आओ जलाएं रावणपन’ नामक कविता मुझे इसलिए भी प्रिय हैक्योंकि हम कभी अपने अंदर की मैल व बुराइयों को उजागर नहीं होने देते और फिर धीरे-धीरे वो हम पर इतना हावी हो जाती है कि हम उसके हाथों कठपुतली बन जाते हैं।
जरा निम्न पंक्तियों पर गौर करें : -
हमने एक सेठजी से पूछा
राम ने रावण को क्यों मारा?लालाजी कुछ कहिए,सेठजी इतराकर बोले- रावण था बड़ा घमंडी,इसलिए राम से मारा गया पाखंडी।
इतना कहकर सेठजी ने
अपने बगल में खड़े
फटेहाल मानव को घूरा और
अपने शाही कपड़ों पर इतराते हुए
भीड़ में गुम हो गए।
अब इन पंक्तियों पर ध्यान दें : -
अबकी बार हमने मुल्ला जी से पूछा,जनाब राम ने रावण को हलाक क्यों किया?मुल्लाजी अपना पान से भरा
मुंह खाली करते हुए बोले
हुजूर जहां तक हमने
अपने हिंदू दोस्तों से सुना है कि
रावण था बड़ा लालची और
करता था लंका पर राज
जनाब राम ने उसे मारकर ठीक किया।
यह कहते-कहते मुल्लाजी की नजर
अपने पैर के बगल में पड़े
एक रुपये के सिक्के पर पड़ गई
वहीं मुल्ला जी की नीयत बिगड़ गई,जूता का फीता बांधने के बहाने नीचे झुके
और रुपया उठाने के बाद
वहां एक पल भी नहीं रुके।

सुमित की लेखनी उसी प्रकार हैजो हमारा मनोरंजन तो करती हैसाथ ही उस पथ प्रदर्शक की तरह भी हैजो राह भटक चुके दृष्टिहीन का हाथ पकड़ पथ प्रदर्शन करती है। साथ ही मुझे यह कहने में भी बिलकुल हिचक महसूस नहीं हो रही कि यह तो सुमित के लिए प्रारंभ भर है। अभी तो उन्हें लंबा सफर तय करना है। साथ ही हिंदी व्यंग्य का स्तर इतना ऊंचा करना है कि वो आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल कायम कर सके।

पुस्तक - सावधान! पुलिस मंच पर है।
लेखक- सुमित प्रताप सिंह
प्रकाशक- हिन्दी साहित्य निकेतनबिजनौरउ.प्र.
पृष्ठ - 104
मूल्य - 200 रुपये
समीक्षक : दीपा जोशीरोहिणीदिल्ली।

Sunday, April 10, 2016

मेरे जन्मदिन का तोहफा


    ज मेरा जन्मदिन है औरों की तरह मैं प्रफुल्लित नहीं हूँ, कि आज मेरा जन्मदिन है मैं औरों की भांति यह भी नहीं सोच रहा कि मैं कोई महान व्यक्ति हूँ इसलिए सभी को मेरा जन्मदिन बड़े धूमधाम से मनाना चाहिए और मेरे घर का कम से कम एक कमरा तो तोहफों से भर देना चाहिए, न ही मेरे मन में आत्ममोही भले मानवों की तरह ये ख्याल आ रहा है, कि भविष्य में मेरे सम्मान में फर्लो मारने के लिए मेरे जन्मदिन पर सार्वजनिक अवकाश घोषित किया जाए सच कहूँ आज जब मैं सुबह सोकर उठा तो मैं बहुत उदास था अब उदास होता भी क्यों न अरे भाई आज के दिन मैं एक साल और पुराना हो गया हूँ बेशक लोग इस गम को छुपा जाते हों और ऊपरी मन से अपने जन्मदिवस पर हो-हल्ला करते हों पर मुझसे ये नहीं हो पाया सुबह उबासी लेते हुए जब मैंने आइना देखा तो मेरे सिर में से झांकते दो-तीन सफ़ेद बालों ने मुझे सोचने पर विवश कर दिया, कि मैं एक साल और पुराना हो गया हूँ इसलिए मैं शौच इत्यादि से निवृत होकर पार्क की ओर भागा और वहाँ तन्मयता से योग व प्राणायाम किया यह मेरे पुराने होने से लड़ने का एक छोटा सा प्रयास था इसके बाद मैंने सरकार द्वारा पार्क में जनता की सेहत सुधारने के लिए स्थापित किये गए ओपन जिम में अपनी सेहत सुधारने का प्रयास करने के विषय में सोचा, पर वहाँ मशीनों के पुर्जे गायब मिले मशीनों के पुर्जे शायद किसी बेचारे की आर्थिक सेहत सुधारने के काम आ गए थे और मजे की बात ये थी कि इससे पार्क के चौकीदार की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा था पार्क से आकर स्वयं को पौष्टिक आहार से परिपूर्ण किया फिर सोचा कि आज अपने इक्के-दुक्के सफ़ेद बालों को कालिमा प्रदान की जाए, सो सैलून की राह पकड़ी राह में दसों से सैकड़ों की संख्या पा चुकीं झुग्गियों को देखा तो मन ने विचार किया कि कितने खुशनसीब हैं ये लोग जो समय-समय पर सरकार से नए-नए तोहफे पाते रहते हैं चाहे किसी भी दल की सरकार बने पर इनको तोहफे मिलने निश्चित हैं झोपड़ियों के खिड़की-दरवाजों से झांकते हुए अत्याधुनिक सुख-सुविधा के सामान शायद मुझे जीभ चिढ़ा रहे थे और मुझे मध्यमवर्गीय आम आदमी की योनि में रहने के लिए बार-बार धिक्कार रहे थे झुग्गियों के साम्राज्य की सीमा समाप्त होने के बाद इलाके की मार्किट का क्षेत्र शुरू होता है बचपन में कितना खाली-खाली सा लगता था यह क्षेत्र, लेकिन अब इसमें इतनी बसें और इतनी टैक्सियां खड़ी मिल जायेंगीं, कि संभलकर चलने में ही अपनी भलाई लगती है हालाँकि क्षेत्र की जनता ने समय-समय पर झुग्गियों, बसों एवं टैक्सियों की बढती संख्या के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद की है, किन्तु हुआ कुछ भी नहीं झुग्गीवालों के वोटरुपी तोहफे व टूर-ट्रेवल्स द्वारा संबंधित माननीयों की सेवा में निरंतर अर्पित किये जानेवाले मनमोहक उपहारों ने जनता की आवाज को महत्वहीन बना दिया नतीजा ये है कि झुग्गियों में शराब बिक्री, नशे का व्यापार, वैश्यावृत्ति, जुए व सट्टेबाजी जैसे सुकार्य धड़ल्ले से चलते रहते हैं और इनसे हुई आमदनी का एक निश्चित भाग झुग्गीवासियों पर अपना वरदहस्त रखे हुए माननीयों तक बिना बाधित हुए समय से पहुँचता रहता है टूर-ट्रेवल्स वाले भी अपनी नियमित सेवाएं देकर माननीय महोदयों को प्रसन्न रखते हैं बहरहाल सैलून में बाल कटवाकर सफ़ेद बालों को कालिमा प्रदान करने की योजना इसलिए रद्द करनी पड़ी क्योंकि जेब पर ज्यादा बोझ डालना उचित नहीं लगा बाल कटवाकर घर को आ रहा था तो एक दुकान की ओर नज़र गयी कभी वहाँ सिन्धी स्टोर हुआ करता था मेरा और मेरे साथियों के बचपन कुछ भाग इस सिन्धी स्टोर को चलानेवाले सिन्धी अंकल से किराये पर कॉमिक्स लेकर इसके बगल की सीढ़ियों में बैठकर कॉमिक्स पढ़ते हुए ही बीतता था यहीं हम चाचा चौधरी, साबू, राका, बिल्लू, पिंकी, गब्दू, नागराज और सुपर कमांडो ध्रुव की काल्पनिक दुनिया में सैर किया करते थे अब सिन्धी स्टोर की जगह एक मोबाइल फोन स्टोर खुल गया था अब समय बदल गया है और आज के बच्चे स्मार्ट हो गए है तथा वे कॉमिक्स जैसी फालतू किताबों को पढने के बजाय अपने-अपने स्मार्ट फ़ोनों में कुछ न कुछ स्मार्ट चीज देखना पसंद करने लगे हैं कभी-कभी लगता है कि शायद बदलता हुआ समय हमें ये सब तोहफे दे रहा है मुझे पता है कि आप सब भी मुझे स्नेह व प्रेमवश लाइक, कमेंट व शेयर रुपी तोहफा देंगे तथा मुझसे कुछ अधिक प्रेम करनेवाले आप में से कुछ महानुभाव मेरे इस लेख पर चुपचाप बस एक दृष्टि डालकर अपनी-अपनी राह निकल लेंगे इसलिए इन सब बातों की परवाह किये बिना मैंने स्वयं ही स्वयं को तोहफा देने का निश्चय किया है अपने पथ पर निरंतर बढ़ते हुए अपनी मंजिल पाने का संकल्प ही इस जन्मदिन पर मेरा स्वयं को अनमोल तोहफा है

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

Monday, February 29, 2016

जन मानस का जीवन वृतांत सुनाती हुई पुस्तक


     सुमित प्रताप सिंह की नवप्रकाशित पुस्तक 'सावधान! पुलिस मंच पर है’ पढ़ी जा रही है। हाथ में आते ही यह कविता संग्रह समृद्ध प्रस्तुति का अहसास कराता है। हिन्दी साहित्य निकेतन द्वारा प्रकाशित इस कविता माला का आवरण पृष्ठ एकदम आकर्षित करता है जिसकी सज्जा एवं चित्रांकन लाजवाब हैं। प्रभावी मुद्रण की यह पुस्तक 47 कविताओं का उपस्थिति स्थल है। रचनाएं सहजस्वाभाविक व जन जीवन से जुड़ी होने के कारण पाठक को अपनेपन का अहसास कराती हैं। पढ़ते पढ़ते कई जगह यादों के स्वप्नलोक की भी यात्रा हो जाती है। जहाँ पृष्ठों की रचना 'अच्छा है बकरापनद्वारा मनुष्य की 'पशुवृतिकी पतन पराकाष्ठा और जानवरों की 'मानवताकी समृद्ध महानता को बड़े ही सहज भाव से उकेरा गया है वहीं मात्र 19 शब्दों की एक रचना 'काशसम्मान वापसी पाखण्ड पर एक करारा तमाचा है। सामान्य जनजीवन का हिस्सा बन चुके धरना प्रदर्शन व दिल्ली की पेयजल समस्या जैसे विषय जहाँ ख़ूबसूरती से पंक्तिबद्ध किए गए हैं वहीं 'परिवर्तननाम की कविता के माध्यम से बदलते सामाजिक मूल्यों पर कटाक्ष किया गया है। यहाँ कविताओं में एक तरफ सर्वजन हिताय - सर्व जन सुखाय की मनोभावना व्यक्त है तो दूसरी ओर बंजारे मन की आवारगी दृष्टव्य है। पुस्तक शीर्षक वाली कविता पुलिस कार्य प्रणाली का प्रथम दृष्टया वर्णन करती है। एक अन्य रचना द्वारा हाल के ज्वलंत विषय प्याज - टमाटर की महंगाई को बड़े सहज भाव से चिन्हित किया गया है। 
जन सुलभ भाषा में साधारण जनजीवन से जुड़ी ये रचनाएं जन मानस का जीवन वृतांत सुनाती हुई स्वर लहरी हैं। 
कवि ने इस पुस्तक के माध्यम से समाज के प्रति निज उत्तरदायित्व का निर्वहन और कुरीति निवारण का आह्वान किया है। 
सुमित प्रताप सिंह को बहुत बहुत बधाई!

- श्री अनिल समोता 
     इंस्पेक्टर, दिल्ली पुलिस
      द्वारका, नई दिल्ली-75 

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