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Monday, February 13, 2017

सहिष्णुता की खोज (पुस्तक समीक्षा)

       इन दिनों अन्य विधाओं के अलावा व्यंग्य पर ज्यादा काम हो रहा है। यह खबर व्यंग्य यात्रियों के लिए अच्छी हो सकती है, क्योंकि व्यंग्य ही साहित्य में ऐसा धारदार हथियार है जो विसंगतियों, विद्रपताओं को एक झटके में ठीक करने का सामर्थ रखता है । साहित्य में सहिष्णुता की खोज तो पुरातन काल से होती चली आ रही है। सुमित ने भी इस खोज को ऐसे समय जारी रखा जब देश में असहिष्णुता का माहौल निर्मित करने का प्रयास किया जा रहा था। सुमित ने अपने अभिकथन में लिखा है कि नफे और जिले के काल्पनिक पात्र के माध्यम से खोज जारी रखी। व्यंग्य में ऐसे कथोपकथन वाले पात्रों के माध्यम से चोट करने का अच्छा प्रयास है ।
युवा व्यंग्यकार सुमित ने आधुनिक घटनाओं का समावेश अपने संग्रह में किया है चाहे वह साइबर युग के राजा, एक पत्र साक्षी और सिंधू के नाम, एक पत्र माइकल फेल्प्स के नाम, वायरल होने की चाहत या एक पत्र सन्नी लियाॅन के नाम जैसे एक से बढ़कर एक शीर्षकों के साथ घटित तथ्यों पर कटाक्ष किया है। जिसमें एक पत्र आमिर खान के नाम से तत्समय की परिस्थितियों पर बेबाक व्यंग्य किया है। असहिष्णुता की बात कहकर आमिर खान ने ही विवाद को जन्म दिया था और उनके इस विवाद को लेखक ने बड़ी ही संजीदगी से पकड़ लिया। इसके अतिरिक्त क्षणिक लाभ लेनेवाले बुद्धिजीवियों द्वारा लौटाए जा रहे सम्मान ढकोसले को भी उन्होंने सार्थक रूप से फोकस किया है।
इस व्यंग्य संग्रह में सामाजिक और ऐतिहासिक पात्रों का भी संयोजन किया है कंस का प्रतिशोध, आरक्षण महाराज, सच्ची श्रद्धांजलि, फूफा बनाने की परम्परा अच्छे व्यंग्यों में माने जा सकते है । एक बात और सुमित पक्के पुलिसवाले हैं इसीलिए समाज में घटित होनेवाली किसी भी घटना को उसी निगाह से देखकर वे व्यंग्य के सांचे में ढाल लेते हैं। यह उनका सराहनीय कौशल है। ठीक उसी प्रकार पुलिस समाज की पहरेदार होती है और व्यंग्यकार भी समाज का पहरेदार होता है । सुमित दोनों में सामंजस्य या यूँ कहें कि सहिष्णुता का भाव बनाकर चल रहे हैं। थूकाचाटी, गंदी बात, काश! हम भी सम्मान लौटा पाते, अगले जनम में मोहे ठुल्ला ही कीजो, एक पत्र रायते के नाम, नौकरी बचाव यंत्र, एनकांउटर, भैया आँखों से घर तक छोड़के आओगे आदि मुकम्मल व्यंग्य है। सुमित महानगरीय सभ्यता में विगलित होती परम्पराओं एवं सामाजिक सरोकारों को अपनी पैनी निगाह से पकडने का सार्थक प्रयास कऱ रहे है। जहाँ व्यंग्य में चारित्रिक एवं परिवेश गत परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए लक्ष्य पर चोट की है, वहाँ ऐसे पात्रों को सिवाय मन-मसोसकर रहने के अतिरिक्त और विचार करने के अलावा कुछ नहीं बचता, तभी तो व्यंग्यकार को समाज-सुधारक भी कहा गया है।

पुस्तक : सहिष्णुता की खोज
लेखक: श्री सुमित प्रताप सिंह
समीक्षक - श्री रमाकान्त ताम्रकार, जबलपुर, म.प्र.
प्रकाशक: सी.पी. हाउस, रामा विहार, दिल्ली
पृष्ठ : 119
मूल्य : 160/-

Wednesday, May 11, 2016

सावधान रहें अब पुलिस मंच पर है (पुस्तक समीक्षा)


 सुमित मानव मूल्यों के सप्तरंगी कवि हैं। उनके मूल्यों के विषय लोक व्यवहार के हैंमानवीय प्रवृत्तियों के हैंलोकाचार के हैंभारतीय परिवेश के है। उनका कविता संग्रह समाज में व्याप्त विसंगतियों, विषमताओं एवं विगलती होती परिस्थितियों पर प्रहार कर उन्हें रेखांकित करता है । कविता संग्रह भावनाओं और यथार्थ का समिश्रण है जिसकी कवितायें संवेदनाओं में बहकर प्रस्फुटित हो रही हैं। सुमित समय सचेत हैं। उन्होंने छोटी-छोटी बातों पर दृष्टि डालकर और उन्हें सहज संवेदनाओं में पिरोकर चिंतन के लिए कविता संग्रह में प्रस्तुत किया है ।
सुमित ने अपने इस काव्य संग्रह में आम आदमी की परेशानियों को समाज के साथ-साथ पुलिस विभाग से जोड़कर मुखरित किया प्रतीत होता है लेकिन हकीकत में बात यह है कि पुलिस भी इंसान होती है, पर लोग उसे पुलिस ही मानते हैं इंसान नहीं और समय आने पर उससे जनता दोयम दर्जे का व्यवहार करती है । एक सिपाही की कहानीपुराना सिपाहीमें ही देखिए । सुमित के अभिव्यक्त-कथन में यह पीड़ा उभरकर सामने आती है । सुमित के स्वर में जो उच्छवास प्रकट होता है वह सृजनशीलता की अकुलाहट-व्याकुलता है । वे एक स्वस्थ्य परिवेश को देखना चाहते हैं।
उनकी शीर्षक कविता सावधान! पुलिस मंच पर हैविशुद्ध व्यंग्य कविता है, जो मंचीय लोगों द्वारा किए जा रहे कारनामों पर खुलकर प्रहार कर उन्हें आईना दिखा रही है। विनती सुन लो भगवान’ ’तुम नागनाथ हम साँपनाथकविताओं में व्यंग्य की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता क्योंकि व्यंग्य के दर्शन भी कविता संग्रह में हो रहे हैं। एक बात और सुमित के लेखन हेतु कहना चाहूँगा कि वे सहजता से गंभीर बात कह जाते हैं और हमें चिंतन करने के लिए मजबूर होना पड़ता है यह उनकी लेखनी की सार्थकता है। ऐसा ही ‘गुलाम’, ‘भेड़ों की चिंता, ‘थू’ आओ जलाएं रावणपन आदि कविताओं में परिलक्षित हो रहा है।
जहाँ मंच पर कवियों के गिरते स्तर को उन्होंने अपनी लेखनी में सम्मिलित किया है तो वहीं वय उमर के चलतू प्रेम तू लड़की है झकासअपुन लड़का बिंदास’ ’तेरी चाहत में बना देवदास’ आदि समय के प्रभाव की रचना हैलेकिन बकरे का इंतजार’ और अच्छा है बकरापन’ ‘धंधेवाली’ ’वो बच्ची’ ‘खूनी दरवाजा’ लेखक के चिन्तन की पूर्ण परिपक्व रचनायें कहीं जा सकती हैंजिनके द्वारा वे समाज पर सटीक प्रहार करते हुए गंभीर चिन्तन के लिए प्रेरित करते हुए प्रतीत हो रहे हैं। इन कविताओं को राष्ट्रीय फलक पर रखा जा सकता है। लेखक वर्तमान परिस्थितियों से मनाएँ पन्द्रह अगस्त’ ‘बन जा भारत का किसान’ में भी रूबरू होता है । आज लोगों ने गिरगिट को भी मात कर दिया है इसीलिए तो ऐसे छली और प्रपंची लोगों का जमावड़ा समाज में है जो अपने स्वार्थ के लिए समाज में भ्रम फैला रहे हैं। ऐसे लोगों एव ऐसी परिस्थितियों को केन्द्र कें रखकर सुमित का रचनाकर्म सार्थक उॅचाईयों को छू रहा है। भाषा भी स्थानीयसहज और आम बोल चाल की है इसीलिए पाठक इस कविता संग्रह को सहजता से आत्मसात कर सकेंगे।
पुस्तक - सावधान ! पुलिस मंच पर है
लेखक - सुमित प्रताप सिंहनई दिल्ली
प्रकाशक- हिन्दी साहित्य निकेतनबिजनौरउ.प्र.
पृष्ठ - 104
मूल्य - 200 रुपए
समीक्षक - श्री रमाकान्त ताम्रकारजबलपुर, मध्य प्रदेश  

Tuesday, April 26, 2016

सावधान! अब पुलिस मंच पर भी है (समीक्षा)


‘सावधान! पुलिस मंच पर है’  यह सुनकर पाठकगण डरें नहीं, क्योंकि यह मात्र एक पुस्तक का नाम है,  जो कि व्यंग्य कविताओं का संग्रह है और इसके रचनाकार हैं युवा कवि और लेखक सुमित प्रताप सिंह। इस कविता संग्रह में कटाक्ष करती हुईं  कुछ कविताएँ खड़ी बोली हिन्दी की हैं और कुछ कविताएँ  ग्रामीण भाषा के लबादे में हैं।   इस संग्रह में संकलित  व्यंग्य कविताएँ काफी रोचक और सजीव हैं कि पढ़ते हुए मानस पटल पर एक छायाचित्र खींचने में सफल होती हैं। अधिकतर कविताएँ सामाजिक विषयों पर आधारित है। मुसीबतों के आने पर पर हमारा समाज पुलिस पर ही आश्रित होता है। कवि के अनुसार पुलिस की भूमिका और कर्तव्य इस कदर बढ़ चुके हैं, कि पुलिस को अब मंचों को भी सम्भालना होगाऔर उसकी मर्यादा की रक्षा के लिए तत्पर रहना पड़ेगा। इस संग्रह की पहली कविता लोक सभा चुनाव के दौरान लिखी गयी थी। कवि ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से देश के अच्छे भविष्य की उम्मीद की आशा के साथ इस कविता को लिखा है। हालांकि पहली कविता से मोदी विरोधी थोड़े और नाराज हो सकते हैं, क्योंकि उनकी नाराजगी तभी से आरंभ हो चुकी होगी जब उन्होंने पुस्तक का समर्पण पृष्ठ खोलकर देखा होगा, क्योंकि कवि ने अपने इस कविता संग्रह को देश के प्रधानसेवक श्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी को सादर समर्पित किया है।
           कविता संग्रह की दूसरी कविता "कवि घंटाल" आज के लेखक समुदाय पर करारा प्रहार करती है। आज का लेखक क्या सोचता है उसकी मानसिकता कैसी है? वह खुद में स्वयंभू है और सम्मान पाने के लिये किस तरह से सांठ-गांठ करता है इस पर एक दृष्टि कविता की निम्न पंक्तियों के माध्यम से डालिएगा : -
"हमने लिख लईं कविता चार
अब करनो है इनको प्रचार
दुय-चार हमें सम्मान दिलाय देओ
किनके पांव छूने बताय देओ
मालिश करनी तो बऊ करएँ
पदमश्री तक हम नहीं टरएँ
आओ एक- दूजे की पीठ खुजाएँ
मिल-जुल के आगे बढ़ जाएँ।
यकीनन उपरोक्त पंक्तियाँ आज के परिप्रेक्ष्य में एक ऐसी सच्चाई है जिसको समाज जानते हुए भी स्वीकार करने से परहेज करता है। इस संग्रह की यह कविता मुझे बेहद पसंद आयी। चूंकि कवि पुलिस विभाग में कार्यरत है तो इसकी रचनाओं में इसका असर भी दिखता है। कवि समाज और पुलिस दोनों की भूमिकाओं को तीसरी नजर से देखता और कम शब्दों में तीखे बाण तानता हुआ दिखा। कवि का पुलिसिया अनुभव भी इसकी कविताओं जगह बनाने में कामयाबी पाता है। जहाँ ये कविता के माध्यम से जेबकतरों से डरवाने के साथ-साथ सतर्क भी करता है। कवि कटाक्ष करने हेतु कहीं देवदास बन बैठा है तो कहीं बिंदास लड़का। असहिष्णुता की आड़ में राजनीति करने वाले साहित्यकार भी कवि की व्यंग्य दृष्टि  से बच नहीं पाए। सम्मान लौटाने की उत्कंठा इतनी कि उसके मन में विचार आता है : -
"हम अपुरस्कृत लोग
दुख व पीड़ा से
उदास और बेचैन हो
अक्सर छटपटाते
काश!
हम भी सम्मान लौटा पाते।
इन पंक्तियों को पढ़कर कवि की मानसिक छटपटाहट को महसूस कर सकता है कि वह क्या सोचता है? कविताओं के अगले क्रम में ही एक कविता शीर्षक है "विनती सुन लो भगवान" जो कि देश में मँहगाई की समस्या पर लिखी गई है। टमाटर और प्याज के बढ़ते दामों से कवि इतना प्रभावित है कि वह अगले जनम खुद ही टमाटर और प्याज बनने की प्रार्थना भगवान से कर बैठता है।
           संग्रह की एक कविता " होली तो हो ली" समाज व हमारे तीज-त्यौहारों पर  सोशल मीडिया किस तरह से काबिज़ हो चुका है इस पर कवि ने इस कविता के द्वारा जोरदार व्यंग्य कसा है। यह एक ऐसा कविता संग्रह हैं जिसमें पाठक को हर क्षेत्र व विषय पर हँसातीं और गुदगुदातीं रचनाएँ मौजूद हैं। चूंकि व्यंग्य एक ऐसी विधा है जिसके माध्यम से बड़े से बड़े गम्भीर मुद्दों पर चोटिल प्रहार किया जाता है । कवि ने समाज में व्याप्त छोटे-छोटे मुद्दों को भी बड़ी संजीदगी से उठाया  है और उठाकर आराम -आराम से धो-धो कर पछाड़ा है। अलबत्ता  इस संग्रह को मैं व्यंग्य कविताओं का मिक्स वेजिटेबल नाम देती हूँ जो थोड़ा मीठा-नमकीन और थोड़ा तीखा है। जिसको पढ़कर आपको भी उतना ही आनंद आयेगा जितना कि मुझे आया। समाज में व्याप्त अनियमितताओं, कुरीतियों व विद्रूपता को इस कविता संग्रह में इतने अच्छे ढंग से रखा गया है कि पाठकगण का ध्यान संग्रह पढ़ने के साथ-साथ सामाजिक मुद्दों पर विचार- विमर्श के लिए बाध्य करेगा है। सुमित प्रताप सिंह को इस कविता संग्रह हेतु हार्दिक बधाई एवं उज्जवल भविष्य हेतु शुभकामनाएँ!
पुस्तक -  सावधान!पुलिस मंच पर है।
लेखक-   सुमित प्रताप सिंह
प्रकाशक- हिन्दी साहित्य निकेतन, बिजनौर, उ.प्र.
पृष्ठ - 104
मूल्य -  200 रुपए
समीक्षक - शशि पाण्डेय, नई दिल्ली।
इस पुस्तक को आप निम्न लिंक पर क्लिक करके Online भी मँगवा सकते हैं : -

Monday, April 18, 2016

पुस्तक समीक्षा : कुछ अनोखी है ‘सावधान पुलिस मंच पर है’


सावधान पुलिस मंच पर है’ जितना अनोखा इस पुस्तक का नाम हैउतनी ही सावधानी रचनाकार ने कविताओं के चयन में की है। सुमित प्रताप सिंह अब सिर्फ नाम नहींअपितु व्यंग्य जगत में युवा रचनाकारों में जाना-माना चेहरा बन चुका है और यह बात कहने में मुझे कतई संकोच महसूस नहीं हो रहा है। मैं सुमित को तबसे जानती हूंजब उनकी पहली किताब पुलिस की ट्रैनिंगमुसीबतो की रेनिंग’ प्रकाशित हुई थी। आज इस बात को करीब 10 साल हो गए हैं और तब से लेकर अब तक सुमित की लेखन शैली में जो बदलाव आया है उसे देख मुझे हर्ष की अनुभूति होती है। अपनी रचनाओं में व्यंग्य के स्तर को सुमित ने किस स्तर पर पहुंच दिया हैउसका अंदाजा सावधान पुलिस मंच पर है’ को पढ़कर सहज लगाया जा सकता है।
सुमित की शुरू से खासियत रही है कि वो हमारे आसपास हो रहे घटनाक्रम को अलग नजरिए से देखते व परखते हैं और फिर उसे कविताकहानी अथवा व्यंग्य के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। सावधान पुलिस मंच पर है’ में भी उन्होंने कुछ ऐसा ही करने का प्रयास किया हैजिसमें वो काफी हद तक सफल भी हुए हैं। कहीं उन्होंने गंभीर विषय को चुटीले अंदाज में कहकर एक तरफ तो उस पर कटाक्ष करते हैं तो दूसरी तरफ पाठक को उस विषय पर सोचने को लिए विवश करते हैं। इस काव्य संग्रह की भाषाशैली भी ऐसी हैजो पाठकों को अपने साथ जोड़े रखने में मदद करती हैसाथ ही उनकी कविताओं का मर्म को समझने में दिमाग के घोड़े नहीं दौड़ाने पड़ते। अगर युवाओं की बात करें तो यह कहना गलत नहीं होगा कि उनका साहित्य खासकर हिंदी कविताओं से मोह भंग हो रहा हैलेकिन सुमित सावधान पुलिस मंच पर है’ के जरिए युवाओं को एक बार फिर से इससे जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। अब इस जरा इस कविता पर गौर कीजिए तू लड़की झकासअपुन लड़का बिंदास,तेरी आंखें कुछ खासअपुन हो गया खल्लास।
बड़ी मस्त तेरी बोलीतुझे देख नीयत डोली,मेरे दिल की खाली खोलीआ खेलें प्यार की होली।
तू पाव अपुन वड़ातेरे वेट में कबसे खड़ा,तेरे वास्ते सबसे लड़ातुझ बिन लाइफ बिल्कुल सड़ा।
अब इस भाषा शैली को आप क्या कहेंगे। बेशक इस कविता में जो वाक्य विन्यास है और जिन शब्दों का प्रयोग किया गया हैसंभवत: वो हिंदी साहित्य के मानकों पर इतर होलेकिन यह कहना भी गलत नहीं होगा कि इससे युवा वर्ग जरूर आकर्षित होगा और कविता पढ़ने पर मजबूर होगा। इसे पढ़कर वह यही सोचेगा कि अरे ये तो मेरे ही शब्द और भावनाएं हैं और अगर रचाकार ऐसा करने में सफल होता है तो यह न सिर्फ उसकीअपितु हिंदी साहित्य जगत की जीत होगी। अगर युवा पीढ़ी इस माध्यम से एक बार फिर हिंदी कविता व कहानियों की ओर आकर्षित होती है तो उसमें हर्ज ही क्या है। बड़े बुजुर्ग कहते भी हैं कि अगर हाजमा खराब हो तो कुछ हल्का-फुल्का आजमाना चाहिए। सुमित इस कॉम्बो पैकेज में यही करने का प्रयास कर रहे हैं। इस तरह के प्रयोग कई वरिष्ठ लेखक भी कर चुके हैं और वो उसमें सफल भी रहे हैं।
इस काव्य संग्रह से प्रभावित होने के और भी कई कारण रहे हैं। उनमें से एक यह है कि सुमित ने इस समाज में खत्म होती जा रही संवेदना को झकझोरने का प्रयास किया है। उसकी एक बानगी अच्छा है बकरापन’ कविता में झलकती है। इस कविता की निम्न पंक्तियों पर ध्यान दें : -
अबे ओ गुच्चन!
तूने बना डाला मुझे रंडवा,मेरे सामने ही बेचा
मेरी बकरी रानी का एक-एक खंडवा,आ आ मुझे काट,जितने चाहे टुकड़ों में ले बांट,तभी पड़ोस के फ़ज़लू ने आकर बताया,इलाके में हो गया है दंगा,सेना ने कस लिया शिंकजा,मुसलमानों ने मंदिरों में और
हिंदुओं ने मस्जिदों में लगा दी है आग,यह सुन गुच्चन की दुष्ट आत्मा गई जाग,उसने अपने बचपन के यार,सूरज पंडित को जाकर दो भागों में बांट दिया,सूरज के बेटे ने आकर,गुच्चन को बीच से काट दिया।
आगे की पंक्तियां देखिए कैसे लेखक शून्यहीन हो चुके समाज पर चोट करता है : -
अब मुझे दुख नहीं कि मैं बकरा पैदा हुआ,हम इन इंसानों से अच्छे हैं,इनसे कई गुना सच्चे हैं,कभी कोई बकरा या मुर्गा,किसी दूसरे बकरे या मुर्गे को
काटतालूटता या जलाता नहीं,आज मुझे हुआ यह अहसास है,मुझे अपने बकरेपन पर नाज है।
सुमित ने इस कविता के जरिए खंड-खंड होते सामाजिक मुद्दों को इतनी सहजता व सरलता से उठाया है कि हमें सोचने पर विवश हो जाते हैं हम किस तरह की दुनिया का निर्माण कर रहे हैं और आने वाली पीढ़ी को विरासत में क्या देकर जाने वाले हैं। इस कविता ने मेरे वजूद पर सवाल खड़ा कर दिया तथा साथ ही साथ सामाजिक मूल्यों को समझने की एक नई शक्ति दी। इतना ही यह उन लोगों के गाल पर करारा तमाचा है जो कहने को तो इंसान हैंलेकिन व्यवहार के मामले में बकरापन उनसे कहीं बेहतर है। यहां मैं ये जरूर कहना चाहूंगा कि अगर हम सभी इंसानीयत न सही बकरेपन पर ही उतर आए तो शायद एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकें।
एक और कविता का जिक्र करने से खुद को नहीं रोक पा रही हूं। आओ जलाएं रावणपन’ नामक कविता मुझे इसलिए भी प्रिय हैक्योंकि हम कभी अपने अंदर की मैल व बुराइयों को उजागर नहीं होने देते और फिर धीरे-धीरे वो हम पर इतना हावी हो जाती है कि हम उसके हाथों कठपुतली बन जाते हैं।
जरा निम्न पंक्तियों पर गौर करें : -
हमने एक सेठजी से पूछा
राम ने रावण को क्यों मारा?लालाजी कुछ कहिए,सेठजी इतराकर बोले- रावण था बड़ा घमंडी,इसलिए राम से मारा गया पाखंडी।
इतना कहकर सेठजी ने
अपने बगल में खड़े
फटेहाल मानव को घूरा और
अपने शाही कपड़ों पर इतराते हुए
भीड़ में गुम हो गए।
अब इन पंक्तियों पर ध्यान दें : -
अबकी बार हमने मुल्ला जी से पूछा,जनाब राम ने रावण को हलाक क्यों किया?मुल्लाजी अपना पान से भरा
मुंह खाली करते हुए बोले
हुजूर जहां तक हमने
अपने हिंदू दोस्तों से सुना है कि
रावण था बड़ा लालची और
करता था लंका पर राज
जनाब राम ने उसे मारकर ठीक किया।
यह कहते-कहते मुल्लाजी की नजर
अपने पैर के बगल में पड़े
एक रुपये के सिक्के पर पड़ गई
वहीं मुल्ला जी की नीयत बिगड़ गई,जूता का फीता बांधने के बहाने नीचे झुके
और रुपया उठाने के बाद
वहां एक पल भी नहीं रुके।

सुमित की लेखनी उसी प्रकार हैजो हमारा मनोरंजन तो करती हैसाथ ही उस पथ प्रदर्शक की तरह भी हैजो राह भटक चुके दृष्टिहीन का हाथ पकड़ पथ प्रदर्शन करती है। साथ ही मुझे यह कहने में भी बिलकुल हिचक महसूस नहीं हो रही कि यह तो सुमित के लिए प्रारंभ भर है। अभी तो उन्हें लंबा सफर तय करना है। साथ ही हिंदी व्यंग्य का स्तर इतना ऊंचा करना है कि वो आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल कायम कर सके।

पुस्तक - सावधान! पुलिस मंच पर है।
लेखक- सुमित प्रताप सिंह
प्रकाशक- हिन्दी साहित्य निकेतनबिजनौरउ.प्र.
पृष्ठ - 104
मूल्य - 200 रुपये
समीक्षक : दीपा जोशीरोहिणीदिल्ली।

Monday, February 29, 2016

जन मानस का जीवन वृतांत सुनाती हुई पुस्तक


     सुमित प्रताप सिंह की नवप्रकाशित पुस्तक 'सावधान! पुलिस मंच पर है’ पढ़ी जा रही है। हाथ में आते ही यह कविता संग्रह समृद्ध प्रस्तुति का अहसास कराता है। हिन्दी साहित्य निकेतन द्वारा प्रकाशित इस कविता माला का आवरण पृष्ठ एकदम आकर्षित करता है जिसकी सज्जा एवं चित्रांकन लाजवाब हैं। प्रभावी मुद्रण की यह पुस्तक 47 कविताओं का उपस्थिति स्थल है। रचनाएं सहजस्वाभाविक व जन जीवन से जुड़ी होने के कारण पाठक को अपनेपन का अहसास कराती हैं। पढ़ते पढ़ते कई जगह यादों के स्वप्नलोक की भी यात्रा हो जाती है। जहाँ पृष्ठों की रचना 'अच्छा है बकरापनद्वारा मनुष्य की 'पशुवृतिकी पतन पराकाष्ठा और जानवरों की 'मानवताकी समृद्ध महानता को बड़े ही सहज भाव से उकेरा गया है वहीं मात्र 19 शब्दों की एक रचना 'काशसम्मान वापसी पाखण्ड पर एक करारा तमाचा है। सामान्य जनजीवन का हिस्सा बन चुके धरना प्रदर्शन व दिल्ली की पेयजल समस्या जैसे विषय जहाँ ख़ूबसूरती से पंक्तिबद्ध किए गए हैं वहीं 'परिवर्तननाम की कविता के माध्यम से बदलते सामाजिक मूल्यों पर कटाक्ष किया गया है। यहाँ कविताओं में एक तरफ सर्वजन हिताय - सर्व जन सुखाय की मनोभावना व्यक्त है तो दूसरी ओर बंजारे मन की आवारगी दृष्टव्य है। पुस्तक शीर्षक वाली कविता पुलिस कार्य प्रणाली का प्रथम दृष्टया वर्णन करती है। एक अन्य रचना द्वारा हाल के ज्वलंत विषय प्याज - टमाटर की महंगाई को बड़े सहज भाव से चिन्हित किया गया है। 
जन सुलभ भाषा में साधारण जनजीवन से जुड़ी ये रचनाएं जन मानस का जीवन वृतांत सुनाती हुई स्वर लहरी हैं। 
कवि ने इस पुस्तक के माध्यम से समाज के प्रति निज उत्तरदायित्व का निर्वहन और कुरीति निवारण का आह्वान किया है। 
सुमित प्रताप सिंह को बहुत बहुत बधाई!

- श्री अनिल समोता 
     इंस्पेक्टर, दिल्ली पुलिस
      द्वारका, नई दिल्ली-75 

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Monday, October 27, 2014

पुस्तक समीक्षा : पत्र शैली में व्यंग्य की अनूठी फुहार है व्यंग्यस्ते

   दिल्ली के श्री सुमित प्रताप सिंह की पुस्तक “व्यंग्यस्ते" पढ़ने को मिली कविताओं में पत्र (पाती) लिखने की पुरानी विधा है आदरणीय गोपालदस 'नीरज'की "नीरज की पाती" पुस्तक भी वर्षों पहले प्रकाशित हो चुकी है अन्य कवियों एव लेखकों की भी पत्रोंचिठ्ठोखत् आदि से मिलते-जुलते शीर्षकों पर कई पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, लेकिन पत्रों के द्वारा व्यंग्य आलेख सुमित जी की इस पुस्तक को विशिष्ट एवं अद्वितीय बनाते है मैं तो इन पत्रों के मनोहारी चुटीले शीर्षकों व सम्बोधनों का मुरीद हो गया इस संबंध में सुमित जी एकदम अलग,अनूठे और अद्वितीय व्यंग्यकार हैं पुलिस डिपार्टमेंट में होते हुए भी व्यंग्य की विधा के प्रति दीवानगी प्रशंसनीय ही नही अपितु अनुकरणीय व वंदनीय भी है पुलिस विभाग के कठोर अनुशासनात्मक वातावरण में रहने व कार्य करने वाले व्यक्ति का हृदय भी मानवीय समवेदनाओं के लिए इस तरह स्पंदित होता है यह आपने आप में सुखद अजूबा है
   श्री सुमित जी ने पत्रों के माध्यम से समाज में व्याप्त विकृतियोंविसंगतियों विषमताओं पर तीखा प्रहार किया है लोकतंत्र महाराज के नाम अपने पत्र में ही सुमित जी वर्तमान राजनीतिज्ञों की करतूतों पर कितने व्यथित है इसका एक उदाहरण देखिये - पुराने राजाओं व नवाबों ने नया चोला धारणकर लिया व राजनीति में आ गये, राजनीति को कुछ परिवारों ने अपनी पैतृक संपत्ति मान लिया तथा राजनैतिक दलों में उनके पूतों व कपूतों के सिवा किसी अन्य को महत्व/जगह नहीं दी जाती है सुमित जी के अनुसार जब सदन में लात-घूँसेजूते-चप्पल चलते हैं व अभद्र भाषा का प्रयोग होता है तो उनके शिष्ट व विशिष्ट लेखक मन को मर्मांतक पीड़ा होती है इसी बात को सुमित जी के आधुनिक नेता के नाम पत्र में भी नेताओं द्वारा स्वार्थवश आपस में लड़ने व झगड़ने पर गहरी वेदना व्यक्त की है
  हिंदी की दुर्दशा पर "हिन्दी के नाम पत्र" में उनकी पीड़ा को सहज ही महसूस किया जां सकता है वो अपनी पीड़ा को इन शब्दों में उकेरते हैं- " हिन्दी संसार की दूसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है संसार में सबसे अधिक समाचार पत्र व टी.वी. चैनल हिन्दी के ही हैं हिन्दी फिल्मों के नायक-नायिकाएँ व फिल्मों से जुड़े अन्य लोग जिन्होंने हिन्दी माध्यम से खूब धन अर्जित किया है किन्तु हिन्दी बोलने पर वे शर्म महस करते हैं कलयुगी रावणों के बढ़ते आकारप्रकार व नारी दुर्दशा पर सुमित जी ने लंकाधीश रावण के नाम पत्र में इन शब्दों में अपना क्षोभ व्यक्त किया है -" अपने युग में आप (रावण) इकलौते थे किन्तु कलयुग में हर गली हर क्षेत्र में उत्पन्न हो चुके हैजिनके आगे आज के राम लक्षमण बेबस है", "समाज में नारी की अस्मिता इन रावणों के डर से थर थर काँप रही है"    बड़े शहरों में कुकुरमुत्तों सरीखी फैली हुई झोपड़पट्टी पर सुमित जी ने लिखा है - " झोपड़पट्टी में अपराधियों का एक छोटा संसार बसा हुआ है वो आगे यह भी लिखते हैं- " किसी न किसी अन्धेरी झोपड़ी में अबलाओं का दिन-दहाड़े नियम से बलात्कार होता है इन अबलाओं की सुनने वाला कोई नहीं होता क्यूँकि वे बेचारी गरीब होती हैं और इस कारण वे इस नियमित बलात्कार को अपनी नियति समझकर स्वीकार कर लेती है
मजहब के नाम पर कट्टरवादी व संकुचित सोच वाले धर्म विशेष के सिरफिरों की करतूतों पर "ओसामा का ओबामा के नाम पत्र" में सुमित जी की सहृदयता इन शब्दों में स्पष्ट हो रही है- " क्या कोई धर्म चाहेगा कि विनाश का रास्ता अपनाया जाए अथवा उस्के बच्चे आपस में लड़कर खून बहाएं, लूटपाट करें,बलात्कार करें या एक-दूसरे का घर जलाएंभारत की जेलों में इंसानियत व भारतीयता के दुश्मन आतंकवादियों को कठोरतापूर्वक प्रताड़ित करने के बजाय वोट बैंक की खातिर जिस तरह ऐशो-आराम की सुविधाएँ मिल रही हैं उस पर हर सच्चे भारतीय की भांति सुमित जी की अन्तर्वेदना "आतंकियों का जिहादियो के नाम पत्र" में देखने को मिल जाती हैभारतीय जेलों में पकड़े गए तो मजे ही मजे हैं यहाँ की जेलों में ऐश करोगे दस-पन्द्रह साल तो मुकदमे में ही लग जायेंगे और सजा हुई तो अगले दस-पन्द्रह साल इस विचार में की सजा की तामील की भी जाय अथवा नहींयहाँ जेलों में हम जिहादी किसी कैदी की तरह नहीं अपितु घर जमाई की भाँति रह रहे हैं हमारी समस्त सुख-सुविधाओं का पूरा ध्यान रखा जाता है”
   एक सच्चे व्यंग्यकार की तरह सुमित जी अपने आसपास के वातावरणघटनाओंव परिस्थितियों में भी व्यंग्य तो देखते ही है पर इनमें उनके अंतर्मन में समाज विरोधी के प्रति जो आक्रोश अपेक्षा तथा मानवता के प्रति जो गहनतम आस्था है वह् भी कई स्थानों पर प्रकट हो रही है कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं : -
1. 
एक पत्र पटाखों के नाम - यदि तुम्हें फटने का इतना ही शौक है तो भ्रष्टाचारियो के काले धन के भंडार में जाकर फटो और जलकर राख कर दो उस काली कमाई को जो गरीबों का खून चूसकर जमा की गई है
2. 
एक पत्र मच्छर मियाँ के नाम - अगर आपको काटने की इतनी बुरी आदत है तो जेल में बन्द आतंकवादियों को काटो और इस देश के पानी में जन्म लेने का कर्ज चुकाओ
3. 
एक पत्र जूते राजा के नाम - असली मजा तो तब आए जब आप बढ़ती मंहगाई पर चलोजब आप स्विस बैंक में काले धन छिपाने वालों पर चलोजब आप आतंकवाद व नक्सलवाद पर चलोजब आप तुष्टिकरण की नीति पर चलो । ये सब उदाहरण बतलाते हैं कि सुमित जी के रग-रग में राष्ट्रीयता की धारा सघनतापूर्वक प्रवाहित हो रही है सहित्य के दृष्टि से भी सुमित जी ने अपनी इस पुस्तक में बहुत सुंदर व हृदयस्पर्शी शब्दावली का प्रयोग किया है इसी संदर्भ में पापी पाकिस्तान के नाम पत्र में सुमित जी ने उल्लेख किया है कि1965, 1971 के बाद भी पापी पाकिस्तान द्वारा हम पर बार-बार जो आक्रमण किये गये और उसके बाद अनवरत रूप से किये जा रहे झूठे सन्धि प्रस्ताव व वादा खिलाफी के बाद हम इतने आहत हो गये हैं कि : -
अब मरहम पर भी रहा ना यकीं
पड़ोसी ने ऐसे दिए है घाव गहरे
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सुमित जी द्वारा रचित "व्यंग्यस्ते" देश व समाज के विभिन्न आयामों को बड़ी कुशलता व कुशाग्रता से अभिव्यक्त कर रही है। वे इसी तरह अनवरत साहित्य सृजन करते हुए हिन्दी पाठकों की आशा अपेक्षाएँ पूर्ण करते रहेंगे इसी विश्वास के साथ शुभकामनाओं सहित

समीक्षाकार - वीरेश अरोड़ा "वीर"


गाँधी नगर, गुजरात 

Tuesday, April 15, 2014

विसंगतियों पर प्रहार करती व्यंग्यस्ते

सुमित प्रताप सिंह का हाल ही में प्रकाशित व्यंग्य संग्रह “व्यंग्यस्ते” देश समाज और अपने आस पास के परिवेश की  विसंगतियों  की गहन पड़ताल करते हुए उन पर करारा व्यंग्य करता है। इस पुस्तक में सुमित ने ४२ पत्र लिखे हैं।  गुटखा से  लेकर लोकतंत्र तक सभी को  सम्बोधित किया है उन्होंने अपनी पत्रों में.  कुछ पत्र राजनीति को बेपर्दा करते हैं तो कुछ समाज को और इन सबके बीच एक गहरी पीड़ा से गुजरता हुआ मुस्कुराता चला जाता है एक आदमी।
    छोटी और बड़ी सभी विसंगतियां बेहद चुटीला सम्बोधन पाती  हैं। ज्यादा कुछ छूटा नही  है रचनाकार की पैनी निगाहों से। सुमित के सम्बोधनों में एक गहरा व्यंग्य है और व्यंग्य भी ऐसा की होठों पर मुस्कराहट भी आती है और विसंगतियों से उपजे दर्द की एक गहरी लकीर भी हृदय को बेध डालती है। अपने पहले ही पत्र में  लोकतंत्र को सम्बोधित करते हुए वो कहते हैं 'प्यारे लोकतंत्र महाराज’  ‘सादर  राजतन्त्रस्ते’ लोकतंत्र कितना प्यारा हो सकता था एक आम भारतीय के लिए जो उसे महाराज बनाने का वादा  करके आया था, परन्तु सुमित अपने सम्बोधन में ही स्पष्ट कर देते है कि ये असल में राजतंत्र है जो लोकतंत्र का खोल पहने हुए है।  इसे आगे स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं कि पुराने राजाओं और नवाबों ने नया चोला धारण किया और वे राजनीती में आ गए और सत्ता सुख भोगने की अपनी परंपरा जारी  रखी।इसी तरह  राष्ट्रगीत वंदे मातरम  के अपमान पर भी लेखक का दुखी मन यह जानता है कि  वन्दे मातरम के अपमान के पीछे धर्म नहीं कुत्सित राजनीति है।वो इस पत्र में लिखते हैं  ''उसे उसके धर्म में अंग्रेजी सम्राट की स्तुति में बने गीत को गाना जायज है पर मातृ भूमि के प्रति सम्मान प्रकट करना हराम लगता है।“
     आज उदारवाद या उधारवाद के दौर में जब राजनीति महज  पद  प्रतिष्ठा और पैसे को प्राप्त करने का एक धंधा बन गयी है। तथाकथित नेता गण जब घोटालों में आकंठ डूबे हों तो ऐसे नेता का अभिवादन "सादर घोटालास्ते" कितना प्रामाणिक हो जाता है। परिवेश के प्रति  इस सजग रचनाकार की निगाहों से भलाकैसे बच सकती है ये   नेतागीरी? भारत की राजनीति कितनी अवसरवादी और निर्बल है। देशद्रोह को भी वोट में बदल पाने का लालच अक्सर कतराता है एक देश द्रोही को सजा देने के लिए इसका ब्यौरा सुमित “आतंकी का जिहादियों के नाम पत्र” में देते हैं। "हिंदुस्तान पर हमले के दौरान पकडे भी गए तो भी सुभानल्लाह मजे ही मजे। यहाँ की जेलों में जमकर ऐश करोगे।  दस-पंद्रह साल तो मुक़दमे में ही लग जाएंगे और सजा हुई भी तो अगले दस पंद्रह साल इस सोच विचार में की सजा की तामील की जाए या नहीं। वोट बैंक की राजनीति ने इस कदर निकम्मा और विचार शून्य बना दिया है, कि सत्ता सुख की चाह में तथाकथित नेतागण "जरूरत पड़ने पर ये अपनी माँ, बहन, बेटी और बहू को भी बेचने को तैयार रहते हैं।" हिंदुस्तान की इनके लिए कोई अहमियत   नहीं।  ऐसे दौर में भारत में मजे मारता हुआ एक आतंकी बड़ी समझदारी से ये कहता है की भला हो इस वोट बैंक की नीति का जो हम सब इतने कुकर्म करके भी खा-पीकर मुस्टंडे हो रहे हैं। हालाँकि लेखक इन जिहादियों की मनोदशा और इनके जिहाद की निरर्थकता का विवरण ओसामा का ओबामा के नाम पत्र में देते हुए कहता है, "मुझे बताया गया था कि यदि जिहाद करते हुए मारे जाओ तो शहीद का  मिलता है और जन्नत नसीब होती है, पर मुझे दोजख में ऐसे अनेक मूर्ख मिले, जो जन्नत के लालच में जिहाद करते हुए मारे गए थे। अल्लाह ने  दुनिया को इतने जतन  और प्यार से बनाया, उसमें रहने के लिए इंसान और दूसरे जीव बनाये क्या वह कभी चाहेगा कि उसके बच्चे आपस में लड़कर खून बहायें?"
     भारत कथित रूप से एक कृषि प्रधान देश है पर किसानों की दयनीय दशा पर भारतीय सत्ता निर्दयतापूर्वक अनभिज्ञ बने रहने का अंतहीन ढोंग किये बैठी है। हर वर्ष किसानों के लिए तमाम योजनाओं की घोषणा होती है परंतु तंत्र की नाकामी के कारण उसका फायदा किसानों को न मिलकर बिचौलियों को मिलता है। फसल बोने के लिए  ऋण से लेकर मंडी में फसल की बिक्री तक की किसान की सारी बेबसी और दयनीयता का ब्यौरा लेखक किसानो का प्रधानमंत्री के नाम पत्र में प्रदर्शित करता है और उम्मीद करता है कि प्रधानमंत्री जी की आँखों से इस कुतंत्र के प्रति अनभिज्ञता का पर्दा हट सके। इसी क्रम में सुमित का एक और पत्र जो भारतीय किसान के नाम है साक्षात्कार कराता है भारतीय किसान की लाचारी का। किसान और उसके कर्जे का अंतहीन क्रम अनवरत चल रहा है और तंगहाल, भूखा व क़र्ज़ की मार से दबा और तंत्र के जटिल बंधनों में छटपटाता किसान आत्महत्याएं करने को विवश है।  और अगला ही खत इस दुर्दशा के कारणों की तह में जाने की कोशिश करता है जो भ्रष्टाचार बाबा के नाम है जहाँ वे आदि-अनादि काल से चले आ रहे भ्रष्टाचार जो आज इतना प्राचीन हो चुका है कि उसे पितामह कहकर सम्बोधित करना पड़ता है।
    भारतीय किसान की तरह ही भारत के गाँव भी दुर्दशा का शिकार हो रहे हैं। नगरों और महानगरों की आर्थिक प्रगति उतनी तेजी से गाँवों में नहीं आई जितनी तेजी से वातावरण को प्रदूषित करने वाला काला धुआँ, जुआ और शराब ने अपने पाँव जमाये। दूध, दही और शुद्ध हवा ने गाँव से दूरियां बनाना आरंभ कर दिया और नशा अपने साथ लेकर आया। अकर्मण्यता, बेरोजगारी, गरीबी और अपराध जिसने गाँव और गाँव वालों की जड़ें हिलाकर रख दीं और अंदर से पूरी तरह खोखला कर दिया।नशे का ये चलन और उससे होने वाले  सामाजिक, राजनैतिक और  सांस्कृतिक  क्षरण को सुमित रेखांकित करते हैं “एक पत्र मदिरा रानी के नाम” नामक पत्र में। वे बताते हैं कि शराब किस तरह बरगला देती है वोटर को एक अच्छा प्रत्याशी चुनने से।  ऐसा ही एक और पत्र है पब प्रेमी बाला  के नाम जहाँ शराब और उन्मुक्त यौन प्रदर्शन संस्कृति का पर्याय बनता जा रहा है।
     “लंकाधीश रावण के नाम पत्र में” सुमित रेखांकित करते हैं कि हर वर्ष दशहरा पर रावण दहन होता है पर रावण नष्ट होने की जगह और शक्तिशाली तथा ज्यादा छली बनकर हमारे समक्ष उपस्थित हो जाता है। तुलना करते हुये समाज में मौजूद आधुनिक रावणों से तुलना करते हुये लेखक रावण से कहता है "आप बली थे और कुछ कुछ छली थे, किन्तु आज के रावण निर्बली हैं और १००% छली  हैं। आपने सीता जी का हरण तो किया पर उसके सतीत्व पर कोई आघात नहीं किया, किन्तु आज के रावण तो अपने घरों की बहू-बेटियों को भी नहीं छोड़ते। समाज में नारी की अस्मिता इन रावणों के डर से थर-थर काँप रही है।“ नारियों के सम्मान पर ही चिंतित होते हुये    दामिनी के नाम पत्र”  में लेखक का व्यथित मन कहता है कि नारियों को देवी का दर्ज देकर पूजने वाले भारत देश ऐसे दरिंदों को अब तक जीने का अधिकार क्यों है?
    कुछ हलके-फुल्के अंदाज में गुदगुदाने वाले हास्य से सराबोर व्यंग्यात्मक पत्र भी हैं जैसे “सर्दी के नाम पत्र”, “मच्छर के नाम पत्र” “ज्योतिषी दद्दा के नाम पत्र” तथा अतिथि महाराज के नाम पत्र।” इन पत्रों को पढ़कर आप खिलखिलाये बिना नहीं राह पायेंगे।  पर संग्रह के अधिकांश पत्र व्यवस्था तंत्र की विसंगतियों पर करारा व्यंग्य प्रस्तुत करते हैं।  
    सुमित एक कुशल चितेरे  की तरह समाज, देश, राजनीति और संस्कृति की विसंगतियों के चित्र  उकेरते हैं।  परन्तु वे उन चित्रों में एक रंग और भरते हैं और वह रंग   है उम्मीद अथवा आशा का रंग। सुमित के पत्रों की शुरुआत  जहां निराशा के माहौल में होती वहीं पत्र का अंत आते-आते उसमें सुधार की उम्मीद भी जागने लगती है।
    लोकतंत्र के नाम पत्र में जहाँ वे लोकतंत्र के राजतंत्र बन जाने के खतरे की बात करते हैं वहीँ लोकतंत्र को वापस प्रतिष्ठित करने के लिए वो वोट की ताक़त की भी बात करते हैं। तथाकथित बुद्धिजीवियों को दुत्कारते हुए वे कहते हैं की पहले तो पप्पू बनकर वोट डालने का कष्ट नहीं उठाते और जब सरकारी नीतियों से उन्हें परेशानी होती है तो विद्वान बनने का ढोंग करके राजनीति के गन्दा होने को कोसते लगते हैं। “दामिनी के नाम पत्र” में वे कहते हैं उस युवा वर्ग ने जिसे अब तक धूम-धड़ाका मस्ती कर जीवन जीने का ही पर्याय माना जाता   था, राजपथ पर एकत्र हो उसे लोकपथ बना दिया और सत्ता को सीधी चुनौती दे डाली। 
    सुमित की ये पुस्तक चुटीले सम्बोधनों के माध्यम से तीखा व्यंग्य करते हुये समाज में उपस्थित विसंगतियों पर कठोर प्रहार करती है।  और उम्मीद यह उम्मीद जगाती है कि अव्यवस्था का ये दौर कभी न कभी तो ख़त्म होकर रहेगा। 

राम जनम सिंह
 २५२, गाड़ी पुरा, इटावा