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Friday, May 10, 2013

भारत में भ्रष्टाचार कांग्रेस की देन

कांग्रेसनीत यूपीए सरकार का कार्यकाल देखकर यह तो नहीं लगता कि इस सरकार के पास देश चलाने की जिम्मेदारी थी। जिस तरह बीते पांच साल में घोटालों की बाढ़ आई है उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि यूपीए की सरकार हजारों हाथ से देश को लूट रही है। मंत्री से सरकारी पद तक सब नीलाम हो रहे हैं, बस खरीददार की जेब में दाम हो। टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले ने बताया कि सरकार में मनचाहा मंत्रालय किस तरह बिकता है और अब रेल मंत्री पवन बंसल के भांजे विजय सिंगला ने संवैधानिक पद की भी दलाली खाकर बता दिया कि कांग्रेस के राज में सब बिकाऊ है। मामा-भांजे की जोड़ी ने महेश कुमार को वेस्टर्न रेलवे जीएम से रेलवे बोर्ड का सदस्य बनाने के लिए १० करोड़ की रिश्वत ली। सीबीआई ने भांजे को रंगेहाथ पकड़ा। बेशर्मी की हद है कि प्रधानमंत्री सहित पूरी कांग्रेस रेलमंत्री पवन बंसल के बचाव में आ खड़ी हुई। इसके लिए बेजोड़ तर्क दिया गया कि मंत्री जी का इसमें क्या दोष है, यह तो उनके रिश्तेदार की करतूत है। एक साधारण-सा आदमी भी इतना सहज ज्ञान रखता है कि पवन बंसल की शह के बिना भांजा विजय सिंगला इतना बड़ा कारनामा नहीं कर सकता था। अलबत्ता सीबीआई की रिपोर्ट भी पवन बंसल को इस रिश्वत काण्ड में लिप्त मानती है। कांग्रेस की बेशर्मी पर यहीं लगाम नहीं लगता, विपक्ष यानी भारतीय जनता पार्टी की ओर से इस्तीफा मांगने पर कांग्रेस के प्रवक्ता कहते हैं कि भाजपा को तो इस्तीफा मांगने की बीमारी हो गई है। यूं तो विपक्ष अपने धर्म का निर्वहन कर रहा था। फिर भी मान लिया कि भाजपा को इस्तीफा मांगने की बीमारी हो गई। लेकिन, क्या कांग्रेस के नेता और प्रवक्ता बता सकते हैं कि आए दिन प्रधानमंत्री और मंत्रियों के इस्तीफे मांगने का मौका भाजपा को कौन दे रहा है? क्या यह सच नहीं कि हर माह औसत एक बड़ा भ्रष्टाचार इन पांच सालों में सामने आया है। हालात ये हैं कि प्रधानमंत्री को भी ऐसी सरकार से शर्मिंदा होकर खुद ही इस्तीफा दे देना चाहिए। भांजे के रंगेहाथ पकड़े जाने के बाद भी पवन बंसल मंत्री पद से इस्तीफा नहीं दे रहे हैं। एक जमाना था जब रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री हुआ करते थे, उन्होंने एक रेल दुर्घटना पर ही इस्तीफा दे दिया था। क्योंकि उन्हें अपनी नैतिक जिम्मेदारी का भान था। कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के किसी भी मंत्री यहां तक कि सौम्यता और ईमानदारी का लबादा ओढ़े प्रधानमंत्री से भी इस स्तर की नैतिकता, शुचिता की राजनीति की अपेक्षा नहीं की जा सकती। जिस सरकार का ध्येय ही भ्रष्टाचार हो गया हो, उससे आप उम्मीद भी क्या कर सकते हैं। कांग्रेस का हाथ भी अब गरीब के साथ नहीं बल्कि गरीब के गिरेबां पर है और भ्रष्टाचारियों के साथ है। जरा अतीत पर नजर डाली जाए तो स्पष्ट होता है कि आज भ्रष्टाचार की जो विशाल इमारत खड़ी दिख रही है, उसकी नींव कांग्रेस ने अपने पहले ही शासन काल में रख दी थी। 
भारत में भ्रष्टाचार की पौध आजादी की तुरंत बाद ही कांग्रेस ने रोप दी थी। अनेक वीर स्वतंत्रता सेनानियों के प्राणों की आहुति देकर सन् १९४७ में भारत ने अंग्रेजों के चंगुल से शासन व्यवस्था छीनी। लेकिन, तत्कालीन कर्णधारों ने सुराज देने की जगह कुराज के बीज बो दिए। आजादी के बाद कांग्रेस के शासनकाल में ही भ्रष्टाचार का बीज अंकुरित हुआ बल्कि शनै-शनै बढ़ता भी गया। अलग-अलग समय सत्ता में रही कांग्रेस ने उस भ्रष्टाचार के पौधे को खूब खाद-पानी दिया, उसका खयाल रखा। आज वही पौधा विशाल वट वृक्ष बन गया है। उसके इस प्रिय पौधे पर जब भी कोई अंगुली उठाता है कांग्रेस उसकी खूब खिंचाई करती है। बाबा रामदेव ने वर्षों से विदेश में जमा होते आ रहे कालेधन की मांग की तो कांग्रेसनीत यूपीए सरकार उन पर डण्डा लेकर पिल पड़ी। दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदर्शन करके रात में सो रही महिलाओं, बच्चों और बूढ़ों पर आंसूगैस के गोले छोड़े गए। अभिव्यक्ति के संवैधानिक अधिकार का गला घोंटा गया। बाद में इस बर्बर घटना में घायल एक महिला ने अस्पताल में दम तोड़ दिया था। जो कुछ समय पहले तक बाबा रामदेव के आश्रम में जाकर उनका आशीर्वाद लेते थे वे बाबा को ठग कहते नहीं थक रहे। वहीं कांग्रेस ने बाबा रामदेव के तमाम ट्रस्टों पर जांच बैठा दी। 
अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार को रोकने के लिए मजबूत लोकपाल की आवाज बुलंद की तो कांग्रेस ने उन्हें घेरना शुरू कर दिया। कांग्रेस के नेता अन्ना हजारे के साथ बदतमीज पर उतर आए। उनका चरित्रहनन करने के लिए अमर्यादित भाषा का जमकर इस्तेमाल किया गया। जिस आदमी के पास अपना खुद का घर नहीं उसे बेईमान ठहराने में पीछे नहीं रहे कांग्रेसी। अन्ना के दामन पर कीचड़ उछालते समय कांग्रेस भूल गई कि उसी ने अन्ना की ईमानदार और समाजसेवी छवि के लिए उन्हें पदम् विभूषण पद से सम्मानित किया था। किरण बेदी जैसी ईमानदार महिला को भी कांग्रेस ने निशाना बनाना शुरू कर दिया। दरअसल, कांग्रेस भ्रष्टाचार को रोकना ही नहीं चाहती। वह ऐसा चाहेगी भी क्यों? उसने तो आजादी के बाद ६४ वर्षों में भ्रष्टाचार को पनपने का अवसर दिया है, संरक्षण दिया है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल करप्शन परसेप्शन इंडेक्स (सीपीआई) की १८३ देशों की सूची में भारत भ्रष्टाचार के मामले में ९५वें नंबर पर है। अगर कोई पानीदार सरकार होती तो भ्रष्टाचार के मामले में देश की यह रैंकिंग देखकर चुल्लूभर पानी में डूब मरती। स्विटजरलैण्ड बैंकिंग एसोसिएशन की रिपोर्ट भी कहती है कि स्विस बैंकों में जमा धन के मामले में भारत सबसे आगे है। यानी विदेशों भारत का कालाधन सबसे अधिक है। का
लाधन भ्रष्टाचार से ही बनाया है। आजादी के बाद से लेकर अब तक भारत में करीब ९१ सौ खरब के घोटाले प्रकाश में आ चुके हैं और अभी भी नए-नए घोटालों का जन्म तेजी से होता जा रहा है।
आजाद भारत का पहला ज्ञात घोटाला सन् १९४७ में हुआ था। सन् १९४८-४९ में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में जीप घोटाले को उनके चहेते वीके कृष्णा मेनन ने अंजाम दिया। वीके कृष्णा मेनन उस समय लंदन में भारत के हाई कमिश्नर थे। १९४८ में ही पाकिस्तान ने हमला कर दिया था। भारतीय सेना को जीपों की जरूरत आन पड़ी। जीप खरीदने की जिम्मेदारी जवाहरलाल नेहरू ने मेनन को सौंपी। मेनन ने विवादास्पद कंपनी से जरूरी औपचारिकताएं पूरी किए बिना २००० जीप खरीदने का सौदा कर लिया। इसके लिए उन्होंने कंपनी को एक लाख ७२ हजार पाउंड की राशि (८० लाख रुपए, उस समय) का भुुगतान भी कर दिया। ब्रिटेन से १५५ जीप की एक ही खेप पहुंची सकी थी। कृष्णा मेनन की करतूत से पर्दा उठ गया। १५५ जीप में से एक भी चलने की स्थिति में नहीं थी। उस समय नाममात्र के विपक्ष की मांग पर दिखाने के लिए एक जांच कमेटी बनाई गई। लेकिन, दोषी मेनन पर कार्रवाई तो दूर बल्कि उनका प्रमोशन कर दिया गया। १९५६ में वीके कृष्णा मेनन कैबिनेट मंत्री बना दिए गए। यहीं से भ्रष्टाचार को बल मिला। अगर कांग्रेस वाकई देश को सुशासन देना चाहती थी तो उसी समय जीप घोटाले के दोषी वीके कृष्णा मेनन पर कड़ी कार्रवाई कर देती तो शायद आज भारत में भ्रष्टाचार की यह स्थिति नहीं होती। कांग्रेस और उसके वरिष्ठ नेता इसी एक घोटाले पर नहीं रुके। कांग्रेस के नेताओं में होड़-सी लग गई घोटाले करने की। जीप घोटाले को दो साल भी नहीं बीत पाए थे कि साइकिल घोटाला १९५१ में सामने आ गया। यह भ्रष्टाचार की यह काली सूची दिन-दूनी रात-चौगुनी बढ़ती गई। अब तो घोटालों में रकम का आंकड़ा करोड़ो-अरबों में पहुंच गया है। लाख रुपए के घोटाले को घोटाला ही नहीं माना जाता। सलमान खुर्शीद पर जब विकलांगों के उपयोग की सामग्री वितरण में कुछ लाख के घोटाले का आरोप लगा था तो कांग्रेस के प्रवक्ता यह कहते हुए पाए गए कि इस कदर मंत्री की औकात कम मत करो, भला मंत्री भी लाख का घोटाला करेगा क्या? यह राशि करोड़ में होती तो ही विश्वास किया जा सकता था। कांग्रेस को अपनी बची-खुची छवि बचानी है तो तत्काल भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे मंत्रियों को बर्खास्त कर देना चाहिए। वरना, यूं ही भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की बातों का क्या है, बातें तो सब करते हैं।
रचनाकार - श्री लोकेन्द्र सिंह राजपूत
सीनियर सब एडिटर, नई दुनिया, ग्वालियर, म.प्र.

Sunday, October 21, 2012

कठिन है ‘शब्द साधना’ की राह

    पने ब्लॉग (अपना पंचू) पर मैंने आखिरी पोस्ट (बड़ों के लिए किस्से बचपन के) २४ सितंबर को प्रकाशित की थी। तब से लेकर अब तक भारी व्यस्तता का दौर रहा। इस बीच पढऩे-लिखने का क्रम ही टूट गया। शिखा वार्ष्णेय की पुस्तक ‘स्मृतियों में रूस’ को रोज लालायित होकर देखता हूं, लेकिन पढ़ नहीं पा रहा हूं। कारण एक ही है भारी व्यस्तता। १६ अक्टूबर को बालक पांच माह का हो गया। अपने नन्हें राजकुमार को भी समय देने में असमर्थ हूं। कल तो श्रीमती जी ने ताना मार ही दिया- तुम्हारे पास तो परिवार के लिए समय ही नहीं है। अपुन सुनकर रह गए। और कर भी क्या सकते थे। खैर, आप सोच रहे होंगे कि मैं ऐसा कौन-सा मील चला रहा था? हमारे इधर कहावत है- मील चलाना। जो मनुष्य यह कहता हुआ पाया जाता है कि मेरे पास समय नहीं है। दूसरे मनुष्य उसे पलटकर यही कहावत सुना देते हैं- तुम कौन-सा मील चला रहे, जो तुम्हारे पास दो मिनट का भी समय नहीं है। कुछ नहीं दोस्तो अभी-अभी संस्थान बदला है। राजस्थान पत्रिका को विदा कह कर नई दुनिया (जागरण ग्रुप) आया हूं। नया माहौल, नया सिस्टम, थोड़ा सहज होने में समय तो लगता ही है। फिर अपुन तो महाआलसी राम हैं। जरा-सा बदलाव, थोड़ा देर से सोना, बहुत देर से उठना। समय कब निकल जाता है अपुन को पता ही नहीं चलता।
     खैर, अभी तक की कहानी शीषर्क से मेल नहीं खा रही न?  चलो यू टर्न लेते हैं। गपशप छोडक़र मुद्दे की बात पर आते हैं। दरअसल, भारी व्यस्तता का एक और कारण है, जिसकी चर्चा मैं आप लोगों से करना चाहता हूं। इन दिनों में अपने पहले काव्य संग्रह के प्रकाशन को लेकर इधर-उधर हाथ-पैर मारने में लगा हूं। संग्रह तैयार है लेकिन प्रकाशक नहीं मिल रहा। मिले भी तो क्यों? अपुन कोई देश-विदेश में ख्याति अर्जित कवि हैं नहीं। अपुन कोई बेस्टसेलर बुक राइटर भी नहीं? साहित्य का कोई सामंत भी अपना मुंह बोला ताऊ नहीं। अपनी कविताओं से विवाद भी नहीं फैलने वाला। ‘लोकेन्द्र जी हम कविताएं नहीं छापते’। कई प्रकाशकों का यह जवाब सुनकर तो माथे पर चिंता की और लकीरें और बढ़ गईं। एक तो आटा कम था वह भी गीला हो गया। दोस्तो, इस भागम-भाग भरे डेढ़ माह में एक विद्वान ने अपुन को उम्मीद की लौ दिखाई कि लगे रहो बेटा जब तक सांस है, कुछ न कुछ तो हो ही जाएगा। हारकर बैठ गए तो कुछ नहीं होना। उन्होंने यह मंत्र मुझे सीधे नहीं दिया। यह तो उन्होंने साहित्य जगत की बिडम्वना को लेकर कहा था। हुआ यूं कि मैं गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी की पुस्तकों के लोकार्पण कार्यक्रम में पहुंचा। कार्यक्रम में मंच पर देश के बड़े साहित्यकार जगदीश तोमर जीऔर दिवाकर विद्यालंकार जी विराजमान थे। विद्यालंकार जी ने अपने उद्बोधन में गिरिजा जी की पुस्तकों की भूरि-भूरि प्रशंसा की। इसके बाद उन्होंने कहा कि साहित्य के क्षेत्र में दो तरह की साधना होती है। एक तो भाव साधना और दूसरी शब्द साधना। भाव साधना पहली साधना है। शब्द साधना अगली सीढ़ी है। भाव साधना में साहित्यकार कितना भी पारंगत हो जाए लेकिन उसकी साधना तब तक अधूरी है जब तक शब्द साधना पूरी न हो जाए। शब्द साधना का अर्थ बताते हुए उन्होंने कहा कि शब्द साधना का मोटा-मोटा अर्थ है भावों का प्रकाशित हो जाना। किसी साहित्यकार की कृति प्रकाशित होने में बड़ा श्रम लगता है। हिन्दी साहित्य में प्रकाशक या तो स्थापित नामों को ही छाप रहे हैं या फिर जो उन्हें धन देता है उसे छाप देते हैं। अर्थात् भाव साधना से भी अधिक परिश्रम और महत्व की साधना है शब्द साधना। लेखक और कवि की बात समाज में जन-जन तक पहुंचे उसके लिए शब्द साधना बहुत जरूरी है। विद्यालंकार जी ने आगे कहा कि निराश होकर रचनाकार कभी-कभी सोचता है कि उसकी कृति स्तरीय नहीं है। यह सोचकर वह उसे किसी संदूक या किसी कोने में छुपा देता है। ऐसा करके वह भावों की हत्या करता है। अशुद्धियों और त्रुटियों के डर से साहित्य रचना को प्रकाशित नहीं कराना गलत कदम है। सबकी रचनाओं में कमियां रह जाती हैं, जिन्हें समालोचना, आलोचना और समीक्षा के बाद दूर किया जाता है।
मित्रो उनके इस उद्बोधन ने अपने पिचकते फेंफड़ों में हवा भर दी। कार्यक्रम में ही जोश आ गया। मन ही मन तय किया कि अब और जोर-शोर से अपने काव्य संग्रह के प्रकाशन की तैयारी की जाएगी। शब्द साधना की कठिन डगर पर चल निकला हूं, देखते हैं कब पूरी होती है।

रचनाकार- श्री लोकेन्द्र सिंह राजपूत



Friday, June 29, 2012

उपनिषदगंगा : भारत में भारतीयता का प्रवाह

      भारत के संदर्भ में देखा जाए तो सबसे अधिक सशक्त जनमाध्यम आज भी आकाशवाणी और दूरदर्शन ही है। दूरदर्शन का भौतिक विकास, पहुंच और तकनीकी तंत्र निजी चैनल्स के मुकाबले कहीं अधिक बेजोड़ है। भारत के सुदूर गांवों को तो छोड़ ही दीजिए महानगरों से कुछ दूर बसे गांवों में भी निजी चैनल्स की पहुंच नहीं है जबकि वहां धड़ल्ले से दूरदर्शन देखा जा रहा है। भारत आज भी गांवों में ही बसता है। देश में शहरी आबादी से कहीं अधिक ग्रामवासी हैं। स्पष्ट है, 'वास्तविक दर्शक संख्या' दूरदर्शन के मुकाबले किसी के पास नहीं। टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग पॉइंट) के नाम पर जो दर्शक संख्या प्रदर्शित की जाती है वह इने-गिने शहरों से प्राप्त आंकड़े हैं। यह भारत के टेलीविजन दर्शकों की वास्तविक संख्या नहीं है। यहां दूरदर्शन के सशक्त जनमाध्यम होने की चर्चा इसलिए की जा रही है क्योंकि हाल ही में दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल (डीडी-१) पर बहुचर्चित धारावाहिक 'उपनिषद गंगा' का प्रसारण शुरू हुआ है। ११ मार्च, २०१२ से प्रति रविवार सुबह १०:०० से १०:३० बजे तक यह प्रसारित हो रहा है। दरअसल, धारावाहिक उपनिषद गंगा भारतीय संस्कृति, परंपरा और चिंतन पर आधारित है। उपनिषद की विभिन्न कथाओं को लेकर डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने इसे बनाया है। इसके निर्माण में चिन्मय मिशन का अमूल्य योगदान है। डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी टेलीविजन जगत में 'चाणक्य' धारावाहिक से प्रसिद्ध हुए। ९० के दशक में चाणक्य भारतीय टेलीविजन का बेहद चर्चित और क्रांतिकारी धारावाहिक रहा है। आज भी इसकी उतनी ही मांग है। दूरदर्शन को नई ऊंचाईयां चाणक्य से मिलीं। डॉ. द्विवेदी मुंबई में उन विरले लोगों में से एक हैं जो भारतीय संस्कृति और साहित्य को लेकर काम कर रहे हैं। उन्होंने अमृता प्रीतम के उपन्यास 'पिंजर' पर इसी शीर्षक से फिल्म बनाई। इसे फिल्म समीक्षकों ने खूब सराहा। पिंजर के लिए डॉ. द्विवेदी को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। प्रसिद्ध उपन्यासकार काशीनाथ सिंह के उपन्यास 'काशी का अस्सी' पर आधारित उनकी फिल्म 'मोहल्ला अस्सी' तैयार है। फिलहाल तो डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी और दूरदर्शन का राष्ट्रीय चैनल डीडी-१ 'उपनिषद गंगा' को लेकर चर्चा में है। उपनिषद गंगा सभ्यता और संस्कृति के विकास की गाथा है। इसमें उपनिषद की कहानियों के साथ ही पुराण और इतिहास की कहानियों को भी सम्मिलित किया गया है। याज्ञवल्क्य-मैत्रैयी, नचिकेता, सत्यकामा-जाबाल, जनक, गार्गी, उद्दालक, श्वेतकेतु, अष्टावक्र, हरिशचंद्र, भृर्तहरि, जड़भरत, प्रह्लात, वाल्मीकि, भास्कराचार्य, वरहमिहिर, शंकराचार्य की कहानियां धारावाहिक में आधुनिक परिप्रेक्ष्य में दिखाई जाएंगी। इसमें चाणक्य, तुलसीदास, मीराबाई, पुंडलिक और दाराशिकोह तक की कहानियों को भी शामिल किया गया है।
      पर्यावरण, साहित्य, संस्कृति और शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने के कार्य में संलग्न संस्था 'स्पंदन' के कार्यक्रम में डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी का भोपाल आना हुआ। इस दौरान सिनेमा, टेलीविजन और संस्कृति पर उनका व्याख्यान हुआ। उनसे एक सज्जन ने पूछा- आपने इतना बढिय़ा धारावाहिक बनाया है तो इसे किसी निजी चैनल पर प्रसारित क्यों नहीं करवाया? दूरदर्शन को आज कौन देखता है? इस पर डॉ. द्विवेदी ने बहुत ही गंभीर और सोचने को विवश करने वाला जवाब दिया। उन्होंने कहा- दूरदर्शन और निजी चैनल में रिमोट के एक बटन का ही तो फर्क है। इसके अलावा दूरदर्शन भारत का राष्ट्रीय चैनल है, इसकी पहुंच भी व्यापक है। स्पंदन के ही कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि भारत में सिनेमा की शुरुआत सांस्कृतिक मूल्यों के साथ हुई। दादा साहेब फाल्के ने १९१३ में पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र बनाई। हालांकि आज मुंबई में साहित्य पर काम करने वाले लोग कम ही बचे हैं। दरअसल, पहले शिक्षा, प्रसार और प्रचार टेलीविजन के आधार थे लेकिन बाजारवाद ने सब कबाड़ा कर दिया है। आज टेलीविजन और सिनेमा से शिक्षा गायब है। वहीं, संस्कृति और साहित्य के लिए दूरदर्शन पर जितना गंभीर काम हो रहा है उतना कहीं और नहीं। यही कारण है कि हम टेलीविजन के सामने घंटेभर बैठे रहते हैं और लगातार चैनल बदलते रहते हैं, देखते कुछ नहीं।
    दूरदर्शन के प्रति डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी के आग्रह को देखकर ही यह आलेख लिखने का संबल मुझे मिला। भारत में दूरदर्शन ५३ बरस का हो गया है। इस दौरान उसने तमाम अनुभव जुटाए। दूरदर्शन का काफी विकास और विस्तार हुआ। आज दूरदर्शन ३० चैनल का बड़ा परिवार है। १५ सितंबर, १९५९ को भारत में टेलीविजन की शुरुआत हुई थी। बाद में, निजी चैनल्स की बाढ़-सी आ गई। फिलवक्त देश में करीब ५०० निजी चैनल हैं। भारत में दूरदर्शन का स्वरूप कैसा हो? इस बात की चिंता के लिए समय-समय पर कमेटियां (चंदा कमेटी, बीजी वर्गीस कमेटी और पीसी जोशी कमेटी) बनी। पीसी जोशी कमेटी ने कहा था- टेलीविजन किसी भी देश का चेहरा होता है। अगर किसी देश का परिचय पाना है तो उसका टेलीविजन देखना चाहिए। वह राष्ट्र का व्यक्तित्व होता है। स्पष्ट है कि दूरदर्शन पर भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधत्व करने वाले कार्यक्रम ही प्रसारित होना चाहिए, इस आशय की रिपोर्ट पीसी जोशी के नेतृत्व वाली कमेटी ने सरकार को सौंपी थी। संभवत: यही कारण रहा कि भारतीय संस्कृति, साहित्य और चिंतन को बचाए रखने, उसके संवर्धन और प्रोत्साहन में जो योगदान दूरदर्शन का है वह अन्य किसी का नहीं। निजी चैनल्स ने तो पैसा बनाया और इसके लिए संस्कृति को विद्रूप भी करना पड़ा तो किया, आज भी कर रहे हैं। भारत में जब निजी चैनल्स को प्रसारण के अधिकार मिले तो टेलीविजन और साहित्य से जुड़े लोगों को एक उम्मीद जगी थी, सोचा था प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। इससे चैनल्स पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों की गुणवत्ता में वृद्धि होगी। लेकिन, स्थिति विद्वानों की सोच के विपरीत है। आज देश में चैनल्स की भीड़ है। उनके बीच प्रतिस्पर्धा भी है लेकिन गुणवत्ता बढ़ाने की नहीं वरन गुणवत्ता गिराने की प्रतिस्पर्धा है।
    निजी चैनल्स पर प्रसारण के क्षेत्र में उतरे तो उनके पास दर्शकों का टोटा था। दूरदर्शन की दर्शक संख्या बेहद मजबूत थी। दूरदर्शन पर प्रसारित अर्थपूर्ण कार्यक्रमों ने दर्शकों को बांधे रखा था। ऐसे में निजी चैनल्स ने दूरदर्शन के दर्शकों को हड़पने के लिए बाकायदा षड्यंत्र रचा। उन्होंने हिटलर के मंत्री गोएबल्स के प्रोपेगण्डा सूत्र का उपयोग किया। 'दूरदर्शन घटिया है। दूरदर्शन पर प्रसारित सामग्री भी भला देखने वाली है क्या? दूरदर्शन आउटडेटेड हो गया है।' ऐसे झूठ निजी चैनल्स के गुटों ने जोर-जोर से चिल्लाकर और चालाकी से आमजन के अंतरमन में बैठा दिए। टीआरपी के झूठे खेल में दूरदर्शन को पिछड़ा दिखाया गया। यह सच है कि निजी चैनल्स यह भ्रम खड़ा करने में सफल रहे कि दूरदर्शन देखे जाने लायक चैनल नहीं है। महानगरों में यह भ्रम आज भी कायम है। लेकिन, असल स्थिति इसके उलट है। गोएबल्स का सूत्र 'एक झूठ को सौ बार बोलो वह सच लगने लगेगा' सफल नहीं क्योंकि झूठ सच भले ही प्रतीत करा दिया जाए लेकिन वह सच नहीं बन पाता। सच तो सच ही रहता है। द्वितीय विश्वयुद्ध में हिटलर की पराजय का एक कारण गोएबल्स का यह सूत्र भी था। गोएबल्स अंत तक हिटलर को यही बताता रहा कि जर्मनी युद्ध जीत रहा है जबकि रणक्षेत्र में कुछ और ही घट रहा था। ठीक यही स्थिति दूरदर्शन और निजी चैनल्स की जंग के साथ है। १९८२ से १९९१ तक का समय भारतीय दूरदर्शन का स्वर्णकाल रहा। इस दौरान दूरदर्शन ने न सिर्फ नायक गढ़े वरन एक टेलीविजन संस्कृति का विकास भी किया। इस दौरान उसने कई ऐतिहासिक रिकॉर्ड कायम किए। यह उसकी लोकप्रियता का दौर था। रंगीन प्रसारण (१९८२ में भार में आयोजित एशियाड गेम्स से) और सोप ऑपेरा ने इसे और विस्तार दिया। महाभारत और रामायण ने किंवदंतियां रचीं। कहते हैं कि महाभारत और रामायण के प्रसारण के वक्त भारत की सड़कें सूनी हो जाती थी। दूरदर्शन पर प्रसारित हुए धारावाहिक हमलोग, बुनियाद, ये जो जिंदगी है, विक्रम-बेताल, चंद्रकांता, करमचंद, तमस और चाणक्य को जो लोकप्रियता हासिल हुई वो किसी भी निजी चैनल्स के किसी भी धारावाहिक को नहीं मिल सकी। डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी द्वारा निर्मित 'उपनिषद गंगा' धारावाहिक इसी श्रंखला को आगे बढ़ाएगा यह तय है। ११ मार्च, २०१२ से प्रति रविवार अब तक प्रसारित एपिसोड तो इसी बात की हामी भरते है।

Sunday, June 17, 2012

रोम-रोम में बसे हैं प्रभु राम

   रामकथा आदर्श जीवन की संपूर्ण गाइड है। राम भारतवर्ष के प्राण हैं। वे भारत के रोम-रोम में बसे हैं। यही कारण है कि उनका अनादर देश बर्दाश्त नहीं कर सकता। 'मेरे राम मेरी रामकथा' लिखने से पूर्व प्रख्यात लेखक नरेन्द्र कोहली राम चरित्र पर एक वृह्द उपन्यास लिख चुके हैं, जिसे खूब सराहा गया। यह दो भागों में था - अभ्युदय-१ (दीक्षा, अवसर, संघर्ष की ओर) और अभ्युदय-२ (युद्ध-१ व युद्ध-२)। पहला खंड 'दीक्षा' का लेखन उन्होंने १९७३ में शुरू किया था लेकिन इसको लिखने से पहले उनके मन में बड़ी उथल-पुथल मची थी। आखिर वे भारत के मर्म पर लिखने जा रहे थे। जरा-सी ऊंच-नीच बवंडर खड़ा कर सकती थी। लेकिन राम के जीवन का कोई कड़वा सच होता तब लेखकीय धर्म उसे भी लिखने के लिए मजबूर करता, ऐसे में मुश्किल हो सकती थी। उनसे पहले कुछेक अति बुद्धिवादियों ने राम के चरित्र को छलनी करने का प्रयास किया ही था। यही कारण रहा कि जब कोहली ने उपन्यास लिखना आरंभ किया तो सबसे पहली आपत्ति उनके पिता ने ही की। उनका मानना था कि राम परम ब्रह्म हैं और नरेन्द्र साधारण चरित्र का कथाकार, जो घटना का रस लेता है। उनके पिता को आशंका थी कि वह लोकप्रियता हासिल करने के लिए राम के चरित्र को औरों की तरह दूषित न कर दें। लेकिन, 'दीक्षा' जब प्रकाशित होकर आया, पाठकों और आलोचकों के हाथ पहुंचा। इसके बाद वहां से जो सकारात्मक रुझान आया वह नरेन्द्र कोहली के लिए बड़े ही आनंद का विषय था। खासकर वह क्षण उनके लिए अविस्मरणीय है जब उन्होंने माता-पिता को बैठाकर 'दीक्षा' का पाठ उनके सामने किया। उपन्यास सुनकर उनके पिता ने प्रसन्नता जाहिर की। कहा कि- उन्हें कोई आपत्ति नहीं क्योंकि उपन्यास में कहीं भी प्रभु राम की अवमानना नहीं है। एक सनातनी हिन्दू का प्रमाण-पत्र मिलने के बाद तो लेखक का साहस बढ़ गया और इसके बाद १९७५ से १९७९ के बीच रामकथा के सारे खंड प्रकाशित हो गए। हालांकि ऐसा नहीं रहा कि उनकी आलोचना नहीं हुई। समीक्षकों ने आपत्ति जताई थी कि राम का चरित्र स्वाभाविक नहीं है, क्योंकि लेखक ने राम की किसी भी चारित्रिक दुर्बलता का चित्रण नहीं किया था। आलोचक की मान्यता थी कि ऐसा कोई नहीं है जिसकी कोई चारित्रिक दुर्बलता नहीं हो। उनका ऐसा सोचना स्वाभाविक है क्योंकि उन्होंने संभवत: अपने जीवन में ऐसा कोई सज्जन देखा ही नहीं होगा। इस पर लेखक कहता है कि श्रीराम के चरित्र में मुझे कहीं कोई छिद्र दिखाई नहीं दे रहा था। जब दोष था ही नहीं तो तथाकथित साहित्यिक पंडितों को प्रसन्न करने के लिए मैं उस परम पावन चरित्र पर कालिमा तो नहीं पोत सकता था।
         लोकनायक राम के जीवन पर शानदार उपन्यास लिखने के लम्बे समय बाद 2009 में उनकी 'मेरे राम मेरी रामकथा' पुस्तक का प्रकाशित हुई। इस पुस्तक की रचना के संदर्भ में नरेन्द्र कोहली कहते हैं कि रामकथा के प्रकाशन के बाद से बहुत सारे प्रश्न मेरे सामने आए थे- कुछ दूसरों के द्वारा पूछे गए और कुछ मेरे अपने मन में अंकुरित हुए थे। बहुत कुछ वह था जो लोग पूछ रहे थे और बहुत कुछ वह था जो मैं पाठकों को बताना चाहता था। यही कारण है कि समय-समय पर अनेक कोणों से, अनेक पक्षों को लेकर मैं अपनी सृजन प्रक्रिया और अपनी कृति के विषय में सोचता, कहता और लिखता रहा। अंतत: उन सारे निबन्धों, साक्षात्कारों, वक्तव्यों और व्याख्यानों को मैंने एक कृति के रूप में प्रस्तुत करने का मन बनाया। इस प्रकार जो मंथन नरेन्द्र कोहली मन में हुआ वही 'मेरे राम मेरी रामकथा' में आपके सामने है।
          लेखक ने पुस्तक में रामायण के प्रसंगों को वर्तमान की परिस्थितियों के बरक्स रखकर यथास्थिति से अवगत कराने का सकारात्मक प्रयास किया है। किसी देश पर अधिपत्य जमाए रखने के लिए वहां बौद्धिक नेतृत्व को खत्म करना जरूरी है। रावण व अन्य राक्षस यही किया करते थे। वे इसे समझाने के लिए बांग्लादेश स्वतंत्रता के युद्ध का उदाहरण देते हैं। कोहली लिखते हैं कि उस युद्ध में उनकी गहरी रुचि थी। इसलिए उसके संबंध में समाचार-पत्रों में प्रकाशित होने वाली सूचनाओं को वे बहुत रुचि से पढ़ते थे। उसी संदर्भ में समाचार छपा था कि पाकिस्तानी सेना अत्यंत सुनियोजित ढंग से सूची बना-बनाकर बांग्लादेश के बुद्धिजीवियों की हत्या कर रही है। उनकी इच्छा थी कि बांग्लादेश का एक-एक बुद्धिजीवी समाप्त कर दिया जाए ताकि बांग्लादेश को बौद्धिक नेतृत्व नहीं मिल सके। इस समाचार से लेखक को स्पष्ट हुआ कि रावण के नेतृत्व में राक्षस, दंडकवन के ऋषियों का मांस क्यों खा रहे थे। अब तक ऋषियों के वध की घटनाएं, राक्षसों की क्रूरता को चित्रित करने का साधन मात्र थीं, किन्तु अब वे मानव समाज के दलित-दमित वर्ग को पिछड़ा बनाए रखने के लिए उसे बौद्धिक नेतृत्व से वंचित करने के क्रूर षड्यंत्र का प्रतीक थीं।
मेरे राम मेरी रामकथा
- नरेन्द्र कोहली
मूल्य : २५० रुपए (सजिल्द)
प्रकाशन : वाणी प्रकाशन
४६९५, २१-ए, दरियागंज, नई दिल्ली-११०००२

      आज समाज में नुकीले दांतों, विशाल और भयाभय शरीर वाले राक्षस नहीं है। लेकिन, राक्षस तो हैं ही। जो धर्म का पालन नहीं करते, गरीब और असहाय को सताते हैं वे राक्षस ही हैं। इसे भी लेखक ने स्पष्ट किया है। राक्षस की  जाति नहीं है। रामकथा में ही एकाधिक स्थानों पर राम जिस समय किसी राक्षस के कंठ पर अपने चरण रखकर पूछते हैं कि वह कौन है तो वह अपना परिचय देता हुआ कहता है कि वह गंधर्व था, अब राक्षस हो गया है। इस प्रकार सामान्य लोग भी राक्षस हो जाते हैं और दंड के अभाव में लगातार राक्षस हो रहे हैं। राक्षस जीवन-शैली और चिंतन को स्वीकार कर लेने वाला कोई भी व्यक्ति राक्षस हो सकता है। आमूलचूल परिवर्तन समाज जागरण और जनांदोलन से ही आता है। यही कारण है कि ऋषियों ने राम को रावण के खिलाफ जननायक के रूप में खड़ा किया, अयोध्या के राजा के रूप में नहीं। उन्होंने राम से पहले जनजागरण कराया, समाज में राम की छवि जननेता की बनाई ताकि लोग राम के साथ अन्यास के खिलाफ उठ खड़े हों। विश्वामित्र को सिद्धाश्रम ही बचाना होता तो वे स्वयं किसी राजा की शरण में चले जाते या ताड़का वध के बाद राम को वापस अयोध्या भेज देते लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। क्योंकि उनकी योजना समाज जागरण कर अत्याचारी रावण के खात्मे की थी। नरेन्द्र कोहली ने 'मेरे राम मेरी रामकथा' में राम के जीवन से जुड़े कई प्रश्नों को बेहतर तर्क प्रस्तुत कर स्पष्ट किया है। जिन प्रसंगों को लेकर विधर्मी राम के चरित्र पर सवाल उठाते हैं उन्हें 'मेरे राम मेरी रामकथा' करारा जवाब है। रामसेतु प्रसंग की चर्चा कर उन्होंने केन्द्र सरकार और राम विरोधियों की मानसिकता को भी उजागर किया है। वैसे तो देश में रोज ही कहीं न कहीं रामकथा का वाचन-श्रवण होता ही रहता है फिर भी राम के मर्म को समझना है तो यह पुस्तक और राम के जीवन पर लिखा नरेन्द्र कोहली का उपन्यास पढऩा चाहिए।