आज सुबह से
हर तरफ़, हुआ अजब है शोर
पकड़ो, दौड़ो, रंग दो; आवाज़ें हर ओर ।
गली-गली में
रंग का, बरस रहा है मेघ
पिचकारी की धार का, बढ़ाते हुआ
है वेग ।
रंग घुला
चहुँ ओर अब, उड़ा गुलाल , अबीर
पिचकारी से रंग के, छूट रहे हैं
तीर ।
होली पर
इतना रखें, सभी मनुज बस ध्यान,
यूँ बैरंग न हो कभी, रंगों में
इंसान ।
द्वेष, अदावत, रंज़िशें; होली में दे फूँक
जा सबके लग
जा गले, मत बैठा रह मूक ।
इक जीवन में
रंग भर, इक जीवन में प्रान
होली का
मतलब यही, ये होली का ज्ञान ।
रचनाकार: श्री अंकित गुप्ता 'अंक'
मोरादाबाद, उत्तर प्रदेश
पिता तुल्य कोई नहीं, देवों का संसार
पिता, पिता है और है, उत्तमता का सार
मानसरोवर स्नेह का।
पिता बिना होता नहीं, माँ का कोई अर्थ
माँ उत्कलिका प्रेम की, पिता बिना असमर्थ
एक किनारा अर्थ का।
माँ पराग केसर अगर, पापा एक पराग
हँसता रहता हैं जहाँ, आपस का अनुराग
माली है वह चमन का।
पिता रक्ष अहिवात का, आंगन का वैदूर्य
सुरभित सिंदूर मांग का, एक चमकता सूर्य
जयमाला की सौम्यता।
गूढ़ हिमालय शांति का, मूँछों का ऐश्वर्य
संबंधों की डाल का, मनमोहक सौन्दर्य
उच्च निरूपक धैर्य का।
रचनाकार- श्री शिवानंद सिंह "सहयोगी"
संपर्क- "शिवभा" ए- 233, गंगानगर, मवाना मार्ग, मेरठ- 250001
दूरभाष- 09412212255, 0121-2620880
पानी का जल स्रोत जब, उगल रहा है रेत
मधुवन है सूना हुआ, सूना है साकेत
रहीमा रोना रोये.
भूजल का तल घट गया, छूता है पाताल
शेषनाग की नागिनी, चूम रही है गाल
पियासी होगी शायद.
रोता है माथा पकड़, भष्मी का अवशेष
गंगा तेरी गोद में, पानी बचा न शेष
फूल में कहाँ बहाऊँ.
जल के वातावरण में, पलता जीवनमूल्य
जीवलोक है घुट रहा, पानी नहीं अमूल्य
बढ़ी बेचैनी दिल में.
टोंटी में पानी नहीं, पंछी हैं बेचैन
सागर तट पर बैठकर, बिलख रहे दिन-रैन
कौन है सुननेवाला.
एक ततइया दौड़कर, आई नल के पास
नल बेचारा भी खड़ा, मुखड़ा लिये उदास
नहीं है पारो पानी.
रचनाकार- श्री शिवानंद सिंह "सहयोगी"
संपर्क- "शिवभा" ए- 233, गंगानगर, मवाना मार्ग, मेरठ- 250001
दूरभाष- 09412212255, 0121-2620880
*चित्र गूगल से साभार*
कुछ दोहे उसके लिये, जो जीवन सौगात
आजीवन चंदा बना, मैं जिसका अहिवात
गले का मंगल धागा.
पत्नी धुँधली साँझ है, घर की फटती पौ
घर की अक्षत दूब है, दीया की है लौ
पत्नी घर की गोमती, घर की अमृत धार
सिंचित करती ही रही, एक अमित परिवार
पत्नी घर की नींद है,पत्नी घर की आग
रागों की है रागिनी, खटकों का खटराग
पत्नी पुलकित पूर्णिमा, पत्नी मावस रात
अँधियारी ही जानती, पत्नी की औकात
रचनाकार- श्री शिवानंद सिंह "सहयोगी"
संपर्क- "शिवभा" ए- 233, गंगानगर, मवाना मार्ग, मेरठ- 250001
दूरभाष- 09412212255, 0121-2620880
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| चित्र गूगल से साभार |
सोचा था अपना जिन्हें, हैं घर से वो दूर
प्रेम आज घायल हुआ, मन में पला गरूर
यही सब होना ही था
दुःख अपने परिवार संग, साध रहा है बैर
राहें चलतीं पूछतीं, रोज - रोज ही खैर
किसे मैं क्या बतलाऊँ
दूर - दूर होते गए, अपने - अपने लोग
किस-किसको मैं दोष दूं, यह सब है संयोग
हुए अपने बेगाने
किसने यह साजिश रची, किया कौन अपराध
अपनेपन से दूर मन, साथी बना विराध
कौन है मामा शकुनी
दुविधाओं ने सहन का, तोड़ दिया है बाँध
दर्द तभी से दे रहा, आशाओं को काँध
पड़ोसी ताना मारे
रचनाकार- श्री शिवानंद सिंह "सहयोगी"
संपर्क- "शिवभा" ए- 233, गंगानगर, मवाना मार्ग, मेरठ- 250001
दूरभाष- 09412212255, 0121-2620880
विद्यालय है कल खुला, बहुत दिनों के बाद
अध्यापक हैं ले रहे, पकवानों का स्वाद
कक्षा कहती आइये, लेकर सब सामान
शिक्षक हैं हड़ताल पर, ग्रहण कीजिए ज्ञान
शिक्षा चली देहात से, लेकर केवल पेट
शहर पहुँच पीने लगी, मदिरा संग सिगरेट
बचपन पर बस्ता चढ़ा, हँसी हो गई कैद
पैदल-पैदल चल पड़ी, फीस खड़ी मुस्तैद
आज की शिक्षा पद्धति
।
रचनाकार- श्री शिवानंद सिंह "सहयोगी"
संपर्क- 09412212255