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Monday, February 23, 2015

हमारी चाय की चुस्कियों पर टिकी उनकी रोजी-रोटी


सम अपनी कड़क और तन-मन में ऊर्जा का संचार कर देनेवाली चाय के लिए मशहूर है राज्य में चाय बागान बेरोज़गारी को कम करने और राज्य की वित्तीय स्थिति को बेहतर बनाने में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं यहाँ चाय उत्पादन में बराक घाटी के नाम से मशहूर दक्षिण असम की अहम भूमिका है हाल ही में बराक घाटी में सेहत के अनुकूल पर्पल यानि बैंगनी चाय के उत्पादन की संभावनाए भी नज़र आई हैं
ऐतिहासिक रूप से नज़र डालें तो सुरमा घाटी और अब बराक घाटी के नाम से विख्यात दक्षिण असम के चाय बागानों का इतिहास सौ साल से भी ज्यादा पुराना है यहाँ प्रतिकूल मौसमीय परिस्थितियों के बाद भी चाय उत्पादन में लगभग 3 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है और कछार चाय की कीमत में भी तुलनात्मक रूप से 8 फीसदी से ज्यादा का इज़ाफा हुआ है जानकारों का कहना है कि यदि परिवहन, बिजली और संचार सुविधाएँ बेहतर हो जाएँ तो कछार चाय देश के कुल चाय उत्पादन में और भी ज्यादा योगदान दे सकती है जिसका असर पूर्वोत्तर के विकास पर भी स्पष्ट नज़र आएगा
वैसे असम में कुल मिलाकर 70 हज़ार से ज्यादा छोटे-बड़े चाय बागान हैं और लाखों परिवारों की रोजी-रोटी इन बागानों के सहारे चल रही है यही नहीं राज्य की अर्थव्यवस्था में भी चाय बागानों का महत्वपूर्ण योगदान है इसलिए असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई चाय को स्टेट ड्रिंक अर्थात राजकीय पेय का दर्जा भी दे चुके हैं हालाँकि बीते कुछ समय से प्रतिकूल मौसम कम वर्षा और तकनीकी परेशानियों के कारण छोटे चाय बागानों को तमाम समस्याओं का सामना करना पड रहा है इसके अलावा तकनीकी प्रगति के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने और प्रतिस्पर्धा में बने रहने में छोटे चाय बागानों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है ऐसे में भारतीय स्टेट बैंक की नई पहल उनके लिए राहत बनकर आई है
 अब स्टेट बैंक ने छोटे चाय बागानों की वित्तीय परेशानियों को दूर करने के लिए आर्थिक सहायता देने की योजना बनायीं है योजना के अंतर्गत बैंक पहले चरण में 3 हज़ार चाय बागानों को यह सहायता देगा इसके लिए सौ करोड़ रुपए निर्धारित किये गए हैं बताया जाता है कि चाय बागानों में स्थित स्टेट बैंक की शाखाएं जल्दी ही सर्वेक्षण का काम शुरू करेंगी और फिर इस सर्वे के आधार पर आर्थिक मदद प्रदान की जाएगी बैंक के आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक वित्तीय सहायता केवल उन्हीं चाय बागानों को दी जाएगी जो भारतीय चाय बोर्ड के मापदंडों पर खरे उतरेंगे
बैंक असम के साथ साथ पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में स्थित चाय बागानों को भी इस योजना में शामिल करेगा यही नहीं स्टेट बैंक ने प्रधानमंत्री जन-धन योजना की तर्ज पर चाय बागानों में काम करने वाले मजदूरों के खाते खोलने की एक अन्य योजना पर भी काम शुरू किया है इससे उनकी दिहाड़ी का भुगतान सीधे बैंक खाते के जरिये हो सकेगा

प्रधानमंत्री द्वारा पूर्वोत्तर के विकास के लिए की जा रही पहल में हाथ बटाने के लिए स्टेट बैंक अब इस क्षेत्र के युवाओं को भी वित्तीय मदद के रास्ते तलाश रहा है प्रारंभिक तौर पर पर्यटन के क्षेत्र में काम करने वाले युवाओं को आर्थिक मदद देकर प्रोत्साहित किया जाएगा ताकि क्षेत्र में पर्यटन विकास के साथ साथ बेरोज़गारी को भी दूर किया जा सके

Saturday, February 7, 2015

दिल्ली की लड़कियाँ क्या बिगड़ी हुई हैं


   कुछ साल पहले दिल्ली में रोजी-रोटी की खातिर बसने आये या फिर सालों से दिल्ली में निवास करने के बावजूद दिल्ली को अपना नहीं माननेवाले लोगों से अक्सर बिन माँगी राय मिलती जाती है कि दिल्ली की लड़कियों का चरित्र ठीक नहीं होता अर्थात वो बिगड़ी हुई होती हैं। इन तथाकथित रायवीरों को यह बताना जरूरी है कि दिलवालों के शहर दिल्ली की लड़कियाँ बिगड़ी हुई नहीं हैं। दिल्ली ही क्यों लड़कियाँ किसी भी शहर या कसबे या फिर गाँव की बिगड़ी हुई नहीं होतीं। अब चूँकि बात दिल्ली की लड़कियों की हो रही है तो दिल्ली शहर में हर देशहर प्रान्त एवं हर जाति और सम्प्रदाय के लोग पाए जाते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो दिल्ली शहर में एक लघु भारत बसता है। इस लघु भारत में रहते-रहते यहाँ के निवासी खुले दिल के स्वामी हो जाते हैं तथा किसी भी कार्य को पूर्णता प्रदान करने में औरों से अधिक सिद्धहस्त भी होते हैं और उनके शब्दकोश से भेदभाव और असंभव शब्द धीमे-धीमे मिट जाते हैं। किसी के साथ दो पल हँसकर बात करने को बिगड़ा हुआ होना कहा जाए तो शायद दिल्ली का हर निवासी बिगड़ा हुआ है। अन्य शहरों की भाँति दिल्ली की लड़कियों का भी एक परिवार होता है जिसमें सभ्यता एवं संस्कृति वास करती हैं। यहाँ की लड़कियाँ भी अपने परिवार के सम्मान की परवाह करती हैं और मर्यादा का पालन करते हुए प्रगति के पथ पर अग्रसर होती हैं। जिन लड़कियों को देखकर दिल्ली की लड़कियों को बिगड़ेपन का तमगा प्रदान किया जाता है असल में वो उन लड़कियों का 10-12 प्रतिशत होता है जो विभिन्न शहरों या कसबों से दिल्ली में शिक्षा प्राप्त करने या नौकरी करने के उद्देश्य से आती हैं और अपने माँ-बाप के विश्वास का राम नाम सत्य करके यहाँ स्वच्छंदता की सारी हदें पार कर डालती हैं और उन्हीं लड़कियों को दिल्ली की लड़कियों का प्रतिनिधि मानकर दिल्ली की लड़कियों को बिगड़ा घोषित कर दिया जाता है। इसलिए यदि कभी कोई आपसे कहे कि दिल्ली की लड़कियाँ बिगड़ी होती हैं तो उससे कहिएगा कि दिल्ली की लड़कियाँ बिगड़ी हुई नहीं हैंबल्कि ऐसा सोचनेवाले उस व्यक्ति का मानसिक संतुलन ही बिगड़ा हुआ है।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह
www.sumitpratapsingh.com

Friday, February 6, 2015

क्या किरण बेदीजी को न्याय मिलेगा




   किरण बेदीजी से पहली बार मुलाकात दिल्ली पुलिस की ट्रेनिंग के दौरान हुई थी। रंगरूट के रूप में उनका पहला भाषण अभिभूत होकर सुना था। पुलिस की पारंपरिक ट्रेनिंग को उन्होंने नया रूप प्रदान किया था। इससे पहले पुलिस की ट्रेनिंग अंग्रेजी तरीके से ही होती थी जिसमें ट्रेनिंग देनेवाले अंग्रेजों की भूमिका होते थे और ट्रेनिंग लेनेवाले भारतीयों की। ट्रेनिंग में ट्रेनीज पर इतना अत्याचार किया जाता था कि कुछ तो परेशान होकर त्यागपत्र देकर ट्रेनिंग से रवानाहो जाते थे। इस परम्परा को किरणजी ने बदला। पुलिस ट्रेनिंग के अलावा उन्होंने तिहाड़ जेल व होमगार्ड की पोस्टिंग के दौरान सार्थक कदम उठाकर तिहाड़ जेल के कैदियों और होमगार्ड का भला किया जिसे आज भी याद किया जाता है। किरणजी दिल्ली पुलिस की आयुक्त बनने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त दावेदार थीं लेकिन उनकी वरिष्ठता और उनकी कर्मठता को न देखकर उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की कार उठवाने की सज़ा के तौर पर इस पद के अयोग्य कर दिया गया। ये उनका नहीं बल्कि हम दिल्लीवासियों का दुर्भाग्य था। उस समय मैं जब उनसे मिलने गया था तो उनके साथ हुए अन्याय को देखकर मेरी भी आँखें नम हो गई थीं। फिर किरणजी ने जब अन्ना के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन शुरू किया था तो उनके रूप में ऊर्जा से ओतप्रोत एक नई किरण का आभास हुआ था। एक साजिश के तहत इस आंदोलन को कुचल दिया गया, लेकिन देश की जनता उनका बदला लिया देश को नरेन्द्र मोदीजी के रूप में एक सशक्त नेतृत्व प्रदान किया। अब जब समय आया कि किरणजी से हुए अन्याय की भरपायी करके उन्हें दिल्ली की कमान सौंपकर पिछले एक साल से अक्षम पड़ी दिल्ली को प्रगति के पथ पर बढ़ने का यत्न किया गया तो दिल्ली को 49 दिनों में छोड़कर भागने वाले किरणजी को अवसरवादी घोषित कर स्वयं को पुण्यात्मा सिद्ध करने का षड़यंत्र कर रहे हैं अब ये और बात है कि कभी उन्होंने ही किरणजी को अपने दल का नेतृत्व करने को निमंत्रित किया था। जहाँ तक ज़मीन से जुड़ा होने की बात है तो उनके अंतर्गत कार्य कर चुके एवं उनसे किसी न किसी प्रकार जुड़े व्यक्ति भली-भांति बता सकते हैं कि वो वास्तव में ज़मीन से जुड़ी हुई इंसान हैं।फिर देखिये ज़मीन से जुड़े तथाकथित व्यक्ति के दल के ही लिव इन रिलेशन के नाम पर घर पर रखैल रखकर भोग-विलास करनेवाले एक महोदय ने अभी कुछ दिन पहले किरणजी के साथ अभद्रता की भी हद ही पार कर दी। कई दशक बढ़िया प्रशासक की भूमिका का निर्वहन करते हुए देश-विदेश में दिल्ली और भारत का नाम रौशन करनेवाली किरणजी की तुलना एक असफल शासक से, जो दिल्ली की प्रगति को कई साल पीछे ले जाने का भी जिम्मेदार है, करना उनके साथ फिर से अन्याय करना ही होगा। अब आप दिल्लीवासियों पर निर्भर करता है कि जैसे पूरे देश ने नरेन्द्र मोदीजी को देश का नेतृत्व सौंपकर एक सुदृढ़ शासन प्रदान किया वैसा शासन किरणजी के नेतृत्व में प्रदान करते हैं या नहीं। या फिर दिल्ली और दिल्ली की आशा की किरण किरण बेदीजी की झोली में इस बार भी अन्याय ही हासिल होता है। 

लेखक: सुमित प्रताप सिंह 

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Thursday, February 5, 2015

क्या वाकई में इस्लाम इतना कमज़ोर है

   क्या वाकई में इस्लाम इतना कमज़ोर है, कि मस्जिद से कोई लाऊड स्पीकर उतारने को बोल दे तो इस्लाम खतरे में, कोई घर वापसी कराए तो इस्लाम खतरे में, कहीं दंगा हो तो खतरा, अमरीका में टावर गिरे तो खतरा. "शर्ली अब्दों" पत्रिका ने मोहम्मद साहब का कार्टून छाप दिया तो १२ पत्रकारों को मौत के घाट उतार दिया. ये काम किया एक ऐसे गिरोह ने, जो इस्लाम के नाम पर मासूम बच्चो को भी मारने से भी नहीं डरता. जिस पत्रिका ने यह कार्टून छापा उसकी पहले केवल १५००० हजार प्रतियाँ छपती थीं, लेकिन इस हादसे के बाद लाखों की संख्या में इसकी प्रतियाँ छपीं और इससे करोड़ों रूपये कमाए गए. किस की वजह से आप भली-भांति समझ सकते हैं. क्या हम ऐसे लोगों के बहकावे में आ गये जो सिर्फ और सिर्फ कातिल हैं. जिनका इस्लाम से कुछ भी लेना-देना नहीं है. उन्हें तो हुकूमत करने के लिए हर वो काम करना है जो उन्हें राजगद्दी तक पहुचाये. आप एक बात पर ध्यान दें क्या कोई भी मुसलमान यह दावा कर सकता है कि मोहम्मद साहब की कोई भी तस्वीर दुनिया में मौजूद है. अगर नहीं तो फिर हमें उनके तथाकथित कार्टून से क्या लेना-देना. मुसलमानों को अपनी खुद की तरक्की समाज और देश की तरक्की के बारे में सोचना होगा. जितने वफादार हम दीन के हैं, उतने ही क्यों न देश के भी हों. कोई भी हमारी भावनाओं को भड़काकर दीन के नाम पर हमारा शोषण न कर सके. कुछ लोगो का तो सिर्फ ये ही काम है कि हमारी कौम को किसी भी तरह शिक्षा से दूर रखा जाये ताकि हम रेहड़ी-पटरी लगानेवाले और मज़दूर ही बने रहें. हमारे धर्म के तथाकथित ठेकेदार सिर्फ चंदा वसूलकर मदरसों में हमारे बच्चों को केवल हाफिज और मौलाना ही बनाने का काम करते रहेंगे. डॉक्टर और इंजीनीयर बनाने का ख्वाब शायद जन्नत में ही पूरा हो पायेगा. हमारी कौम को अब तो जागना ही होगा और धर्म के तथाकथित ठेकेदारों और राजनितिक दलालों के पीछे भेड़-बकरियों की तरह पीछे चलने की पुरानी आदत छोडनी ही होगी. दुनिया मंगल ग्रह तक पहुँच गई लेकिन हम अभी तक उसी बीती दुनिया में खोये हुए सो रहे हैं और यह सब मानने को बिल्कुल भी तैयार नहीं है. इस लेख को सभी भाई खासकर मुसलमान भाई जरूर पढ़ें और यह सोचें कि अपने बच्चों को ऊँची तालीम दिलवाएँ जिससे कि हमारे बच्चे पंचर लगाने की बजाय डॉक्टर बनकर किसी ऑपरेशन थिएटर में इंसान का ऑपरेशन करके उनकी ज़िन्दगी बचाने का काम करे या फिर रेहड़ी-पटरी पर चिल्लाकर सामान बेचने की बजाय इंजीनियर बनकर कहीं किसी पुल का निर्माण करवाते हुए अपने मुल्क की तरक्की में योगदान दे और यह साबित करे कि इस मुल्क को हमने भी कुछ बेहतर दिया है.
जय हिन्द! वंदे मातरम्!
रऊफ अहमद सिद्दीकी
संपादक, जनता की खोज, नॉएडा 

Wednesday, February 4, 2015

‘खबर’ से ‘बयानबाज़ी’ में बदलती पत्रकारिता


मीडिया और खासतौर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया से ‘खबर’ गायब हो गयी है और इसका स्थान ‘बयानबाज़ी’ ने ले लिया है और वह भी ज्यादातर बेफ़िजूल की बयानबाज़ी. नेता,अभिनेता और इसीप्रकार के अन्य कथित ‘सेलिब्रिटी’ आए दिन उट-पटांग बयान देते हैं और मीडिया आगे बढ़कर उन्हें उछालने और ऐसे ही अन्य बयान देने के लिए उकसाता रहता है. टेलीविजन चैनलों पर अपना चेहरा दिखाने और सस्ती लोकप्रियता पाने की प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ गयी है या यों कहा जाए कि मीडिया ने इतनी बढ़ा दी है कि अब हर कोई ‘विवादित बयानबाज़ी’ के जरिये कथित तौर पर लोकप्रिय होना चाहता है. यही कारण है कि देश में इन दिनों साधुओं-साध्वियों,मुल्ला-मौलवियों और उनसे भी ज्यादा बदनाम होने को तत्पर गुमनाम नेताओं की मानो बाढ़ सी आ गयी है. हर कोई अपनी भाषा-संस्कृति की गंदगी को उगलने और दूसरों को भी उसकी चपेट में लेने के लिए बेताब है. मीडिया के ‘बाइट-वीर’ तो मानो इसे लपकने के लिए अपनी झोली फैलाए बैठे हैं कि आओ हमारे चैनल पर आप अपनी गन्दी जुबां की प्रतिभा का प्रदर्शन करो और फिर हम उसे ब्रेकिंग न्यूज़ बनाकर पूरे देश में इसे दिनभर महामारी की तरह फैलाते रहेंगे. खेद की बात तो यह है कि हमारे समाचार पत्र भी इलेक्ट्रानिक मीडिया के बिछाए इस जाल में फंस रहे हैं. यहाँ तक कि आकाशवाणी-दूरदर्शन जैसे अपेक्षाकृत संतुलित समाचार माध्यमों में भी इसका असर साफ़ नजर आने लगा है.
देश में दशकों से सैकड़ों की संख्या में संचालित पत्रकारिता संस्थानों की कक्षाओं में संतुलित खबर की पट्टी पढाई जा रही है. संतुलित खबर माने जिसमें सही तथ्य, सभी पक्ष और समाज की बेहतरी छिपी हो. मुझे याद है नब्बे के दशक में जब प्रिंट मीडिया की तूती बोलती थी तो आमतौर पर सभी बड़े अख़बारों में किसी भी समाचार को बिना दूसरे या उस पक्ष की राय जाने बिना प्रकाशित नहीं किया जाता था जो उस समाचार से प्रभावित हो सकता था. कई बार अच्छी एवं महत्वपूर्ण ख़बरों को भी दूसरे पक्ष की राय जानने तक रोक दिया जाता था. यहाँ तक कि सरकार और सत्ता-प्रतिष्ठान के खिलाफ होने वाले समाचारों पर भी सरकार का पक्ष जानना जरुरी होता था और वह भी किसी जिम्मेदार अधिकारी का. लेकिन नई दौर की पत्रकारिता को देखकर तो लगता है कि इसके कर्ता-धर्ताओं ने ‘संतुलित’ के स्थान पर शायद ‘सनसनी’ पढ़ लिया है इसलिए वे खबरों को अधिक से अधिक सनसनीखेज बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ते.
 समाचार का सामान्य शिष्टाचार तो यह कहता है कि सर्वप्रथम तो किसी के अनर्गल प्रलाप को मीडिया की सुर्ख़ियों से दूर रखा जाना चाहिए और दूसरा यह कि यदि यह प्रलाप किसी व्यक्ति/संस्था/सरकार से सम्बंधित है तो उस प्रलाप पर उनका पक्ष भी जानने के बाद ही दोनों पक्षों से मिली जानकारी को मिलाकर समाज के हित में होने वाली सूचना को मीडिया में प्रचारित/प्रकाशित/प्रसारित किया जाना चाहिए लेकिन टीआरपी और ब्रेकिंग न्यूज़ की अंधी दौड़ ने समाज का हित तो दूर देशहित को भी दरकिनार कर दिया है और बस सनसनी फैलाकर दर्शक बटोरने और फिर उनके माध्यम से विज्ञापन जैसे माध्यमों से पैसा कमाने की भेडचाल सी चल पड़ी है. यही कारण है कि अब नेता भी अभिनेता बन गए हैं और वे खबर के अनुरूप भाव-भंगिमाओं के साथ अपनी बात को ‘पंचलाइन’ और ‘स्लोगन नुमा’ ढंग से करने लगे हैं क्योंकि अब उन्हें भी यह बात भली-भांति समझ आ गयी है कि सीधे/सपाट/स्पष्ट और संगत ढंग से कही गई बात मीडिया में जगह नहीं बना पायेगी. नए दौर के मीडिया को तो बस तुकबंदी चाहिए और तुकबंदी भी ऐसी जो किसी न किसी की खिल्ली उड़ाती हो फिर चाहे उसका तथ्यों/घटना/सूचना से लेना-देना हो या न हो. मीडिया अब निष्पक्ष समाचार प्रसारक न रहकर भोंपू बनता जा रहा है जिसका काम बस सूचना को बस सनसनी बनाकर पेश करना है. मिनटों में किसी भले आदमी को बलात्कारी या भ्रष्ट बना देना,महज आरोप लगने पर मीडिया की अदालत में सज़ा सुना देना और फिर बिना किसी ‘फालो-अप’ के अगले शिकार की तलाश में जुट जाना. शिकार-दर-शिकार यह भूख बढती जा रही है और इसका दुष्परिणाम आम लोगों को उठाना पड रहा है. ऐसा कितनी बार हुआ है जब मीडिया की अदालत में दोषी ठहराए गए किसी व्यक्ति को देश की अदालत द्वारा निर्दोष करार देने के बाद मीडिया ने फिर अपनी गलती स्वीकार की हो और इस फालो-अप को भी पहले की तरह खबरों में स्थान दिया हो.  

यदि यह बात इलेक्ट्रानिक मीडिया तक सीमित होती तब भी समझा जा सकता था लेकिन अब तो समाचार पत्र भी अपनी पठनीयता और तथ्यात्मक विश्लेषण करने की मूल प्रवृत्ति को छोड़कर इलेक्ट्रानिक मीडिया के पिछलग्गू और उसकी प्रतिकृति बनने को बेताब हैं. इलेक्ट्रानिक मीडिया में सुर्खियाँ बटोरने वाले किसी भी ऐरे गैरे नत्थू खैरे का बयान दूसरे दिन समाचार पत्रों में भी उसी के अनुपात में स्थान बनाने में कामयाब हो जाता है.जबकि होना यह चाहिए कि अख़बार के संपादकों को किसी भी बयान के दूरगामी परिणामों के मद्देनजर उसे न्यायोचित स्थान देना चाहिए. दरअसल न्यूज़ चैनलों पर तो सुर्खियाँ दिनभर में कई बार बनती-बिगडती हैं लेकिन समाचार पत्रों में प्रकाशित बात लम्बे समय तक वजूद में रहती है और प्रायः घरों/पुस्तकालयों में संग्रहित तक हो जाती है इसलिए उसका असर भी गहरा तथा दीर्घकालीन होता है.इसलिए अब जरुरी हो गया है कि मीडिया स्व-नियंत्रण या आत्मनियंत्रण की नीति का गंभीरता से पालन करे और तत्काल इस दिशा में कड़े कदम उठाये वरना मीडिया तो अपनी गरिमा खो ही देगा साथ में देश को भी जाने-अनजाने में खासा नुकसान पहुंचता रहेगा जो भारत जैसे विकासशील देश की प्रगति और लोकतान्त्रिक ताने-बाने की मजबूती के लिए निश्चित तौर पर बाधक है.     

Tuesday, December 23, 2014

‘दहशत अंकल’, अब तो मान जाइए....!!!!


‘दहशत अंकल’, हाँ यही तो कहा था पेशावर में स्कूली बच्चों के नरसंहार के बाद उस दस साल की मासूम बच्ची ने दहशतगर्दों के लिए क्योंकि उसे तो बचपन से यही सिखाया गया है कि अपने पिता की उम्र के सभी पुरुषों को अंकल जैसे सम्मानजनक संबोधन के साथ पुकारना है और दहशत शब्द उसके लिए शायद नया नहीं होगा.पकिस्तान में आए दिन होने वाले धमाकों और फायरिंग के बाद अख़बारों से लेकर न्यूज़ चैनलों में दहशतगर्द शब्द दिनभर गूंजता रहता है इसीलिए उसने अनुमान लगा लिया कि यह कारनामा करने वाले दहशतगर्द ही होंगे. पारिवारिक संस्कारों के कारण उसने अनजाने में ही एक नया शब्द ‘दहशत अंकल’ गढ़ दिया यानि खौफ़ के साथ प्रेम और सम्मान का अदभुत समन्वय.
‘दहशत अंकल’ शब्द ने मुझे सत्तर के दशक की सुपरहिट फिल्म ‘दुश्मन’ की याद दिला दी. सदाबहार अभिनेता स्वर्गीय राजेश खन्ना, मीना कुमारी और मुमताज़ के अभिनय से सजी दुलाल गुहा की इस फिल्म में भी बच्चे फिल्म के नायक को ‘दुश्मन चाचा’ कहकर पुकारते हैं क्योंकि उन्हें शुरू से ही यह बताया जाता है कि नायक उनका दुश्मन है और संस्कारवश वे चाचा अपनी ओर से जोड़ देते हैं. किसी अपराधी को अनूठे ढंग से सुधारने और मानसिक रूप से प्रताड़ित कर पटरी पर लाने के अदालती प्रयासों पर बनी इस फिल्म से तालिबानी दहशतगर्द की तुलना कतई नहीं की जा सकती. इस फिल्म में नायक को उस परिवार के साथ दो साल गुजारने की सज़ा दी जाती है जिस परिवार का मुखिया नायक के हाथों ही मारा गया था और फिल्म के अंत में जब सज़ा पूरी होने के बाद नायक के वहां से जाने की बारी आती है तब तक वह उस परिवार के साथ इतना घुल-मिल जाता है कि वह अदालत में जज से कहता है कि उसे रिहाई नहीं बल्कि उम्र कैद की सज़ा चाहिए ताकि वह जीवन भर उसी परिवार के साथ रह सके.
जब महज दो साल में एक व्यक्ति भावनात्मक रूप से इतना बदल सकता है और किसी अनजाने और यहाँ तक की, अपने को दुश्मन मानने वाले परिवार का अभिन्न सदस्य बन सकता है तो तालिबानियों में यह बदलाव अब तक क्यों नहीं आ पाया. वे भी तो सालों-दशकों से पाकिस्तान में घोषित-अघोषित रूप से बसे हुए हैं, वहां का नमक खा रहे हैं और काफी हद तक उसके रहमो-करम पर हैं. क्या दशकों का साथ भी भावनात्मक रूप से इतना भी नहीं जोड़ पाया कि कम से कम मासूम बच्चों पर दया आ जाए या गोली चलाने के पहले हाथ कांपने लगे? जब एक मासूम बच्ची अपने साथियों की भयावह मौत देखने के बाद भी ‘दहशत अंकल’ जैसे अनूठे संबोधन से पुकार सकती है तो क्या किसी दहशतगर्द को उसकी मासूमियत नजर नहीं आयी, उसे उस बच्चे में अपने बच्चे का चेहरा, उसका भोलापन, निश्छल हंसी, निष्कपट व्यवहार और बेदाग बचपन नहीं दिखा. पाकिस्तान ही क्यों, यह बात तो दुनिया भर के सभी मुल्कों और सभी किस्म के दहशतगर्दों पर लागू होती है. कोई कितना भी क्रूर हो पर बच्चे के सामने तो उसके भी हाथ-पैर और चेहरे पर व्याप्त क्रूरता की लकीरे ढीली पड़ जानी चाहिए. जब दो साल में दुश्मन, चाचा बन सकता है तो सालों से हमारे साथ और आसपास रहने वाले दहशतगर्द अंकल क्यों नहीं बन सकते भले ही फिर ‘दहशत अंकल’ ही क्यों न सही....आखिर कैसे भी किसी भी स्तर से बदलाव की शुरुआत तो हो..!             

Tuesday, September 30, 2014

और ऐसे बन गया मिनटों में इतिहास....!!!!

राक वैली एक्सप्रेस के चालक ने जैसे ही हरी झंडी दिखाते हुए सिलचर रेलवे स्टेशन से अपनी ट्रेन आगे बढ़ाई, मानो वक्त ने मिनटों में ही लगभग दो सदी का फ़ासला तय कर लिया. हर कोई इस पल को अपनी धरोहर बनाने के लिए बेताब था. यात्रा के दौरान शायद बिना टिकट चलने वाले लोगों ने भी महज संग्रह के लिए टिकट ख़रीदे. सैकडों मोबाइल कैमरों और मीडिया के दर्जनों कैमरों ने इस अंतिम रेल यात्रा को तस्वीरों में कैद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. कोई ट्रेन के साथ,तो कोई स्टेशन पर अपनी ‘सेल्फी’ खींचने में व्यस्त था. वहीँ ट्रेन में सवार कुछ लोगों के लिए यह महज रेल यात्रा नहीं बल्कि स्वयं को इतिहास के पन्नों का हिस्सा बनाने की कवायद थी. 30 साल की सरकारी सेवा पूरी कर चुके बराक वैली एक्सप्रेस के चालक सुनीलम चक्रवर्ती के लिए भी इस मार्ग पर यह अंतिम रेल यात्रा ही थी. भावुक होकर उन्होंने कहा- “पता नहीं अब इस मार्ग पर जीते जी कभी ट्रेन चलाने का अवसर मिलता भी है या नहीं.”
दरअसल असम की बराक वैली या भौगोलिक रूप से दक्षिण असम के लोगों की डेढ़ सौ साल तक ‘लाइफ लाइन’ रही मीटर गेज ट्रेनों के पहिए अब थम गए है. रेल मंत्रालय मीटर गेज को ब्राडगेज में बदलने जा रहा है और इस काम को निर्बाध रूप से पूरा करने के लिए एक अक्तूबर से यहाँ रेल सेवाएं फिलहाल छह माह के लिए पूरी तरह से बंद कर दी गयी हैं. अभी तक पूर्वोत्तर रेलवे के लामडिंग जंक्शन तक ब्राडगेज रेल लाइन है लेकिन लामडिंग से सिलचर के बीच 201 किमी का सफ़र मीटर गेज से तय करना पड़ता था. वैसे लामडिंग से सिलचर के इस सफ़र को देश का सबसे रोमांचक और प्राकृतिक विविधता से भरपूर रेल यात्रा माना जाता है. इस सफ़र के दौरान यात्रियों को पहाड़ों की हैरतअंगेज खूबसूरती के साथ 586 पुलों और 37 सुरंगों से होते हुए 24 रेलवे स्टेशनों को पार करना पड़ता था. बताया जाता है कि तमाम तकनीकी विकास के बाद भी जिस रेल लाइन को मीटरगेज से ब्राडगेज में बदलने में अब तक़रीबन बीस साल का समय लग रहा है,वहीँ 19 वीं सदी में अंग्रेजों ने महज 15 साल में पहाड़ों को काटकर और कंदराओं को पाटकर इस रेल लाइन को अमली जामा पहना दिया था. यहाँ के इतिहास के जानकारों के मुताबिक 1882 में सर्वप्रथम जान बोयर्स नामक इंजीनियर ने सुरमा वैली (बराक वैली का विभाजन से पहले का नाम ) को ब्रह्मपुत्र वैली से जोड़ने की परिकल्पना की थी. फिर अगले पांच साल में परियोजना रिपोर्ट तैयार हुई और 1887 में तत्कालीन सलाहकार इंजीनियर गुइल्फोर्ड मोल्सवर्थ ने इस मीटर गेज रेल परियोजना को मंजूरी दे दी. फिर 1888 से यहाँ निर्माण कार्य शुरू हुआ और 1 दिसंबर 1903 से यहाँ रेल सफ़र शुरू हो गया.     अतीत से विकास के इस सफ़र में मीटर गेज और इस पर आज के गतिशील दौर में भी कछुआ चाल से चलने वाली ट्रेने अब संग्रहालय का हिस्सा बन जाएंगी क्योंकि पटरियों का आकर बदलने के साथ ही यहाँ सब-कुछ बदल जाएगा. सिलचर स्टेशन का विकास व विस्तार होगा और शायद स्थान भी बदलेगा. कई छोटे स्टेशन कागज़ों में सिमट जाएंगे. कई की रोजी-रोटी छिनेगी और विस्तार की आंधी में कुछ के घर भी उजड़ेंगे. धीमी और सुकून से चलने वाली ट्रेनों के स्थान पर राजधानी-शताब्दी जैसी चमक-दमक और गति वाली ट्रेने दौड़ती नजर आएगी. बराक वैली के साथ साथ  त्रिपुरा,मिज़ोरम तथा मणिपुर जैसे राज्य वर्षों से इस बदलाव की प्रतीक्षा कर रहे हैं लेकिन सदियों का रिश्ता एक पल में तो नहीं तोडा जा सकता इसलिए मीटर गेज को विदाई देने के लिए फूल मालाओं और ढोल-ढमाकों के साथ पूरा शहर मौजूद था. सभी दुखी थेऔर साथ में खुश भी क्योंकि इस विछोह में ही सुनहरे भविष्य के सपने छिपे हैं.

Thursday, August 7, 2014

रक्षा बंधन है भाई-बहन के प्यार का त्यौहार


   सावन (श्रावण) उत्सवों का माह है और इसी श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को रक्षाबंधन का त्यौहार मनाया जाता है। ये भाई-बहनों के प्रेम को समर्पित त्यौहार है इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधती हैं और भाई बहनों की रक्षा का संकल्प लेते हैं पर इस त्यौहार का सम्बन्ध सिर्फ भाई-बहन से ही नहीं है जो भी हमारी रक्षा करता है या कर सकता है उसे हम राखी बाँधते हैं जैसे अपने पितापड़ोसीहमारे सैनिक भाई और किसी राजनेता को भी राखी बांध सकते हैं प्रकृति भी हमारी रक्षा करती है इसलिए पेड़ पौधों को भी राखी बाँधने का प्रचलन है ताकि उनकी रक्षा हो सके क्योंकि रक्षा सूत्र में अद्भुत शक्ति होती है | यह बात खुद भगवान श्री कृष्ण ने महाभारत में कही है राखी का त्यौहार भाई-बहनों को स्नेह की डोर में बाँधने का त्यौहार है जिससे उनके रिश्तों में मिठास बनी रहती है और वो हमेशा इस डोर में बंधे रहते हैं भाई बचपन से लेकर बुढ़ापे तक बहनों की रक्षा करते हैं और बहनें उनकी रक्षा के लिए उनकी कलाई पर रक्षासूत्र बांधतीं हैं कहीं-कहीं पुरोहित भी अपने यजमान को उनकी उन्नति के लिए रक्षासूत्र बांधते है और यजमान उन्हें सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देते हैं ये त्यौहार हमारे जीवन में मधुरता लाते हैं और ये हमारी सांस्कृतिक धरोहर भी हैं इस त्यौहार को श्रावणी भी कहतेहैं |
इस दिन सुबह बहनें स्नान करके थाली में रोलीअक्षतकुमकुम और रंग-बिरंगी राखी रखकर दीपक जलाकर पूजा करती हैं फिर पहले भगवान को राखी बाँधकर फिर अपने-अपने भाइयों के माथे पर रोली का तिलक करती हैं और दाहिनी कलाई पर राखी बाँधते हुए निम्न  मन्त्र बोलती हैं : -
येन बद्धो बलि: राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षेमा चल मा चल॥
रक्षाबंधन के बारे में अनेकों पौराणिक और ऐतिहासिक कथाएं हैं। रक्षाबन्धन कब प्रारम्भ हुआ इसके बारे में कोई निश्चित जानकारी नहीं है पर पौराणिक कथाओं के अनुसार सबसे पहले इन्द्र की पत्नी ने देवराज इन्द्र को देवासुर संग्राम में असुरों पर विजय पाने के लिए रक्षा सूत्र बंधा था। इस सूत्र की शक्ति से देवराज की युद्ध में विजय हुई थी।
पुराणों के एक और कथा के अनुसार बलि ने अपनी भक्ति के बल से भगवान को रात-दिन अपने सामने रहने का वचन ले लिया। विष्णु जी के घर न लौटने से परेशान लक्ष्मी जी ने नारद जी से उन्हें वापस लाने का उपाय पूछा, तो नारद जी ने उन्हें उपाय बताया तब नारद जी के कहे अनुसार लक्ष्मी जी ने राजा बलि के पास जाकर उन्हे राखी बांधकर अपना भाई बनाया और भगवान जी को अपने साथ ले आयीं। उस दिन भी श्रावण मास की पूर्णिमा थी। द्वापर में शिशुपाल के वध के समय जब सुदर्शन चक्र से श्री कृष्ण की उंगली कट गई तब द्रौपदी ने अपना आंचल फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया था । उस दिन सावन की पूर्णिमा थी तब भगवान कृष्ण ने द्रौपदी को उनकी रक्षा का वचन दिया था और चीरहरण के समय उन्होंने अपना वचन निभाया था |
महाभारत में युधिष्ठिर ने श्री कृष्ण के कहने पर अपनी सेना की रक्षा हेतु पूरी सेना को रक्षासूत्र बांधा था कुन्ती द्वारा अभिमन्यू की रक्षा हेतु उसे राखी बाँधने का उल्लेख भी मिलता है |
इतिहास उठाकर देखें तो उसमे भी राजपूत रानी कर्मावती की कहानी है। जब रानी ने अपने राज्य की रक्षा के लिए हुमायूं को राखी भेजी तब हुमायूं ने राजपूत रानी को बहन मानकर उनके राज्य को शत्रु से बचाया था ।
सिकंदर की पत्नी ने भी सिकंदर के हिन्दू शत्रु की कलाई में राखी बाँधकर सिकंदर के जीवन दान का वचन लिया था |
राखी प्रेम और सौहार्द का त्यौहार है इस रक्षाबंधन पर सभी भाई ये संकल्प लें कि वो अपनी बहनों के साथ-साथ दूसरों की बहनों के सम्मान की भी रक्षा करेंगे और उनका

अपमान न करेंगे और न ही होने देंगे बहनों के लिए इससे बड़ा कोई उपहार नहीं होगा|
आप सभी को रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ |

मीना पाठक
कानपुर, उत्तर प्रदेश 

Monday, July 21, 2014

साहित्यकारों को भी सम्मान मिलना चाहिए - क्या सहमत है आप ?

 अभी कुछ दिन पूर्व हमने हास्य एवं व्यंग्य कवि अलबेला खात्री जी को हास्पिटल मे पड़े हुये देखा जो किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त थे और उनकी पत्नी ने सहायता की गुहार लगाई थी । लेकिन दुर्भाग्य वश उनका देहांत हो गया । इसको देखकर लगा कि ऐसे कई काव्य जगत से जुड़े हुये रचनाकार होंगे जो ऐसे ही गुमनामी के अँधेरों मे जूझ रहे होगे या जूझते जूझते चले गए होंगे । 

साहित्य के स्वरूप को लेकर चलने वाली बहस कोई नयी चीज़ नहीं है। किसी पुराने ज़माने की कालातीत कहानी जैसे ही पुरातन साहित्य शास्त्रियों की पुस्तकों के सिद्धान्तहमारी आधुनिक साहित्यिक चिंतन में प्रतिष्ठित हैं। यूँ साहित्य के स्वरूप पर हमारे विद्वान साहित्यकार आज भी पुस्तकें लिख रहे हैंपुराने ढरों से दूरउदित होती नई विधाओंनए लेखन को साहित्य में समाने या साहित्य से हटाने के लिए नए प्रतिमान गढ़ रहे हैं और गढ़े हुई इन प्रतिमानों की प्रामाणिकता पर बहस कर रहे हैं - यह सब एक बात तो स्पष्ट करता ही है कि साहित्य जीवन सा गहराजीवन से जुड़ाजीवन की ही तरह हर समय नया रंगरूप दिखाने वाला होता है। कितने ही रूप पकड़ेकितने ही समझे पर फिर भी कुछ कहना-सुनना-समझना शेष रह गया।
ऐसे में बरबस ही घनानंद के पद की एक पंक्ति याद आती है-
"रावरे रूप की रीति अनूप नयौ नयौ लागत ज्यौं-ज्यौं निहारियै"
साहित्यकारोंरंगकर्मियों और हस्तशिल्पियों के लिए एक योजना चलायी जा रही हैजिन्होंने अपने क्षेत्र में उत्कृष्ट सेवा की हो और वर्तमान में अभावग्रस्त हों. इस योजना का लाभ ऐसे लोगों के अलावा उनके आश्रितों को भी दिया जाता है. इसके तहत सीधी वित्तीय सहायता दी जाती है. यह योजना साहित्यकला और जीवन के ऐसे ही क्षेत्रों में अभावग्रस्त परिस्थितियों में रह रहे उत्कृष्ट व्यक्तियों और उनके आश्रितों को वित्तीय सहायता के लिए है. इसमें वैसे साहित्यकार या लेखक भी लाभ पा सकते हैंजिनका योगदान तो उत्कृष्ट हो हीलेकिन उसकी कृति प्रकाशित नहीं हुई हो.
योजना का लाभ पाने के लिए ऐसे साहित्यकारों और कलाकारों की आर्थिक हालत को भी आधार बनाया गया है. आवेदक की अपनी और पति या पत्नी की कुल आय चार हजार रुपया प्रतिमाह से अधिक नहीं होना चाहिए. साथ ही उसकी उम्र कम-से-कम 58 वर्ष होलेकिन यह उन आवेदकों के मामले में हैजो खुद कलाकार या साहित्यकार है. अगर उसका आश्रित आर्थिक सहायता के लिए आवेदन करता हैतो उसके लिए आयु सीमा तय नहीं है ।
इस योजना के तहत आर्थिक सहायता की सीमा चार हजार रुपया मासिक तय है. यह राशि दो प्रकार से मिलती है. अगर आपका आवेदन केंद्रीय कोटे के तहत स्वीकृत हैतो केंद्रीय संस्कृति मंत्रलय पूरी राशि आपको देगी और अगर आवेदन राज्य कोटे के तहत स्वीकृत हैतो आपको राज्य सरकार से पांच सौ और केंद्र से 35 सौ रुपये हर माह मिलेंगे.
ऐसी ही कलाकारों और साहित्यकारों को इस योजना के तहत चुना जाता हैतो अपने क्षेत्र में ख्याति प्राप्त हों और जिन्हें केंद्र या राज्य सरकार ने पुरस्कृत किया हो. सहायता इसकी प्रसिद्धि पर निर्भर करती है. इसके लिए चयन समिति बनती है. अगर राज्य सरकार से किसी कलाकार या साहित्यकार का आवेदन अनुशंसित होकर केंद्र के पास पहुंचातो उस पर समिति सीधा विचार करती है और अगर आवेदन सीधा केंद्र को मिला होतो आवेदक की आर्थिक स्थिति का पहले पता लगाया जाता है. यह केंद्रीय संस्कृति मंत्रलय के विवेक पर निर्भर करता है कि वह किस कलाकार को कितने समय के लिए आर्थिक सहायता मिलेगी. समय सीमा खत्म होने पर उसका सहायता का नवीकरण भी होता है.
इस योजना के तहत सहायता प्राप्त करने वाले की मृत्यु हो जाने पर उसकी पत्नी या पति को जीवन भर इसका लाभ मिलता रहेगा. आश्रितों के मामले में यह सहायता उसे तक तब तक मिलती रहेगीजब तक कि वह इसे लेने से इनकार नहीं करता या उसे रोजगार नहीं मिलता हैलेकिन उसके 21साल का होने और अगर बेटी हैतो उसकी शादी होने के बाद यह लाभ बंद कर दिया जाता है.
इस योजना के तहत मंत्रलय अभावग्रस्त प्रसिद्ध कलाकारों को चिकित्सा के लिए भी आर्थिक मदद देती है.। यह योजना विशिष्ट मंचीय कला परियोजनाओं के लिए है. यह अनुदान सक्रिय कलाकारों और उसके व्यावसायिक समूहों को मिलता है. इस स्कीम के तहत नाट्य समूहोंरंगमंच समूहों,संगीत मंडलियोंबाल थियेटरएकल कलाकारों तथा मंचीय कला के सदस्यों को लाभ मिले ।
किन्तु लाभ सच मे उन सभी को मिल रहा है या नहीं यह किसी ने देखने कोशिश नहीं की । यथार्थ तो यह है कि ये सभी वादे और और योजनाएँ सिर्फ कोरे वादे और कोरी योजनाएँ है । आज हम देखते है कि कई अच्छे साहित्यकार धन के अभाव मे ही मर जाते है जबकि उनके पीछे उनकी अथाह लेखन राशि होती है । जिससे प्रकाशक और वितरक कमाते है । पहले के सहितयकारों का जीवन भी देखिये तो कई ऐसे साहित्यकार मिल जाएंगे जिनहोने अभावों मे जी कर जीवन गुजार दिया ।
इसके लिए आवश्यक है कि सरकार की ओर से ठोस कदम उठाए जाएँ और साहित्यकारों को सम्मान और आर्थिक सहयोग मिले ।---------------------------------------अन्नपूर्णा बाजपेई 

Wednesday, April 30, 2014

डगर आसान नहीं आने वाली सरकार की

आने वाली सरकार से लोगो क्या अपेक्षाएं है मैंने कई गण मान्य लोगो से इस विषय पर बात की । उन सबके विचार इस प्रकार रहे : -

1) प्राइवेट स्कूलों , कलेजो,की फीस बहुत ज्यादा है अंधाधुंध पैसा बहाओ तब कहीं जाकर अपने बच्चों की अच्छी शिक्षा दिला सको । स्कूल हो या कालेज सभी जगह यही हाल है । कालेजों मे अच्छी शिक्षा हेतु बच्चों के माता पिता पानी की तरह पैसा बहाते है ट्यूशन फीस तो अलग हास्टल फीस इतनी ज्यादा है और बच्चो को खाने पीने की कोई खास व्यवस्था नहीं होती । करीब करीब हर माता जिनके बच्चे बाहर पढ़ रहे है सभी को यह शिकायत है । सुविधाओं के नाम पर कुछ नहीं ।


2) आरक्षण के कारण गुणवत्ता समाप्त हो चुकी है । जो वाकई काबिल है वो दर दर भटक रहा है । गुण वत्ता को प्रमुखता दी जाए ।

3) महिलाओं को सुरक्षा मिले , वे आजादी से कहीं भी आ जा सके । अभी हर माँ डरती है बेटी को बाहर अकेले भेजने मे , कहीं कोई दुर्घटना न हो जाए ।

4) बिजली की समस्या सबसे ज्वलंत है इसके लिए कुछ ठोस उपाय किए जाएँ ।

5) शराब , सिगरेट तंबाकू जैसी चीजों पर बैन लगाया जाए , जिससे नस्ल खराब हो रही है । युवा इन सबके फेर मे अपना जीवन बर्बाद कर रहा है , घरों की शांति शराब की वजह से समाप्त हो रही है ।

6) यातायात के नियमों को कड़ाई से लागू किया जाए । ताकि आए दिन जाम लगने की समस्या से निजात मिल सके ।

7) महिलाओं को आर्थिक मजबूती मिले खास कर उन महिलाओं को कोई रोजगार नहीं करती है या गृहणी है । इसके लिए केयर इकोनोमी फार्मूला भी उचित होगा ।