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Wednesday, October 21, 2015

‘नो कमेंट’ पर कमेंट तो बनता है

 38 व्यंग्य लेखों से सुसज्जित बंधु सुमित प्रताप सिंह की किताब ‘नो कमेंट’ पढ़कर खामोश रहना मुश्किल है और आम किताबों की तरह कुछ रचनाएँ पढ़कर रुक जाना भी मुश्किल। सुमित की मौजूदगी इस बात का सुखद अहसास करवाती है कि शरद-परसाईं परम्परा के वाहक किसी भी शहर में किसी भी प्रोफेशन में क्यों न हों अपना काम ईमानदारी से कर रहे हैं सुमित के पास शरद जी की तरह विविध विषय चुनने का हुनर है तो यज्ञ शर्मा जी की तरह कम शब्दों में अपनी धारदार और जानदार बात कहने का कौशल भी है सुमित की लेखन यात्रा का पहला व्यंग्य लेख “मेरी माँ और गंगा स्नान की उनकी मन्नत” ही यह शुभ संकेत देता है कि एक व्यंग्यकार अपने अलग अंदाज और तेवर के साथ दस्तक देने के लिए तैयार है
मुझे सुमित का व्यंग्य ‘संपादक की पत्नी’ भी अच्छा लगा संपादक पर तो खूब लिखा गया है लेकिन पहली बार किसी व्यंग्यकार ने शायद संपादक जी की पत्नी को यथोचित सम्मान दिया है
हम सभी को ‘नो कमेंट’ का दिल खोलकर स्वागत करना चाहिए क्योंकि यह तो शुरुवाती दौर है जो उज्जवल भविष्य और शानदार लेखन की उम्मीदें जगाता है
सुमित को अनंत शुभकामनाएं!

श्री सुभाष काबरा
हास्यकवि, मंच संचालक एवं व्यंग्यकार,  
मुंबई 

Tuesday, April 14, 2015

'नो कमेंट' पर मेरा कमेंट


दोस्तो अभी-अभी सुमित प्रताप सिंह की नयी पुस्तक 'नो कमेंट' पढ़ कर ख़त्म की है। पुस्तक ने दिमाग़ को झकझोर कर रख दिया है। इतनी छोटी सी उम्र में किसी को ज़िन्दगी का इतना अनुभव कैसे हो सकता है? मेरे मतानुसार व्यंग्य साहित्य की सबसे मुश्किल विधाओं में से एक है पर सुमित की लेखनी में वो प्रवाह है कि लगता है कि व्यंग्य लिखना बहुत आसान होता होगा। इतनी आसानी से समाज की हर विसंगति पर इतनी सटीक चोट की है कि संवेदनशील व्यक्ति तिलमिला उठता है। यही व्यंग्य की सार्थकता है। उम्मीद की एक नयी किरण नज़र आ रही है। व्यंग्य का भविष्य मज़बूत और क़ाबिल हाथों में है।
इतनी अच्छी पुस्तक के लिए बधाई सुमित और एक और नयी पुस्तक के लिए अग्रिम शुभकामनाएँ।

प्रमोद शर्मा 'असर'
हौज़ ख़ास, नई दिल्ली