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Wednesday, March 5, 2014

अस्तित्व ढूंढती कलम.............. अन्नपूर्णा बाजपेई

मूक नहीं हूँ लिखते जाना ही मेरी  जात है ,
तम की स्याही से लिखती नित्य नव प्रभात हूँ ।  
उजियारा फैलाने को रोज नया सूरज मै लाती हूँ  ,
जो मूक हो जीते है उनकी जुबान मै बन जाती हूँ ।   
पढा लिखा कर सम्मान की अलख मै जगाती हूँ  ,
झूठे हो चाहे जितने पर सच्चाई की धार लगाती हूँ ।
अज्ञानता के घोर तमस को समूल उखाड़ भगाती हूँ ,
होती जिसके हाथ मै (कलम) ज्ञान भंडार लगाती हूँ 
पैनी कितनी भी हो तलवारें पर भीत नहीं मै खाती हूँ 
परचम  सच्चाई  का  नित्य  नया  लहराती  हूँ 
टेकते  अँगूठों  को  मुड़ना  मै बतलाती  हूँ 
अंगूठा टेको को अक्सर लिखना सिखलाती हूँ । 
फिर क्यों ऐसा है कि आज अकेली  मै रोती हूँ ? 
सच को सच और झूठ को झूठ कह न पाती हूँ । 
  ................अन्नपूर्णा बाजपेई 

Thursday, February 20, 2014

शिरोमणि कहलाने वाले !!

Poverty

कुछ त्रिपदियाँ ... 

शिरोमणि कहलाने वाले !! 
क्या पीड़ा हर लोगे तुम ...
क्या व्यथाओं को समझ सकोगे तुम ?

इन चिथड़ों मे जीवन है 
चिथड़ों की हो रही चिन्दियाँ 
क्या ये चिन्दियाँ समेट सकोगे तुम ?

भग्न हो चुका मन प्राण है 
खो रही आशाओं की रशमियां
क्या रश्मियां प्रेषित कर सकोगे तुम ?

पी रहे हम हलाहल हैं 
फिर क्यों कोलाहल है 
क्या जीवन अमृत दे सकोगे तुम ? 

शिरोमणि कहलाने वाले !! 
क्या पीड़ा हर लोगे तुम ... 
क्या मधुबन की खुशबू दिला सकोगे ?

अन्नपूर्णा बाजपेई

Wednesday, February 12, 2014

कविता: कुम्हलाया मन का सरोवर

बागों बहारों और खलिहानों मे

बांसो बीच झुरमुटों मे
मधुवन और आम्र कुंजों मे
चहचहाते फुदकते पंछी
गाते गीत प्रणय के
श्यामल भौंरे और तितलियाँ
फुली सरसों , कुमुद सरोवर
नाना भांति फूल फूलते
प्रकृति की गोद ऐसी
फलती फूलती वसुंधरा वैसी
क्या कहूँ किन्तु कुम्हलाया
है मन का सरोवर मेरा
भावों के दीप झिलमिलाये ऐसे
रागिनी मे  कुछ जुगुनू  जैसे
नेह का राग सुनाता
जीवन को निःस्वार वारता
 एक पतंगा हो जैसे
प्रकंपित अधर है शुष्क
ज्यों पात विहीन वृक्ष ।

Wednesday, December 25, 2013

लाड़ली चली ................. (अन्नपूर्णा बाजपेई)

मेरी कविताओं के झरोखे से ................

लाड़ली चली !!!

बाबा की दहलीज लांघ चली
वो पिया के गाँव चली
बचपन बीता माँ के आंचल
सुनहरे दिन पिता का आँगन
छूटे संगी सहेली बहना भैया
मिले दुलारी को अब सईंया
मीत चुनरिया ओढ़ चली
बाबा की ...........
माँ की सीख पिता की शिक्षा
दुलार भैया का भाभी की दीक्षा
सखियों का स्नेह लाड़ बहना का
वो रूठना मनाना खेल बचपन का
भूल सब मुंह मोड चली
वो पिया के ...............
परब त्योहार हमको  बुलाना
कभी तुम न मुझको भुलाना
साजन संग मै आऊँगी
खुशियाँ संग ले आऊँगी
वो लाड़ली चली
बाबा की ..................

Monday, December 16, 2013

मै नारी हूँ ..........

मै नारी हूँ ................

मै दुर्गा , अन्नपूर्णा मै ही

मै अपूर्ण  , सम्पूर्णा मै ही ।

मै उमा , पार्वती मै ही ,

मै लक्ष्मी , सरस्वती मै ही ।


मै सृजक , संचालिका मै ही ,

मै प्रकृति , पालिका मै ही ।

मै रक्षिका , संहारिका मै ही ,

मै धारिणी ,   वसुंधरा मै ही ।


मै जननी , जानकी मै ही ,

मै यशोदा , देवकी मै ही ।

मै राधा , रुक्मिणी मै ही ,

मै एकता  , अनेकता मै ही ।


मै माँ हूँ ,  भगिनी हूँ ,

मै वल्लभा हूँ , कामिनी हूँ ।

मै वधू हूँ , रागिनी हूँ ,

मै निर्भया हूँ , दामिनी हूँ ।


मत भूलो मै जननी हूँ

मत भूलो मै भगिनी हूँ

मत भूलो मै दामिनी हूँ ,

मै नारी हूँ , मै नारी हूँ ।

Thursday, December 5, 2013

कविता: अकुला रही सारी मही

अकुला रही सारी मही
किसको पुकारना है सही ।  
सोच रही अब वसुंधरा
कैसा कलुषित समय आ पड़ा 
बालक बूढ़े नौजवान
गिरिवर तरुवर आसमान
रक्षा को उठता न कोई
अकुला रही .............

अखंड भारत सपना
देखा था ये अपना
खंडित होकर बिखर रहा
जन मानस को न अखर रहा
राष्ट्रभक्ति नीर में जा बही
अकुला रही .................

ढूँढने पर भी अब मिलते
राम कृष्ण से पुरुषोत्तम नहीं
अर्जुन कर्ण गदाधर भीम नहीं
भगत सुभाष से नायक नहीं
अकुला रही .............

रण बांकुरों से वसुंधरा
हर युग मे अल्हादित रही
किन्तु अहो ! क्या कोई
बचा अब बांका लाल नहीं
अकुला रही .............  

अन्नपूर्णा बाजपेई
कानपुर, उत्तर प्रदेश 

Sunday, November 24, 2013

कविता: सुनो आखेटक !

आखेटक !!
क्या तुम्हें आभास है ?
कि तुम! मृगमरीचिका की   
जिजीविषा में
किसी का आखेट कर
जीवनयापन की मृगया में
भटकते हुये मदहोश हो !
आखेटक !
क्या तुम्हें आभास है ?
आखेटक को संजीवनी नहीं मिलती
मन की तृष्णा की खातिर
अनन्य मार्गदर्शी का भी
विसस्मरण कर दिया है
सृजनमाला को विस्फारित नेत्रों से
देखते हुए मदमस्त हो !
आखेटक !!
क्या भूल गए हो ?
आखेट करने को आया तीर
एक दिन तुम्हें भी बेध जाएगा
तब !!...... समक्ष राम न होंगे
सागर से उबरने को कर्म न होंगे
सुनो आखेटक !

अन्नपूर्णा बाजपेई
कानपुर, उत्तर प्रदेश 

Monday, November 18, 2013

कविता: नव युवा उठो भारत का निर्माण करो

नव युवा हे चिर युवा तुम
उठो नव युग का निर्माण करो ।
जड़ अचेतन हो चुका जग,
तुम नव चेतन विस्तार करो ।
पथ भ्रष्ट औ' लक्ष्य विहीन होकर
न स्वयौवन का संहार करो ।
उठो ! नव युग का निर्माण करो 

दीन-हीन संस्कार क्षीण अब
तुम संस्कारित युग का संचार करो ।
अभिशप्त हो चला है अब भारत !!
उठो ! नव भारत निर्माण करो ।
नव युवा हे चिर युवा 

गर्जन तर्जन  ढोंगियों का
कर रहा मानव मन क्रंदन ।
सिंहों सा गर्जन कर अब हुंकार भरो
उठो सत्य प्रति मूर्ति नरेंद्र बनो ।
नव युवा हे चिर युवा 

गूँजे हुंकार कि काँप उठे दुष्प्रहरी
न मृगछौना बन शावक केसरी ।
चहुँ ओर गुंजन हो 
ऐसी सिंह दहाड़ करो ।
नव युवा हे चिर युवा 

अन्नपूर्णा वाजपेयी 
कानपुर, उत्तर प्रदेश 

Friday, November 15, 2013

कविता: रेत के घरौंदे

समंदर किनारे रेत पर
चलते चलते यूं ही
अचानक मन किया
चलो बनाए
सपनों का सुंदर एक घरौंदा
वहीं रेत पर बैठ
समेट कर कुछ रेत
कोमल अहसास के साथ
बनते बिगड़ते राज के साथ
बनाया था प्यारा सा सुंदर 
एक घरौंदा................
वही समीप बैठ कर
बुने हजारों सपनो के
ताने बाने जो
उसी रेत की मानिंद
भुरभुरे से ,
हवा के झोंके से उड़ने को बेताब
प्यारा घरौंदा ..............
अचानक उठी लहर
बहा ले गई वो
प्यारा सुंदर घरौंदा
जिसको सींचा था
सहलाया था , प्यार से
दुलराया था
बिखरे पड़े उन अवशेषों को
समेट फिर चल दी
उन्हे दुबारा सवारने की खातिर
प्यारा सा सपनों का घरौंदा..................
जो शायद सपने ही है
जो कभी सच होते है
कभी नहीं भी
मन की संकरी गलियों मे
यूं ही घुमड़ते हुए बादल से
सपने .............
रेत के घरौंदे ही तो है ...................... ।

अन्नपूर्णा बाजपेई

कानपुर, उत्तर प्रदेश 

Tuesday, October 29, 2013

कविता : मेरे प्रियवर

मेरे  प्रियवर...
स्नेह सिक्त हृदय
तुम रहते  प्राण बन
जीवन की अविरल धारा
तुम रहते अठखेलियाँ बन
तुम मेरे प्रियवर...
मद युक्त नयन
तुम रहते काजल रेख बन
शीश पर चमकते
यों सिंदूरी रेख बन
तुम मेरे प्रियवर...
तुमसे ही है जीवन
हर शाम सिंदूरी
फूलों सा महके सिंगार
संग तुम्हारा  अनुपम फुलवारी ॥
मेरे प्रियवर...

अन्नपूर्णा बाजपेई 
कानपुर, उत्तर पदेश 

Monday, October 21, 2013

कविता: क्या कहूँ

क्या कहूँ ...............
आहत मन की व्यथा
कैसे सुनाऊँ.................
मन की व्याकुलता
अश्रु और व्याकुलता
साथी है परस्पर
आकुल होकर आँख भी
जब छलक जाती है
गरम अश्रुओं का लावा
कपोलों को झुलसा जाता है
न जाने कब कैसे ...................
पीर आँखों की राह
चल पड़ती है बिना कुछ कहे
आकुल मन बस यूं ही
तकता रह जाता है
भाव विहीन होकर भी
भाव पूर्ण बन जाता है जब
जिह्वा सुन्न हो जाती है तब
न जाने कब कैसे .........................
कुछ आरोपों की पोटली
फिर खुल गई
मन ने आरोपित किया
आँख को ,
फिर भर आई शायद
मन और आँख
साथी हैं परस्पर
क्या कहूँ .......................... 

अन्नपूर्णा बाजपेई


कानपुर, उ.प्र.

Friday, October 11, 2013

वो प्यार रीत गया क्यूँ !! ........( अन्नपूर्णा बाजपेई )

कल तक कितने करीब थे हम ,
आज क्यूँ अजनबी से हो गए हम । 
वो प्यार वो स्नेह सब रीत गया क्यूँ ,
आलोकित चाँदनी छिप गई क्यूँ ।
वो चंद लम्हे जो आज भी याद मुझे ,
पर तुममे वो सब रीत गया क्यूँ ।
आँख आज भी भर आती है, 
दो बूंद से टपक जाते है क्यूँ ।
वो नन्हें फूल बहुत याद आते मुझे ,
जिनको पहली बार सँजोया मैंने ,
सहलाया दुलराया और संवारा मैंने ,
आज वह स्रोत सूख गया क्यूँ । 
रिक्त सागर हो गया क्यूँ ,
कल तक कितने ..............

Wednesday, September 18, 2013

दूर तलक शून्य मे -- कविता

एक शाम
उदास सी थी
निस्तेज , निशब्द , निस्पंदित
निहारती सी
दूर तलक शून्य मे।  
कर्तव्य विहीन, कर्म विहीन
अचेतन जड़ हो गए जो
पुकारती सी
दूर तलक शून्य मे ।
नेपथ्य से कुछ सरसराहट
वैचारिक या मौन
विजयी पर प्रसन्न नहीं
श्रोता सी
दूर तलक शून्य मे ।
अन्तर्मन के क्रंदन को
छिपा मुख मण्डल पर खेलती जो
अलौकिक आभा थी
दूर तलक शून्य मे ............... ।