सादर ब्लॉगस्ते पर आपका स्वागत है।
Showing posts with label Geet. Show all posts
Showing posts with label Geet. Show all posts

Thursday, May 7, 2015

अँधियारी रातों में

अँधियारी रातों में ये मन 
दूर देश तक हो आता है 
कभी ढ़ूढ़ लेता अवसादें 
अपने अन्त: मे अनजानी 
कभी मोर पंखों पर चढ़कर
नील गगन में फिरे अमानी
मान-अमान भरे पलछिन के
अपने पन मे खो जाता है ।

कभी दौड़ना चाहे खुलकर
लेकिन पग सोए रहते हैं 
आस- निराश भरे लम्हों में 
अनदेखे साए पलते हैं 
परछाई के मोहपाश मे
हँसता-हँसता रो जाता है ।

कभी शाह अपनी मर्जी का
नूतन अपनें रूप दिखाए 
दीन-हीन बन कभी उतरकर
आसमान से नीचे आए 
धूप - छाँव के गलियारे में
मस्त कलंदर सो जाता है ।

पाप-पुण्य की जड़ता छाई
अवचेतन के मृदु भावों में
नाव नदी की लहर ले चली
चेतनता के सद्भावों में 
भाव-कुभावों की झंझा में
बीज कर्म के बो जाता है ।


रचनाकार- डॉ. जय शंकर शुक्ला 
संपर्क- बैंक कालोनी, दिल्ली।

Monday, December 2, 2013

गीत: चलो मिलते हैं वहाँ

धरती के उस छोर पर
धानी चूनर ओढ़ कर
वसुधा मिलती हैं अनन्त से जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ !!

बन्धन सारे तोड़ कर
लहरों की चादर ओढ़ कर
दरिया मिलता है किनारे से जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ !!

पर्वतों से निकल कर
लम्बी दूरी चल कर
नदियाँ मिलती है सागर से जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ !!

बसंती भोर में
खिले उपवन में
भँवरे फूलों से मिलते हैं जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ !!

स्वाति नक्षत्र के
वर्षा की इक बूँद से
तृप्त हो चातक मिलता है जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ !!

पूनम की रात में
चाँदनी विस्तार से
किलोल करती मिलती हैं जहाँ
चलो मिलतें हैं वहाँ !!

जमुना के तट पर
बाँध उमंगो की डोर
मिलती है राधा कृष्ण से जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ !!

सांसों की लय तोड़ कर
नश्वर काया छोड़ कर
आत्मा परमात्मा से मिलती है जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ !!

मीना पाठक


कानपुर उत्तर प्रदेश