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Monday, January 26, 2015

देशभक्ति (लघु कथा)


   कमांडेंट साहब ने पूरे स्टाफ को ब्रीफ करते हुए कहा, “आज 26 जनवरी है, जो कि देश का राष्ट्रीय पर्व है। इस दिन पूरी कर्मठता से ड्यूटी करें और अपनी देशभक्ति का परिचय दें।” उन्होंने आगे कहा, “यह दिन देखने के लिए हमारे पुरखों ने बहुत सारी कुर्बानियां दीं। अनेक कष्ट सहे, तब जाकर हम सब स्वतंत्र हुए तथा आगे चलकर हमारा देश गणतंत्र बना। इतनी कठिनाइयों के बाद मिले इस विशेष दिन पर कोई ऊंच-नीच न होने पाये। आओ आज हम सब मिलकर यह शपथ लें, कि चाहे हमारी जान चली जाये लेकिन हमारे वतन की इज्जत मिट्टी में न मिलने पाए।” इतना कह कर कमांडेंट साहब पूरे स्टाफ को अलर्ट रहने का आदेश देकर अपने कमरे में चले गये। स्टाफ इधर-उधर बिखर कर आपस में बतियाने लगा, किन्तु एक युवा सिपाही उसी स्थान पर शांत खड़ा रहा। उसके मन पर कमांडेंट साहब के भाषण का अत्यधिक प्रभाव पड़ा था। उसने ठान लिया था, कि अपने देश की सेवा में यदि उसे प्राणों की भी आहुति देनी पड़े, तो वह पीछे नहीं हटेगा। देशभक्ति का दिल में जोश जगाने के लिए वह कमांडेंट साहब के प्रति बहुत आभारी था। वह कमांडेंट साहब का धन्यवाद करने के लिए उनके कमरे के भीतर गया। कमांडेंट साहब व उनका ऑफिस स्टाफ टीवी पर 26 जनवरी के कार्यक्रम देखने में मस्त था। सिपाही ने कमांडेंट साहब को सैल्यूट किया। इससे पहले वह कमांडेंट साहब से अपने दिल की बात कह पाता, टीवी में राष्ट्रगान आरंभ हो गया। वह सावधान होकर खड़ा हो गया और धीमे-धीमे स्वयं भी राष्ट्रगान गाने लगा। इस दौरान उसने देखा, कि कमांडेंट साहब अपने स्टाफ के साथ मजे से बैठकर बतियाते हुए टीवी देखने में मस्त रहे। युवा सिपाही कमांडेंट साहब व उनके स्टाफ की ऐसी महान देशभक्ति को देखकर मन ही मन गदगद हो उठा। 

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

इटावा, नई दिल्ली, भारत 

Wednesday, August 6, 2014

हरिद्वार यात्रा भाग 2,

दूसरा दिन 
दूसरा दिन शुरू हुआ 5.30 बजे शाखा के कार्यक्रम से जिसमें हलका फुल्का व्यायाम करवाया गया और उसके बाद चाय तैयार थी जो पीना चाहे | इसके बाद लगभग 6.30 बजे सभी गंगा स्नान के लिए हर की पौढ़ी की तरफ चल दिए यहाँ सुविधा से जाने के लिए टेम्पो जो 10 रुपये सवारी लेते हैं एक अच्छा साधन है अगर भीड़ का समय नही है तो यह आपको हर की पौड़ी के बाहर ही उतार देते हैं और अगर भीड़ का समय है तो आपको भीमगौडा पर ही रोक दिया जाता है उसके आगे के लिए आप दोबारा रिक्शा कर सकते हैं |  
हर की पौड़ी :---
वह स्थान जहाँ पर अमृत की बूंदें गिरी थी उसे हर-की-पौडी पर ब्रह्म कुंड माना जाता है जिसका शाब्दिक अर्थ है 'ईश्वर के पवित्र पग'। हर-की-पौडी, हरिद्वार के सबसे पवित्र घाट माना जाता है और पूरे भारत से भक्तों और तीर्थयात्रियों के जत्थे त्योहारों या पवित्र दिवसों के अवसर पर स्नान करने के लिए यहाँ आते हैं। यहाँ स्नान करना मोक्ष प्राप्त करने के लिए आवश्यक माना जाता है।



यहाँ से हमने दोबारा रिक्शा किया और पहुँच गए हर की पौड़ी के बाहर 
हर की पौड़ी पर पहुँचने के लिए काफी सारी सीड़ियाँ नीचे उतरनी पड़ती हैं यहाँ हर सीढ़ी पर भिखारी अपना कब्ज़ा किये बैठे हैं और गन्दगी तो बेशुमार है यहाँ प्रशासन की ओर से कमी अभी भी खलती है यहाँ कोई कूड़ादान नजर नही आता है यहाँ खाली दूध की थैलियाँ, फूल पत्ते और बाकी कचरा फैंका जा सके |
कुछ सीडियां उतर कर जूता स्टैंड है यहाँ आप अपने जूते जमा कराकर हर की पौड़ी पर स्नान के लिए जा सकते हैं दो जूता घर हैं दोनों तरफ से आने वालों के लिए लेकिन जूते अगर ज्यादा हों तो इनके पास कोई बोरी या थैले की सुविधा नही है और आपका सामान वगेरह रखने की कोई सुविधा यहाँ नहीं है जो लोग अकेले आते हैं वो घाट पर बैठे किसी भी पण्डे के पास अपना कीमती सामान रख सकते हैं जिसके वो निसंदेह पैसे लेते हैं मुफ्त सुविधा कोई नहीं है |
हर की पौड़ी पर ही एक महिला घाट है जो बस नाम मात्र का है जिसमें पहले रेत भरी रहती थी अब उसमें पानी ही नही है इसलिए सब महिलाएं बाहर नहाना ही पसंद करती हैं | महिला घाट के अन्दर कुछ तख़्त पड़े हैं जिन पर मोटी मोटी पंडिताईन बैठी हैं जो आपका सामान रखने का आपसे पैसा लेती हैं | यहाँ महिलाएं सिर्फ कपडे बदलने के लिए आती हैं |
हमने सबने बारी बारी स्नान किया और फिर बाहर आ गए और दोबारा अपने जूते वापिस लेकर हम सीड़ियाँ चढकर बाहर पहुँच गए और फिर हमने यहाँ से टेम्पो किया धर्मशाला के लिए जो आने के लिए तो प्रति सवारी दस रुपये किराया ले रहा था लेकिन वापिसी में प्रति सवारी बीस रुपये किराया लिया गया | खैर हम सब 8 बजे तक धर्मशाला पहुँच गए थे | 
 8.30 बजे नाश्ते के लिए जाना था इसलिए सब दोबारा स्नान कर तैयार होने चले गए क्योंकि गंगा नहाने के बाद कपड़ों में रेत आ जाती है | इसके बाद नाश्ता किया गया नमकीन और मीठे दलिए के साथ |इसके बाद हर कोई स्वतंत्र था यहाँ भी कोई जाना चाहे | कुछ लोग नीलकंठ चले गए कुछ मनसा देवी ,कुछ ऋषिकेश और हमारा ग्रुप तैयार हुआ पतंजलि योगपीठ जाने के लिए |
पतंजलि योगपीठ यहाँ से लगभग 25 किलोमीटर दूर है इसलिए नाश्ता करने के बाद लगभग 9.30 बजे हम सब निकल पड़े ताकि दोपहर के भोजन तक हम वापिस धर्मशाला में आ सकें |
        यहाँ जाने के लिए हमने दो टेम्पो किये क्योंकि एक में सात लोग बैठ सकते हैं सभी लोग इसमें बैठ कर निकल पड़े वहां पहुँचने में हमें लगभग 45 मिनट लगे |टेम्पो वाले ने वहां जाने के लिए प्रति सवारी 30 रुपये लिए |


यहाँ पहुंचने के बाद थोडा घूम कर हमने इसे देखा फिर जलपान के लिए पहुंचे इसकी कैंटीन में जिसका नाम है 'अन्नपूर्णा ' यहाँ की शुद्ध घी से निर्मित जलेबी का स्वाद आप चखे बिन नहीं रह सकते | सबने यहाँ फ्रूट चाट ,गोलगप्पे, जलेबी और चाट पकौड़ी खाई सभी स्वादिष्ट बना हुआ था यहाँ शुद्ध घी से निर्मित मिठाइयाँ भी मिलती हैं |


  इसके बाद हम दवाइयां लेने पहुंचे जिसको जो भी सामान चाहिए था लिया और फिर वापिस पहुंचे टेम्पो वाले के पास जो हमारा इन्तजार कर रहे थे क्योंकि धूप बहुत अधिक थी इसलिए कोई भी और घूमने के लिए तैयार नहीं था |
वापिसी में काफी गर्मी थी और ट्रैफिक जाम भी बहुत था इसलिए थोड़ा देर से पहुंचे हम धर्मशाला | फिर थोडा विश्राम करने के बाद भोजन का समय हो चूका था इसलिए हम सबने भोजन किया और अपने अपने कमरे में चले गए |
शाम के समय जो नील कंठ गए थे उनको काफी देर हो गई आने में और इतनी गर्मी के कारण कहीं भी जाने का मन नहीं हुआ इसलिए हम धर्मशाला के बाहर ही कुर्सी लगा कर बैठ गए और ठंडी तजि हवा का आनन्द लिया | कुछ लोग उस समय हर की पौढ़ी और कुछ पास वाले घाट पर नहाने के लिए चले गए |
अब सब अपने अपने कमरे में चले गए आराम करने | रात को 9 बजे फिर सभी भोजन के लिए पहुँचे |


उसके बाद बाहर बरामदे में ही भजन कीर्तन का कार्यक्रम चलता रहा | उसके बाद सभी सोने के लिए चले गए |

तीसरा दिन 
आज सुबह सभी उठकर अपने कार्यों से निवृत होकर नाश्ता करने चले गए | उसके बाद लगभग 9 बजे सभी अपने अपने गंतव्य की ओर बढ़ गए | हम कुछ लोगों ने शांतिकुंज जाने का कार्यक्रम बनाया जो धर्मशाला से केवल 10-12 किलोमीटर की दूरी पर ही था ,इसलिए सबने टेम्पो ले लिया और 10..10 रुपए देकर वहां पहुँच गए |
शांतिकुंज :-
रेलवे स्टेशन/बस स्टैण्ड से हर की पौड़ी पहुंचने के बाद यहाँ से बाई पास रोड़ में सूखी नदी तथा भारतमाता मन्दिर पार करके उसी मार्ग पर शांतिकुंज स्थित है। यहाँ पर कार से पँहुचने में 15 मिनट, रिक्शा से पँहुचने में 30 मिनट, एवं पैदल पँहुचने में 45 मिनट लगते है। 
संस्थान की स्थापना :
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य एवं माता भगवती देवी शर्मा द्वारा इस आश्रम की स्थापना 1971में की गई थी।
अंदर जाने से पहले प्रवेश सूचना देनी होती है रजिस्टर में लिख कर कितने लोग जा रहे हैं | बहुत ही साफ़ सफाई और सुव्यवस्था का संगम है शांतिकुंज ,यहाँ बहुत सारे लोग अपनी वृद्ध अवस्था में आकर रहते हैं ,यहाँ रहने की बहुत ही सुंदर व्यवस्था है | जैसे अंदर पूरा एक क़स्बा बस्ता है | इसके अंदर ही दो कैंटीन हैं एक कैंटीन में कुछ सस्ता सामान मिलता है इसके साथ ही भोजनालय है यहाँ पर दिन में दो बार मुफ्त भोजन की व्यवस्था है यहाँ पर कुछ लोग आकर दान रूप में भोजन वितरण भी करते हैं | अंदर ही आयुर्वेदिक दवाइयां जो यहाँ निर्मित होती हैं उचित मूल्य पर मिलती हैं | बहुत सारे विभाग हैं यहाँ ,जिनमे लोग रहते हैं ,उनको ऋषिओं के नाम पर नाम दिया गया है | यहाँ जूते रखने की व्यवस्था बहुत ही उत्तम है | शांति कुञ्ज की कुछ झलकियाँ ...




जैसे की गर्मी बहुत अधिक हो रही थी इसलिए हमने जल्दी वापिस आना ही उचित समझा | वापिस आकर हमने दोपहर का भोजन लिया और वापिस अपने अपने कमरे में चले गए | 
शाम को गंगा आरती देखने का प्रोग्राम था जिसे देखने के लिए लोग बहुत दूर दूर से हर की पौढ़ी पर पहुंचते हैं | क्योंकि आरती का समय 7 बजे के बाद का रहता है और हमें बाजार से कुछ सामान भी लेना था इसलिए हम 5 बजे तक धर्मशाला से निकल चुके थे ,क्योंकि भीमघोड़ा सड़क पर चप्पल की बहुत अच्छी दुकाने हैं यहाँ मोल भाव करके बहुत मजबूत चप्पलें आप ले सकते हैं |उसके बाद हमने दोबारा रिक्शा किया हर की पौढ़ी के लिए |

आरती शुरू होने वाली थी ,इसलिए सबको गंगा किनारे बिठाने के लिए वहां काफी कार्यकर्त्ता तैनात थे वहां प्लास्टिक की पन्निओं की बनी चादरें बिछा दी गई थीं ,जिस पर सब बैठ गए आरती का आनंद लेने के लिए और लोग जो आते रहे सब पीछे खड़े होते गए | तभी मन्त्र उच्चारण के साथ शुरू हुई गंगा आरती जिसमें 11 या 13 पंडितों  ने भाग लिया ,रात होने को थी और कल कल बहती गंगा के किनारे जगमगा उठे थे लहरों पर भी दिए सवार होकर निकल पड़े थे दूसरे गंतव्य को सभी अपलक इस दृश्य को अपने अपने कैमरे में कैद करने लग गए थे | जो सेवक तैनात थे सबकी व्यवस्था  करने में लगे थे ,सबके हाथ में एक एक पुस्तिका थी यानि दान पर्ची ,जो आरती के उपलक्ष्य में जलाये जाने वाले दिओं के लिए दान स्वरुप ली जा रही थी | आइये आपको ले चलें गंगा किनारे आरती दर्शन के लिए कुछ झलकियों के साथ ....





आरती से फ्री होकर हम सब वापिस धर्मशाला के लिए चले ,वापिसी में बहुत मुश्किल से रिक्शा मिली भीमगौडा तक वो भी दुगने पैसों के साथ और वहां से आगे कोई टेम्पो 200 रुपये से कम जाने को तैयार नही हो रहा था जिसकी आने की कीमत हमने सिर्फ 70 रुपये दी थी | वहां कोई आपको सुनने वाला नही है | बहुत मुश्किल से हम धर्मशाला पहुंचे और खाना खाकर अपने अपने कमरे में चले गए |

हरिद्वार यात्रा भाग 3.क्रमशः ....
                                                        ....सरिता भाटिया 

Saturday, August 2, 2014

हरिद्वार यात्रा भाग १.

दोस्तों वादे के अनुसार एक और धार्मिक यात्रा वृतांत के साथ आप सबके समक्ष हाजिर हूँ पहले हरिद्वार यात्रा का थोड़ा सा जिक्र मुल्तान ज्योत महोत्सव के तौर पर कर चुकी हूँ जिसमें मुख्य बिंदु ज्योत महोत्सव के ही रहे ,अब लेकर आई हूँ हरिद्वार यात्रा संस्मरण और उसके आसपास के दर्शनीय स्थल तो चलिए बढ़ते हैं अपने पहले पड़ाव की ओर ....
हरिद्वार 
पवित्र गंगा नदी के किनारे बसे 'हरिद्वार' का शाब्दिक अर्थ है- 'हरि तक पहुँचने का द्वार'। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, हरिद्वार वह स्थान है जहाँ अमृत की कुछ बूँदें भूल से घडे से गिर गयीं जब खगोलीय पक्षी गरुड़ उस घडे को समुद्र मंथन के बाद ले जा रहे थे। चार स्थानों पर अमृत की बूंदें गिरीं, और ये स्थान हैं:- उज्जैन, हरिद्वार, नासिक, और प्रयाग| 

हरिद्वार  एक अंतरराष्ट्रीय  तीर्थ स्थान  होने के कारण यहाँ साल भर   लाखों करोड़ों  की संख्या में श्रद्धालू देश विदेश से आते है |




स्थिति :---
हरिद्वार, हरिद्वार जिला, उत्तराखण्ड, भारत में एक पवित्र नगर और नगर निगम बोर्ड है। हिन्दी में, हरिद्वार का अर्थ हरि "(ईश्वर)" का द्वार होता है। हरिद्वार हिन्दुओं के सात पवित्र स्थलों में से एक है। हरिद्वार जिला, सहारनपुर डिवीजनल कमिशनरी के भाग के रूप में २८ दिसंबर १९८८ को अस्तित्व में आया। २४ सितंबर १९९८ के दिन  उत्तर प्रदेश का पुनर्गठन किया गया , और इस प्रकार ९ नवंबर, २०००, के दिन हरिद्वार भारतीय गणराज्य के २७वें नवगठित राज्य उत्तराखंड (तब उत्तरांचल), का भाग बन गया।
भूगोलिक स्थिति :---
३१३९ मीटर की ऊंचाई पर स्थित अपने स्रोत गौमुख (गंगोत्री हिमनद) से २५३ किमी की यात्रा करके गंगा नदी हरिद्वार में गंगा के मैदानी क्षेत्रो में प्रथम प्रवेश करती है, इसलिए हरिद्वार को गंगाद्वार के नाम सा भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है वह स्थान जहाँ पर गंगाजी मैदानों में प्रवेश करती हैं।
पहुँचने के साधन :---
हरिद्वार देश के विभिन्न स्थलों से रेल एवं सड़क मार्ग से जुड़ा है। 
रेल द्वारा :-
दिल्ली से हरिद्वार तक की दूरी रेल द्वारा लगभग 225 किलोमीटर है |
हरिद्वार के लिए दिल्ली से लगभग 20 गाड़ियाँ निकलती हैं जिसका आम किराया 92 रुपये से 160 रुपये तक है थोड़ी सुविधा के साथ इसका किराया लगभग 466 रुपये और 661 रुपये है और थोड़ी और ज्यादा सुविधा के साथ इसका किराया 1083 से लेकर 1103 रुपये तक है |
बस द्वारा :-
बस से हरिद्वार की दूरी लगभग 208 किलोमीटर है डीटीसी बस सर्विस सुबह 7.30 बजे से शुरू होकर रात को 7 बजे तक उपलब्ध है जिसका किराया 143 रुपये है | 
बहुत सारी प्राइवेट बस सेवा भी उपलब्ध हैं जिनका किराया 250 रुपये से लेकर 750 रुपये तक है |
हवाई मार्ग द्वारा :-
विदेशी पर्यटकों के लिए हरिद्वार का निकटतम हवाई अड्डा जॉली ग्रांट हवाई अड्डा देहरादून में है जो कि दिल्ली और देश के अन्य मुख्य हवाई अड्डों से जुड़ा हुआ है इसकी हरिद्वार से दूरी मात्र 34 किलोमीटर है और देहरादून के लिए दिल्ली से सप्ताह में चार उड़ानें होती हैं जेट लाइट और स्पाइस जेट द्वारा और इसका किराया लगभग 1000 रुपये है |
अपनी गाड़ी द्वारा :-
बहुत सारे लोग एकादशी,अमावस्या और पूर्णमाशी के लिए हर महीने हरिद्वार जाते हैं इसलिए सुविधा अनुसार अपनी गाड़ी उठाते हैं और चल देते हैं |  
जलवायु :---
तापमान
ग्रीष्मकाल: 15 डिग्री से- 42 डिग्री तक 

शीतकाल: 6 डिग्री से- 16.6 डिग्री तक
ठहरने के स्थान :---
यहां उत्तरांचल सरकार ने पर्यटकों के लिए आवास गृह बनाए हैं। पर्यटक अपने बजट के हिसाब से ठहरने के स्थान का चयन कर सकते हैं। यहाँ लगभग हर धर्म हर प्रान्त की धर्मशाला हैं , बहुत होटल भी उपलब्ध हैं किसी भी धर्मशाला में आप अपने पहचान के आधार पर रह सकते हैं | लगभग सभी धर्मशालाओं में खाने की व्यवस्था रहती है इसलिए आपको घर जैसा खाना मिल जाता है |

वैसे तो हरिद्वार की बहुत बार यात्रा की है लेकिन सेवा भारती के साथ जाने का यह पहला अवसर था | सेवा भारती वर्ष में दो बार अपने शिक्षिकों निरीक्षकों एवं अन्य सदस्यों को यात्रा पर लेकर जाता है जिसमें शिविर या अभ्यास वर्ग भी लगाया जाता है पर इस बार की यात्रा एक स्वतंत्र यात्रा के रूप में थी | सेवा भारती के साथ हरिद्वार का कार्यक्रम पूर्व नियोजित था इसलिए हमारी जनशताब्दी देहरादून से आने जाने की टिकटें पहले से बुक कर ली गई थीं | 13 जून को हमारा जाना और 16 जून को हमारी वापिसी निश्चित की गई थी |

सेवा भारती :---
सेवा भारती वैसे तो किसी परिचय का मोहताज नहीं परन्तु जिनका कभी इससे परिचय नहीं हुआ तो उनके लिए इतना कहना है कि यह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा चालित एक प्रकल्प है जो मुख्यतः बनवासी क्षेत्रों में कार्य करता है | पूरे देश में इसके लगभग एक लाख से ज्यादा केंद्र कार्यरत हैं |
मुख्य कार्य :--- इसके मुख्य कार्य शिक्षा, संस्कार, सामाजिक जागरूकता, धर्म-परिवर्तन से वनवासियों की रक्षा आदि हैं | इसमें मुख्यता बाल संस्कार , महिलाओं के लिए सौन्दर्य प्रसाधन की शिक्षा ,सिलाई की शिक्षा एवं कंप्यूटर की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाता है | 
पहला दिन 
हम कुल 105 लोग थे जिसमें पश्चिमी जिले के छः विभाग के कार्यकर्त्ता ही सम्मलित थे | सबको अपने आप नई दिल्ली स्टेशन पर पहुंचना था | हमारी गाड़ी का चलने का समय था दोपहर 3.25 का इसलिए इस भीषण गर्मी से पार पाने के लिए घर से रिक्शा कर मेट्रो लेना ही उचित समझा ठीक 2.14 बजे हम मेट्रो में बैठ चुके थे .....
राजीव चौक से येलो लाइन बदल कर एक स्टेशन बाद ही हम नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन पर 2.45 पर पहुंचे | यहाँ से बाहर निकल कर हमने प्लेटफोर्म संख्या 11 का रुख किया यहाँ पर हमारी गाड़ी जन शताब्दी लग चुकी थी ,पर यहाँ की अव्यवस्था ,बहुत सारी सीडियां और कोई भी लिफ्ट ना होने के कारण हम 3.14 पर ही गाड़ी के अन्दर पहुँच पाए | इतने में हम पसीने से लथपथ हो चुके थे जिसे सूखने में काफी देर लगी गाड़ी अपने निर्धारित समय पर चल चुकी थी | 
          हम सब अपनी अपनी सीट पर बैठ चुके थे | गाड़ी वाताअनुकूलित नहीं थी इसलिए काफी गर्मी रही पर बातों में सफ़र कट गया पता ही नहीं चला गाड़ी का पहुँचने का समय था शाम 7.35 पर ,लेकिन 45 मिनट की देरी से पहुंची यानि 8.14 पर | 
हम हरिद्वार स्टेशन पर उतर चुके थे और यहाँ की जो सबसे अच्छी बात रही वोह यह की यहाँ पर कोई सीढ़ी ना होकर केवल स्लाइड ही थी जिससे सभी वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को और सबको ही उतरने में बहुत सुविधा रही | प्लेटफॉर्म से बाहर निकलते ही स्टेशन के बरामदों में और बाहर भी नजारा कुछ इस तरह था सब ने अपना रैन बसेरा बना रखा था और जमीन पर चादरें बिछा कर आराम से सो रहे थे |




जब सभी इक्कट्ठे हो गए तो स्टेशन से बाहर निकल धर्मशाला तक जाने का कार्यक्रम शुरू हुआ | कुछ ऑटो जिसमें सात सीट होती हैं वहीँ पर सात सात लोगों को लेकर धर्मशाला पहुँचने लगे जिसका हरेक को 30 रुपये किराया देना था | 
हमारी धर्मशाला दूधाधारी मंदिर के सामने आश्रम बाबा जोध सचियार जोकि ऋषिकेश जाने वाले प्रमुख मार्ग पर स्थित थी जिसमें सेवा भारती द्वारा पहले से व्यवस्था की गई थी | 


सबको कमरे मिल जाने के बाद सबने सामान रखा और पहुँच गए भोजनशाला में यहाँ खाने की व्यवस्था की गई थी |
भोजन के बाद सभी अपने अपने कमरे में सोने के लिए चले गए |

हरिद्वार यात्रा भाग 2.क्रमशः.....
 
      लेखिका :--- सरिता भाटिया 

Wednesday, February 5, 2014

गढ़ मुक्तेश्वर

कार्तिक का महीना एक पवित्र महीना माना जाता है जिसमें गंगा स्नान का विशेष महत्व रहा है | 12 नवम्बर का दिन हमने भी चुना इस बार गढ़ मुक्तेश्वर जाने के लिए | अपनी ही गाड़ी में हमने जाने का फैसला किया | लगभग 9 बजे हम निकल पड़े घर से ,फिर पटेल नगर से बाकी सदस्यों को लेते हुए हम 9.30 बजे वहाँ से रवाना हो गए अपने नये गंतव्य गढ़ मुक्तेश्वर की ओर | 





परिचय एवं स्थिति :---
गढ़मुक्तेश्वर भारत के उत्तरप्रदेश राज्य के हापुड़ जिले का शहर है। इसे गढवाल जाटों ने बसाया था। गंगा नदी के किनारे बसा यह शहर गढवाल राजाओं की राजधानी था। बाद में पृथ्वीराज चौहान ने हड़प लिया। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से सौ किलोमीटर दूर 'राष्ट्रीय राजमार्ग 24' पर 'गढ़मुक्तेश्वर' नामक नगर बसा है जो हापुड़ ज़िले का एक तहसील मुख्यालय है। गढ़मुक्तेश्वर मेरठ से 42 किलोमीटर दूर स्थित है और गंगा नदी के दाहिने किनारे पर बसा है। विकास की दृष्टि से गढ़मुक्तेश्वर सबसे पिछड़ी तहसील मानी जाती है, किंतु सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यहाँ कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लगने वाला गंगा स्नान पर्व उत्तर भारत का सबसे बड़ा मेला माना जाता है।


Garhmukteshwar is located in Uttar Pradesh

दिल्ली से इसकी दूरी लगभग 85 किलोमीटर है ,क्योंकि सुबह का समय था तो इतनी भीड़ नहीं थी और हमने खाना गाड़ी में ही रख लिया था इसलिए जल्दी से हम बढते जा रहे थे | किसी अच्छे ढाबे जा होटल की तलाश करते करते हम तीन घंटे में वहाँ पहुँच गए थे |

कैसे पहुंचें :---
सड़क मार्ग से :-
दिल्ली से यहां की दूरी लगभग 85 किलोमीटर है। उत्तर प्रदेश रोडवेज की नियमित बसें 'आनन्द विहार बस अड्डा, दिल्ली से चलती हैं।
रेल मार्ग से :-
यहाँ दो रेलवे स्टेशन हैं गढ़मुक्तेश्वर सिटी और बृजघाट रेलवे स्टेशन |
बृजघाट रेलवे स्टेशन यहां से 6 किलोमीटर की दूरी पर है। यह दिल्ली मुरादाबाद रूट पर पड़ता है | यह बड़े बड़े शहरों जैसे लखनऊ ,इलाहाबाद ,रोहतक ,सहारनपुर ,मुज्जफरपुर से जुदा हुआ है | 
अपनी गाड़ी :-
यह विकल्प तो है ही हमेशा अपने अनुसार चलने के लिए |

निवास :---
यहाँ पर कुछ अच्छे होटल हैं जो हाईवे पर हैं और सभी जरुरी सुविधायों से सुसज्जित हैं जैसे राही टूरिस्ट बंगलो ,होटल क्रिस्टल पैलेस, राजमहल होटल,होटल कृष्णा सागर आदि लेकिन घाट के पास कोई भी अच्छा निवास अच्छी सुविधाओं के साथ उपलब्ध नहीं है |

पौराणिक महत्त्व :---
भागवत पुराण व महाभारत के अनुसार यह कुरु की राजधानी हस्तिनापुर का भाग था। आज पर्यटकों को यहां की ऐतिहासिकता और आध्यात्मिकता के साथ-साथ प्राकृतिक ख़ूबसूरती भी खूब लुभाती है। मुक्तेश्वर शिव का एक मन्दिर और प्राचीन शिवलिंग कारखण्डेश्वर यहीं पर स्थित है। काशी, प्रयाग, अयोध्या आदि तीर्थों की तरह 'गढ़मुक्तेश्वर' भी पुराण उल्लिखित तीर्थ है। शिवपुराण के अनुसार 'गढ़मुक्तेश्वर' का प्राचीन नाम 'शिववल्लभ' (शिव का प्रिय) है, किन्तु यहां भगवान मुक्तीश्वर (शिव) के दर्शन करने से अभिशप्त शिवगणों की पिशाच योनि से मुक्ति हुई थी, इसलिए इस तीर्थ का नाम 'गढ़मुक्तीश्वर' (गणों की मुक्ति करने वाले ईश्वर) विख्यात हो गया। 

कथा :---
शिवगणों की शापमुक्ति की संक्षिप्त कथा इस प्रकार है- प्राचीन समय की बात है क्रोधमूर्ति महर्षि दुर्वासा मंदराचल पर्वत की गुफा में तपस्या कर रहे थे। भगवान शंकर के गण घूमते हुए वहां पहुंच गये। गणों ने तपस्यारत महर्षि का कुछ उपहास कर दिया। उससे कुपित होकर दुर्वासा ने गणों को पिशाच होने का शाप दे दिया। कठोर शाप को सुनते ही शिवगण व्याकुल होकर महर्षि के चरणों पर गिर पड़े और प्रार्थना करने लगे। उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर दुर्वासा ने उनसे कहा - हे शिवगणो! तुम हस्तिनापुर के निकट खाण्डव वन में स्थित 'शिववल्लभ' क्षेत्र में जाकर तपस्या करो तो तुम भगवान आशुतोष की कृपा से पिशाच योनि से मुक्त हो जाओगे। पिशाच बने शिवगणों ने शिववल्लभ क्षेत्र में आकर कार्तिक पूर्णिमा तक तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन उन्हें दर्शन दिए और पिशाच योनि से मुक्त कर दिया। तब से शिववल्लभ क्षेत्र का नाम 'गणमुक्तीश्वर' पड़ गया। बाद में 'गणमुक्तीश्वर' का अपभ्रंश 'गढ़मुक्तेश्वर' हो गया। गणमुक्तीश्वर का प्राचीन ऐतिहासिक मंदिर आज भी इस कथा का साक्षी है।

यहाँ पहुँचने के बाद हमने गाड़ी घाट की तरफ ले जानी चाही क्योंकि घाट तक जाने के लिए पैदल चलना पड़ता और पार्किंग काफी दूर थी हाई वे के बाई तरफ यहाँ कुछ गेस्ट हाउस वगेरह भी थे तो वहाँ पुलिस वाले खड़े थे अवरोध लगाकर उन्होंने गाड़ी अन्दर ले जाने के लिए रोका फिर वोही हुआ गाड़ी एक साइड खड़ी करके आए और उससे बात करके गए तब उसने गाड़ी ले जाने दी क्योंकि उसकी मुट्ठी गरम कर दी गई थी मात्र सौ रुपये देकर |
वहाँ पहुंचकर हमने घाट के नजदीक कोई होटल या गेस्ट हाउस वगेरह ढूंडना चाहा एक ही गेस्ट हाउस मिला वो भी इतना गन्दा था की हमने उसे ना लेने का निर्णय बनाया क्योंकि हमें सिर्फ कपड़े वगेरह बदलने के लिए ही इसकी जरुरत थी |वैसे घाट के पास बहुत सारी फानूस की बनी हुई झोंपड़ीयां हैं जो किराये पर मिलती हैं जैसा की चित्रों में दिखाया गया है |



क्योंकि कार्तिक माह चल रहा था इसलिए काफी स्त्रियाँ हवन यज्ञ में व्यस्त नज़र आईं | सब मिलकर हवन कर रहीं थी |




हमने घाट के उस पार जाकर नहाने का मन बनाया |हम घाट की तरफ बढ़ गए और नाव वाले से पूरी नाव दूसरे पार ले जाने का मूल्य पूछा जबकि एक सवारी का मूल्य 40 रुपये लिखा हुआ था और हम कुल 6 लोग थे  हमने उससे 200 रुपये में बात करली | उस पार पहुँचने के लिए रास्ते में ज्यादा पानी नहीं था कभी कभी नाव ले जाने वाला उतरकर पानी में खड़ा हो जाता नाव को ठेलने के लिए | और वो हमें उस पार छोड़ आया | 



यहाँ पर बहुत सारे तख्तपोश लगे हुए हैं जिस पर आप सामान रख सकते हैं बैठ सकते हैं खाना खा सकते हैं |यहाँ पहुंचकर हमने जूते वगेरह उतारकर एक तख्तपोश पर सारा सामान रख दिया | जो नहाने के इच्छुक थे वो नहाने के लिए चल पड़े | हमने स्नान किया आराम से क्योंकि पानी ना तो गहरा था ना ही उसमें बहाव था |




उसके बाद एक फानूस के पत्तों से बने कमरे में जिसमें साड़ी या दुपट्टे का पर्दा लगा था  उसमें जाकर कपड़े बदले  |
तब तक खाने की इच्छा प्रबल हो चुकी थी हमने खाना जो साथ लेकर आए थे वो खोला और पूरी पिकनिक की तरह उसका आनंद उठाया |



पेट पूजा होने तक नाव दोबारा हमें लेने पहुँच चुकी थी हमने वहीँ पूजा की और नाव में बैठकर वापिस उसी किनारे पहुँच गए |




गंगा मेला :---
इसी महत्व के कारण यहां प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में एकादशी से लेकर पूर्णिमा तक एक पखवाडे का विशाल मेला लगता है, जिसमें दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब आदि राज्यों से लाखों श्रद्धालु मेले में आते हैं और पतित पावनी गंगा में स्नान कर भगवान 'गणमुक्तीश्वर' पर गंगाजल चढ़ाकर पुण्यार्जन करते हैं।

धार्मिक कृत्य :---
यहां 'मुक्तीश्वर महादेव' के सामने पितरों को पिंडदान और तर्पण (जल-दान) करने से गया श्राद्ध करने की जरूरत नहीं रहती। पांडवों ने महाभारत के युद्ध में मारे गये असंख्य वीरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान यहीं मुक्तीश्वरनाथ के मंदिर के परिसर में किया था। यहां कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को पितरों की शांति के लिए दीपदान करने की परम्परा भी रही है सो पांडवों ने भी अपने पितरों की आत्मशांति के लिए मंदिर के समीप गंगा में दीपदान किया था तथा कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी से लेकर पूर्णिमा तक यज्ञ किया था। तभी से यहां कार्तिक पूर्णिमा पर मेला लगना प्रारंभ हुआ। कार्तिक पूर्णिमा पर अन्य नगरों में भी मेले लगते हैं, किन्तु गढ़मुक्तेश्वर का मेला उत्तर भारत का सबसे बड़ा मेला माना जाता है।

व्यापार :---
यह गंगा के जल मार्ग से व्यापार का मुख्य केन्द्र था। उन दिनों यहां इमारती लकड़ी, बांस आदि का व्यापार होता था, जिसका आयात दून और गढ़वाल से किया जाता था। इसके साथ ही यहां गुड़ - गन्ने की बड़ी मंडी थी। यहां का मूढा़ उद्योग भी अति प्राचीन है। यहां के बने मूढे़ कई देशों में निर्यात किए जाते रहे हैं।

साक्षरता एवं भाषा :--- 
यहाँ की कुल जनसंख्या 60,000 के लगभग है |यहाँ पर साक्षरता रेट 82 % है जोकि राष्ट्रीय साक्षरता रेट से भी अधिक है जोकि 74% है | इसमें पुरुषों का प्रतिशत अधिक है | यहाँ की भाषा हिंदी है |
यहाँ आकर उनका रहन सहन देखकर आपको नहीं लगता की आप किसी पढे लिखे राज्य में आए हैं जबकि यहाँ पर बहुत सारे स्कूल और कॉलेज हैं| 

जलवायु :---
यहाँ की जलवायु गर्मिओं में बहुत गरम और सर्दिओं में बहुत सर्द रहती है ,अप्रैल से जून तक यहाँ खूब गर्मी पड़ती है और जून से सितम्बर मध्य तक बरसात और अक्तूबर से मार्च तक खूब सर्दी होती है |

दर्शनीय स्थल :---
गढ़मुक्तेश्वर में गंगा किनारे स्थित देवी गंगा को समर्पित मुक्तेश्वर महादेव मंदिर, गंगा मंदिर, मीराबाई की रेती, गुदडी़ मेला, बृज घाट, झारखंडेश्वर महादेव, कल्याणेश्वर महादेव का मंदिर आदि दर्शनीय स्थल हैं। 
मुक्तेश्वर महादेव मंदिर :-
यह मंदिर गढ़मुक्तेश्वर के प्राचीन शिव मंदिरों में से है |ऐसा माना जाता है की यह मंदिर राजा शिवि ने बनाया था |इस मंदिर में शिव लिंग स्थापित है जोकि संत परशुराम ने बनाया था ऐसा कहा जाता है |

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गंगा मंदिर :-
गंगा मंदिर एक प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल है इसमें 101 सीड़ियाँ बनी हुई थी जोकि गनगा में उअतारती हैं ,उसमें से 85 अभी  हैं | ब्रह्मा की सफ़ेद पत्थर से बनी मूर्ति देखने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से यात्री आते हैं नहुष कूप :-
मंदिर में राजा नहुष द्वारा यज्ञ किया गया और यहाँ एक कूप का भी निर्माण किया गया जिसमें पानी की पूर्ति गंगा के पानी से होती है | इसलिए इसे नहुष कूप कहा जाता है |

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मीरा बाई की रेती :-
मुकतेश्वर मंदिर के बिल्कुल कुल सामने मीरा बाई की रेती के नाम से जाना जाने वाला दर्शनीय स्थल है यहाँ पूरे रेत ही फैली हुई है ऐसा कहा जाता है की यहाँ पर मीरा बाई ने भक्ति की थी |यह एक सुन्दर मंदिर है |

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बृजघाट :-
बृजघाट एक सुन्दर दर्शनीय स्थल है | यहाँ वेदांत मंदिर, अमृत परिसर हनुमान मंदिर जैसे बहुत सारे मंदिर हैं |गंगा घाट सबसे सुन्दर घाट है |
कल्पवृक्ष :-
यह एक दिव्य वृक्ष है जो वेदांत मंदिर में विजयमल बघेल ने लगाया था |इसका धार्मिक ,आध्यात्मिक एवं औषधीय महत्व है |यह एक दुर्लभ जाति का पौधा है | 
घाट से वापिस लौटते हुए हमने बाजार का एक चक्कर लगाया यहाँ कुछ ऐसा नहीं था जो ख़रीदा जा सके | कोई भी ऐसा साफ़ सुथरा रेसटोरेंट नहीं था यहाँ खाना खाया जा सके इसलिए अपना खाना साथ ले जाना ना भूलें |
वापिस गाड़ी में बैठ जब निकलने लगे तो भिखारिओं को कुछ पैसे दे रहे थे तो एक भिखारी को ज्यादा ही लाचार जान जब उसे 100 रुपये देने की कोशिश की तो उसने लेने से इनकार कर दिया यह कहकर बाबूजी मैं इतने संभाल नहीं पायूँगा ,फिर उसे खुले पैसे कहीं से लेकर 10 रुपये दिए उस भिखारी के लिए सब नतमस्तक हो गए ,यह सोचते हुए कि दुनिया में ईमानदारी अभी भी कायम है |
इसके बाद हम वापिस दिल्ली के लिए निकल पड़े समय हो गया था 4 बजे का | धार्मिकता से ओतप्रोत हो थके हुए ठीक तीन घंटे में हम अपने घर पहुँच चुके थे | 

          लेखिका ......... सरिता भाटिया .........