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Tuesday, April 10, 2018

ना ही गीतों में अब आत्मा है, ना संगीत में माधुर्य



गीत-संगीत जीवन में एक नयी उर्जा और स्फूर्ति का माध्यम है.संगीत ने हमारे जीवन में एक अद्भुत स्थान बना लिया है. ‘तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है...’,’एक प्यार का नगमा है..’,‘आज से तेरी सारी गलियाँ मेरी..’,‘बापू सेहत के लिए तू तो हानिकारक,मेरा जूता है जापानी ये पतलून इंगलिश्तानी,इक दिन बिक जायेगा माटी के मोल,मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया, ए मेरे वतन के लोगों जरा आँख में भर लो पानी,मेरी प्यारी अम्मी जो है,जैसे अनेक सुरमय गीत है.जो हमारे दिल में किसी ना किसी तरह के भाव को जगाते है,चाहे फिर वो देशभक्ति, प्यार, अपनत्व, हास्य,करुणा का भाव हो. आज धीरे-धीरे गानों के लेखन से लेकर संगीत निर्माण तक में क्रांति का दौर देखा जा रहा है.जहाँ पहले एक गाने को बनाने में कई महीनों का वक़्त लगता था,सारा काम मानवशक्ति से ही सम्भव था,अब कम्प्यूटरीकरण की वजह से आसान हो गया है,जहाँ पहले मानवशक्ति और संसाधनों दोनों के प्रयोग के बाद भी समय काफी लगता था,वही आज गाने तैयार करने में दिनभर भी नहीं लगता. गानों में एक माधुर्य और गहराई हो तो वो कही ना कही दिल में उतर जाता है.आज हम गानों के शब्दों से ज्यादा उनके फिल्मांकन को महत्व देने लगे है,क्योंकि आज गाने के प्रचलन में बदलाव की बयार महसूस की जा सकती है.हम फिल्म संगीत में स्वर्णिम रेट्रो युग की तरह गानों में एक अद्भुत अनुभूति की कमी पाते है,अब वो लेखनी भी नही,जो मानवीय संवेदनाओं से जुड़ाव की अभिव्यक्ति करती थी. हमारे समाज का आइना कहे जाने वाले भारतीय चलचित्र में वो अपनेपन और आत्मीय भाव जो पहले था.वो अब ना कहानियों में रहा ना लिरिक्स में, शब्दों का महत्व समझे बिना ही गानों की रचना हो रही.धीरे-धीरे अश्लील गानों का सृजन होने लगा.उनमें हमने सारी सीमाओं को पार कर दिया, या फिर पुराने प्रसिद्ध गानों को रीमिक्स करके नये रूप में पेश करने की होड़ सी लग गयी है.दोनों ही स्थितियों में गाने की मधुरता और सुखद एहसास से छेड़छाड़ हुई.क्या इस तरह हम अपने संगीत प्रेम को   प्रकट कर रहे? वैसे गाने को बनाने में जो सबसे जरूरी है और जो उसकी आत्मा है वे शब्द है.शब्द ही गाने को सबके बीच प्रसिद्धि दिलाते है,लेकिन जब उनमें अश्लीलता  का तड़का लगे तो प्रसिद्धि तो है लेकिन स्थायित्व और दिल पर असर छोड़ने की कमी रहेगी,अगर हम अपने अब के माहौल में इस तरह का संगीत सुनते है तो वो हमें सरसता के स्थान पर कानफोडू दौर की ओर ले जाता है,वो गाने हमारे विचारों,सोच पर अपना असर छोड़कर अपने संगीत के माधुर्य से संगीत के अत्याचार की ओर ले जा रहे हैं . क्या हमें इस बात की गंभीरता को समझने की जरूरत नहीं है? मेरे विचार से इस बात पर वाकई गंभीरता से सोचने का वक़्त आ गया. क्योंकि हमारी युवा पीढ़ी और बच्चों के बीच इस अश्लील गानों का अपना एक आकर्षण देखा जा सकता है, विशेषकर उनके फिल्मांकन पर. कुछ यही हाल फिल्मों का है क्योंकि  आज फिल्मों में कहानियों के नाम पर सार्थक प्रेरणास्रोत और शिक्षाप्रद के स्थान पर आधारहीन कहानियों की भरमार है. समाज में इस प्रचलन ने एक अलग वर्ग को उभरने का मौका दिया है. वो माहौल आज हर उम्र के व्यवहार में समझ आ रहा है.आसपास का परिवेश भी विषाक्त रूप ले रहा है,जिसने व्यक्ति के आचार विचार को पूर्णतः संकुचित कर दिया है. उनके लिए संगीत मतलब शोरगुल है. संगीतकारों गीतकारों का पूरा ध्यान अब केवल मांग के अनुरूप शब्दों की ऐसी तुकबंदी गढ़ने पर है जो कम समय में आम लोगों की जुबान पर चढ़ जाए भले ही गीत के तौर पर उसका कोई अर्थ ना हो.मेरे विचार से उन्हें पुराने संगीतकारों और गीतकारों से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है.केवल पुराने धुनों का रिमिक्स कर देना कोई प्रेरक नही बल्कि उस तरह के भावना प्रधान गीतों को एक बार फिर चलन में लाना होगा ताकि गाने की आत्मा को हम संरक्षित कर पायेंगे. हमारे लिए शरीर और आत्मा का अंतर जानना आवश्यक है. एक स्वस्थ आत्मा ही शरीर को सुंदर स्वरुप देती है.अगर उसमे कपटता,नफरत,द्वेष,दुश्मनी,लालच,समाहित हो.तो उसे कैसे निखार सकते है.फिल्म संगीत हमेशा से ही लोक संगीत से प्रेरित रहा है.जिसमें विशेषकर राजस्थान, बंगाल, गोवा,गुजरात महाराष्ट्र का संगीत प्रमुख है.पर इन दिनों लोकसंगीत की आत्मा को भी धूमिल करने के प्रयास होने लगे है. लोकसंगीत के नाम पे अश्लील स्वरुप की प्रचुरता है, संगीत की कला को शांति और प्रसन्नता प्रदान करने का माध्यम मानते है.इसलिए उसे उसके वास्तविक रूप में ही व्यक्त होने देना हम सभी का फ़र्ज़ बनता है. जिससे समाज में फैली असामाजिक मानसिकता को बदला जा सके. जो समाज और देश के लिए भी कारगर है.  


















































































 


Wednesday, February 28, 2018

रिश्तों से नहीं, रंगों से खेले होली



होली के दिन दिल खिल जाते हैं रंगों में रंग मिल जाते है,होली आई रे कन्हाई,जा रे हट नटखट ना खोल मेरा घूँघट,रंग बरसे भीगे चुनर वाली इन जैसे अनेक गीतों ने हमेशा हमारे मन को उत्साह और उमंग की नयी उर्जा से ओतप्रोत किया है. आज भी ये गाने होली के त्यौहार की मस्ती को दोगुना करते है, पर अब इस त्यौहार में आधुनिकता और पाश्चात्य संस्कृति का बोलबाला साफ़ देखा जा सकता है. कुछ साल तक पहले हमारे घरों में संयुक्त परिवार की अवधारणा सार्थक होती थी.जिस कारण हर त्यौहार का उत्साह भी हटके होता था. परिवार में महीनों पहले से त्यौहार की तैयारियां प्रारंभ हो जाती थी, मिठाइयाँ और पकवानों की खुशबू हमें एक अलग ही एहसास कराती थी, हम त्यौहार के रोज ईश्वर को मिठाई और पकवान का भोग लगाके रंग गुलाल चढ़ाकर साथ ही अपने बड़ों के चरणों में लगा के आशीर्वाद के साथ एक दूसरे को लगाते थे और पकवान मिठाई का अपने पूरे परिवार, मित्रों,रिश्तेदारों के साथ आनंद उठाते थे. आज इस माहौल में हम सभी इस त्यौहार को मनाते तो है, पर हमारे लिए अब वो महत्व नहीं है जो हुआ करता था क्योंकि अब हम अपने जीवन की भागमभाग में लगे हुए हम अपने दोस्तों परिवार के सदस्यों के बीच समय बिताना क्या होता है भूलते जा रहे. त्यौहार  भी उस उत्साह के साथ नही मनाते,केवल रस्म अदायगी मात्र होती है. क्या हमने कभी सोचा त्यौहार का उत्साह आज महज औपचरिकता क्यों बन गया?  हमें इस ओर ध्यान देना होगा की क्यों हमारे परिवारों में संयुक्तता ना होकर एकल की इबारत पढ़ी जाने लगी है जो हम सबको अपनेपन और आत्मीयता के सागर से दूर कर एकल जीवन रुपी कुँए का मेंढक बना रहा है और हम इसे अपनी उन्नति और उचाईयों का शिखर मान रहे है. परिवार को दरकिनार करके सफलता का मापदंड तय करने में केवल स्वार्थ का मोल ज्यादा है,त्योहारों पर भी हम अपनी ऐसी ही कुछ वजहों के अनुसार इसका इस्तेमाल स्वार्थपरकता के लिए करते है. वास्तविकता यह है की त्यौहार की परम्पराओं ने शुरुआत से ही हमें एकजुटता और मिलनसारिता का पाठ पढ़ाया गया था. वो आज बीती बात हो गयी है. आज हम अपनी संस्कृति एवं सभ्यता को तिरस्कृत भाव से देखते है और पाश्चात्य संस्कृति को अपनाते हुए गर्वित होते है. शायद यही कारन है की होली जैसा सार्वजनिक मेलमिलाप का त्यौहार भी अब केवल सोशल मीडिया तक सीमित हो गया है. हम अब आपस में मिल जुलकर पर्व मनाने जैसे सामाजिक शिष्टाचारों तथा रिवाजों को दकियानूसी कदम कहने से भी नही हिचकिचाते. अगर कोई आज भी इस सामाजिक परंपरा को जीवित रखे है तो तो वो हमारी नजर में अनपढ़ और बेकार है. आज अगर रंगों के त्यौहार का  हमारे जीवन में रस्म जैसा भाव रह गया है, तो फिर जीवन में रंगों की वास्तविकता को लुप्तप्राय मान लेना अतिश्योक्ति नही है. वैसे रंगों के बिना क्या सुंदर जीवन की कल्पना सार्थक हो सकती है. नही न, तो फिर हमें रंगों को फिर से जीवन में लाने के प्रयास करना चाहिए,वो केवल त्योहारों के माध्यम से नही बल्कि अपनत्व की भावना को समाज में फैलाकर ही सम्भव है. जीवन जीना भी रंगों का प्रतिबिम्ब हैं. हँसना,सहयोग,मेलमिलाप,त्याग,समर्पण,रोना,धैर्य. सुख-दुःख और ख़ुशी ये सभी जीवन के अलग अलग रंग ही तो हैं जो हमारी जिन्दगी को इन्द्रधनुषी बनाते हैं.
आज वक्त का तकाजा है की आपसी सामंजस्य और सहयोग द्वारा परिवेश को बदलने के प्रयास होने चाहिए वर्ना त्योहारों के दौरान प्यार और अपनत्व की भाव के जगह नफरत,प्रतिस्पर्धा,कुंठित सोच की अधिकता बढती जाएगी और हम समाज के नाम एक एक परिवार या फिर एक व्यक्ति तक सिमटकर रह जायेंगे. त्यौहार को आपसी मनमुटाव दूर करने के माध्यम के तौर पर स्थान देना आवश्यक हो गया है. होली ने हमेशा से हमें रंगों के जीवन में महत्व का अभिप्राय समझाया है .होली का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत और परस्पर मेलमिलाप से जीने की जीवनशैली का पर्व है. उत्तर भारत में होली पर प्रचलित प्राचीन कथा के अनुसार हिरण्यकश्यप नामक राजा का बेटा प्रहलाद था, जो भगवान विष्णु का परम भक्त था, वो सदैव भगवान की भक्ति में लीन रहता था लेकिन उसका पिता स्वयं को भगवान् मानता था और उसे उसे भक्ति करने से रोकता था. जब प्रहलाद लाख कोशिशों के बाद भी भगवान् की भक्ति से दूर नहीं हुआ तो  राजा ने अपनी बहन होलिका को बुलाया और उससे प्रहलाद को दंड देने को कहा .होलिका को वरदान प्राप्त था कि अग्नि भी उसे जला नही सकती इसलिए राजा ने होलिका को प्रहलाद को गोद में लेकर अग्नि के बीच में बैठने का आदेश दिया,राजा जानते थे होलिका को तो कुछ नही होगा राजकुमार को दंड मिलेगा क्योंकि उसे तो कोई बचाने वाला है नहीं. परन्तु भगवान तो अपने भक्त में वास करते है तो फिर उसे कैसे कोई कष्ट दे सकता है, इसलिए जिस होलिका को वरदान प्राप्त था वो उस आग में भस्म हो गयी. प्रहलाद सुरक्षित बाहर आ गया. तब से होली के पर्व के एक दिन पहले होलिका और प्रहलाद की मूर्ति की स्थापना और पूजा की रीत चली आ रही  है. रात्रि में होलिका दहन किया जाता है, अगले दिन होली में रंगों को एक दूसरे को लगाकर पुराने गिले शिकवे भुलाने का प्रयास किया जाता है. वैसे पूर्वोत्तर में होलिका दहन की परंपरा नहीं है बल्कि इस दो दिवसीय पर्व के पहले दिन ठाकुर जी अर्थात भगवान् के चरणों में रंग-गुलाल अर्पित किया जाता है और फिर दूसरे दिन आम लोग परस्पर रंग खेलते हैं. होली का ये त्यौहार केवल देश में नहीं विदेशों में भी अपनी छाप छोड़ रहा है. होली में रंग का महत्वपूर्ण स्थान है, पर कई बार लोग इस रंगों के त्यौहार को बेरंग बना देते है,वो रंग,पेंट में खुजली करने वाले पाउडर, तेजाब जैसे ज्वलनशील तत्व मिलाकर लगाते है जो लगने पर अपना बुरा प्रभाव डालता है, इस तरह कई बार रिश्तों और दोस्ती में हमेशा के लिए खटास आ जाती है जो जीवन भर के लिए इस त्यौहार से दूरी का कारण बन जाती है.
अब समय आ गया है की हम मेलमिलाप और सामाजिक सहयोग के इस पर्व को पुनः उत्साह से मनाएं और इस दौरान समाज में घर कर गयी तमाम बुराइयों को होलिका की तरह होली की अग्नि में भस्म कर दे और बस रंग-अबीर-गुलाल के जरिये एक साथ मिलकर अपने सारे गिले शिकवे भुलाकर इस त्यौहार के महत्त्व को प्रतिपादित करें.  

Tuesday, February 27, 2018

असम: जहाँ नागरिकों को साबित करनी पड़ रही है अपनी नागरिकता !!


असम में बहुप्रतीक्षित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) का पहला मसौदा जारी होने के बाद गहमा गहमी का माहौल और बढ़ गया है । पहले मसौदे में राज्य के कुल 3.29 करोड़ आवेदनों में से 1.9 करोड़ लोगों को कानूनी रूप से भारत का नागरिक माना गया है लेकिन अभी नही तक़रीबन दो करोड़ लोगों का भविष्य दांव पर है क्योंकि यदि वे यह प्रमाणित नहीं कर पाए कि वे भारत के नागरिक हैं तो उन्हें न केवल यहाँ के नागरिकों को मिलने वाली मूलभूत सुविधाओं से हाथ धोना पड़ेगा बल्कि देश छोड़ने की नौबत भी आ सकती है असम देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ नेशनल रजिस्टर आफ सिटीजंस अर्थात राष्ट्रीय नागरिक पंजीयन या एनआरसी है । सबसे पहले वर्ष 1951 में असम में एनआरसी तैयार किया गया था दरअसल असम में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशियों और अन्य विदेशी लोगों की पहचान कर उन्हें बाहर निकालने के लिए एनआरसी की प्रक्रिया पर अमल किया जा रहा है ।
आधिकारिक जानकारी के मुताबिक  पूरी प्रक्रिया इसी वर्ष अर्थात 2018 के अंदर पूरी कर ली जायेगी क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने एनआरसी का काम पूरा करने के लिए समय सीमा बढ़ने से इनकार कर दिया है । इसका मतलब यह है कि जून माह तक हर हाल में राज्य सरकार और इस काम से जुड़ी एजेंसियों को यह काम पूरा करना ही होगा और तब तक लगभग दो करोड़ लोगों का समय उहापोह की स्थिति में बीतेगा । आम लोगों की जानकारी के लिए यह बताना जरुरी है कि असम में एनआरसी के लिए  आवेदन की प्रक्रिया मई, 2015 में शुरू हुई थी, जिसमें समूचे असम के 68 लाख 27 हजार परिवारों से 6 करोड़ से ज्यादा दस्तावेज मिले थे । बताया जाता है कि इनमें 14 प्रकार के दस्तावेज शामिल हैं । इस प्रक्रिया को पूरा करने में 40 हजार सरकारी कर्मचारियों के अलावा निजी क्षेत्र के 8 हजार से ज्यादा कर्मियों की सेवा ली गयी है । एनआरसी के बारे में आम लोगों को जागरूक बनाने के लिए गाँव पंचायत और वार्ड स्तर पर अब तक 8 हजार 407 बैठके की गयी और यह सिलसिला अब तक जारी है ।
अख़बारों में 11 सौ से ज्यादा विज्ञापन और टीवी-रेडियो पर 28 हजार से ज्यादा जागरूकता विज्ञापन प्रसारित किए गए । यही नहीं, 40 टेराबाईट स्टोरेज क्षमता वाला अत्याधुनिक डाटा सेंटर भी बनाया गया ताकि डाटा प्रोसेसिंग में कोई परेशानी न आये । एनआरसी कॉल सेंटर ने महज 7 माह के दौरान फोन के जरिए लगभग 11 लाख लोगों की शंकाओं का समाधान किया । इसके लिए 211 फोन आपरेटरों की सेवाएं ली गयीं । एनआरसी आवेदन पर केन्द्रित वेबसाइट को ही अब तक 50 लाख से ज्यादा हिट मिल चुके हैं, वहीँ लीगेसी डाटा पर केन्द्रित वेबसाइट पर हिट्स की संख्या 7 माह में 17 करोड़ तक पहुँच गयी है ।
एनआरसी की संपूर्ण प्रक्रिया पर निगरानी रख रहे उच्चतम न्यायालय ने करीब दो करोड़ दावों की जांच के बाद 31 दिसंबर तक एनआरसी का पहला मसौदा प्रकाशित करने का आदेश दिया था । पहले मसौदे में कुल  आवेदकों में से 1करोड़ 90 लाख लोगों की भारतीय नागरिकों के रूप में पहचान कर ली गई है । एनआरसी में नाम नहीं होने के कारण मची गफलत को दूर करते हुए रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (आरजीआई) शैलेश ने गुवाहाटी में पत्रकारों के साथ बातचीत में स्पष्ट किया है कि बाकी नामों की विभिन्न स्तरों पर जांच की जा रही है । जैसे ही जांच पूरी हो जायेगी हम लोग अन्य मसौदा भी ले आयेंगे । एनआरसी के राज्य समन्वयक प्रतीक हजेला ने भी साफ़ तौर पर कहा कि जिन लोगों का नाम पहली सूची में शामिल नहीं है, उन्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है । हजेला ने कहा कि नामों की जांच एक लंबी प्रक्रिया है इसलिए ऐसी संभावना है कि पहले मसौदे में कई ऐसे नाम छूट सकते हैं जो एक ही परिवार से आते हों । चिंता की जरूरत नहीं है क्योंकि बाकी के दस्तावेजों का सत्यापन चल रहा है । वहीं राज्य के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने बताया कि उच्चतम न्यायालय के आदेश के मुताबिक एनआरसी के दो और मसौदे होंगे और पहले प्रकाशन में जिन वास्तविक नागरिकों के नाम शामिल नहीं हो पाए हैं उनके दस्तावेजों के सत्यापन के बाद उन्हें शामिल किया जाएगा ।
ये सभी आश्वासन सुनने में तो सकारात्मक लगते हैं लेकिन जिन लोगों के या फिर एक ही परिवार के जिन सदस्यों के नाम एनआरसी की पहली सूची में शामिल नहीं हो पाएं हैं उनकी तो जान अटकी है । पहली सूची के प्रकाशन के बाद ऐसे सैकड़ों मामले सामने आए हैं जिसमें किसी परिवार में बच्चों के नाम तो सूची में शामिल हो गए हैं लेकिन माँ-बाप का नाम नहीं है तो कहीं स्थिति इसके उलट है और कहीं कहीं किसी एक अभिभावक को भारतीय नागरिक का दर्जा मिल गया है तथा परिवार के अन्य लोगों के आवेदन की जांच चल रही है । कुल मिलाकर देखा जाए तो आने वाले तीन महीने असम के करोड़ों लोगों के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बनकर सामने आयेंगे और तब तक सिवाए इंतज़ार के आम लोग कुछ और कर भी नहीं सकते ।




Wednesday, February 14, 2018

मनोरंजन के नाम पर क्या गंदगी परोस रहा है टीवी !!



                             
क्या बुआ-मामा जैसे रिश्ते हमारे परिवारों को जोड़ने की कड़ी है या फिर तोड़ने की ? क्या जोधाबाई-पद्मावती या फिर चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रेम आज की युवा पीढ़ी के भोंडे प्रेम की तरह था या फिर पांच साल के बच्चे को ‘एक आँख मारू तो....’नुमा गीत पर अपनी गायन या नृत्य प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए वैसे ही अश्लील हावभाव प्रदर्शित करने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है? दरअसल ये तमाम सवाल आज टीवी पर चल रहे विभिन्न सीरियलों और कथित रियल्टी शो से उपजे हैं.
क्या आज का मनोरंजन वाकई इस श्रेणी का है, जो हमारे जीवन में कुछ अच्छे संस्कारों का बीज बो सके,शायद नहीं क्योंकि मनोरंजन के रूप में हमें जो परोसा जा रहा है,वो केवल वास्तविकता से परे और काल्पनिक संसार को तो बनाता है.कहीं ना कही आपसी रिश्तों में दूरियों का सबब भी बना है,आप सोचेंगे ऐसा क्यों तो उस से जुड़ा एक उदाहरण टीवी में दिखाए जा रहे धारावाहिकों में कॉमेडी के नाम पर भी फूहड़ता का परिचय मिलता है,वही पारिवारिक धारावाहिक में रिश्तों को काफी तोड़ मरोड़ के पेश किया जाता है,बल्कि रिश्तों में प्यार,अपनापन,सहयोग,सम्मान,विश्वास को दरकिनार करके अपमान,नफरत, धोखा का बोलबाला दिखाया जाता है,जिसने समाज में एक विकृत मानसिकता को जन्म दिया है, ये कहीं ना कहीं समाज के माहौल को बिगाड़ रहा है.इसी तरह रिएलिटी शोज़ ने प्रतिभाओं को आगे लाने के साथ-साथ बच्चों को उनकी उम्र से ज्यादा बड़ा बना दिया है,इन शोज़ में दो शो की चर्चा करना जरूरी समझती हूँ एक है सारेगामापा लिटिल चेम्प्स जिसने बच्चों को गाने के क्षेत्र में नाम कमाने और फिल्मों में गाने का मौका तो दिलाया है, पर उस कार्यक्रम में जजों और प्रतिभागियों के बीच चुनौती देने का एक राउंड शामिल किया था,जिसमें जजों ने प्रतिभागियों को अलग-अलग तरह के गाने की चुनौती दी, पर जो चुनौती प्रतिभागियों के द्वारा जजों के लिए रखी वो सम्मान का ह्रास ही कहा जाये,तो अतिश्योक्ति नहीं होगी उस श्रंखला में जजों की आधी मूँछ,बालों को कटवाना,शास्त्रीय गायकों को रैप जैसे गीत गाने बोलना, चूहों को मुंह से उठाना, उन्हें किसी भी धुन पर डांस करने को कहा जाता था,चेहरे पर कुछ भी लगा देना,उनकी इच्छा ना होते हुए भी उन्हें करने पर मजबूर होना पड़ता था,जैसे बच्चों के माध्यम से उनके व्यक्तित्व को धूमिल करने के प्रयास ज्यादा थे.इसी तरह बिग बॉस में भी प्रतिभागियों द्वारा एक दूसरे पर व्यक्तिगत कटाक्ष,होस्ट के साथ उनका व्यवहार,इन सबसे ऊपर साजिशों की भरमार,बिग बॉस द्वारा दिए गये टास्क में भी आपसी द्वेष का पुट साफ़ दिखाई देता था,जैसे इस बार के सीजन में पड़ोसियों को एक दूसरे पर नज़र रखने जेसे टास्क लांच किए,साथ-साथ उनके बीच सारी मर्यादाएं तोड़ते हुए चुम्बन और उनके बीच डेटिंग जेसे टास्क से किस तरह के मनोरंजन की कल्पना की गयी,क्या इस तरह के शोज परिवार के साथ देखे जा सकते है,इनके अलावा कुछ ऐतिहासिक,धार्मिक धारावाहिक जो इस समय प्रसारित हो रहे है,उनमें जो भी दिखाया है, उसकी प्रमाणिकता और सत्यता कहाँ तक सही है,जैसे जोधा-अकबर,पोरस,पृथ्वी-वल्लभ,टीपू सुल्तान,महारानी लक्ष्मीबाई,शेरे-ए पंजाब महराजा रणजीत सिंह,चन्द्रकान्ता, पेशवा बाजीराव, चन्द्रगुप्त मौर्य,चित्तोड़ की रानी पद्मिनी,चाणक्य,मिर्ज़ा ग़ालिब,रज़िया सुल्तान,इसीतरह धार्मिक विषयों पर आधारित सीरियलों जैसे धर्मक्षेत्र,द्वारकाधीश भगवान श्री कृष्,लवकुश, पदमावतारश्रीकृष्ण,संकट मोचन महाबली हनुमान,विष्णु पुराण, सिया के राम, महाकाली,सूर्यपुत्र कर्ण इत्यादि जैसे सीरियलों में जो भी कुछ प्रदर्शित किया जा रहा है वो ग्रंथों से भी परे प्रतीत होता है.
   प्राचीन समय से ही मानव जीवन में अनेक आवश्यक भाग है, जो उसके लिय अनुकूल जीवन में मददगार है,जिनमें आवास, शिक्षा,आहार, व्यवसाय,और मनोरंजन प्रमुख है. पहले के समय में खेलकूद और लोकसंगीत ही मनोरंजन का माध्यम था,धीरे-धीरे विकास के दौर में इन साधनों में भी बदलाव आया, रेडियो और टेलीविजन ने इस में एक नया आयाम जोड़ा.रेडियो ने शहरों और ग्रामों में लोगों को बाहरी दुनिया से जुड़ाव महसूस कराया वरन उनके लिए ज्ञानवर्धन और गीत संगीत से भी अपनत्व कायम किया,रेडियो केवल सुनकर मनोरंजन करवाता था,वही दूसरी ओर टेलीविज़न ने सुनने और देखने वाले मध्यम के तौर पर सभी को आश्चर्यचकित किया. आज विज्ञानं की नयी क्रांति  मनोरंजन के साधनों में नूतन स्वरुप को जन्म दिया है. इनमें मोबाइल का अविष्कार,होम थियेटर,इन्टरनेट गेम्स,सीडी प्लेयर्स,प्रमुख है. आज बच्चों का जीवन इन्ही में सीमित है, वे अपने परम्परागत मनोरंजन के साधनों को हीन दृष्टि से देखते है,उनके लिए मोबाइल,लैपटॉप के इर्दगिर्द जीवन पूर्ण है.पर क्या आज जिस तरह का मनोरंजन हमारे सामने आ रहा है वो हमारे बच्चों को क्या सिखा रहा है, मनोरंजन ने बच्चों को उम्र से पहले होशियार बना दिया. इंटरनेट ने बहुत से क्षेत्रों में काम आसान कर दिया है,एक बात ये भी है कि इंटरनेट बच्चों को किताबी ज्ञान से विमुख कर रहा है.पहले हम कोई भी विषय की पढाई को उचित रूप से करने के लिए पाठ्य पुस्तक के साथ कई ओर किताबों से अध्ययन करते थे.आज बच्चों की पढाई और किसी भी समस्या का समाधान उन्हें इंटरनेट में ही दिखाई देता है,अगर उनके बड़े उनसे बोले इंटरनेट का कम उपयोग करने कहे तो उन्हें लगता है कि हम उनकी आज़ादी में खलल डाल रहे, क्या ये माहौल इंटरनेट की देन है? आज टेलीविज़न सीरियल्स भी कही ना कही इस सब के लिए जिम्मेदार है.जिनमें भले कॉमेडी से लेकर ऐतिहासिक और पारिवारिक से लेकर हारर जैसी तमाम श्रेणियों के सीरियल हमारे संस्कारों और संस्कृति का संरक्षण करने में सहभागी ना होकर असामाजिक,फूहड़ता और आधुनिकता के साथ पाश्चात्य संस्कृति को बढ़ावा देने का स्रोत बन गए हैं और   आज रिश्तों में दरार का कारण भी बन रहे है, एकल परिवार का बढ़ता ग्राफ भी भी इन्ही का परिणाम है. आज हम मनोरंजन के एक और पक्ष को इसमें शामिल किए बिना नहीं रह सकते,वो है चलचित्र अर्थात फिल्मों का मेला, जहाँ तकनीक की प्रगति तो साफ नजर आती है,वही दूसरी ओर उनकी कहानियां कई बार तो समाज के दर्पण का काम करती है और प्रेरणादायक भी हैं परन्तु कई बार चलचित्र में कहानी से ज्यादा अश्लीलताओं का बोलबाला होने लगा है,जैसे पैडमेन,टॉयलेट एक प्रेम कथा, दंगल,चक दे इंडिया,मेरी कोम,महेंद्र सिंह धोनी,सचिन तेंदुलकर,अज़हर जैसी फिल्में हम में जीवन में संघर्ष के साथ मिसाल बनने का जज्बा जगाती है,वही दूसरी ओर हम साथ-साथ हैं,विवाह,बंधन, दोस्ती, अनपढ़, रोबोट,कृष,मॉम ने हमारे बीच एक अलग छवि अभिव्यक्त की है,जहाँ तक अश्लीलता का बात है, तो मर्डर, हेट लव स्टोरी,जिस्म,टू स्टैट्स,मोहरा और कई फिल्में है,जिनमें गानों का प्रस्तुतीकरण अश्लीलता के सारे रिकार्ड तोड़ता आ रहा है. जब हमारे समाज और परिवारों के बीच इस तरह के मनोरंजन को पेश किया जा रहा है.तो सीबीएफसी[फिल्मों के निर्माण का नियन्त्रण बोर्ड] बीसीसीसी [टेलीविज़न कार्यक्रमों के विषयों पर नियन्त्रण]   जैसी संस्थाओं की लापरवाही का भुगतान हमें भोगना पड़ता है,जब इन संस्थाओं के कड़े मापदंड कुछ निजी स्वार्थों की बलि चढ़ रहे हो,तो क्या हमारा फ़र्ज़ नहीं बनता कि हम इन संस्थाओं की कार्यप्रणाली को सार्वजनिक करवायें, या अपनी जिम्मेदारी को निभाने में असफल संस्था के अधिकारियों को उनके पद से हटाने की मुहिम चलाने के प्रयासों से पीछे नहीं हटना चाहिए,इसके साथ-साथ सरकारों को भी कानून में बदलाव कर इनको सख्त से सख्त सज़ा का प्रावधान कराना चाहिए.