सादर ब्लॉगस्ते पर आपका स्वागत है।

Saturday, September 23, 2017

महालया पर सभी ने पूरी कर ली अपनी मुराद


सिलचर में मानो जनसैलाब उमड़ आया । जनसैलाब शब्द भी बराक नदी के किनारे उमड़ी भीड़ के लिए छोटा प्रतीत होता है । यदि इससे भी बड़ा कोई शब्द इस्तेमाल किया जाए तो अतिसयोक्ति नहीं होगी । चारों ओर बस सिर ही सिर नजर आ रहे थे । सभी ओर बस जनसमूह था- पुल पर,सड़कों पर, नदी की ओर आने वाले रास्तों पर । ऐसा लग रहा था जैसे आज शहर की सारे मार्ग एक ही दिशा में मोड़ दिए गए हों। बूढ़े, बच्चे, महिलाएं और मोबाइल कैमरों से लैस नयी पीढ़ी, परिवार के परिवार चले आ रहे थे । सुबह चार बजे से शुरू हुआ यह सिलसिला कई घंटों तक जारी रहा । इस तरह की भीड़ मैंने तब देखी थी जब वर्षों के इंतज़ार के बाद पहली ब्राडगेज ट्रेन ने यहाँ का रुख किया था या फिर महालया पर।
विभिन्न उम्र,जाति और धर्मों के लोग खास बंगाली वेश-भूषा में गाजे-बाजे के साथ बराक घाटी में देवी दुर्गा के स्वागत के लिए एकत्रित हुए। बराक नदी की ओर जाने वाली सड़कें खचाखच भरी हुई थीं और लोग ढोल-ढमाके के बीच देवी की आराधना में जुटे थे।इस दिन का सबसे बड़ा आकर्षण आकाशवाणी से सुप्रसिद्ध गायक बीरेंद्र कृष्ण भद्र के चंडी पाठ का विशेष प्रसारण भी है। आकाशवाणी सिलचर द्वारा अपनी स्थापना के समय से ही महालया के दिन इसका प्रसारण किया जा रहा है। सुबह 4 बजे से प्रसारित यह स्तुतिगान आज भी लोगों को भाव-विभोर कर देता है।स्थानीय लोगों के मुताबिक महालया पर रेडियो पर बजने वाला चंडी पाठ उनकी सुबह का अनिवार्य हिस्सा है और वे इसके बिना महालया की कल्पना ही नहीं कर सकते। बताया जाता है कि कोलकाता (तब कलकत्ता) में 80 के दशक में एक बार महालया पर इस पारंपरिक चंडी पाठ के स्थान पर कुछ ओर प्रसारित करने की कोशिश हुई थी तो लोगों ने आकाशवाणी भवन पर पथराव कर दिया था।  
वैसे बराक घाटी ही नहीं,असम के कई शहरों , पश्चिम बंगाल,ओडिशा सहित कई राज्यों में आज के दिन का खास महत्व है परन्तु असम की बंगाली बहुल बराक घाटी में महालया के परंपरागत उत्साह और गरिमा की बात ही अलग है । वैसे उत्तर भारत के किसी शहर में यहाँ बताया जाए कि लोग सुबह चार बजे से नहा-धोकर नदियों के तट पर हजारों की संख्या में जमा हो जाते है तो शायद वहां लोग इस बात पर भरोसा न करें क्योंकि उनके लिए तो सुबह के चार यानी आधी रात है। अब यह बात अलग है कि पूर्वोत्तर पर भगवान भास्कर खुद मेहरबान है तभी तो यहाँ समूचे देश की तुलना में तक़रीबन घंटे भर पहले सूर्य के दर्शन हो जाते हैं इसलिए यहाँ सुबह के चार भोपाल,लखनऊ या दिल्ली के चार से काफी अलग हैं।
सिलचर में बराक नदी के घाट पर उमड़ी भीड़ को देखते हुए एक ओर जहाँ सामान्य व्यवस्था बनाने के लिए सुरक्षा कर्मी मशक्कत कर रहे थे तो वहीँ, दूसरी ओर राज्य आपदा प्रबंधन बल के जवान भी पूरीतरह मुस्तैद थे। स्वयं डिप्टी कमिश्नर और पुलिस अधीक्षक साडी गतिविधियों पर नजर रखे थे।इसका अहम् कारण बराक पर बने सदर घाट पुल का जर्जर हो जाना है। प्रशासन इस बात से डरा हुआ था कि पुल पर बढ़ती भीड़ के वजन से कहीं कोई अनहोनी न हो जाए और त्योहारों का रंग फीका पड़ जाए। डिप्टी कमिश्नर एस लक्ष्मणन ने तो लोगों से अपील भी की कि महालया के जोश में होश न खोएं, लेकिन इन सबसे बेपरवाह आम लोगों के लिए तो यह पिकनिक का दिन था इसलिए शहर में सुबह से सजी खानपान की दुकानों पर भी लोगों का ताँता लगा रहा । कहीं गरमागरम जलेबियाँ लोगों को ललचा रहीं थी तो कहीं सिंघाड़े(समोसे) की खुशबू मुंह में पानी ला रही थी। बच्चों के लिए खिलौनों की दुकाने तो युवाओं के लिए दिल के आकार के गुब्बारे। महालया के बहाने कई युवा जोड़ों को साथ साथ समय बिताने और हाल-ऐ-दिल सुनाने का मौका भी हाथ लग गया। सड़क पर लक्ष्यहीन भागती मोटरसाइकल और इत्र से महकते युवाओं की तलाशती नजरें महालया को कुछ और ही रंग देने के लिए काफी थीं।
महालया दरअसल में एक संस्कृत शब्द है जिसमें महा का अर्थ होता है महान और आल्या का अर्थ है निवास । महालया नवरात्र की शुरुआत को दर्शाता है । महालया के दिन मां दुर्गा की पूजा की जाती है और उनसे प्रार्थना की जाती है कि वो धरती पर आएं और अपने भक्तों को आशीर्वाद दें । पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन मां दुर्गा धरती पर आकर असुर शक्तियों से अपने बच्चों की रक्षा करती हैं । ये देवी पक्ष की शुरूआत के साथ पितृ पक्ष का अंत भी माना जाता है ।
एक अन्य मान्यता के अनुसार मां दुर्गा का भगवान शिव से विवाह होने के बाद जब वह अपने मायके लौटी थीं और उनके आगमन के लिए खास तैयारी की गई थी । इस आगमन को ही अब महालया के रूप में मनाया जाता है । वहीँ, बांग्ला मान्यता के अनुसार महालया के दिन मां दुर्गा की मूर्ति बनाने वाले मूर्तिकार उनकी आंखे बनाते हैं इसे चक्षुदान के नाम से भी जाना जाता है । महालया के अगले दिन से मां दुर्गा की नौ दिवसीय पूजा के लिए कलश स्थापना की जाती है ।

*(लेखक आकाशवाणी सिलचर में समाचार संपादक हैं )

Saturday, June 3, 2017

बिना पंखों के आसमान छूने का हौंसला

प्रतिभाएं कभी सुविधाओं की मोहताज नहीं होती बल्कि वे अवसरों का इंतज़ार करती हैं ताकि वक्त की कसौटी पर स्वयं को कस सकें. असम बोर्ड की इस बार की परीक्षाओं में कई ऐसे मेधावी छात्रों ने अपने परिश्रम का लोहा मनवाया है जिनके घर में पढाई का खर्च निकालना तो दूर, दो वक्त के खाने के भी लाले पड़े रहते हैं. 

सिलचर के राज सरकार के पास रंग और ब्रश खरीदने के पैसे नहीं हैं फिर भी उसने फाइन आर्ट्स में पूरे राज्य में अव्वल स्थान हासिल किया है. राज को 100 में से 100 अंक मिले हैं. आलम यह है कि उसके स्कूल में इस विषय को पढ़ाने-सिखाने वाले शिक्षक तक नहीं है और उसके माता-पिता भी दैनिक मजदूर हैं इसलिए घर में इस कला को समझने वाला कोई नहीं है लेकिन एकलव्य की तरह साधना करते हुए राज ने अपने परिश्रम से ऐसा मुकाम हासिल कर लिया है अब राज्य सरकार से लेकर कई स्थानीय संस्थाएं भी उसकी मदद को आगे आ रही हैं.

राजदीप दास की कहानी तो और भी पीड़ादायक है. बचपन से ही पोलियो के कारण वह चल फिर नहीं सकता था लेकिन पढाई के प्रति लगन देखकर उसके पिता प्रतिदिन गोद में लेकर स्कूल आते थे. ऐन परीक्षा के पहले उसके दाहिने हाथ ने भी काम करना बंद कर दिया. रिक्शा चालक पिता की हैसियत इतनी नहीं थी कि तुरंत इलाज करा सकें. तमाम विपरीत परिस्थितियों के बाद भी राजदीप ने पढाई नहीं छोड़ी और उसने बोर्ड परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास कर परिवार और स्कूल का नाम रोशन कर दिया. अनपढ़ माता पिता के लिए तो अपने दिव्यांग बेटे की यह सफलता मेरिट लिस्ट में पहला स्थान पाने जैसी है. अब राजदीप प्रतियोगी परीक्षाओं के जरिए बड़ा अधिकारी बनकर न केवल अपने परिवार के आर्थिक संकट को दूर करना चाहता है बल्कि अन्य बच्चों के लिए भी आदर्श बनना चाहता है.  

मजदूर परिवार की दायिता पुष्पा की कहानी तो और भी अनूठी है. असम बोर्ड के 12वीं के नतीजों में उसे फेल दिखाया गया था। छात्रा और उसके स्कूल ने जब बोर्ड से इस संबंध में बात की तो पता चला कि वह फेल नहीं, बल्कि उसने टॉप टेन में शामिल है।

दरअसल बोर्ड की गफलत के चलते दायिता को एक विषय में अनुपस्थित मानकर फेल कर दिया गया । जांच में पता चला कि छात्रा अनुपस्थित नहीं थी बल्कि गलती से उसके अंक जुड़ नहीं पाए थे। बोर्ड ने अपनी गलती मानते हुए तत्काल ही उसका संशोधित रिजल्ट घोषित करते हुए बताया कि दायिता पुष्पा ने टॉप टेन में सातवां स्थान हासिल किया है। उसे कुल 500 में 471 अंक मिले हैं।


लिंटन नामसुद्र, अमन कुर्मी,विक्रम सूत्रधार जैसे कई नाम हैं जिन्होंने इस वर्ष गरीबी, स्कूल से दूरी, संसाधनों का अभाव जैसी तमाम प्रतिकूल स्थितियों में भी अपनी मेहनत से साबित कर दिया है कि यदि किसी भी काम को करने की लगन और उत्साह हो तो सफलता की राह कोई नहीं रोक सकता.   

Tuesday, April 4, 2017

हास्य व्यंग्य : म्हारे गुटखेबाज किसी पिकासो से कम न हैं


     पने देश में कला की तो कोई कद्र ही नहीं है। आए दिन कोई न कोई ऐसा सरकारी फरमान जारी होता रहता है, जो कला का मानमर्दन करने को तत्पर रहता है। अब गुटखेबाज कलासेवी जीवों को ही ले लीजिए। कलासेवा की खातिर कड़ी और ज़हरीली चेतावनी का सन्देश पढ़ने के बावजूद भी अपने मुँह में नुकसानदायक ज़हरीला गुटखा गटकने वाले महान जीवों का त्याग भला वे लोग कहाँ समझेंगे, जिन्होंने कभी भी गुटखा छूने का साहस ही न किया हो। गुटखा को मुँह में धरकर पिच-पिच की ध्वनि का घोष करते हुए दफ्तर से लेकर पुरातत्व के महत्त्व की इमारत तक को पिचकारी मारकर भाँति-भाँति प्रकार की कलाकृतियों का निर्माण करनेवाले कलाकारों के परिश्रम का कुछ तो ध्यान रखना चाहिए। सरकारी-गैरसरकारी दफ्तरों की सीढियाँ, दरवाजे व शौचालय की सुंदरता इन कलासेवकों के दम पर ही टिकी हुई है। इनके द्वारा ऐतिहासिक इमारतों पर गुटखा खाकर मुँह में गंभीर गुटखा मंथन के उपरांत उपजे अनोखे रंग के द्रव्य द्वारा ऐसी अनोखी कलाकृतियों  का निर्माण किया जाता है, कि जिन्हें देखकर बड़े-बड़े चित्रकार भी दाँतों तले उँगलियाँ दबाने को विवश हो जाते हैं। देशी-विदेशी पर्यटक तो इन कलाकृतियों को देखकर इन्हें निर्मित करनेवाले गुटखेबाज कलासेवियों की कलाकारी के आगे नतमस्तक हो उठते हैं। कोई माने या न माने लेकिन घूमकर वापस लौटने पर पर्यटकों के मन-मस्तिष्क पर ऐतिहासिक इमारतों अथवा स्थलों की छवि बेशक न रहे पर गुटखेबाज कलासेवियों द्वारा प्रयत्नपूर्वक निर्मित की गईं अद्भुत कलाकृतियों की मनमोहक छवि गहराई से पैठ बना लेती हैं। यदि इन कलासेवियों की कला की प्रशंसा एक वाक्य में करें तो ‘म्हारे गुटखेबाज चित्रकारी में किसी पिकासो से कम न हैं’। गुटखेबाज कलासेवियों द्वारा विकसित की गई इस अनोखी भित्ति चित्रकला को संरक्षित करने की ओर हमें गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। यदि सरकार इस पुनीत कार्य को करने में उदासीनता दिखाती है तो स्वयंसेवी संगठनों एवं भले लोगों को मदद के लिए आगे बढ़कर आना चाहिए। वरना ऐसी अद्भुत भित्ति चित्रकला के विलुप्त होने की पूरी-पूरी संभावना है। इसके विलुप्त होने से गुटखेबाज कलासेवियों द्वारा सालों-साल से निरंतर किया जा रहा कठोर परिश्रम माटी में मिल जाएगा। इसलिए गुटखा, पान और तंबाकू सेवन पर प्रतिबंधरुपी कटार चलाकर इस कला को नष्ट करने का प्रयास बहुत ही निंदनीय है और हम सभी कलाप्रेमी एक मत से इस फैसले की कड़ी से कड़ी निंदा करते हैं।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 
कार्टून गूगल से साभार 

Monday, March 6, 2017

युगांडा का स्टेट हाऊस यानि सत्ता का एक मात्र केंद्र



ये है युगांडा के राष्ट्रपति का आधिकारिक निवास यानि स्टेट हाउस (State House) या राष्ट्रपति भवन...वैसा ही जैसा दिल्ली में हमारा राष्ट्रपति भवन है या फिर अमेरिका का व्हाइट हाउस. राजधानी कम्पाला(Kampala) से लगभग 37 किलोमीटर दूर एंटेबे (Entebbe) शहर में बना यह स्टेट हाउस तक़रीबन साढ़े 17 हजार वर्गमीटर में फैला है. अन्य देशों से आने वाले मेहमानों का स्वागत यहीं किया जाता है. हाल ही में 22-23 फरवरी के दौरान हमारे उपराष्ट्रपति श्री मो हामिद अंसारी युगांडा गए थे हमें भी इस स्टेट हाउस को अन्दर से देखने का मौका मिला. इस झक सफेद इमारत का निर्माण हमारे राष्ट्रपति भवन (पहले वाइसराय भवन) की तरह ब्रिटिश हुकूमत ने कराया था. तब एंटेबे  ही युगांडा की राजधानी थी. युगांडा को 1966 में आज़ादी मिली और तब से यह यहाँ के राष्ट्रपति का स्थायी आवास और सत्ता का आधिकारिक केंद्र है. चूँकि एंटेबे में ही युगांडा का अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है इसलिए कम्पाला के राजधानी बनने के बाद भी एंटेबे शहर का महत्व बना हुआ है. वैसे युगांडा में एक से ज्यादा स्टेट हाउस हैं लेकिन फिलहाल सत्ता की धुरी यही भवन है.

युगांडा के प्रथम राष्ट्रपति सर एडवर्ड मुतिसा (Sir Edward Muteesa) ने यहाँ रहना पसंद नहीं किया क्योंकि वे अपने महलों का मोह नहीं छोड़ पाए. इसीतरह युगांडा के सबसे चर्चित राष्ट्रपति ईदी अमीन (Idi Amin) ने भी 1971 की शुरुआत में तो इसका इस्तेमाल किया लेकिन बाद सुरक्षा के लिहाज से वे भी 1976 में इस सरकारी आवास को छोड़कर चले गए. बाद के राष्ट्रपतियों ने भी स्टेट हाउस की उतनी कद्र नहीं की लेकिन मौजूदा राष्ट्रपति योवेरी के मुसेवनी (Yoweri K Museveni) ने न केवल इसको अपना आधिकारिक आवास बनाया बल्कि इसकी साज-संवार भी की. स्टेट हाउस को महज 1584 वर्गमीटर से बढ़ाकर साढ़े 17 हजार वर्गमीटर तक फैलाने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है. यहाँ के सम्मलेन कक्ष में एक साथ 500 मेहमान बैठ सकते हैं. इसके अलावा, स्टेट हाउस परिसर में प्रथम महिला (First Lady) का निवास, राष्ट्रपति के सलाहकारों के घर, सुरक्षा भवन, संचार भवन, कई सम्मलेन कक्ष, अतिथि कक्ष, मनोरंजन कक्ष और हेल्थ क्लब भी है. यह खूबसूरत भवन अब युगांडा की पहचान और सत्ता का प्रतीक है. स्टेट हाउस हमारे उपराष्ट्रपति के अलावा ब्रिटेन की महारानी सहित कई दिग्गजों की मेजबानी कर चुका है.

#Uganda  #VicePresidentvisit  #StateHouse  #Kampala   #Entebbe  #Yoweri K Museveni   #PresidentHouse #HamidAnsari