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Sunday, December 23, 2012

कविता: चौकीदार


रात को भटकते हुए बोला चौकीदार
अपनी भी ज़िंदगी कोई जिंदगी है यार
रात भर यूँ ही भूत से भटकते रहो
खाली सड़क पर डंडा पटकते रहो
जागते हुए अपनी रात करो काली
कोई ढंग की नौकरी भी तो नहीं मिलती साली
डबल शिफ्ट करते - करते
चल रही अपनी कहानी
आधी पगार छीन लेता है
साला ठेकेदार हरामी
घरवाले गाँव में रहें चैन से
इसीलिए यहाँ मर रहा हूँ
एक वक्त खाकर ही
जैसे-तैसे गुज़ारा कर रहा हूँ
मन चाहता है कि अपने बच्चे भी
खूब पढ़ें, लिखें, आगे बढ़ें
और भूल से भी कभी
अपने बाप की तरह चौकीदार न बनें
दो वक्त की रोटी खाकर
वे तंदुरुस्त रहेंगे
कम से कम मेरी तरह
मरीज तो न लगेंगे
इन सुहाने सपनों को देखते हुए
उस चौकीदार को
उस सर्दीली रात में
ऐसी गहरी नींद आई कि
अगली सुबह कॉलोनी वालों को
उसकी लाश कुर्सी पर
मुस्कुराती हुई नज़र आई.



3 comments:

  1. बहुत मर्मस्पर्शी रचना...

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  2. मर्मस्पर्शी रचना, बधाई बेहतरीन रचना के लिए

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निवेदक-
सुमित प्रताप सिंह,
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